तो साहबान जिल्ले सुहानी के स्वदेशी भूत का शिकार अब हमारी खूबसूरत जुबां हिंदी होने जा रही है इसका श्रीगणेश भारत के सूचना प्रसारण मंत्रालय के उस आदेश में स्पष्ट झलकता है जो भारत के तमाम सूचना प्रसारण केंद्रों को जारी किया गया है इसमें कहा गया कि अब उद्घोषक हिंदी बोलते वक्त उर्दू शब्दों का प्रयोग नहीं कर पाएंगे। उर्दू एक मीठी जुबान है जो भारत में ही पैदा हुई और जब हिंदी का निर्माण हुआ भारतेन्दु युग में तो उसमें संस्कृत, अरबी, फारसी, उर्दू के साथ देशज भाषाओं के शब्दों को शुमार किया गया। बाद में इसमें अंग्रेजी शब्द भी हूबहू ले लिए गए। इससे हिन्दी हिंदुस्तानी जुबान बन गई।
आज यदि उर्दू के शब्दों से नफ़रत की बात सामने आई है कल को अरबी, फारसी और अंग्रेजी शब्द भी निकाले जाने चाहिए। उर्दू तो इस देश की ही भाषा है बाकी तो विदेशी भाषाएं हैं। इस तरह की हरकत कर नफ़रत का जो भाव देश में पनपाया गया है खासकर मुसलमानों से जोड़कर इसे देखना गलत है। वे यह जान लें कि, तमिल, कन्नड, बंगाली, असमी, मराठी, गुजराती मुसलमान उर्दू नहीं बोलते वहां बोली जाने वाली भाषा का ही इस्तेमाल करते हैं। कमोबेश भारत के मध्य क्षेत्र को छोड़ दें तो हिंदी का भी यही हाल है। इसलिए ही उसे आज तक राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं मिल पाया है।
देखा जाए तो वास्तव में कई शताब्दियों से भारत के व्यापारिक संबंध अरब देशों से रहे हैं। अरबी भाषा का जब संस्कृत से मिलन हुआ तो संस्कृत के कई शब्द अरबी भाषा में आ गए जैसे कपि’, मूषक ’चर्म’ और ’कर्णफूल’ वगैरह
इसी प्रकार – कालांतर में कुछ विदेशी लोग भारत की समृद्धि से आकृष्ट होकर भारत पर हमला करने आए परंतु यहाँ की संस्कृति देखकर यहीं बस गए। उस समय इनकी सेना में अरब, फ़ारस, तुर्किस्तान, मंगोलिया और मध्य एशिया के सैनिक थे जो आपस में अपनी मातृ भाषा अरबी, फारसी, तुर्की अरबी, तुर्की और मंगोल आदि भाषाओं में बात करते थे। जब शासक वर्ग ने यहाँ बसने का इरादा किया तो उन्होंने अपनी सेना के लिए यहाँ के स्थानीय लोगों की भर्ती की। उस समय भारत की भाषा अपभ्रंश थी। जब भारतीय सैनिकों का मेलजोल इन सैनिकों से हुआ तो भाषा की समस्या आड़े आई। इन सब भाषाओं के मेल से जिस खिचड़ी भाषा का जन्म हुआ उसे उर्दू कहा गया उर्दू शब्द अपने आप में तुर्की भाषा का शब्द है और इसका अर्थ है-छावनी या फौजी पड़ाव।
अमीर खुसरो पहले ऐसे प्रतिभावान व्यक्ति थे जिन्होंने इसे एक साहित्यिक रूप दिया और इसका नाम हिंदवी रखा। धीरे-धीरे इसी हिंदवी का खड़ी बोली रूप -हिन्दी में बदल गया और खिचड़ी रूप को रेख्ता या उर्दू कहा जाने लगा। परंतु लिपि को छोड़कर इन दोनों भाषाओं का व्याकरण, शब्द विन्यास और शब्दावली आपस में कॉमन रही और इसीलिए भाषा विज्ञान की दृष्टि से उर्दू को हिन्दी की छोटी बहन माना जाने लगा।
पिछले दो सौ वर्षों में उर्दू इतनी फली फूली कि अब इसको हिन्दी से अलग करके देखना कठिन है। अरबी और फ़ारसी के अनेक शब्द जैसे साबुन, चाक़ू और चश्मा आदि उर्दू के माध्यम से हिन्दी में आ गए हैं और अब इनके समानार्थक शुद्ध हिन्दी के शब्द नहीं मिलते। “हम जा रहे हैं”, यह वाक्य उर्दू भी है और हिन्दी भी। कुछ शब्द जोड़े में भी बोले जाते हैं, जिनमें एक शब्द उर्दू होता है और एक हिन्दी जैसे-रूप-रंग,दान-दहेज और लाज-शरम आदि।
अब ऐसी तालमेल वाली भाषा से कैसे विदेशी शब्द हटाए जा सकते हैं इनको हटाने में कई वर्ष लग जाएंगे और हटने के बाद हिंदी का स्वरूप इतना बेढब और बदसूरत हो जाएगा कि लोगों को इससे एलर्जी होने लगेगी।
इसलिए लगता है यह स्वदेशी का राग भाषा के मार्ग में हंसी का पात्र बन जाएगा।इससे हमारी अपनी मिली-जुली संस्कृति का स्वरूप भी नष्ट हो जायेगा।
आश्चर्यजनक यह है कि उर्दू से नफ़रत करने वाले हमारे जिल्ले सुहानी बिहार में जाकर विदेशी भाषा अंग्रेजी में लिखा भाषण पढ़ते हैं वहां हिंदी नहीं बोल सकते जबकि बिहार के लोग हिंदी भली-भांति समझते हैं। तो आगे बढ़ते मुल्क के पढ़ने और आगे बढ़ने के सपने संजोए बच्चों को स्वदेशी जुबान में पढ़ने के लिए कैसे बाध्य करेंगे। उनकी तमाम योजनाएं मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, स्मार्ट सिटी आदि का क्या हिंदी तर्जुमा होगा। स्वदेशी की सीख देने वाले क्या अपना, विदेशी चश्मा, घड़ी, कार, हवाई जहाज को त्यागेंगे?
कुल मिलाकर यह घोषणा संघ को खुश करने की उनकी सोची समझी रणनीति है। सूचना प्रसारण मंत्रालय की यह घोषणा कितनी कामयाब होगी यह तो समय बताएगा। लेकिन यह सच है देशवासी इसे कभी कुबूल नहीं करेंगे। लगता है दो अक्टूबर संघ की सौंवी वर्ष गांठ से पूर्व जिल्ले सुहानी संघ के आगे जाने क्या क्या समर्पित कर देंगे।
(सुसंस्कृति परिहार लेखिका और एक्टिविस्ट हैं।)