युगे-युगीन भारत राष्ट्रीय संग्रहालय: क्या संघ परिवार के ‘हिन्दुत्व परियोजना’ का ही एक हिस्सा है?

नयी दिल्ली के जनपथ पर स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय कोलकाता में स्थित भारतीय कला संग्रहालय के बाद देश का सबसे बड़ा संग्रहालय है। इसकी स्थापना सन् 1949 में हुई थी, हालाँकि वर्तमान संग्रहालय की इमारत 1960 में बनकर तैयार हुई, इसके पश्चात इसे जनता के लिए खोला गया। इस संग्रहालय में भारत में कहीं से भी प्राप्त कलाकृतियों का अनूठा संग्रह है। वर्तमान में इस संग्रहालय में 2 लाख से भी ज़्यादा भारतीय व विदेशी मूल की वस्तुएँ प्रदर्शित हैं। 

दिल्ली में नये संसद‌ भवन के निर्माण के लिए सेंट्रल विस्टा परियोजना के अंतर्गत अनेक ऐसी इमारतें गिरा दी गईं, जिनका निर्माण आज़ादी के बाद जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में हुआ था। दिल्ली में लुटियंस जोन में स्थित संसद भवन की जगह नयी संसद भवन की इमारत बनाई गई तथा इसके अंतर्गत दो शानदार इमारतों को गिराने की चर्चा उस समय चल रही थी, जिसमें एक जनपथ पर स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय तथा दूसरा राष्ट्रीय अभिलेखागार की इमारत है। सरकार द्वारा यह कहा गया, कि इस इमारत को गिराकर इसके अंदर की कलाकृतियों को नये बन रहे युगे-युगीन राष्ट्रीय संग्रहालय में स्थानांतरित कर दिया जाएगा।

तब देश के चर्चित इतिहासकारों तथा पुरातत्ववेत्ताओं ने कहा था, “इस संग्रहालय में देश की करीब 5000‌ साल पुरानी कलाकृतियाँ‌ संरक्षित हैं। इनको हटाकर अन्यत्र ले जाने से ढेरों के नष्ट हो जाने का ख़तरा है, क्योंकि बहुत सी चीज़ें अत्यंत प्राचीन होने के कारण इतनी नाजुक और संवेदनशील हैं, कि उनको अपने स्थान से हटाने मात्र से उनके नष्ट होने का ख़तरा है, परन्तु वर्तमान सरकार जवाहरलाल नेहरू द्वारा बनाई गई बहुमूल्य धरोहरों और इमारतों से बेहद नफ़रत करती है, इसी कारण से उसे राष्ट्रीय धरोहरों की कोई परवाह नहीं है।” यद्यपि जन-दबाव के कारण राष्ट्रीय संग्रहालय की इमारत गिराने तथा कलाकृतियों को स्थानांतरित करने की प्रक्रिया को कुछ समय के लिए रोक दिया गया था, लेकिन यह कहा गया कि नया युगे-युगीन राष्ट्रीय संग्रहालय बनते ही इन सारी कलाकृतियों को उसमें स्थानांतरित कर दिया जाएगा।

अब थोड़ा इस बात का विश्लेषण करते हैं, कि युगे-युगीन राष्ट्रीय संग्रहालय क्या है? जब देश इतने अधिक आर्थिक संकट से गुजर रहा है, धरोहरों को संरक्षित के लिए सरकार के पास पैसे नहीं हैं। दिल्ली में ही स्थित पुराने किले के पुरातत्व संग्रहालय की फ़र्श धंस जाने पर पुरातत्व विभाग यह कह रहा है, कि उसके पास निर्माण हेतु पैसे नहीं हैं, फिर लाखों-करोड़ों रुपए ख़र्च करके तथाकथित रूप से दुनिया के सबसे बड़े संग्रहालय को बनाने की ज़रूरत क्यों आन पड़ी? 

युगे-युगीन भारत राष्ट्रीय संग्रहालय ; जिसे सेंट्रल विस्टा परियोजना के तहत खाली किए गए ऐतिहासिक नार्थ और साउथ ब्लॉक में बनाया जाएगा। यह कहा जा रहा है, कि “यह दुनिया का सबसे बड़ा संग्रहालय होगा, जिसमें 950 से अधिक कमरे होंगे, इसका वर्ग मीटर 1.55 लाख से अधिक होगा। इसमें 5000 से अधिक वर्षों के भारतीय इतिहास को प्रदर्शित किया जाएगा, जिसमें भारत की प्राचीन सभ्यताओं, ज्ञान प्रणालियों, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और गणित के योगदानों को एक साथ प्रदर्शित किया जाएगा। इसको विकसित करने के लिए फ्रांस की एक संस्था फ्रांस म्यूजियम डेवलपमेंट (FMD) के साथ साझेदारी की गई है। 

दुनिया का सबसे बड़ा संग्रहालय ‘लुब्र संग्रहालय पेरिस’ फ्रांस में है। आख़िर इस मंदी के दौर में भारत सरकार को उससे भी बड़ा संग्रहालय बनाने की ज़रूरत क्यों आन पड़ी? इसमें किसी को आपत्ति नहीं हो सकती थी, कि एक बड़े संग्रहालय को बनाकर उसमें भारत के अतीत को प्रदर्शित किया जाए, परन्तु अतीत की व्याख्या इस तरह की गई है, कि संघ परिवार के ‘कथित गौरवशाली अतीत’ को दिखाने के लिए ही किया गया है।

भारत में ढेरों इतिहासकार और पुरातत्ववेत्ता हैं, जिन्होंने भारतीय सभ्यता-संस्कृति के सकारात्मक और नकारात्मक पक्षों को अपने लेखनों और अनुसन्धानों से उजागर किया है।‌ अभी तक कोई ऐसी सूचना नहीं है, कि संग्रहालय निर्माण में उनसे कोई सहयोग लिया गया है या सलाह देने के लिए कोई सलाहकार मंडल बनाया गया है। 

पिछले दिनों 24‌ अगस्त, 2025 के इंडियन एक्सप्रेस समाचारपत्र में इसके निर्माण से संबंधित एक लेख प्रकाशित हुआ है, जिसको पढ़ने से पता लगता है, कि सरकार किस तरह के अतीत को इस संग्रहालय में प्रदर्शित करना चाहती है? समाचारपत्र लिखता है, कि “ संग्रहालय की पहली भूतल गैलरी : जो 1500 वर्ग मीटर की  होगी, जिसका नाम ‘टाइम एण्ड टाइमलेसनेस’ होगा, जिसमें देश भर के संग्रहालयों में रखी लगभग 100 ऐतिहासिक कलाकृतियों का प्रदर्शन किया जाएगा। इसके बारे में कहा जा रहा है, कि यह ‘समय के साथ सभ्यतागत सम्बन्धों’ की पड़ताल करता है, जो सदियों के ‘सांस्कृतिक और वैज्ञानिक विकास’ को दर्शाता है।

यह गैलरी उत्तर और दक्षिण ब्लॉक में स्थित संग्रहालय परिसर का हिस्सा है, जिसमें हजारों वर्षों की कलाकृतियाँ होंगी। जिसके बारे में बताया जा रहा है, कि ये सभी क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करेंगी, जिसमें 2500-1700 की हड़प्पा केंद्र कालीबंगा में निर्मित ‘टेराकोटा रेत घड़ी’ से शुरू होकर 10वीं या 11वीं शताब्दी में निर्मित चोलकाल में बनी तमिलनाडु की कांस्य कलाकृतियाँ,‌1567 में निर्मित लाहौर की एक खगोल प्रयोगशाला तथा 5वीं शताब्दी में निर्मित गुप्त कालीन मूर्तियाँ,13वीं सदी में निर्मित कोणार्क सूर्य चक्र तथा इसके अलावा हिन्दू कलेंडर पञ्चांग की 18वीं सदी में निर्मित पाण्डुलिपि होंगी। इंडियन एक्सप्रेस ने बताया, कि युगे-युगीन संग्रहालय का मुख्य विषय ‘भारतीय सभ्यता के 5000‌ वर्ष’ हैं।

उत्तर और दक्षिणी ब्लॉक‌ में फैले विषयगत क्षेत्रों में विभाजित यह संग्रहालय भारत के अतीत से जुड़ी ऐतिहासिक घटनाओं, व्यक्तित्वों, विचारों और उपलब्धियों को प्रदर्शित करेगा, जिन्होंने इसके वर्तमान स्वरूप के निर्माण में योगदान दिया। 

संग्रहालय की प्रथम गैलरी के बारे में बताया जा रहा है, कि यह इस वर्ष के अंत तक बनकर तैयार हो जाएगा। वास्तव में इस प्रथम गैलरी से पता लग जाता है, कि इस संग्रहालय के निर्माण का असली उद्देश्य क्या है? इसमें संदेह करने की गुंजाइश नहीं है, कि 5000 साल पुरानी इस सभ्यता का गौरवशाली अतीत भी रहा है, परन्तु यह अतीत केवल हिन्दू अतीत नहीं था, इसमें विभिन्न जातियों, धर्मों, सभ्यताओं तथा बाहर से आए लोगों का योगदान था। संघ परिवार लगातार यह बताने की कोशिश करता है, कि आज का भारतीय समाज 5000 साल पुरानी हिन्दू सभ्यता की निरंतरता थी, जो कि तथ्यत: गलत है।‌

प्राचीन भारत में गणित, विज्ञान, खगोलशास्त्र, चिकित्सा विज्ञान और सर्जरी का विकास हुआ, जिसको इस संग्रहालय में प्रदर्शित किया जाएगा, परन्तु यह नहीं बताया गया कि किन कारणों से इनका पराभव हुआ और आज हम इन क्षेत्रों में पश्चिम से मीलों पीछे क्यों छूट गए? वे ये भी नहीं बताते हैं, कि कठोर जातिवादी-ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने किस तरह से सारे ज्ञान-विज्ञान को मुट्ठी भर लोगों के हाथों में केंद्रित कर दिया?

ज्ञान का विस्तार न होने के कारण इसका पराभव हुआ, हालाँकि संघ परिवार इसके लिए मुस्लिम शासनकाल को दोषी ठहराता है तथा भारत की 1000 साल तक की गुलामी की बात करता है, जो कि तथ्यत:‌ ग़लत है। आज इतिहास की पुस्तकों से मुग़लकाल को हटाया जा रहा है। मुस्लिम शहरों और स्थानों के नाम बदले जा रहे हैं, यहाँ तक कि आगरा में बनने वाले मुग़ल संग्रहालय का नाम बदलकर ‘शिवाजी संग्रहालय’ कर दिया गया है, जबकि आगरा में शिवाजी की कोई भूमिका नहीं थी।

वास्तव में संघ परिवार का इतिहास भारतीय अतीत के झूठे स्वर्ण युग को दिखलाता है और वर्तमान समस्याओं के लिए मुसलमानों को दोषी ठहराता है। यही तथाकथित अतीतजीविता फासीवाद का मुख्य आधार भी है, यही कारण है, कि युगे-युगीन राष्ट्रीय संग्रहालय संघ परिवार के हिन्दुत्व परियोजना का ही एक हिस्सा प्रतीत होता है।

(स्वदेश सिन्हा लेखक और टिप्पणीकार हैं।)

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