पश्चिम बंगाल महिलाओं के खिलाफ हिंसा और न्याय के मामले में देश के सबसे बदतर प्रदेशों में एक क्यों बना हुआ है? 

एक ‘क्रांतिकारी तेवर’ की महिला पिछले 14 सालों से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री हैं, इसके पहले 27 वर्षों तक वामपंथ का शासन था और बंगाल ‘भारतीय पुनर्जागरण’ और ‘आधुनिकता’ का केंद्र रहा है। इस सब के बाद भी पश्चिम बंगाल महिलाओं के खिलाफ हिंसा और न्याय न दे पाने वाले सबसे बदतर राज्यों में एक क्यों है?

सैकड़ों बार यह दुहराए जाने वाला कथन है कि किसी समाज-राज्य की उन्नति-प्रगति का सबसे बड़ा पैमाना यह है कि उस समाज- राज्य में महिलाओं की स्थिति क्या है? यदि इस पैमाने पर देखें तो भारत में पश्चिम बंगाल महिलाओं के मामले में सबसे बदतर प्रदेशों में एक है। सबसे पहले महिलाओं के खिलाफ हिंसा, यौन उत्पीड़न और बलात्कार के मामले में पश्चिम बंगाल कहां खड़ा है? उससे भी आगे की बात यह है कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा, यौन उत्पीड़न और बलात्कार करने वालों को सजा मिलती है कि नहीं? 

पश्चिम बंगाल में 2018 के बाद पश्चिम बंगाल भारत के उन राज्यों में शामिल है, जहां महिलाओं के खिलाफ सबसे अधिक हिंसा होती है। 2018 के बाद लगातार पश्चिम बंगाल में महिलाओं के खिलाफ 30,000 हिंसा की घटनाएं दर्ज हुईं। हम सभी जानते हैं कि महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा की बहुत कम घटनाएं दर्ज हो पाती हैं। 2021 से 2023 के बीच देश में पश्चिम बंगाल वह प्रदेश रहा है, जहां सबसे अधिक महिलाओं के खिलाफ एसिड अटैक की घटनाएं हुईं। महिलाओं के साथ बलात्कार के मामले में यह प्रदेश देश में दूसरे नंबर का शर्मनाक स्थान प्राप्त किया। यह स्थिति 2019 से 2023 के बीच लगातार बनी रही।

2018 से 2023 के बीच पश्चिम बंगाल देश के तीसरे नंबर का वह प्रदेश रहा है, जहां महिलाओं को घरेलू हिंसा का सबसे अधिक शिकार होना पड़ा। यह हिंसा पति या अन्य परिवार के सदस्यों-रिश्तेदारों ने अंजाम दिया। महिलाओं के खिलाफ दहेज हत्या-उत्पीड़न, एसिड अटैक की कोशिश, महिलाओं का अपहरण, यौन-उत्पीड़न और महिलाओं की आत्महत्या की कोशिशों जैसे मामलों में पश्चिम बंगाल देश के शीर्ष आपराधिक राज्यों में शामिल है।

सबसे बदतर और चिंताजनक बात यह है कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा करने वाले आरोपियों-अपराधियों को मिलने वाली सजा के मामले में पश्चिम बंगाल भारत का सबसे बदतर प्रदेश है। पश्चिम बंगाल वह प्रदेश है, जहां सिर्फ महिलाओं के खिलाफ हिंसा करने वाले 5 प्रतिशत आरोपियों को न्यायालय से सजा मिलती है, 95 प्रतिशत बाइज्जत बरी हो जाते हैं। यही स्थिति 2017 से चली आ रही है। सिर्फ 2022 का साल एक ऐसा साल था, जब 8.9 प्रतिशत आरोपियों को सजा मिली। 2023 में पश्चिम बंगाल भारत के 36 प्रदेशों में महिलाओं के खिलाफ हिंसा के आरोपियों को सजा देने के मामले में 35वें स्थान पर रहा। यह प्रदेश महिलाओं के खिलाफ हिंसा के आरोपियों को बरी करने के मामले में पहले स्थान पर है।

इससे भी भयानक स्थिति यह है कि पश्चिम बंगाल में महिलाओं के खिलाफ हिंसा के 3.7 लाख मामले अदालतों में 2023 तक पेंडिंग हैं। ये वे मामले हैं, जिन पर न सुनवाई पूरी हुई और न ही अदालत का कोई निर्णय आया। साफ है कि 3.7 लाख महिलाएं अपने खिलाफ हुई हिंसा के मामले में न्याय की बाट जोह रही हैं। महिलाओं के खिलाफ हिंसा के अदालतों में पेंडिंग मामलों के संदर्भ में पश्चिम बंगाल नंबर एक पर है। 

क्या नेशनल क्राइम ब्यूरो के ये तथ्य पश्चिम बंगाल में महिलाओं पर होने वाले हिंसा और न मिलने वाले न्याय के बारे में ये तथ्य सिर्फ सरकारी लापरवाही के मामले हैं? कुछ व्यक्तियों के अपराधी मानसिकता के मामले हैं? कुछ पुलिस, वकीलों और जजों के अच्छे न होने या बुरे होने के मामले हैं?

पश्चिम बंगाल में महिलाओं के खिलाफ हिंसा के आंकड़े और सिर्फ 5 प्रतिशत मामलों में न्याय मिलने के मामले को कुछ व्यक्तियों के आपराधिक मानसिकता का होने या सरकारी लापरवाही कहकर न देखा जा सकता है, न देखा जाना चाहिए। यह बहुत सतही विश्लेषण- मूल्यांकन होगा।

सबसे पहले यह देखते हैं कि 95 प्रतिशत मामलों में महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा, बलात्कार, दहेज हत्या, एसिड अटैक, घरेलू पिटाई और अन्य तरह की हिंसा करने वाले आरोपी आखिर बरी क्यों हो जाते हैं, बिना किसी सजा के छूट क्यों जाते हैं? साफ है कि यह कुछ व्यक्तियों की लापरवाही, बदनियती या स्त्री विरोधी मानसिकता तक सीमित नहीं है, यदि पूरे के पूरे सिस्टम और संरचना में स्त्री द्वेषी और पितृसत्तावादी मानसिकता न होती तो यह संभव नहीं है कि 95 प्रतिशत महिलाओं के खिलाफ हिंसा के आरोपी निर्दोष छूट जाएं। ध्यान दीजिए, 95 प्रतिशत। वह भी एक साल दो साल नहीं, साल दर साल।

दूसरे तथ्य पर ध्यान दीजिए। पश्चिम बंगाल में 3.7 लाख केस ऐसे पेंडिंग हैं, जो महिलाओं के खिलाफ हिंसा से जुड़े हैं। देश में किसी भी प्रदेश की तुलना में सबसे अधिक। इसको कैसे देखा जाए, कैसे समझा जाए, कैसे विश्लेषित किया जाए? इस बात को यह कहकर तो किनारे नहीं लगाया जा सकता है कि यह कुछ एक व्यक्तियों की लापरवाही का मामला है। यदि पूरा का पूरा सिस्टम और उसकी संरचना स्त्री-द्वेषी और पितृ सत्तावादी न हो तो ऐसा नहीं हो सकता है। आखिर पश्चिम बंगाल का सिस्टम और संरचना ऐसी क्यों बनी हुई है, जहां पहले तो महिलाओं के खिलाफ हिंसा के मामले में केस पेंडिंग रहेंगे और जिन केसों पर फैसला आएगा, उसमें 95 प्रतिशत आरोपी निर्दोष कहकर छोड़ दिए जाएंगे।

जहां तक लाखों की संख्या में केस पेंडिंग होने और 95 प्रतिशत आरोपियों के निर्दोष छूट जाने का सवाल है, सहज ही कोई भी समझ सकता है कि पुलिस, सरकारी वकील और जज स्पष्ट तौर पर सबसे पहले जिम्मेदार हैं। न्याय तो पुलिस, वकील और जज की कार्रवाई पर निर्भर करता है। क्या यह कुछ पुलिस वालों, कुछ वकीलों, कुछ जजों का मामला है? ऐसा तो किसी एक या दो या चार या 100 केस में हो सकता है। 3.7 लाख पेंडिंग केसों और 95 प्रतिशत निर्दोष छोड़े जाने वाले आरोपियों के मामले में तो नहीं ही हो सकता है। साफ है कि पूरा सिस्टम और संरचना महिलाओं को न्याय दिलाने के खिलाफ है।

इसके अलावा हम सब को पता है कि यदि आरोपी ताकतवर न हों, सिस्टम को प्रभावित करने की उनकी समझ और कोशिश न हो, तो इतने केस पेंडिंग नहीं रह सकते हैं, न ही 95 प्रतिशत आरोपी बाकायदा निर्दोष छूट सकते हैं।

तीसरे तथ्य पर ध्यान दीजिए। पश्चिम बंगाल में महिलाओं पर सबसे अधिक एसिड अटैक की घटनाएं होती हैं। यह बलात्कार के बाद, कुछ मामलों में बलात्कार से ज्यादा बर्बर हिंसक हमला होता है। इस बर्बर मानसिकता के लोग इतनी बड़ी संख्या में  पश्चिम बंगाल में क्यों हैं?

महिलाएं तो महिलाओं पर एसिड से हमला नहीं करती होंगी। पश्चिम बंगाल ऐसा क्यों अभी तक बना हुआ है?

यह तो महिलाओं के खिलाफ हिंसा से जुड़े मामले और उनके निष्कर्ष हैं। पश्चिम बंगाल उन प्रदेशों में शामिल है, जहां से सबसे अधिक लड़कियां देश और दुनिया के वेश्यालयों में खरीद-फरोख्त करके, जोर-जबर्दस्ती और अपहरण करके भेजी जाती हैं। हिंदी पट्टी में आज भी लोग यह उम्मीद करते हैं कि बंगाल से लड़की खरीद कर शादी की जा सकती है और होती भी है।

तो क्या बंगाली आधुनिकता, सभ्यता, संस्कृति, तहजीब और स्त्री शक्ति की प्रतीक के रूप में बड़े पैमाने पर दुर्गा पूजा यह सब ऊपरी सतही चीजें हैं, भीतर से पश्चिम बंगाल महिलाओं के मामले में संस्थागत और संरचनागत तौर पर भयानक रूप में पितृसत्तावादी है? स्त्री-द्वेषी है?

यह भी सवाल है कि आखिर जिस बंगाल को आधुनिकीकरण और पुनर्जागरण का केंद्र माना जाता है, जहां सबसे पहले आधुनिक विचारों, वैज्ञानिक-सामाजिक अध्ययन केंद्रों, विश्वविद्यालयों और आधुनिक साहित्य की नींव पड़ी। जहां सबसे पहले आधुनिक विचारों के संस्थान और संगठन बने। जो ज्ञान-विज्ञान का केंद्र रहा है। जहां पुनर्जागरण की शुरुआत की करने वाली संस्थाओं का सबसे पहले गठन हुआ, जहां अंग्रेजों की 1911 तक राजधानी थीं। जहां विचारों, कला, साहित्य, सिनेमा और साहित्य की इतनी महान-महान हस्तियां पैदा हुईं। जहां सबसे पहले आधुनिक कल-कारखानों की नींव पड़ी, वह बंगाल महिलाओं के मामलों में आज भी इतना पितृसत्तावादी और हिंसक आज तक क्यों हैं?

जो पश्चिम बंगाल मार्क्सवादी विचाराधारा और वामपंथ का केंद्र रहा। जहां से मार्क्सवादी और वामपंथी विचारों का पूरे देश में प्रचार-प्रसार हुआ। जहां वामपंथ की तमाम धाराएं मजबूत रहीं, जो नक्सलबाड़ी आंदोलन का केंद्र था, जहां 27 वर्षों तक लगातार वामपंथी पार्टियों का शासन रहा, वह पश्चिम बंगाल महिलाओं के मामले में इतना पिछड़ा और हिंसक क्यों है? इतना अन्यायी क्यों है?

जिस पश्चिम बंगाल में वामपंथ के 27 वर्षों के शासन के बाद एक क्रांतिकारी तेवर की महिला (ममता बनर्जी)  पिछले करीब 14 सालों से मुख्यमंत्री हैं, वह बंगाल महिलाओं के मामले में इतना पिछड़ा और हिंसक क्यों हैं?

पश्चिम बंगाल अपने तथाकथित शानदार ऐतिहासिक विकास-यात्रा के बाद भी इतनी मर्दवादी मानसिकता का क्यों शिकार है? बंगाली समाज की तथाकथित सभ्यता, संस्कृति और उच्च आदर्श महिलाओं के मामले में कहां चले जाते हैं? अभिजात्य वर्ग की जिन बंगाली महिलाओं को आधुनिकता का पर्याय कहा जाता है, जहां नारीवादी चिंतन और लेखन की तमाम धाराएं मजबूत रही हैं, उन महिलाओं ने इस स्थिति को बदलने के लिए अब तक क्या किया? 

उपरोक्त आंकड़े ज्यादातर 2018 से 2023 के बीच के हैं, इस बीच में एक क्रांतिकारी तेवर की महिला (ममता बनर्जी) मुख्यमंत्री हैं, क्या महिलाओं की स्थिति पर इससे कोई बुनियादी फर्क नहीं पड़ता कि महिला मुख्यमंत्री या पुरुष मुख्यमंत्री? हालांकि ममता बनर्जी ने हाल में एमबीबीएस छात्रा के बलात्कार के मामले में यह कहकर कि मेडिकल छात्राओं को देर रात को नहीं निकलना चाहिए, अपनी मर्दवादी पितृसत्तात्मक सोच का परिचय दे ही दिया, जिसमें जाने-अनजाने महिला को ही उसके बलात्कार के लिए दोषी ठहरा दिया जाता है।

बात सिर्फ ममता बनर्जी की नहीं। बात यह है कि यह तथाकथित आधुनिकता, पुनर्जागरण, वामपंथ का गढ़ और आज की क्रांतिकारी तेवर की महिला की पार्टी के शासन के बाद पश्चिम बंगाल महिलाओं के खिलाफ हिंसा के मामले में इतना अग्रणी क्यों है? क्यों हिंसा के लिए जिम्मेदार लोगों को दंडित करने के मामले में करीब पूरी तरह असफल है?

क्यों यह बंगाली समाज और सरकार इतनी स्त्री-द्वेषी और पितृसत्तावादी है, क्यों आधुनिकता और वामपंथ की करीब 150 वर्षों से अधिक सालों की यात्रा करने वाला पश्चिम बंगाल ऐसा प्रदेश या समाज नहीं बना पाया कि जहां महिलाएं हिंसा से खुद को सुरक्षित महसूस कर पाएं? जहां हिंसा करने वालों को दंडित किया जा सके? जीवन के सभी क्षेत्रों में स्त्री-पुरुष बराबरी की बात ही छोड़ दीजिए।

27 सालों के वामपंथी शासन और 14 वर्षों के एक क्रांतिकारी महिला के शासन में भी पश्चिम बंगाल महिलाओं के लिए हिंसा से सुरक्षित और हिंसा करने वालों को दंडित करने वाला एक राज्य भी नहीं बन पाया। एक सेकेंड के लिए मान लेते हैं कि राज्य हिंसा रोक नहीं सकता, लेकिन हिंसक लोगों को दंडित तो कर ही सकता है, लेकिन पश्चिम बंगाल में 95 प्रतिशत महिलाओं पर हिंसा करने वाले आरोपी बाइज्जत बरी हो जाते हैं। 

यह कुछ व्यक्तियों, आने-जाने वाली सरकारों तक सीमित मामला नहीं है, तथ्यों को यदि ठीक से देखें तो साफ समझ में आयेगा कि पश्चिम बंगाल भीतर से स्त्री-द्वेषी और पितृसत्तावादी समाज ही बना हुआ है, आधुनिकता, सभ्यता-संस्कृति और पुनर्जागरण-वामपंथ और क्रांतिकारिता का बाहरी आवरण ओढ़े हुए।

(नेशलन क्राइम ब्यूरों की रिपोर्ट ( 2023) हाल में जारी। स्रोत-द इंडियन एक्सप्रेस, 16 अक्टूबर 2025)

(डॉ. सिद्धार्थ लेखक और पत्रकार हैं।)

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