बिहार में चुनाव का बिगुल बज चुका है और दूसरे चरण की नामांकन प्रक्रिया चल रही है। दोनों गठबंधन सीट बंटवारे और प्रत्याशियों को तय करने की प्रक्रिया को करीब करीब अंतिम रूप दे चुके हैं। ओपिनियन पोल वाले भी अपने खेल में लग गए हैं। जितने बड़े पैमाने पर चुनाव की घोषणा के दिन तक जनता के विभिन्न हिस्सों को विशेषकर महिलाओं को पैसा बांटा गया है वह अभूतपूर्व है। एनडीए के समर्थक इसे गेम चेंजर बता रहे हैं।
बहरहाल लोग भूले नहीं हैं कि पिछले चुनाव में किस तरह रोजगार का सवाल सर्वप्रमुख मुद्दा बनकर उभर गया था और तेजस्वी तथा महागठबंधन ने करीब करीब बाजी पलट दी थी।
इस बार भी तेजस्वी ने हर घर में कम से कम एक सरकारी नौकरी देने का वायदा किया है और उसके लिए समयबद्ध कार्यक्रम के तहत 20 दिन के अंदर अधिनियम पास करने का वायदा किया है।
दरअसल 2020 से2025 के बीच बेरोजगारी का सवाल और गम्भीर ही हुआ है। 2015 में जहां रोजगार को सबसे प्रमुख मुद्दा मानने वालों की संख्या 9.1%थी वहीं 2020 में यह बढ़कर 21% हो गई थी। जाहिर है इस चुनाव में यह संख्या और बड़ी हो चुकी होगी।
इस बीच महागठबंधन के विभिन्न दलों के कुछ प्रत्याशी एक दूसरे के खिलाफ कथित दोस्ताना लड़ाई लड़ रहे हैं। जाहिर है चुनाव में दोस्ताना लड़ाई नाम की कोई चीज नहीं होती है। लड़ाई लड़ाई होती है।सब लोग जीतने के लिए लड़ते हैं और सामने के सभी प्रत्याशियों को हराने के लिए लड़ते हैं। नामांकन वापसी तक अगर यही स्थिति बनी रहती है तो यह महागठबंधन के लिए नुकसानदेह ही साबित होगी।
एक अन्य बहस तेजस्वी को मुख्यमंत्री का चेहरा न घोषित किए जाने पर चल रही है। वैसे तो सबसे बड़े दल के नेता के रूप में उनकी दावेदारी स्वाभाविक है और इसे लोग मानकर चलते हैं। लेकिन कांग्रेस संभवतः जिन तबकों को जीतना चाहती है मसलन दलित अति पिछड़े और सवर्ण उसमें संभवतः यह संदेश देना चाहती है कि वह इन तबकों की राजद विरोधी भावना के विरुद्ध नहीं है और उसने राजद के आगे समर्पण नहीं किया है।
इससे वह अपने जनाधार को मजबूत करना चाहती है और इसका कुल मिलाकर पूरे महागठबंधन को लाभ मिलेगा। सीटों के सवाल पर भी कांग्रेस अड़ी रही हैं और कुछ सीटों पर महागठबंधन के कुछ दलों से उसका टकराव हो रहा है। जाहिर है कांग्रेस अपनी खोई राजनीतिक जमीन पाने के लिए बेचैन है और अपनी संभावनाओं का बढ़ा चढ़ा कर मूल्यांकन कर रही है।
महागठबंधन का नेतृत्व अपनी पूर्ण एकजुटता का प्रदर्शन कर पाने में विफल रहा। राजद नेतृत्व भी संकीर्णता के चलते सभी सीटों पर पूर्ण समझौता नहीं कर पाया। हद तो तब हो गई जब कांग्रेस के दलित चेहरे और प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम के खिलाफ भी राजद ने अपना प्रत्याशी उतार दिया। बाद में उसे वापस लिया गया।
देखना होगा कि इन सीटों पर नामांकन वापसी तक पूर्ण एकजुटता की तस्वीर उभर पाती है या नहीं। क्योंकि इसका पूरे राज्य में मतों के एक दूसरे को ट्रांसफर पर असर पड़ सकता है। महागठबंधन का एक घटक वीआईपी पिछले चुनाव की जैसे पुनरावृत्ति करते हुए गठबंधन से निकलने की ओर था। वह न सिर्फ अधिक सीटों पर लड़ना चाहता था बल्कि उसके नेता मुकेश साहनी उपमुख्य मंत्री के रूप में अपने नाम की घोषणा चाहते थे। मुख्यमंत्री के चेहरे की घोषणा हुई ही नहीं, वे उपमख्यमंत्री की घोषणा चाहते थे, इसे हास्यास्पद ही कहा जाएगा।
इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि उनकी राजनीतिक साख संदिग्ध है। वे तमाम जातियों को जोड़कर अपनी जाति की संख्या को बढ़ा चढ़ा कर पेश करते हैं और अपनी मांगें पूरी होने पर किसी भी गठबंधन में जाने को तैयार रहते हैं। यह कह पाना मुश्किल है कि चुनाव के बाद वे कहा रहेंगे। कोई भी इस बात का गारंटी शुदा आश्वासन नहीं दे सकता कि चुनाव बाद वे एनडीए में शामिल नहीं होंगे। और महागठबंधन में ही हर हाल में रहेंगे!
कई अन्य दल भी चुनाव में जोर आजमाइश कर रहे हैं जिनमें सबसे महत्वपूर्ण प्रशांत किशोर उर्फ पी के की जन सुराज पार्टी है। पी के ने जिन सवालों को उठाकर पिछले तीन साल बिहार को मथा है वे दरअसल विपक्ष के मूलभूत सवाल हैं मसलन विस्थापन रोजगार शिक्षा स्वास्थ्य। इन सवालों को भारी पैसे और मीडिया की मदद से जोरशोर से उठाकर पीके बिहार के युवाओं और अराजनीतिक मतदाताओं में कुछ जगह बना पाने में सफल हुए हैं।
हाल ही में सत्ताधारी नेताओं के खिलाफ सेलेक्टिव ढंग से भ्रष्टाचार के मुद्दे को उठाकर उन्होंने अपने को भाजपा की बी टीम कहे जाने के आरोप से बचने की कोशिश की। बहरहाल समग्रता में सरकार के खिलाफ मौजूद भारी एंटी इनकमबेंसी में कुछ हिस्सा बांटने में वे सफल होंगे और यह महागठबंधन का नुकसान होगा। उन्होंने आरोप लगाया है कि उनके कुछ प्रत्याशियों को अमित शाह और धर्मेंद्र प्रधान ने परचा नहीं भरने दिया।
इसी तरह बसपा और आप पार्टी भी ताल ठोंक रही है। बसपा ने हाल ही में लखनऊ में विराट रैली कर शायद बिहार को भी संदेश देने की कोशिश की थी। बहरहाल ये तमाम पार्टियां सरकार विरोधी भावना का इस्तेमाल करते हुए महागठबंधन को ही नुकसान पहुंचाएंगी।
इस बीच एनडीए में भी सब कुछ ठीक नहीं है। यह साफ है कि भाजपा बिहार में अपने नेतृत्व में सरकार बनाने के लिए बेकरार है। इसके लिए उसने पहले सीट बंटवारे में खेल किया।अपने को मोदी का हनुमान बताने वाले चिराग पासवान जिनके माध्यम से पिछले चुनाव में भाजपा ने नीतीश को भारी नुकसान पहुंचाया था, इस बार भी अमित शाह ने उन्हें मोर्चे में 29 सीटें दे दीं जिसमें से कुछ पिछली बार की नीतीश की जीती हुई सीटें थीं।
दूसरे भाजपा ने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं घोषित किया।अमित शाह ने कह दिया कि यह चुनाव बाद विधायक तय करेंगे। जाहिर है इस सब से नीतीश कुमार नाराज हैं। इस आपसी खींच तान का संदेश नीचे तक पहुंचा तो वोटों का परस्पर ट्रांसफर बहुत मुश्किल होगा। यहां तक कि एक दूसरे को हराने की भी साजिशें हो सकती हैं।
इस तरह इस बार का चुनाव बिहार में बेहद उलझा हुआ है।
नीतीश कुमार ने अपने पक्ष में महिला मतदाताओं की सद्भावना को पैसा बांटकर और गाढ़ा कर दिया है। बहरहाल युवाओं में तेजस्वी की हर घर रोजगार की घोषणा से जबरदस्त उत्साह पैदा हुआ है। उपमुख्यमंत्री रहते लाखों नौकरियां देने की उनकी साख भी है।
जहां तक चुनाव के मुद्दों की बात है, भाजपा शायद सांप्रदायिक विभाजन के लिए घुसपैठियों के सवाल को उठाती रहेगी लेकिन जिस तरह चुनाव आयोग एसआईआर के दौरान सीमांचल में उनकी कोई उल्लेखनीय संख्या तलाश नहीं पाई,उससे इस मुद्दे की विश्वसनीयता खत्म हो चुकी है। इसलिए अमित शाह अब हाल की अपनी रैलियों में इस मुद्दे को नहीं उठा रहे।
संभवतः चुनाव में एनडीए विकास और सुशासन बनाम लालू प्रसाद के कथित जंगल राज को प्रमुख मुद्दा बनाएगी जिसमें महिलाओं समेत अन्य तबकों की दिया गया पैसा भी शामिल है।
वहीं महागठबंधन रोजगार पलायन शिक्षा स्वास्थ्य आदि की बदहाली को मुद्दा बनाएगा। साथ ही नीतीश राज में कानून व्यवस्था की बदहाली, चरम भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाएगी। महागठबंधन लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के अलावा सामाजिक न्याय जाति जनगणना आरक्षण और विशेष कर अतिपिछड़ों व दलितों को जीतने के कार्यक्रम के साथ मैदान में उतरेगा।
महागठबंधन के साथ भाकपा माले जैसी लड़ाकू आंदोलनों की ताकत है, साथ ही अन्य वाम पार्टियां हैं। पिछले चुनाव में भाकपा माले का स्ट्राइक रेट सबसे अच्छा रहा था। इस बार भी सत्ता के दमन के बावजूद उम्मीद है उनका प्रदर्शन अच्छा रहेगा।
बहरहाल नौकरियों के सवाल को अगर तेजस्वी और महागठबंधन चुनाव प्रचार में पिछली बार की तरह एक बार फिर आंदोलन का रूप दे सके तो चुनाव का माहौल बदलते देर नहीं लगेगी और बाज़ी महागठबंधन के हाथ आ सकती है।
(लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष हैं।)