काशी-तमिल संगमम् 4.0 : दो संस्कृतियों का मेल या जनता के पैसे से दक्षिण में पैठ बनाने के लिए बीजेपी का पॉलिटिकल इवेंट?

वाराणसी। वाराणसी के नमो घाट पर 17 दिसंबर, 2023 की वह सांझ आज भी स्मृतियों में वैसे ही चमकती है, जैसे गंगा के पानी में तैरती दीपकों की लौ। हवा में हल्की ठंडक थी, घाटों पर भक्ति के राग घुल रहे थे और ठीक उसी क्षण काशी–तमिल संगमम् 2.0 का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था, “तमिलनाडु से काशी पहुंचने का मतलब मदुरै मीनाक्षी से काशी विशालाक्षी तक और महादेव के एक घर से दूसरे घर तक आना है।”

यह पंक्ति दो संस्कृतियों की अनादि यात्रा का वह बिंब था, जिसमें ऋषि अगस्त्य का दक्षिण गमन, संगम युग की वैदिक–द्रविड़ सांस्कृतिक धारा और शैव-भक्ति की सहस्राब्दियों पुरानी परंपरा आज भी धड़कती महसूस होती है। दो अक्टूबर 2025 से शुरू हुआ काशी–तमिल संगमम् 4.0 अब तक के सभी संस्करणों से कहीं बड़ा, ज़्यादा विस्तृत और अधिक बहसों के केंद्र में है। शैक्षणिक संवाद, सांस्कृतिक प्रस्तुतियां और तमिल प्रतिनिधियों की मौजूदगी इसे भव्य तो बनाती है, लेकिन सवालों की परत भी उतनी ही मोटी होती जा रही है।आलोचकों का आरोप साफ है कि यह सांस्कृतिक आयोजन कम, तमिलनाडु में बीजेपी की राजनीतिक पैठ बनाने की रणनीति ज़्यादा है।

तमिल विद्वान प्रोफेसर अरुनन कहते हैं कि तमिलनाडु में भाषाई अस्मिता, द्रविड़ आंदोलनों का इतिहास और हिंदी-विरोध की मानसिकता अब भी मौजूद है। ऐसे में जब केंद्र सरकार तमिल संस्कृति का उत्सव काशी में मनाती है, तो यह तमिलों के दिल में जगह बनाने की कोशिश के रूप में देखा जाता है। उनका कहना है कि, “यदि उद्देश्य वास्तव में तमिल परंपरा का सम्मान होता, तो कार्यक्रम काशी में नहीं, तमिलनाडु में होता। यह करदाताओं के पैसे से चल रहा राजनीतिक आयोजन है।”

आलोचकों का यह भी सवाल है कि जब सरकार तमिल विरासत को इतना सम्मान देती है, तो कीलाडी और आदिचनल्लूर की खुदाई की रिपोर्टें सार्वजनिक क्यों नहीं की जातीं? भारतीय सभ्यता की जड़ें केवल उत्तर भारत में नहीं, दक्षिण में भी उतनी ही गहरी हैं, यह स्वीकार करने में संकोच क्यों है?

वहीं आयोजन से जुड़े लोग इन आरोपों को खारिज करते हैं। उनका दावा है कि काशी और तमिलनाडु के बीच सांस्कृतिक रिश्ता उतना ही प्राचीन है जितनी काशी की शैव परंपरा या चोल–चेरा–पांड्य राजवंशों के तीर्थ-समागम। उनके अनुसार यह आयोजन राजनीतिक नहीं, दो सांस्कृतिक परंपराओं का पुनर्मिलन है। एक तथ्य लगातार चर्चा में है कि तमिल अतिथियों की सुविधा के लिए केंद्र सरकार ने तमिल मूल के आईएएस अफसर एस. राजलिंगम को वाराणसी का जिलाधिकारी नियुक्त किया था और बाद में कमिश्नर बना दिया। आलोचक इसे भी राजनीतिक प्रतीकवाद ही मानते हैं।

कार्यक्रम में खाली पड़ी कुर्सियां

काशी–तमिल संगमम् 4.0, जो दो अक्टूबर 2025 से चल रहा है।  अपने पहले ही दिन बनारस को राजनीति, संस्कृति और भावनाओं के इस त्रिकोण में खड़ा कर देता है। नमो घाट पर आयोजित उद्घाटन समारोह में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मंच से घोषणा की कि दक्षिण भारत के प्रमुख तीर्थस्थलों की यात्रा पर जाने वाले उत्तर प्रदेश के तीर्थयात्रियों को विशेष सहायता दी जाएगी। रामेश्वरम्, कन्याकुमारी, त्रिवेंद्रम और मदुरई के यात्रियों के आवागमन, खानपान और आवास का खर्च पर्यटन विभाग रियायती दरों पर वहन करेगा। यह एक ऐसा कदम है जो सांस्कृतिक संवाद को बढ़ावा देता है, लेकिन राजनीतिक बहसों को भी जन्म देता है।

उद्घाटन समारोह, हमेशा की तरह, भव्य था। मंच पर तमिलनाडु के राज्यपाल आर.एन. रवि, पुडुचेरी के उपराज्यपाल के. कैलाशनाधन, केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, केंद्रीय संसदीय कार्य एवं संचार राज्यमंत्री डॉ. एल. मुरुगन और उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक मौजूद थे। राज्यपाल आर.एन. रवि ने कहा कि तमिल भाषा के विकास और शोध के लिए प्रधानमंत्री मोदी की पहल अद्वितीय है। उन्होंने घोषणा की कि तमिल पर शोध करने वालों को फेलोशिप दी जाएगी। इसी समारोह में दंडक्रम पारायण करने वाले वेदमूर्ति देवव्रत और बालाजी बालू को सम्मानित भी किया गया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कार्यक्रम के लिए भेजे संदेश में कहा कि काशी-तमिल संगमम् ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना को मजबूत करने वाला आयोजन है। केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि यह अब केवल आयोजन नहीं, बल्कि जन आंदोलन में बदल चुका है।
उनके शब्दों में, “भाषाई अंतर कम हुआ है। घाटों, बाजारों और दुकानों में तमिल भाषा सुनाई देने लगी है। यह आपसी समझ और सांस्कृतिक आदान-प्रदान की दिशा में बड़ा कदम है।”

इस बार तमिलनाडु से 1,400 से अधिक प्रतिनिधि वाराणसी पहुंच रहे हैं, जिनमें छात्र, शिक्षक, कारीगर, लेखक, पत्रकार, महिलाएं, किसान और आध्यात्मिक विद्वान शामिल हैं। वाराणसी के स्कूलों में 50 तमिल शिक्षकों की नियुक्ति की गई है, जो 1,500 छात्रों को स्पोकन तमिल सिखाएंगे। तमिलनाडु के बाहर भाषा-संवाद का इतना बड़ा प्रयोग किसी एक शहर में पहली बार हो रहा है। वहीं उत्तर प्रदेश के 300 से अधिक छात्र तमिलनाडु के प्रमुख विश्वविद्यालयों-आईआईटी मद्रास, पॉन्डिचेरी विश्वविद्यालय, गांधीग्राम, कांचीपुरम का शंकरा कॉलेज, कोयंबटूर का कोंगुनाडु कॉलेज और थंजावुर का शास्त्र विश्वविद्यालय का शैक्षिक दौरा करेंगे। संगमम् 4.0 इस तरह काशी की हवा में एक नया संवाद, एक नया ताप और एक नई बहस भी जोड़ रहा है कि यह आयोजन संस्कृति का उत्सव है या राजनीति का विस्तार?
यह एकता का परचम है या दक्षिण में पांव जमाने की रणनीति?

धर्म का बाज़ार ढूंढ रही बीजेपी

काशी–तमिल संगमम् के उद्घाटन के अवसर पर बनारस के लोग गिने–चुने ही आए। जो भीड़ दिखी, वह छात्रों और शिक्षकों की थी, जिन्हें कड़ाके की ठंड में देर शाम तक गंगा तट पर बैठाए रखा गया। इसके बावजूद तमाम कुर्सियां खाली रहीं। वरिष्ठ पत्रकार राजीव सिंह कहते हैं कि भाषा और संस्कृति के जरिये प्रधानमंत्री मोदी, तमिलनाडु जैसे राज्यों में लंबे समय से अपनी पैठ बनाने की कोशिश में जुटे हैं। तमिलनाडु में एआईएडीएमके और डीएमके जैसी पार्टियां हैं, जिनका एजेंडा हिंदुत्व नहीं, बल्कि विकास होता है। यही वजह है कि बीजेपी की ज़मीन तमिलनाडु और अन्य गैर–हिंदीभाषी राज्यों में अब तक तैयार नहीं हो पाई है। बीजेपी की हिंदुत्ववादी राजनीति का केंद्र अभी भी हिंदी भाषी प्रदेश ही रहे हैं। अस्पष्टवादी सोच के चलते दक्षिण भारत में बीजेपी को सियासी जमीन मिलती नजर नहीं आती।

तमिलनाडु के राजनीतिक समीकरणों को देखें तो वहां की क्षेत्रीय पार्टियां धार्मिक मुद्दों से ज्यादा स्वास्थ्य, शिक्षा, भूख, बेरोज़गारी और जनता की मूलभूत आवश्यकताओं पर ध्यान देती हैं। उनके मुद्दे पब्लिक ज़रूरत से जुड़े होते हैं। तमिलनाडु भारत का शायद पहला राज्य है, जहां बीजेपी की विचारधारा और पीएम मोदी का लगातार विरोध होता रहा है। जब प्रधानमंत्री मोदी डिफेंस एक्सपो-2018 का उद्घाटन करने चेन्नई गए थे, तो “मोदी गो बैक” के नारे लगे थे। जब वह चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ ममल्लापुरम पहुँचे, तब भी ट्विटर पर यही नारा ट्रेंड कर रहा था। 2019 के लोकसभा चुनाव में तमिलनाडु में बीजेपी एक भी सीट नहीं जीत पाई थी।

ठिठुरन भरी ठंड में बच्चों की फजीहत

बनारसियों के लिए तमिल संगमम् का आयोजन कोई नई बात नहीं है। यहां बाहर से कोई भी आता है तो बनारस शहर डौल बांधने और मेला–ठेला करने लगता है। दुनिया में शायद ही कोई इतना फुर्सतिया शहर होगा जितना बनारस और फुर्सत में रहने वाला शहर तमाशा भी चाहता है। यह शहर सिर्फ सांडों की लड़ाई का तमाशा नहीं देखता, बल्कि तोता–मैना, ललमुनिया, भेड़–बकरा, सांप–नेवले की लड़ाई देखने और ताली बजाने का पुराना शौक रखता है। इसी वजह से बनारस में हर इवेंट पसंद किया जाता है, चाहे काशी विश्वनाथ मंदिर का मेगा आयोजन हो या काशी–तमिल संगमम्।

विपक्षी दलों का कहना है कि तमिलनाडु में बीजेपी के केवल मुठ्ठी भर समर्थक हैं। पार्टी उन्हें काशी, प्रयागराज और अयोध्या दिखाकर अगले चुनाव के लिए ‘रिचार्ज’ करती रहती है। इस आयोजन से बनारस के आम लोगों पर कोई खास असर पड़ता नज़र नहीं आता।

क्यों लुटा रहे टैक्स का पैसा?

युवा राजनीतिक विश्लेषक समीक्षा सिंह बीजेपी के दावों से इत्तेफाक नहीं रखतीं। वह कहती हैं, “काशी–तमिल संगमम् का आयोजन जनता के पैसे से क्यों हो रहा है? तमिल भाषा और उसकी संस्कृति के महत्व को बताने के लिए बनारस का चयन क्यों किया गया? आम आदमी भी समझ सकता है कि यह बीजेपी का सियासी एजेंडा है। आम तौर पर भाषाओं के विकास का काम भारतीय भाषा समिति का होता है, लेकिन इस आयोजन में समिति की कोई प्रमुख भूमिका नज़र नहीं आती। अगर बीजेपी सचमुच तमिल भाषा और संस्कृति को बढ़ावा देना चाहती तो तमिल संगमम् का आयोजन वहीं किया जाता, जहां तमिलनाडु के लोगों को ज़्यादा लाभ मिलता।”

वह आगे कहती हैं, “बीजेपी बनारस की विविधताओं वाली संस्कृति दिखाकर तमिल के लोगों का मिजाज बदलने की कोशिश कर रही है। लेकिन वह लोगों को यह क्यों नहीं बताती कि तमिल भाषा संस्कृत से पांच सौ साल अधिक पुरानी है? तमिल तो सभी भारतीय भाषाओं में सबसे प्राचीन है। इसलिए तमिलनाडु के लोग भाषा के सवाल पर कोई दबाव बर्दाश्त नहीं करते। तमिल भाषा उनके लिए संस्कृति और पहचान है और उसके साथ किसी तरह का घालमेल उन्हें स्वीकार नहीं। वे अपनी विविधताओं और आत्मसम्मान में भरोसा रखते हैं। ऐसे में ‘एक भारत–श्रेष्ठ भारत’ की छतरी के नीचे वे किसी दूसरी भाषा को कैसे आत्मसात कर लेंगे?”

दक्षिण और उत्तर की संस्कृति के अंतर पर समीक्षा कहती हैं, “उत्तर भारत के लोग भावनाओं में जीने के आदी हैं, लेकिन दक्षिण भारत के लोग वास्तविकता में भरोसा करते हैं। सिर्फ काशी–तमिल संगमम् जैसे आयोजनों के दम पर बीजेपी के लिए दक्षिण में अपने पैर जमाना आसान नहीं। उसके सामने पहाड़ जैसी चुनौतियां हैं, क्योंकि दक्षिण भारत में बनारस की तरह तामझाम और दिखावा नहीं चलता। वहां वही सरकार चलेगी जो दिखावे के बजाय काम करती दिखे। दक्षिण में बीजेपी का लगभग सफ़ाया हो चुका है। वह सोच रही है कि काशी-तमिल संगमम् से तमिलनाडु में राजनीतिक फायदा मिल जाएगा, लेकिन ऐसा संभव नहीं है।”

बनारस के पत्रकार राममूर्ति दुबे कहते हैं, “धर्म और संस्कृति की आड़ में काशी–तमिल संगमम् के के पीछे खास मकसद है। इसके जरिये पार्टी अपना राजनीतिक लक्ष्य साधना चाहती है। इसी रणनीति के तहत बीजेपी ने बनारस से कन्याकुमारी तक ट्रेन चलाई और संसद में ‘सिंगोल’ स्थापित कराया। लेकिन तमिलनाडु की राजनीति में बीजेपी की कोई औकात नहीं है। कांग्रेस जिस दल के साथ जुड़ती है, वहां उसकी सरकार बन जाती है। बीजेपी भी उसी भूमिका में आना चाहती थी। इसी रणनीति के तहत पिछले चुनाव में उसने AIADMK से गठबंधन किया था, लेकिन कुछ महीने पहले AIADMK ने यह कहते हुए गठबंधन तोड़ दिया कि बीजेपी को अपनी हैसियत पता होनी चाहिए। उनके पास कोई वोटबैंक नहीं, तमिलनाडु में वे हमारी वजह से ही पहचाने जाते थे।”

तमिलनाडु की सियासत में बीजेपी की स्थिति बेहद सीमित रही है। साल 2021 के विधानसभा चुनाव में वह दो दशक बाद सिर्फ चार सीटें जीत सकी, वह भी AIADMK के साथ गठबंधन के बावजूद। यदि आंकड़ों पर नजर डालें तो बीजेपी ने पहली बार 1996 में एक सीट जीती थी। साल 2001 में डीएमके के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ने पर उसे चार सीटें मिलीं। इसके बाद साल 2006, 2011 और साल 2016 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी का खाता नहीं खुला।

लोकसभा चुनावों में भी वहां बीजेपी का प्रदर्शन विशेष नहीं रहा। साल 2014 में वह केवल एक सीट जीत पाई और वोट शेयर लगभग 5.5 प्रतिशत था। साल 2019 में उसका वोट शेयर घटकर 3.66 प्रतिशत रह गया और पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली। 2024 में वोट शेयर बढ़कर करीब 11.24 प्रतिशत हुआ, लेकिन सीटों के मामले में वह फिर शून्य पर रही। यह साफ है कि तमिलनाडु में बीजेपी की पकड़ कमजोर है। काशी–तमिल संगमम् के जरिये वह तमिलनाडु को साध पाएगी या नहीं इस पर अभी कुछ कहना मुश्किल है।

जनता के पैसे का राजनीतिक प्रचार में खर्च

ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि तमिल पहचान की राजनीतिक और धर्मनिरपेक्ष प्रकृति ने राज्य में बीजेपी और संघ के हिंदू दक्षिणपंथी एजेंडे को सीमित कर रखा है। तमिलनाडु में राजनीति भाषा और जाति के गहरे बंधन पर आधारित है। इसी वजह से बीजेपी लगातार वोटों में उतार–चढ़ाव तो देख रही है, लेकिन सीटों में सफलता हासिल नहीं कर पा रही। इस दौरान डीएमके और एआईएडीएमके जैसे बड़े क्षेत्रीय दलों का प्रभुत्व बरकरार रहा है और तमिल पहचान के मजबूत राजनीतिक आधार ने बीजेपी की पकड़ को लगातार कमजोर बनाए रखा है।

बीजेपी को राम और शिव दोनों चाहिए

काशी-तमिल संगमम के ज़रिये तमिलनाडु में पैठ बनाने की बीजेपी की कोशिशों पर बात करते हुए बनारस के वरिष्ठ पत्रकार विनय मौर्य कहते हैं, “काशी हिंदू विश्वविद्यालय अब आरएसएस के हिन्दुत्व की प्रयोगशाला बन चुका है। बीजेपी जानती है कि राम के ज़रिये वह केवल उत्तर भारत में अपनी पैठ मजबूत कर सकती है, लेकिन तमिलनाडु जैसे राज्य को साधने के लिए केवल राम पर्याप्त नहीं। वहां शिव की जरूरत है। बीजेपी को लगता है कि उत्तर में राम और दक्षिण में शिव के सहारे ही वह अपनी राजनीति का विस्तार कर सकती है। बाबा विश्वनाथ अब बीजेपी की राजनीति की एक अहम कड़ी बनते जा रहे हैं। इसी मकसद से काशी से लेकर कन्याकुमारी तक विशेष ट्रेन चलाई गई है। बीजेपी हर काम अपने सियासी फायदे को ध्यान में रखकर करती है। ऐसे में तमिल संगमम के आयोजन में जनता उसके राजनीतिक चरित्र को तलाशेगी ही।”

विनय आगे कहते हैं, “बीजेपी तमिल समाज में यह छवि गढ़ना चाहती है कि वह तमिल समुदाय की तरक्की और तमिल भाषा के विकास को लेकर बेहद चिंतित है। लेकिन यदि सरकार सच में तमिल की अहमियत पर बात करना चाहती है तो उसे कीलाडी और आदिचनल्लूर में हुए उत्खनन की रिपोर्ट सार्वजनिक करनी चाहिए। बनारस और तमिल समाज को यह भी बताया जाना चाहिए कि भारतीय सभ्यता की जड़ें हड़प्पा-मोहनजोदड़ो में नहीं, बल्कि तमिलनाडु में देखी जाती हैं। हमें लगता है कि काशी-तमिल संगमम बीजेपी का एक तयशुदा राजनीतिक एजेंडा है। इसका असर कितना होगा, यह आने वाला वक्त बताएगा।”

विनय मौर्य यह भी जोड़ते हैं, “बनारस और तमिलनाडु के लोगों में आज भी कोई गहरा तालमेल नहीं दिखता। तमिलनाडु में हिंदी को लेकर अनुकूलता नहीं है, इसलिए हिंदी-विरोधी आंदोलन आज तक थमा नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी धर्म को माध्यम बनाकर उत्तर और दक्षिण के अचेतन मन में एक सांस्कृतिक सेतु बनाना चाहते हैं, लेकिन उन्हें यह भी समझना होगा कि दोनों क्षेत्रों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि बिल्कुल भिन्न है। द्रविड़ जहां आर्यों को घुसपैठिया मानते आए हैं, वहीं आर्य खुद को यहां का असली शासक समझते रहे हैं। इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि द्रविड़ सभ्यता भारत की सबसे प्राचीन सभ्यता मानी जाती है और आर्य बाहर से आए थे। बीजेपी इस सोच को आखिर कैसे बदलेगी? धर्म और संस्कृति के नारों के सहारे राजनीति साधना ही काशी-तमिल संगमम का वास्तविक उद्देश्य लगता है।”

वे आगे कहते हैं, “कोई भी राजनेता किसी कार्यक्रम का आयोजन राजनीतिक निहितार्थों के बिना नहीं करता। मोदी भी इसमें अपवाद नहीं हो सकते। यह कहना गलत नहीं होगा कि उनकी लोकप्रियता दक्षिण भारत में उतनी मज़बूत नहीं है। दक्षिण में उनके पास ले-देकर केवल कर्नाटक था, जिसे कांग्रेस ने उनसे छीन लिया। दक्षिण से रिश्ते मजबूत करने के लिए मोदी पिछले दो सालों से तमिल संगमम करा रहे हैं। वे कहते हैं कि यह दो संस्कृतियों को जोड़ने की मुहिम है, लेकिन यह सांस्कृतिक मिलन कम, तमिल राजनीति में प्रवेश का प्रयास ज़्यादा है। काशी-तमिल संगमम से बीजेपी को कितनी सफलता मिलेगी, यह फिलहाल भविष्य के गर्त में है।”

धर्म के कारोबार की राजनीति

काशी विश्वनाथ मंदिर के पूर्व महंत राजेंद्र तिवारी कहते हैं, “बीजेपी हर साल दक्षिण भारतीयों को साधने के लिए कथित धार्मिक कार्यक्रमों के सहारे बनारस बुलाती है और काशी दर्शन के ज़रिये अपना राजनीतिक एजेंडा सेट करती है। वास्तव में इनकी आस्था चुनाव है। ये धर्माधिकारी नहीं, धर्म के व्यापारी हैं। धर्म का व्यापार कैसे किया जाता है, यह किसी को सीखना हो तो बीजेपी से सीखे। इनके लिए धर्म सिर्फ एक राजनीतिक औज़ार है। इनकी भाषा में कहें तो यह एक रिलिजियस इवेंट है, ताकि वोट बटोरे जा सकें। जनता का पैसा बेहिसाब लुटाया जा रहा है। काशी-तमिल संगमम 4.0 में भोले-भाले दक्षिण भारतीयों को बुलाकर उनकी आस्था का राजनीतिकरण किया जा रहा है। आरएसएस के प्रचारक हर ग्रुप के संचालक बने हुए हैं, जो उन्हें गुमराह करके बनारस लाते हैं और पर्यटन की आड़ में अपने लाभ साधते हैं। भीड़-भडक्के के चलते बनारस का जनजीवन अस्त-व्यस्त होता जा रहा है।”

शिक्षा मंत्रालय पार्टी की सेवा में

महंत तिवारी आगे कहते हैं, “बनारस का अलमस्त जीवन, यहां की मस्ती और फक्कड़पन मिटता जा रहा है। यहां अब बस दो ही चीजें बची हैं-बाहर से आने वालों के लिए पकौड़े तलना और धर्म का कारोबार। मोदी का विकास मॉडल सिर्फ मंदिरों के आसपास सीमित है। तमिलनाडु में चौदह साल तक के बच्चों को मुफ्त शिक्षा मिलती है और हर विषय की पढ़ाई का विकल्प उपलब्ध है। वहां की जनता धर्मभीरू नहीं, इसलिए सांप्रदायिक राजनीति वहां असर नहीं छोड़ पाती। काशी-तमिल संगमम का उद्देश्य तमिल को काशी से जोड़ना नहीं, बल्कि राजनीतिक हित साधना है। इससे जनता पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ेगा।”

“बनारस के लोग जानते हैं कि बीजेपी बुनियादी मुद्दों को हल करने के बजाय धार्मिक ढकोसले को बढ़ावा दे रही है। कुछ समय पहले उसने ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ मनाया, तिरंगा यात्रा निकाली, लेकिन बेरोजगारी और भुखमरी से राहत देने में बुरी तरह विफल रही। आस्था का कोई भी कार्यक्रम तभी सार्थक होता है जब उसका आयोजन गैर-राजनीतिक और निःस्वार्थ भाव से हो। धर्म की आड़ में एसआईआर के खेल का तमिलनाडु में विरोध हो रहा है और यहां बीजेपी बनारसियों को तमिल सीखने के लिए प्रेरित करने में जुटी है। प्रधानमंत्री कहते हैं ‘ड्रामा नहीं, डिलेवरी चाहिए’, लेकिन हो रहा है उल्टा-ड्रामा धर्म का और डिलेवरी एसआईआर की। बनारसी अब इस ड्रामे को पसंद नहीं कर रहे।”

काशी और तमिलनाडु के संबंध

काशी और तमिलनाडु के इतिहास को खंगालने पर पता चलता है कि दसवीं शताब्दी से ही दोनों क्षेत्रों के बीच धार्मिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान चलता रहा है। चोल काल के शिलालेखों में वाराणसी का उल्लेख मिलता है। तमिलनाडु में आज भी काशी विश्वनाथ और विशालाक्षी मंदिर हैं और काशी नाम का एक शहर भी मौजूद है। काशी में भी तमिल समुदाय के लोग रहते हैं और संबंध बनाए रखते हैं। 17वीं शताब्दी में शैव संत कुमारागुरूपरार तमिलनाडु से काशी आए थे और यहां उन्होंने एक मठ स्थापित किया, जिसे आज ‘काशी मठ’ कहा जाता है।” इतिहास भले साझा हो, लेकिन आलोचक इसे बीजेपी के दक्षिण में राजनीतिक विस्तार का माध्यम मानते हैं।

बीजेपी की प्रतिक्रिया

कार्यक्रम स्थल पर मौजूद जीआई विशेषज्ञ रजनीकांत ने कहा, “हम नई पीढ़ी को काशी और तमिलनाडु के ऐतिहासिक संबंधों से परिचित कराना चाहते हैं। यह कोई नई बात नहीं कि तमिल समाज काशी के प्रति श्रद्धा रखता है। यहां नास्तिक परंपरा के प्रतीक पेरियार भी समय बिताकर गए हैं। विरोध करने वालों को समझना चाहिए कि यह आयोजन राजनीतिक नहीं, सांस्कृतिक और शैक्षणिक आदान-प्रदान का मंच है।”

बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष राकेश त्रिवेदी कहते हैं, “तमिल संगमम के पीछे प्रधानमंत्री की दूरदर्शी सोच है। भारत एक है, लेकिन भाषाई, आहार-संस्कृति और वेशभूषा में विविधता बहुत है। तमिल परंपरा में कहा जाता है कि हर जल गंगाजल है और भारत का हर भूभाग काशी है। इसी भावना को सशक्त करने के लिए यह संगमम एक महत्वपूर्ण कदम है। हम चाहते हैं कि लोग यहां का विकास, विश्वनाथ कॉरिडोर और काशी की संस्कृति देखें।”

वे आगे कहते हैं, “आदि शंकराचार्य ने भारत को चार दिशाओं में धर्म से जोड़ा था। आज उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए प्रधानमंत्री मोदी तमिल संगमम के माध्यम से उत्तर और दक्षिण को एक सूत्र में पिरोने का काम कर रहे हैं। जो लोग इसका विरोध कर रहे हैं, वे भूल रहे हैं कि बीजेपी भाषा, क्षेत्रवाद या जातिवाद की राजनीति नहीं करती। यह आयोजन ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना को मजबूत करेगा।”

काम नहीं आएगी साउथ पॉलिटिक्स

हालांकि आलोचक इसे बीजेपी की तमिलनाडु में राजनीतिक पैठ बढ़ाने की रणनीति मानते हैं। आलोचकों और विद्वानों का मानना है कि यह कार्यक्रम राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित है। बीएचयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष शिवकुमार सिंह कहते हैं, “यदि उद्देश्य केवल तमिल संस्कृति को बढ़ावा देना होता, तो कार्यक्रम सीधे तमिलनाडु में आयोजित होता। इस आयोजन के लिए वाराणसी का चयन राजनीतिक उद्देश्य के लिए किया गया है। यह आयोजन हिंदुत्व के मुख्यालय माने जाने वाले शहर में हो रहा है, ताकि बीजेपी तमिलनाडु में अपनी जड़ें मजबूत कर सके। यह आयोजन भारतीय करदाताओं के पैसे से चलाया जा रहा है। विरोध करने वालों को समझना चाहिए कि यह कोई साधारण सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं है। इसका उद्देश्य दक्षिण भारत में राजनीतिक प्रभाव बढ़ाना है।”

बीजेपी पर सीधा निशाना साधते कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय कहते हैं, “बीजेपी की सांप्रदायिक नीति से देश की एकता और अखंडता को खतरा पैदा हो गया है। बीजेपी नेताओं का मानना है कि जनता को उकसाकर ही चुनाव जीता जा सकता है और सत्ता पर काबिज रहा जा सकता है। कांग्रेस ने भारत जोड़ो यात्रा निकाली, मन की बात नहीं की। बनारस में तो रोज ही लंबी-लंबी नाटकबाज़ी होती रहती है।”

अजय राय आगे कहते हैं, “देश में यह संदेश देने की जरूरत है कि देश से नफरत दूर करने की जरूरत है। जब डर कम होता है, तभी कोई देश तेज़ी से आगे बढ़ता है। हम अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोग हो सकते हैं। हमारी वेशभूषा और भाषाएं भिन्न हो सकती हैं। हमारी भावनाएं अलग हो सकती हैं, लेकिन आस्था एक है। 130 करोड़ के मुल्क को एकजुट रखने के लिए सिर्फ इवेंट नहीं, बल्कि भाईचारा, अपनापन और एक-दूसरे के प्रति प्यार की भावना जगाने की आवश्यकता है। यही हमारी सबसे बड़ी धरोहर है।”

संगमम एक पॉलिटिकल एजेंडा

बनारस के पत्रकार शिवमूर्ति दूबे कहते हैं, “काशी-तमिल संगमम एक स्पष्ट पॉलिटिकल एजेंडा है। एक तयशुदा योजना के तहत दक्षिण भारत के लोगों को मोदी का बनारस मॉडल दिखाने के लिए सरकारी खर्च पर लाया जा रहा है। जो लोग बनारस नहीं आ पा रहे थे, उनके लिए यह संगम नए पर्यटन का माध्यम बन गया है। बीएचयू के ज़रिये सरकार अपने राजनीतिक एजेंडे को तमिल संगमम के रूप में नया मंच दे रही है। बीजेपी को लगता है कि तमिलनाडु के लोगों के मन में काशी को लेकर सॉफ्ट कॉर्नर है। यह मुहिम दक्षिण और उत्तर के बीच वैचारिक खाई पाटने की कोशिश है, लेकिन असल उद्देश्य सियासी मुनाफा कूटना है।”

“बनारस के प्रति दक्षिण भारत के लोगों की आस्था और इस शहर से संबंध सदियों पुराने हैं। तमिलनाडु के तेनकासी में 13वीं सदी में स्थापित काशी विश्वनाथ मंदिर का जिक्र करते हुए शिवमूर्ति कहते हैं, ‘तेनकासी दक्षिण की काशी है। दक्षिण के लोगों ने लंबे समय से अपने मन-मिजाज में काशी रची-बसी है। बनारस में सर्वाधिक दर्शनार्थी और पर्यटक दक्षिण भारत से ही आते हैं। दक्षिण भारतीयों के मन में उत्कंठा रहती है कि वे एक बार काशी आएं और विश्वनाथ मंदिर व गंगा का दर्शन करें। उत्तर भारत की मेन स्ट्रीम की सियासत में शामिल बीजेपी दक्षिण की राजनीति में घुस नहीं पा रही थी। इसलिए अब काशी-तमिल संगमम् की मुहिम चलाई जा रही है, ताकि वहां के युवाओं का मन-मिजाज आसानी से बदला जा सके।’”

शिवमूर्ति दूबे आगे कहते हैं, “एलटीटीई मूवमेंट और भाषा-संस्कृति के सवाल पर दक्षिण के राज्य उत्तर से आज भी कटे हुए हैं। जब कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार बनी, तो बीजेपी की नींद उड़ गई। अब तमिल संगमम के माध्यम से नए सिरे से दक्षिण को साधने का प्रयास किया जा रहा है। बनारस के लोग अच्छी तरह जानते हैं कि हनुमान घाट पर तमिल समुदाय के 55-60 परिवारों के लगभग साढ़े तीन सौ लोग रहते हैं। इनकी कई पीढ़ियां बनारस में ही रहकर चली गई हैं। वे अब तमिलनाडु नहीं जाना चाहते और वहां के लोगों से उनका खास कोई सरोकार नहीं रहा। बीजेपी अब बनारस के तमिल नागरिकों को लेकर तमिलनाडु में पैठ बनाने की नई मुहिम चला रही है।”

बीएचयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष शिवकुमार सिंह इस पूरे आयोजन पर कठोर टिप्पणी करते हैं। उनका मानना है कि काशी–तमिल संगमम जैसा भव्य कार्यक्रम सांस्कृतिक समन्वय के बजाय दक्षिण भारत में राजनीतिक पैठ बनाने का माध्यम है। वे कहते हैं, “यह पूरा आयोजन जनता के पैसे से चलाया जा रहा है। सरकार इसे सांस्कृतिक उत्थान का नाम दे रही है, लेकिन वास्तविकता यह है कि जनता का धन राजनीतिक गणित में बहाया जा रहा है।”

शिवकुमार का आरोप है कि यह पहली बार नहीं है जब सत्ता सांस्कृतिक आयोजनों या भावनात्मक मुद्दों का चुनावी लाभ उठाने के लिए इस्तेमाल कर रही हो। वे याद दिलाते हैं कि “बिहार चुनाव के दौरान भी महिलाओं को बड़े पैमाने पर आर्थिक प्रलोभन दिए गए थे। सरकारी योजनाओं और सहायता कार्यक्रमों के नाम पर सीधे-सीधे राजनीतिक लाभ उठाया गया। आज उसी मॉडल को दक्षिण भारत में दोहराने की कोशिश की जा रही है।”

वे इसे शिक्षा प्रणाली पर भी हमला मानते हैं। उनका तर्क है कि विश्वविद्यालयों को ज्ञान, शोध और नवाचार का केंद्र होना चाहिए था, लेकिन उन्हें विचारधारा केंद्रित कार्यक्रमों का अखाड़ा बना दिया गया है। शिवकुमार आरोप लगाते हैं कि सरकार न तो उच्च शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ा रही है, न शोध को प्रोत्साहित कर रही है। इसके विपरीत, “धर्मांधता और सांस्कृतिक श्रेष्ठता का पाठ पढ़ाया जा रहा है। शोध, आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक सोच-सब पीछे धकेला जा रहा है, मानो इनकी कोई आवश्यकता ही न हो।”

शिवकुमार सिंह कहते हैं, “यह नीति केवल शिक्षा को कमजोर करने के लिए नहीं, बल्कि एक बड़ी सामाजिक इंजीनियरिंग का हिस्सा है। लोगों को बेरोजगार और अशिक्षित बनाकर उन्हें आसानी से नियंत्रित किया जा रहा है। शिक्षित समाज सवाल उठाता है, और सवाल उठते हैं तो सत्ता असहज होती है। इसलिए ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि नागरिक ज्ञान से दूर रहें और सत्ता के निर्णयों पर सवाल न उठाएं।”

दूसरी ओर, वरिष्ठ पत्रकार कुमार विजय का कहना है कि, “अपार प्रयासों के बावजूद भाजपा तमिल समाज की आत्मा में प्रवेश नहीं कर पा रही है। तमिलनाडु की सामाजिक-राजनीतिक बनावट ऐसी है जहां जातिगत चेतना और धार्मिक विभाजन की राजनीति समय के साथ कमज़ोर हुई है। पेरियार की विचारधारा आज भी वहां की जनता के मन में गहरी है और यही कारण है कि भाजपा का कट्टर हिंदुत्व आधारित आख्यान वहां प्रभावी नहीं हो सका।”

“इसी विफलता की भरपाई के लिए तमिलभाषी लोगों को रिझाने की कोशिशें जारी हैं। उन्हें उन राज्यों में मुफ्त यात्राएं कराई जा रही हैं जहां भाजपा की सरकारें हैं, ताकि सामाजिक दरारें गहरी की जा सकें। यह प्रयास अब तक पूरी तरह निष्फल रहे हैं। दुर्भाग्य यह है कि इस विभाजनकारी राजनीति का संचालन स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करते प्रतीत होते हैं। जिस सांस्कृतिक सम्मिलन की वे सार्वजनिक रूप से बात करते हैं, वह व्यवहार में खोखला प्रतीत होता है, मानो सरकार के धन का दुरुपयोग कर एक कृत्रिम एकता गढ़ने की असफल कोशिश हो रही हो।”

वरिष्ठ पत्रकार विजय यह भी कहते हैं, “दो राज्यों के बीच सांस्कृतिक संवाद और समन्वय तभी संभव है जब देश की बहुलतावादी आत्मा को समझा जाए और उसके अनुरूप कार्य किया जाए। किसी भी संस्कृति का वास्तविक उत्थान तभी संभव है जब अन्य धर्मों और परंपराओं का भी सम्मान किया जाए। हिंदुत्व के एकमात्र एजेंडे पर चलते हुए ‘समग्र भारत’ का स्वप्न साकार नहीं हो सकता। देश अपनी शक्ति विविधताओं में ही पाता है। देश का हर आदमी अच्छी तरह से समझने लगा है कि बीजेपी नौजवानों की रोजगार की गारंटी और नौकरी की बात नहीं करती। वो धर्म का काढ़ा पिलाती है। वह वक्त बीजेपी के नेता चुनाव के मूड में रहते हैं। काशी-तमिल संगमम इसी कड़ी का एक हिस्सा है। यह आयोजन पोलिटिकल इवेंट से इतर कुछ भी नहीं है।”

(विजय विनीत, बनारस के वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक)

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