पंजाब हरियाणा के बीच लम्बे समय से चल रहे पानी बंटवारे और सतलुज यमुना लिंक नहर परियोजना के विवाद में 27 जनवरी को हुई दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक के बाद भगवंत मान के पानी को लेकर स्टैंड में खासी ढील संयुक्त पत्रकार वार्ता में स्पष्ट हो गई। मुद्दे पर भगवंत मान का समझौतावादी रुख दिखाई दिया जब एक सवाल के जवाब में मान ने कहा कि ‘नहर तो फेर बना लेंगे पहले पानी का बंटवारा तय हो जाये।’
दोनों प्रदेशों के मुख्यमंत्री, सिंचाई मंत्री और अधिकारियों की इस बैठक में हई बातचीत को भगवंत मान ने बहुत सौहार्दपूर्ण और समाधान की दिशा में पहल के रूप में प्रस्तुत किया।
भगवंत मान के इस बदले हुए रुख ने पंजाब में राजनीति के महत्वपूर्ण बिंदु को फिर से कुरेद दिया है। विपक्षी राजनीतिक दलों के साथ साथ खुद के पूर्ववर्ती रुख को भी उदारता की श्रेणी में लाने के प्रयास को सिख दर्शन के सिद्धांत दयालुता से जोड़ दिया। सर्वोच्च न्यायलय में यह विवाद विचाराधीन है। सर्वोच्च न्यायालय ने दोनों प्रदेशों को आपसी बातचीत से कोई समाधान खोजने की पहल करने के निर्देश दिए थे लेकिन उस पर भी अभी तक कोई बैठक की नहीं गई थी।
हरियाणा द्वारा सतलुज यमुना नहर के निर्माण की बार बार मांग किये जाने पर मई 2025 में भगवंत मान ने तीखी टिप्पणी की थी। मुख्यमंत्री ने कहा था कि जब पंजाब खुद जल संकट से जूझ रहा है और बाँटने के लिए अतिरिक्त पानी नहीं बचा तो नहर बनाने का क्या औचित्य है। मान ने कहा था ऐसी स्थिति में सतलुज यमुना नहर का का निर्माण न केवल अव्यावहारिक है बल्कि पंजाब के किसानों और आनेवाली पीढ़ियों के साथ अन्याय भी है ।
आम आदमी पार्टी और भगवंत मान का यह रुख किस कारण से प्रेरित है और इसके क्या राजनीतिक उद्देश्य हैं इसकी स्पष्टता आने वाले विधानसभा चुनावों की हलचल में हो पायेगी। अब चुनावी वर्ष में इस मुद्दे को छेड़ना अपने आप में सवाल खड़े करता है जबकि सरकार के पास पर्याप्त समय पिछले 4 साल का इस मसले को सुलझाने के लिए था।
आम आदमी पार्टी के द्वारा प्रदेश के सभी राजनीतिक दलों की इस मुद्दे पर कभी कोई संयुक्त बैठक की नहीं गई और ना हीं इस पर कोई सामूहिक विश्वास बनाने के प्रयास आम आदमी पार्टी ने किये यह आरोप विपक्षी दलों द्वारा बार बार लगाए जाते रहे हैं।
2022 मार्च में पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार बनाने के बाद अक्टूबर 2022 में मुख्यमंत्री भगवंत मान की हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खटटर से एक बैठक पानी के बंटवारे और सतलुज यमुना लिंक नहर परियोजना पर हुयी थी। तब मान ने हरियाणा की मांग को सिरे से नकार दिया था और साफ किया की इस परियोंजना को आगे बढ़ाये जाने का सवाल ही नहीं उठता क्योंकि पंजाब के पास पर्याप्त मात्रा में पानी ही नहीं है।
नहर के लिए अधिगृहित भूमि को डीनोटिफाई करके किसानों को जमीन वापस लौटा दी गई है। मान ने यह भी साफ किया कि नदियों में पानी की मात्रा घट गयी है और पंजाब की जनसंख्या में पहले से काफी वृद्धि हो चुकी है इसलिए पुनरावलोकन करना जरूरी है।
वर्तमान में पंजाब में कृषि 27 % धरातलीय जल पर निर्भर है और बाक़ी 73 % भूजल दोहन के उपयोग पर। भगवंत मान ने जल के आंकड़े देते हुए स्थिति का विवरण दिया था कि हरियाणा को 14 .10 मिलियन एकड़ फ़ीट ( एमएएफ ) पानी सतलुज यमुना और अन्य बरसाती नदियों से प्राप्त हो रहा है जबकि पंजाब को 12 .63 एमएएफ ही जल उपलब्ध है। तब भगवंत मान ने कहा था कि हरियाणा को पंजाब से पानी मांगने की बजाये यमुना से पानी पंजाब को देना चाहिए।
भगवंत मान के बदले हुए रुख पर विपक्षी राजनीतिक दलों ने कड़ी प्रतिकिर्याएँ दी हैं। अकाली दल के प्रमुख सुखबीर बादल ने आरोप लगाया है कि भगवंत मान ने गुरु तेगबहादुर और गुरु गोबिंद सिंह के अनुयायी भाई कन्हिया जी के संदर्भ को पंजाब के हिस्से का पानी अन्य राज्य हरियाणा को समर्पण करने लिए तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया है यह अपमानजनक धर्म-द्रोही है। दशमपिता ने हमे करुणा और दान के साथ अपने हकों के लिए लड़ना भी सिखाया है।
सुखबीर बादल ने कहा कि सिख इतिहास को विकृत करने के लिए भगवंत मान को माफ़ी मांगनी चाहिए। भगवंत मान दरबारा सिंह के कदम पर चल रहे है, यह आरोप भी सुखबीर बादल ने लगाया।
‘यह करुणा नहीं बल्कि राजनीतिक विश्वासघात है’ कांग्रेस के नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा ने भगवंत मान के बयान को लेकर कहा। बाजवा ने आरोप लगाया कि भगवंत मान राज्य के जलक्षेत्र पर वैध अधिकारों की रक्षा करने में विफल है।
उन्होंने कहा, “तथ्य स्पष्ट हैं, कानून स्पष्ट है और पंजाब का रुख स्पष्ट है। अस्पष्ट यह है कि मुख्यमंत्री ने कर्तव्य के बजाय दिखावे को और पंजाब के अस्तित्व के बजाय हरियाणा के दृष्टिकोण को क्यों चुना” अब अचानक भगवंत मान की पसंदीदा लाइन ‘पंजाब कोल इक बूंद वी पानी नहीं ‘कहाँ गायब हो गई , यह अज्ञानता नहीं है; यह जानबूझकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ना है। यह अक्षमता नहीं है, यह पीठ में छुरा घोंपना है।”
पूर्व मंत्री और कांग्रेस विधायक परगट सिंह ने कहा कि भगवंत मान की टिप्पणियों ने सिंह समुदाय की सामूहिक अंतरात्मा को आहत किया है। उन्होंने कहा, “इस तरह की टिप्पणियां भाई कन्हैया जी के योगदान की गंभीरता को कम करती हैं और सिख पंथ की भावनाओं को गहरी चोट पहुंचाती हैं, जिससे विभाजन को बढ़ावा मिलता है जहां एकता और सम्मान सर्वोपरि हैं।”
अभी पंजाब के सामाजिक संगठनों और किसान जत्थेबंदियों की प्रतिक्रियाएं आना बाक़ी हैं लेकिन भगवंत मान ने जिस मुद्दे को कुरेद दिया है वो निश्चित तौर पर पंजाब में एक नयी बेचैनी जरूर पैदा कर देगा। राजनीतिक लाभ-हानि की बिसात पर भारतीय जनता पार्टी क्या राह अपनाती है यह देखना भी महत्वपूर्ण रहेगा।
(जगदीप सिंह सिंधु वरिष्ठ पत्रकार हैं।)