चीन के विदेश मंत्रालय के हालिया बयान में ईरान पर हुए इसराइली और अमेरिकी हमलों को संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उद्देश्यों और सिद्धांतों के विरुद्ध बताया गया है। बयान में ईरान की संप्रभुता, सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता के उल्लंघन की बात कही गई तथा सर्वोच्च नेतृत्व को निशाना बनाने की किसी भी कार्रवाई की कड़ी निंदा की गई। चीन ने तत्काल सैन्य कार्रवाई रोकने, तनाव को न बढ़ाने और मध्य पूर्व में शांति व स्थिरता बनाए रखने की अपील दोहराई।
शब्दों की दृष्टि से यह प्रतिक्रिया काफ़ी स्पष्ट और कठोर प्रतीत होती है, किंतु यदि व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो चीन का रुख़ अपने पूर्ववर्ती रुझानों से बहुत अलग नहीं दिखता।
पिछले वर्ष भी जब ईरान पर हमले हुए थे, तब चीन ने कहा था कि इसराइल ने ‘रेड लाइन’ पार की है। इसके बाद शंघाई कोऑपरेशन सम्मेलन में भी हमले की निंदा की थी। 15 जून को चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराग़ची से बातचीत कर संप्रभुता के उल्लंघन और नागरिकों की मौत पर चिंता व्यक्त की थी। विशेष रूप से परमाणु ठिकानों पर हमले को अत्यंत ख़तरनाक बताया गया था।
फिर भी इन कूटनीतिक बयानों से आगे बढ़कर चीन ने कोई प्रत्यक्ष सैन्य या व्यापक आर्थिक हस्तक्षेप नहीं किया। 2025 के बारह दिन चले संघर्ष के दौरान भी बीजिंग ने तेहरान को प्रत्यक्ष सैन्य समर्थन नहीं दिया। इससे यह संकेत मिलता है कि चीन सिद्धांतगत समर्थन और व्यावहारिक हस्तक्षेप के बीच एक स्पष्ट रेखा बनाए रखता है।
चीन की विदेश नीति का मूल चरित्र यहाँ उभरकर सामने आता है। वह स्वयं को बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का समर्थक बताता है और संप्रभुता, आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने तथा संवाद के माध्यम से समाधान की वकालत करता है। किंतु जब क्षेत्रीय संकट उभरते हैं, तो उसकी सक्रियता प्रायः बयानबाज़ी और सीमित कूटनीतिक संवाद तक सिमटी दिखाई देती है। इसका कारण केवल नैतिक या वैचारिक नहीं, बल्कि गहरे रणनीतिक और आर्थिक हितों से जुड़ा है।
ईरान ऊर्जा आपूर्ति और बेल्ट ऐंड रोड जैसी परियोजनाओं के संदर्भ में चीन के लिए महत्वपूर्ण साझेदार है, परंतु अमेरिका के साथ उसके व्यापारिक और तकनीकी संबंध कहीं अधिक व्यापक और संवेदनशील हैं।
हाल ही में डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग के बीच हुई टेलीफोन वार्ता में ईरान, ताइवान और व्यापार जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। यह परिघटना संकेत देती है कि चीन ईरान के प्रश्न पर अपेक्षाकृत संयमित रुख़ अपनाकर अपने प्रमुख हितों—विशेषकर ताइवान और व्यापार—पर अमेरिका से संतुलन या संभावित रियायतें हासिल करने की रणनीति पर काम कर सकता है।
बीजिंग के लिए प्राथमिकता यह भी है कि अमेरिका के साथ प्रत्यक्ष टकराव की स्थिति न बने, क्योंकि ऐसी स्थिति उसके आर्थिक विकास और वैश्विक विस्तार की दीर्घकालिक योजना को प्रभावित कर सकती है।
चीन की राजनीतिक संरचना, जहाँ सत्ता एकदलीय व्यवस्था के अंतर्गत केंद्रीकृत है, विदेश नीति को और अधिक जटिल बनाती है। निर्णय प्रक्रिया में निरंतरता और दीर्घकालिक सोच तो दिखाई देती है, परंतु जोखिम लेने की प्रवृत्ति अपेक्षाकृत सीमित रहती है। चीन अपने को वैकल्पिक वैश्विक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है, किंतु वह प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप या खुले टकराव से बचते हुए ‘रणनीतिक धैर्य’ की नीति अपनाता है।
यही कारण है कि चाहे ईरान का मामला हो या वेनेज़ुएला जैसी परिस्थितियाँ, चीन की प्रतिक्रिया प्रायः औपचारिक निंदा और संवाद की अपील तक सीमित रहती है।
प्रश्न यह है कि क्या केवल सिद्धांतों—संप्रभुता, संवाद और स्थिरता—पर जोर देकर जटिल क्षेत्रीय संकटों का समाधान संभव है? चीन का तर्क हो सकता है कि प्रत्यक्ष हस्तक्षेप से संघर्ष और बढ़ सकता है तथा दीर्घकालिक समाधान वार्ता से ही निकलता है। परंतु आलोचकों का मत है कि जब आर्थिक हित व्यापक हों, तब राजनीतिक और कूटनीतिक सक्रियता का स्तर भी समान रूप से प्रभावशाली होना चाहिए।
ईरान का प्रकरण इसी द्वंद्व को उजागर करता है—जहाँ चीन के आर्थिक हित बड़े हैं, पर उसकी राजनीतिक और सामरिक भागीदारी सीमित दिखती है।
अंततः चीन का रुख़ न तो पूर्ण निष्क्रियता है और न ही प्रत्यक्ष हस्तक्षेप। यह एक संतुलनकारी रणनीति है, जिसमें वह वैश्विक शक्ति की छवि बनाए रखते हुए अमेरिका से सीधा टकराव टालना चाहता है। ईरान का संकट इस रणनीति की सीमाओं और संभावनाओं दोनों को सामने लाता है। क्योंकि इसे चीन की एक कमजोरी के रूप में भी देखा जा सकता है।
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या चीन केवल सिद्धांतों की भाषा तक सीमित रहता है, या बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के अपने दावे को अधिक सक्रिय कूटनीतिक पहल के माध्यम से ठोस रूप देता है।
(शैलेंद्र चौहान लेखक-कवि हैं और अनियतकालिक पत्रिका धरती के संपादक हैं।)