सोनभद्र/मिर्जापुर, (उत्तर प्रदेश)। इन ढाई दशक में गांव की तस्वीर बदली, समय और हालात बदले पर वह दर्द आज भी बरकरार है। भवानीपुर कांड को सब भूल गए हैं, लेकिन नहीं भूली हुई है तो तेतरा देवी जिनके जिगर के टुकड़े को पुलिस की एक गोली ने हमेशा-हमेशा के लिए उनसे छीन लिया था। भला उसे वह कैसे भूल सकती हैं…?
होली का त्योहार करीब आते ही “भवानीपुर कांड” हरा भरा हो जाता है, उसकी यादें ताज़ा हो उठतीं हैं। जिन लोगों के सामने यह कांड हुआ था उनमें से कम ही लोग भवानीपुर गांव में बचे हुए हैं। वह उस मंज़र को याद कर कांप उठते हैं। दर्द और उस मंज़र का आंखों देखा हाल याद कर सिहर उठते हैं, लेकिन कैमरे के आगे आने से आज भी खौफ खाते हैं कि बेवजह पुलिसिया पचड़े में कौन फंसने जाएं।
उस दौर के साक्षी रहे पुरुष और महिलाएं होलिका दहन और होली पर्व आने पर भूले भी इसे नहीं भूल पाते हैं। ख़ासकर एक 11 साल के मासूम बालक का चेहरा तो लोग भूलकर भी नहीं भुला पाते हैं, जो अपने दादा-दादी के साथ रिश्तेदार के घर आया हुआ था, जो पुलिस की गोली का शिकार हो गया।
09 मार्च 2001 के इस घटनाक्रम को हुए भले ही ढाई दशक होने को हैं, इस बीच गांव में काफी कुछ बदलाव हुए हैं। गांव बदला, लोग बदले, कुछ व्यवस्था बदली लेकिन यदि कुछ नहीं बदला है तो ‘भवानीपुर कांड’ का वह मंजर और वह ‘सच’ जिसे वह भाई और मां भूलें भी नहीं भुला पाते हैं, जिनके आंखों के सामने पुलिस की एक गोली ने एक भाई को उसके भाई से एक बेटे को उसकी मां से सदैव के लिए छीन लिया था।
16 नक्सलियों को मार गिराने का तमगा हासिल करने वाली उस दौर की सरकार और उस आपरेशन को क्वार्डिनेट कर पुलिस टीम में शामिल तत्कालीन मड़िहान थाना प्रभारी और पुलिस को बहुत (विशेष प्रोन्नति) कुछ मिला, लेकिन उस मासूम बालक को जो पूरी तरह से निर्दोष रहा, उसके परिवार को आज तक न्याय नहीं मिला है। इन पच्चीस वर्ष में उस बालक के परिवार पर क्या गुज़री है, वह कैसे इस दर्द को लेकर जीतें आएं हैं किसी ने जानने और समझने की जुर्रत नहीं समझी है।
मानवाधिकार आयोग से लेकर सीबीआई की टीम ने गांव में डेरा डाला, जांच की और सभी ने उस बालक को निर्दोष भी माना पर निर्दोष रहे बालक के गुनहगारों को सज़ा देने में कोई कार्रवाई नहीं की जिसका मलाल निर्दोष मार दिए गए बालक के परिवार और गांव के लोगों को आज भी है।
भवानीपुर कांड के पूरे पहलू को क़रीब से जानने और समझने के साथ ही साथ खासकर हमने नक्सली मुठभेड़ के नाम पर मारे गए उस ग्यारह वर्षीय बालक के परिवार से मिलकर उनके भी मर्म-वेदना को समझने और उनकी पूरी दास्तां को सुनने के लिए उनके गांव की ओर रुख़ किया, जहां अभी तक किसी ने जाने की जहमत नहीं उठाई है।
होली और होलिका दहन का दिन करीब आने पर मीडिया की सुर्खियों में भवानीपुर कांड पर कुछ चर्चा छिड़ जाती है, लेकिन उस मासूम बालक की कोई चर्चा नहीं होती है जो नक्सली नहीं एक मासूम बालक था, बेगुनाह था, अपनी मां के आंखों का तारा था, बड़े भाई और पिता के बुढ़ापे का लाठी का सहारा था।
‘जनचौक टीम’ ने भवानीपुर से लेकर खैरपुर गांव का दौरा कर वर्तमान और पूर्व के हालात के हर पहलुओं को एकत्रित किया, लोगों से मिलकर उनके उस दौर के घटनाक्रम को जाना और सुना, ताकि पूरी सच्चाई को सामने लाया जा सके, पेश है नक्सली मुठभेड़ वाले गांव भवानीपुर (मिर्जापुर) से लेकर निर्दोष मार दिए गए बालक के गांव खैरपुर (सोनभद्र) से ‘जनचौक’ विशेष संवाददाता संतोष देव गिरी की ग्राउंड रिपोर्ट :–
होलिका दहन वाले दिन दहल उठा था भवानीपुर गांव
09 मार्च 2001 होलिका दहन वाले दिन पूर्वी उत्तर प्रदेश के दक्षिणांचल में स्थित मिर्जापुर के राजगढ़ विकास खंड क्षेत्र अन्तर्गत भवानीपुर गांव में सब कुछ सामान्य था। मिर्जापुर जिला मुख्यालय से तकरीबन 60 किमी दूर इस गांव में उस दिन लोग अपने रोजमर्रा के कार्यों में लगें हुए थे। कुछ लोग खेतों में सरसों की पक चुकी फसल की कटाई तो गेहूं के खेतों में निराई कर रहे थे। गांव में होलिका दहन की तैयारी भी जोर-शोर से चल रही थी। गांव से गुज़री नहर पूरी तरह से सूख कर सुनी पड़ीं हुई थी।
उमंग उत्साह और होली का उल्लास लिए कुछ लोग गांव के चट्टी तथा बग़ीचे में बतकही में मशगूल थे, कि तभी सहसा दोपहर बाद एक पर एक पुलिस की गाड़ी गांव की और दौड़ने लगी थी। और देखते ही देखते भवानीपुर गांव पूरी तरह से पुलिस छावनी में तब्दील हो चुका था।
गांव में पहुंची पुलिस ने चारों ओर से घेराबंदी करने के बाद गांव वालों को अपने अपने घरों से बाहर निकल आने की चेतावनी देने की माइक से घोषणा की। पुलिस ने मुखबिर के जरिए गांव में बड़े नक्सलियों के होने की सूचना पर गांव को पूरी तरह से घेरकर ग्रामीणों को उनके घरों से सुरक्षित निकालकर नक्सलियों से मोर्चा संभाल लिया था।
पुलिस ने इस दौरान कई घंटों चले गोलाबारी के बीच कथित तौर पर 16 नक्सलियों के मारे जाने का दावा किया था। जिनमें से एक 11 साल का बालक भी पुलिस की गोली से मारा गया था। यह बालक हरिनारायण उर्फ़ कल्लू (11 वर्ष) पुत्र रामखेलावन निवासी सिरिसिया ठकुराई, खैरपुर (सोनभद्र) से अपने पिता के ननिहाल भवानीपुर गांव में आयोजित बहूभोज में शामिल होने के लिए आया हुआ था।
पैंट खिसकते ही पुलिस ने दाग दी थी गोली
बेगुनाह बालक हरिनारायण उर्फ़ कल्लू की कहानी इतनी मार्मिक है की हर कोई सुनकर दहल उठता है। उसे क्या पता था कि जिस गांव में वह खुशियां मनाने के लिए आया हुआ है वही उसके लिए ‘काल’ बनेगा। क्या कहा जाए पुलिस को उस पर नक्सलियों को मारने का जुनून इस कादर हावी था कि उसने कल्लू को ‘सरकती पैंट’ ऊपर करने तक का मौका नहीं दिया और उसे नक्सली समझ गोली मार दी।

लोग बताते हैं कि सोनभद्र के करमा थाना क्षेत्र अंतर्गत खैरपुर गांव से भवानीपुर गांव में अपने दादा-दादी सम्मत राम, जीरा देवी तथा बड़े भाई जगनारायण राम के साथ अपने दादा के साले लालबहादुर के घर भवानीपुर में आए हरिचरण उर्फ कल्लू गांव में अचानक से उस दिन भारी संख्या में पुलिस टीम देखकर डर-सहम गया था। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर बात क्या है? और फिर कक्षा सात में पढ़ने वाला वह बालक समझ भी क्या पाता?
दूसरी ओर पुलिस के तलाशी अभियान और गोलीबारी ने उसे अंदर तक उसके बाल मन को भयाक्रांत भी कर रखा था। बालसुलभ मन ने उसे कुरेदा और वह आव देखा न ताव सीधे घर के बाहर आ गया पीछे से उसका बड़ा भाई जगनारायण भी आ रहा था। इसी दरमियान एक पुलिस वाला पूछ बैठा, ‘बेटा क्या नाम है कहा के रहने वाले हो….?
चूंकि पुलिसकर्मी ने उक्त सवाल कल्लू से डांटते हुऎ पूछा था इसलिए वह हड़बड़ा गया। हड़बड़ाहट में उसकी पैंट नीचे की ओर सरक गई थी जिसे ठीक करने के लिए वह आधा ही झुक पाया था की तभी दुसरे पुलिसकर्मी ने एक गोली उसके सीने में दाग दी थी। पुलिस ने कल्लू के सीने में गोली इतने करीब से मारी थी कि वह ‘उफ्फ’ तक नहीं कर सका था।
बालक कल्लू के बड़े भाई जगनारायण (जो इस मंजर के प्रत्यक्ष गवाह हैं) के मुताबिक, “छोटे भाई को उनकी आंखों के सामने सीने से गोली मार दी गई थी। भाई को वह हाथ लगाकर सहारा दे पाते कि इसके पहले ही एक पुलिस वाले ने उनके आंखों पर उन्हीं के मफलर से आंखों को बांध वहीं बैठा दिया था, जिसके बाद वह कुछ देख नहीं पाए काफी देर बीतने के बाद देखा तो उनका भाई लाश बन चुका था। गांव में लाशों के ढ़ेर लग चुके थे लाशों को एक ट्रैक्टर पर भूंसे की भांति लाद दिया गया था।”
जेहन में आज भी बेटे की चिता जलतीं रहती है
ढ़ाई दशक बीतने के बाद हरिनारायण उर्फ़ कल्लू की मौत को उनका परिवार भूल नहीं पाया है। खैरपुर, सोनभद्र के गांव में मेहनत मजदूरी कर पत्नी और चार बेटियों संग मां का पेट पाल रहे जगनारायण आज भी भाई को भूल नहीं पाए हैं। पुलिस और वर्दी का खौफ उनके मन में इस कदर है कि भाई की मौत कैसे हुई पूछते ही फफक-फफक कर रो पड़ते हैं।
उनके पिता रामखेलावन 70 की अवस्था में कैंसर की लंबी बीमारी के बाद 23 जून 2025 को दम तोड़ चुके हैं। बेटे के बाद पति की मौत ने हरिनारायण उर्फ़ कल्लू की मां तेतरा देवी को बुरी तरह से तोड़ दिया है। वह एक जिंदा लाश बनकर रह गई हैं।
‘जनचौक’ टीम को बेटे की मौत की कहानी और उसके बाद शुरू हुई बदहाली भरी कहानी सुनाते हुए पुलिस की गोली से मार दिए गए ग्यारह वर्षीय बालक हरिनारायण का फोटो देखते ही माथा पीटकर दहाड़े मारकर रोने लगती हैं, जिन्हें संभालने में जुटी परिवार की महिलाओं के आंखों में भी आंसू थमने का नाम नहीं लेते हैं।
क्या आपके बेटे कल्लू को बेगुनाह होते हुए भी गोली मारने वाले पुलिस कर्मियों पर कोई कार्रवाई हुई..? के सवाल पर वह फफक-फफक कर बोलती हैं, “कुछी नाहीं भयल हो साहेब, हमार ललवा चली गयेन पुलिस के गोलियां से।
“सब दिनवा बित जाला, नाहीं बितत फगुनवा हो रजवा!
होलिका नहीं करेजवा जरेला हो रजवा…! इतना कहते-कहते वह बेहोश हो जाती हैं। ऐसी स्थिति में आगे का सवाल कर पाना मुश्किल ही नहीं अत्यंत कठिन और मार्मिक हो जाता है।
कुछ देर की खामोशी के बाद सामान्य होने पर तेतरा देवी बताती हैं कि, बेटे का शव उन्हें दे दिया गया था जिसका 10 मार्च को मिर्जापुर के चौबेघाट स्थिति गंगा नदी तट पर उन्होंने दाह संस्कार ऐसे जैसे किया था जबकि 15 लोगों के लाश को एक साथ जला दिया गया था। बेटे की मौत के बाद जांच दर जांच से भी उन्हें गुजरना पड़ा था कभी मड़िहान थाना तो कभी मिर्जापुर वाराणसी तक की दौड़ लगानी पड़ी थी।
वह बताती हैं कि, “भले ही उनके बेटे को गोली मारकर जिम्मेदारी से मुंह मोड़ा जाता रहा है, लेकिन उनके बेटे की मौत से वह पुलिस अधिकारी जो जांच के लिए आ रहे थे खुद पुलिस वाले होकर भी पुलिस वालों को गाली दे रहे थे कि ‘आखिरकार कैसे उसने गोली चला दी’…!

तंगहाली से जूझ रहा कल्लू का परिवार
2001 में होलिका दहन वाले दिन कथित नक्सली मुठभेड़ के नाम पर पुलिस की गोली से मार दिए गए 11 वर्षीय हरिनारायण उर्फ़ कल्लू का परिवार खैरपुर गांव में तंगहाली भरा जीवन जी रहा है। मां तेतरा देवी और बड़े भाई जगनारायण का कल्लू के गम में आज भी बुरा हाल हो रखा है। दो भाई दो बहनों में कल्लू की मौत के बाद बहनों के बिदा होकर ससुराल चले जाने के बाद जगनारायण का बुरा हाल हो चुका है।
बीए तक की शिक्षा ग्रहण करने के बाद जगनारायण बेरोजगार बना मेहनत और मजदूरी कर किसी प्रकार से परिवार का पेट पालता हुआ आया है। बीते वर्ष कैंसर पीड़ित पिता की मौत से वह और भी टूट गए हैं। चार बेटियों का भार उन्हें अलग से सताए जाता है। पत्नी चंदा देवी भी बीए कर घर का चौका चूल्हा संभालती है। खेती किसानी के नाम पर नाम मात्र का एक बीघा जमीन पूर्वजों के जमाने का पट्टा का मिला हुआ है। जिससे घर गृहस्थी चलाना कठिन होता है।
आवास के नाम एक ग्राम पंचायत से पक्का मकान मिला है, जबकि कल्लू के निर्दोष होने के बाद भी पुलिस द्वारा गोली मार दिए जाने के बाद जांच दर जांच में कल्लू के निर्दोष साबित होने के बाद उनके परिवार को तीन लाख नगद और तीन बीघा खेती योग्य जमीन और बड़े भाई को नौकरी देने का आश्वासन दिया गया था जो आज तक पूरा नहीं हो पाया है।
सरकार से लेकर जनप्रतिनिधियों तक ने खैरपुर की नहीं ली खोज-खबर
भवानीपुर कांड के बाद कथित नक्सली मुठभेड़ के नाम पर वाहवाही बटोरी तत्कालीन राजनाथ सिंह के अगुवाई वाली उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह तथा गृहराज्यमंत्री रंगनाथ मिश्रा ने घटनाक्रम के बाद इस मुठभेड़ में घायल तत्कालीन मड़िहान थाना प्रभारी दिलीप सिंह, सक्तेशगढ़ चौकी के सिपाही नामवर सिंह यादव इत्यादि को आउट आफ टर्न प्रमोशन देने की घोषणा की थी।
मुठभेड़ में शामिल पुलिस दल को सामूहिक रूप से पांच लख रुपए का पारितोषिक भी देने की बात कही गई थी इसी के साथ घायलों के इलाज का पुरा खर्चा सरकार वहन करेेगी की भी घोषणा की गई।
तत्कालीन मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह मिर्जापुर जिला अस्पताल में घायल पुलिस कर्मियों का कुशलक्षेम लेने के बाद पत्रकारों से मुखातिब होते हुए यह बोले थे। पुलिस टीम के लिए घोषणा दर घोषणा के बाद मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह ने भवानीपुर की घटना में किसी निर्दोष के मारे जाने की पुष्टि होने पर सरकर द्वारा उसके परिवार को पुरी मदद करने को तत्पर है का भी ऐलान किया था। उन्होंने कहा था कि उनकी सरकार इ़ंसाफ व इंसानियत के आधार पर काम कर रही है इस आधार पर इसका पालन करने के निर्देश पुलिस को भी दिए गए हैं, लेकिन उनके इस घोषणा और निर्देश के 25 साल बाद भी उनके इस आदेश निर्देश का दूर-दूर न तो पता है ना ही उन्होंने खुद खैरपुर गांव जाकर कल्लू के परिवार के बहते हुए आंसुओं को पोंछ उनका खैर-खबर लेना उचित समझा था।
गांव के कुछ लोग बोलते हैं कि हरिनारायण उर्फ़ कल्लू दलित का बेटा था इस लिए उसके दरवाजे पर किसी ने भी झांकना उचित नहीं समझा। आश्चर्य की बात है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री से लेकर अब तक के सांसद व विधायक ने बालक कल्लू के परिवार को मदद देना तो दूर रहा है, उसके परिवार का हाल भी जानना जरूरी नहीं समझा है। ग्रामीणों को यह बात खटकने से कहीं ज्यादा चुभती रहती है।
सीबीआई से लेकर मानवाधिकार आयोग की जांच
मिर्जापुर के बहुचर्चित भवानीपुर कांड में पुलिस ने सभी के नक्सली होने का दावा करते हुए भले ही अपनी पीठ थपथपा ली थी, लेकिन जैसे-जैसे भाकपा माले, पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (पीयूसीएल), एसोसिएशन फॉर द प्रोटेक्शन आफ डेमोक्रेटिक राइट्स, इंकलाबी नौजवान सभा सहित कई संगठनों ने भवानीपुर कांड के बाद मारे गए लोगों के पहचान को लेकर सवाल उठाना और जांच की मांग करनी शुरू की वैसे ही पुलिस की कलई खुलने लगी थी।
घटनाक्रम में तब नया मोड़ आ गया था जब पुलिस ने कई हार्डकोर नक्सलियों के भी मारे जाने का दावा कर दिया था, लेकिन कुछ दिनों बाद ही उनके इस दावे की तब हवा निकल गई थी जब वह जिंदा पता चले। हालांकि मानवाधिकार आयोग की टीम सहित कई संगठनों की जांच के बाद निष्कर्ष यह निकला था कि पुलिस की गोली से मारा गया बालक कल्लू पूरी तरह से निर्दोष रहा है।
उल्टा पड़ा था दांव, हुई है किरकिरी
गौरतलब हो कि ढाई दशक पहले हुए कांड में मारे गए लोगों में से कई की आज भी शिनाख्त नहीं हो पाई है, ऐसा लोगों का कहना है। इस कांड के बाद उस समय जिले में तैनात रहे तत्कालीन पुलिस अधिकारियों ने आनन-फ़ानन में सभी शवों को नक्सलियों का होना करार दिया था। मारे गए नक्सलियों में लालब्रत कोल सरीखे कुख्यात नक्सलियों का भी नाम शामिल किया गया था।
भवानीपुर कांड के बाद सोनभद्र व चंदौली में हुई कुछ अन्य घटनाओं में जब लालब्रत कोल का नाम सामने आने लगा तो जिले के पुलिस को खुद ही यह कहना पड़ा था की लालब्रत जिंदा है। इससे पुलिस की मुठभेड़ की कहानी और मारे गए लोगों की शिनाख्त को लेकर सवाल खड़े होने लगे थे। बाद में पीयूसीएल और अन्य मानवाधिकार संगठनों की मांग पर तत्कालीन केंद्र सरकार ने इस मुठभेड़ कांड की जांच जुलाई 2006 में सीबीआई को सौंप दी थी और इसके जांच के आदेश दिये थे।
होली आते ही हरा हो जाता है ज़ख्म
ढ़ाई दशक के अंतराल में काफी कुछ बदलाव हो चुके हैं गांव बदला है, गांव का परिवेश बदला है, लोग बदले हैं यदि कुछ नहीं बदला है तो वह है भवानीपुर कांड की याद। होली और होलिका दहन का दिन आते ही गांव में पुलिस की गश्त तेज़ हो जाती है तो ग्रामीण भी पुरानी यादों में खो जाते हैं। ‘जनचौक टीम’ ने खैरपुर, सोनभद्र से वापस लौटते समय भवानीपुर गांव का रुख किया तो गांव के चट्टी पर नहर से लगे सड़क किनारे कुछ लोग बैठे दिखाई दे गये।

चर्चा होने पर भवानीपुर गांव के बीते हुए कल और बालक कल्लू की पुलिस की गोली से हुई मौत पर ओह कहते हुए शून्य में खो जाते हैं।
एक ग्रामीण नाम और फोटो न छापने की शर्त पर बताते हैं, “उस दौर में भवानीपुर की नहर सूखी हुई थी, शाम को होलिका में आग लगनी थी। दोपहर के दो बजे से ही गोली चलनी शुरू हो गई थी। चारों ओर से पुलिस ने गांव को घेर लिया था। गांव के लोग गांव में रह गये थे। जो हाट-बाजार गये थे वह गांव के बाहर ही रात बिताए थे। गोलीबारी रुकी तो मरे पड़े लोगों की लाश को रातों रात ट्रैक्टर में लादकर सभी लाश को मड़िहान थाना ले जाया गया। वहां से मिर्ज़ापुर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया था।
अब कैसी होली होती है के सवाल पर ग्रामीण बोलते हैं, नाम मात्र का होलिका दहन और होली मनाया जाता है। होलिका आते ही याद ताजी हो जाती है, ज़ख्म और गम ताज़ा हो जाते हैं। अब तो कोई उत्साह ही नहीं रहा बस लड़के लोग होलिका जलाते हैं।
खैरपुर से टूट चुका है भवानीपुर का नाता
खैरपुर, सोनभद्र के रहने वाले हरिनारायण उर्फ़ कल्लू की कथित नक्सली मुठभेड़ के दौरान पुलिस की गोली से हुई मौत महज़ एक घटना ही नहीं रही बल्कि दो परिवारों के नाते को भी तोड़ कर रख दिया है। मिर्जापुर जिले के राजगढ़ ब्लाक से भवानीपुर गांव की दूरी तकरीबन चार से पांच किमी है। जबकि भवानीपुर से खैरपुर की दूरी 16 है। ऐसे में कल्लू की मौत के बाद खैरपुर के रामखेलावन राम व भवानीपुर के लालबहादुर के परिवार के बीच का रिश्ता भी एक तरह से टूट चुका है। कल्लू का परिवार भवानीपुर गांव के नाम से ही कांप उठता है। इधर भवानीपुर के लालबहादुर राम की भी मौत चार साल पूर्व हो चुकी है। जबकि रामखेलावन की मौत पिछले वर्ष कैंसर की बीमारी से हो चुकी है।
(संतोष देव गिरी जनचौक के लिए मिर्जापुर/सोनभद्र से रिपोर्टर हैं।)