बनारस की मिट्टी में उठता आक्रोश, काशी द्वार योजना को लेकर ‘नजरबंदी’ से गुस्से में किसान

वाराणसी के पिंडरा इलाके की सुबह आज भी पहली नजर में वैसी ही लगती है जैसी दशकों से रही है। खेतों पर सूरज की हल्की किरणें उतरती हैं, हवा में मिट्टी की सौंधी खुशबू तैरती है और किसान अपने-अपने औजार लेकर खेतों की ओर निकल पड़ते हैं। लेकिन इस सामान्य दिखने वाली सुबह के भीतर अब एक गहरी बेचैनी छिपी हुई है। यह बेचैनी मौसम की नहीं, फसल की नहीं, बल्कि अपने ही अस्तित्व के भविष्य की है। गांवों में अब हर दिन की शुरुआत एक अनकहे डर के साथ होती है, “क्या यह हमारी अपनी जमीन पर आखिरी फसल है?”

काशी द्वार योजना ने इस पूरे इलाके के सामाजिक और आर्थिक संतुलन को झकझोर कर रख दिया है। इस परियोजना के तहत बसनी, बेलवा, बहुतरा, पिंडरा, पिंडराई, समोगरा, कैथौली, जद्दूपुर, चकइन्दर और रघुनाथपुर जैसे गांवों के करीब 5600 किसानों की लगभग 957 एकड़ जमीन अधिग्रहित करने का निर्णय लिया गया है। यह सिर्फ जमीन का आंकड़ा नहीं है। यह हजारों परिवारों के जीवन, उनकी पहचान और उनकी पीढ़ियों से जुड़ी विरासत का सवाल है।

इन प्रभावित किसानों में करीब 90 प्रतिशत छोटे जोत वाले किसान हैं, जिनकी पूरी आजीविका इसी जमीन पर टिकी हुई है। बाकी मझोले किसान हैं, जिनके लिए भी यही खेत जीवन का आधार हैं। इस इलाके की खासियत यह है कि यहां सिर्फ धान और गेहूं ही नहीं, बल्कि बहुफसली खेती होती है। उपजाऊ मिट्टी और पर्याप्त पानी की वजह से यहां हर मौसम में जीवन उगता है। यही कारण है कि किसानों के लिए यह जमीन सिर्फ संपत्ति नहीं, बल्कि उनका पूरा संसार है।

इस बीच वाराणसी एयरपोर्ट से करीब पांच किलोमीटर दूर “नई काशी” बसाने की योजना को सरकार विकास की बड़ी पहल के रूप में पेश कर रही है। आधुनिक टाउनशिप, चौड़ी सड़कें, खेल परिसर और शहरी सुविधाओं का वादा किया जा रहा है। लेकिन जिन गांवों की जमीन इस योजना में जा रही है, वहां के लोगों के लिए यह विकास का सपना नहीं, बल्कि उजड़ते घर का डर बनकर सामने आया है।

काशी द्वार योजना से प्रभावित होने वाले लोगों में बड़ी संख्या दलित और पिछड़ी जातियों के किसानों की है। स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि लगभग 96 प्रतिशत जमीनें उसी मेहनतकश तबके की हैं, जिसे अब तक राजनीतिक तौर पर मजबूत आधार माना जाता रहा है। ऐसे में यह मुद्दा सिर्फ जमीन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि सामाजिक असंतोष का रूप भी लेने लगा है।

किसानों की पीड़ा साफ शब्दों में सामने आती है। वे कहते हैं, “हम अपनी जमीन और अपना समाज छोड़कर कहीं और क्यों भटकें? अगर विकास करना है तो हमारे गांवों को ही विकसित कीजिए, उन्हें बेहतर बनाइए, लेकिन हमें हमारी जमीन से अलग मत कीजिए।”

दूसरी ओर, वैदिक सिटी परियोजना के लिए सारनाथ क्षेत्र के हसनपुर, पतेरवा, सिंहपुर, सथवां और हृदयपुर जैसे गांवों के किसानों को भी जमीन अधिग्रहण के नोटिस भेजे गए हैं। यह वे इलाके हैं जहां खेती ही जीवन का केंद्र रही है। आज वहां हर चौपाल पर एक ही सवाल गूंज रहा है, “क्या हमारी जमीन चली जाएगी?”

सरकार इस पूरी योजना को विकास की नई इबारत के रूप में देख रही है, लेकिन किसानों के लिए यह योजना किसी सुनहरे भविष्य का सपना नहीं, बल्कि अपने घर-आंगन के उजड़ने की आशंका बन चुकी है।

विकास बनाम अस्तित्व की जंग

काशी द्वार योजना के विरोध में लगे पोस्टर अब बनारस शहर से लेकर दूर-दराज के गांवों तक दिखाई देने लगे हैं। यह विरोध अब धीरे-धीरे एक व्यापक स्वर लेता जा रहा है। किसानों की मांग साफ है-अगर जमीन लेनी है तो पहले पुनर्वास की ठोस व्यवस्था बताई जाए। वे पूछते हैं कि जमीन चली गई तो बच्चों की पढ़ाई कैसे होगी, परिवार कैसे चलेगा, और वे खुद कहां जाएंगे?

कई किसान साफ शब्दों में कहते हैं कि वे किसी भी कीमत पर अपनी जमीन नहीं देंगे, चाहे इसके लिए उन्हें अपनी जान ही क्यों न देनी पड़े। संतोष पटेल जैसे किसान इस संघर्ष की कीमत भी चुका चुके हैं। अपनी बात बताते-बताते उनकी आंखें भर आती हैं। वह कहते हैं, “अपनी जमीन बचाने के लिए हम जेल जा चुके हैं, पुलिस की लाठियां भी खा चुके हैं। अगर हमारी जमीनों पर अमीरों के लिए मकान बनाए जाएंगे तो हम जैसे सैकड़ों किसान बेघर हो जाएंगे। हमारी जमीनें चली जाएंगी तो हम क्या करेंगे? कहां रहेंगे?”

उनकी आवाज में गुस्सा नहीं, बल्कि गहरी बेबसी झलकती है। वह आगे कहते हैं, “हम सरकार से न लड़ सकते हैं, न मुकदमा कर सकते हैं। अगर यही करना है तो हमारे खेतों को कब्रिस्तान बना दीजिए और हमें यहीं दफना दीजिए।”

नंगे पैर खेत की मेड़ पर चलते हुए संतोष अपने आसपास फैली फसल की ओर इशारा करते हैं, “देखिए, यह जमीन कितनी उपजाऊ है। यहां हमारे बाप-दादा खेती करते आए हैं। पानी की कोई कमी नहीं है, एक सीजन में कई फसलें होती हैं। अब इसी जमीन पर शहर बसाने की बात हो रही है। अगर हमारी जमीन चली गई तो हजारों किसान उजड़ जाएंगे।”

उनके मुताबिक, इस पूरे इलाके में अगर जमीन अधिग्रहित हुई तो करीब सवा लाख लोग सीधे प्रभावित होंगे। सबसे बड़ी पीड़ा उन्हें इस बात की है कि उनकी आवाज ऊपर तक नहीं पहुंच रही। “हमारी तकलीफ, हमारी आहें न मोदी तक पहुंच रही हैं, न योगी तक,” वह कहते हैं।

मुआवजे का विवाद : कीमत बनाम मूल्य

इस पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू मुआवजे को लेकर है। बुजुर्ग किसान गिरधारी पटेल की रातों की नींद उड़ चुकी है। वह कहते हैं, “हम सालों से सुनते आए कि अच्छे दिन आएंगे, लेकिन समझ नहीं आ रहा कि किसके अच्छे दिन आएंगे। हम तो खेतों में मेहनत कर रहे थे, लेकिन अब हमारे लिए बुरे दिन आ गए हैं।”

उनकी चिंता सीधी है, “जब घर और जमीन ही सरकार ले लेगी, तो हम कहां जाएंगे? हमें मुआवजा नहीं चाहिए, बस हमें हमारे हाल पर छोड़ दिया जाए।”

गिरधारी पटेल की बातों में एक गहरी निराशा झलकती है। वह कहते हैं कि सरकार का ध्यान किसानों की जिंदगी सुधारने के बजाय बड़े प्रोजेक्ट और अमीरों के लिए सुविधाएं खड़ी करने पर ज्यादा है। “अगर हम अन्न नहीं उगाएंगे, तो खाएंगे क्या?” यह सवाल वह बार-बार दोहराते हैं।

एक और किसान बताते हैं कि उन्हें उम्मीद थी कि रिंग रोड जैसी परियोजनाओं से गांव में रोजगार और विकास आएगा, लेकिन अब वही विकास उनके लिए संकट बन गया है। “हम भूल गए थे कि हम किसान हैं और हमें आगे बढ़ने का हक नहीं है,” वह कड़वाहट के साथ कहते हैं।

मुआवजे को लेकर किसानों की नाराजगी सबसे ज्यादा है। उनका कहना है कि उनकी जमीन की बाजार कीमत 30 से 40 लाख रुपये तक है, लेकिन सरकार तीन से आठ लाख रुपये तक का ही मुआवजा दे रही है। इस रकम में न तो वे नई जमीन खरीद सकते हैं, न ही घर बना सकते हैं।

संतोष पटेल एक बार फिर सवाल उठाते हैं, “जो पैसा दिया जा रहा है, उसमें हम क्या करेंगे? न जमीन खरीद सकते हैं, न घर बना सकते हैं… क्या हम मजदूर बन जाएं?” यह सवाल सिर्फ उनका नहीं, बल्कि हर उस किसान परिवार का है जिसकी जिंदगी खेती पर टिकी है।

किसानों का यह भी कहना है कि अगर शासन सच में संवेदनशील होता, तो उनकी बात सुनी जाती। “राजा अच्छा हो तो प्रजा सुकून से रहती है, लेकिन हमारी सुनने वाला कोई नहीं है,”- यह कहते हुए उनकी आवाज में आक्रोश भी है और हताशा भी। किसानों के शब्दों में अब चेतावनी भी झलकने लगी है। उनका कहना है कि अगर उनकी जमीन जबरन ली गई, तो इसका असर जरूर दिखेगा। “किसानों की बद्दुआ खाली नहीं जाती,” यह वाक्य अब गांवों में बार-बार सुनाई देता है।

हर दीवार पर प्रतिरोध

काशी द्वार योजना से प्रभावित गांवों में अब सिर्फ विरोध नहीं, बल्कि एक अजीब सा सन्नाटा भी पसरा हुआ है। बाहर से देखने पर सब कुछ सामान्य लगता है। खेतों में काम चल रहा है, लोग अपने रोजमर्रा के काम में लगे हैं, लेकिन इस सामान्यता के भीतर एक गहरी बेचैनी लगातार धड़क रही है। गांव की गलियों में अब पहले जैसी चहल-पहल नहीं है। चौपालों पर अब भविष्य की योजनाएं नहीं बनतीं, बल्कि हर बातचीत एक ही सवाल पर आकर ठहर जाती है,“अगर जमीन चली गई तो आगे क्या होगा?”

लोग हंसते जरूर हैं, लेकिन वह हंसी अधूरी लगती है। आंखों में एक अनकहा डर साफ दिखाई देता है। किसान मानते हैं कि सरकार उनसे बात करने के बजाय दबाव बनाने की कोशिश कर रही है। उनका कहना है कि अगर सब कुछ सहमति से हो रहा होता, तो आंदोलन से पहले ही नजरबंदी की जरूरत क्यों पड़ती?

हाल ही में पढ़ाई पूरी करके गांव लौटे एक युवा किसान की आवाज में यह बेचैनी साफ झलकती है। वह कहता है, “हम विकास के खिलाफ नहीं हैं। हम भी चाहते हैं कि हमारे इलाके में सड़कें बनें, रोजगार आए, लेकिन ऐसा विकास किस काम का जिसमें हम ही खत्म हो जाएं? अगर हमारी जमीन ही नहीं रहेगी तो हम जिएंगे कैसे?”

नजरबंद हुए किसान नेता

दरअसल, किसानों ने तय किया था कि वे 26 मार्च 2026 को शांतिपूर्ण तरीके से अपना विरोध दर्ज कराएंगे। वे चाहते थे कि अपनी बात सरकार तक पहुंचाएं, बिना किसी टकराव के अपनी मांग रखें। उनकी छह सूत्री मांगों में काशी द्वार भूमि विकास गृहस्थान बाजार योजना और गंजारी, हरसोस सहित अन्य गांवों में प्रस्तावित टाउनशिप परियोजनाओं को रद्द करने की मांग प्रमुख थी।

लेकिन आंदोलन शुरू होने से पहले ही माहौल बदल गया। जैसे ही यह सूचना प्रशासन तक पहुंची कि मिर्जामुराद क्षेत्र के किसान भी इस विरोध में शामिल होंगे, पुलिस सक्रिय हो गई। आंदोलन की शुरुआत से पहले ही कई किसान नेताओं और कार्यकर्ताओं को उनके घरों में नजरबंद कर दिया गया।

नजरबंदी की यह कार्रवाई गांवों में आग की तरह फैल गई। जिन लोगों ने कभी थाने का दरवाजा नहीं देखा था, वे अचानक खुद को प्रशासनिक निगरानी में घिरा हुआ महसूस करने लगे। लोक समिति के संयोजक नंदलाल मास्टर, नागेपुर के ग्राम प्रधान मुकेश कुमार, गंजारी के प्रधान अमित कुमार, हरपुर के प्रधान शिवकुमार राजभर, मनरेगा मजदूर यूनियन के संयोजक सुरेश राठौर और मुस्तफा जैसे कई नाम इस सूची में शामिल थे। यहां तक कि राजातालाब के पत्रकार राजकुमार गुप्ता भी इस कार्रवाई से अछूते नहीं रहे।

इस कार्रवाई ने गांवों में एक नई बेचैनी और गुस्से को जन्म दिया है। लोक समिति के संयोजक नंदलाल मास्टर ने इसे संविधान के खिलाफ बताते हुए कहा कि यह लोकतंत्र की हत्या है और किसानों के अधिकारों का खुला उल्लंघन है। वहीं, आराजी लाइन प्रधान संघ के अध्यक्ष मुकेश कुमार का कहना है कि किसानों की सहमति के बिना जमीन का अधिग्रहण किसी भी हालत में स्वीकार्य नहीं है। पत्रकार राजकुमार गुप्ता ने भी कहा कि लोकतंत्र में अपनी बात रखने का अधिकार सभी को है और इस अधिकार के लिए संघर्ष जारी रहेगा।

हजारों किसान प्रभावित होंगे

यह मामला सिर्फ काशी द्वार योजना तक सीमित नहीं है। बनारस में आधा दर्जन से अधिक आवासीय परियोजनाओं के लिए हजारों एकड़ जमीन अधिग्रहित करने की प्रक्रिया चल रही है। इसके चलते हजारों किसानों को नोटिसें भेजी जा चुकी हैं और उनका गुस्सा अब धीरे-धीरे खुलकर सामने आने लगा है।

गांवों में लोग कहते हैं कि यह सिर्फ जमीन का मामला नहीं है, बल्कि पूरे समाज के उजड़ने का खतरा है। अगर इतनी बड़ी संख्या में किसान अपनी जमीन खो देंगे, तो उनके सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो जाएगा। खेत छिनने के बाद वे न तो खेती कर पाएंगे और न ही उनके पास कोई वैकल्पिक साधन होगा।

दूसरी ओर प्रशासन लगातार यह दावा कर रहा है कि किसी भी किसान से जबरदस्ती जमीन नहीं ली जा रही है। अधिकारियों के मुताबिक अब तक करीब 80 किसानों ने स्वेच्छा से अपनी जमीन की रजिस्ट्री कराई है और उन्हें लगभग 90 करोड़ रुपये का मुआवजा दिया जा चुका है। प्रशासन यह भी कहता है कि सर्किल रेट से चार गुना तक मुआवजा दिया जा रहा है और पूरी प्रक्रिया सहमति के आधार पर हो रही है।

लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग कहानी कहती है। किसानों का कहना है कि सर्किल रेट इतना कम तय किया गया है कि उससे दूसरी जगह जमीन खरीदना लगभग असंभव है। ऐसे में चार गुना मुआवजा भी उनके लिए पर्याप्त नहीं है। उनका कहना है कि यह मुआवजा उन्हें बस विस्थापन की ओर धकेलने का जरिया बन रहा है।

किसानों के बढ़ते विरोध को देखते हुए पिंडरा के विधायक डॉ. अवधेश सिंह को भी सामने आना पड़ा। उन्होंने प्रेस वार्ता कर लोगों को भरोसा दिलाने की कोशिश की कि किसी भी किसान के साथ अन्याय नहीं होगा और बिना सहमति जमीन नहीं ली जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि यह योजना वाराणसी के विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण है और इससे स्थानीय लोगों को रोजगार के नए अवसर मिलेंगे।

विधायक के अनुसार, जिन किसानों की जमीन इस योजना में जा रही है, उन्हें सर्किल रेट का चार गुना मुआवजा, 24 प्रतिशत अतिरिक्त राशि और अन्य लाभ दिए जा रहे हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि करीब 400 किसान अपनी जमीन देने के लिए तैयार हैं।

लेकिन गांवों में इन दावों पर भरोसा कम ही नजर आता है। लोग कहते हैं कि अगर सब कुछ इतना पारदर्शी और सहमति से हो रहा है, तो फिर इतने बड़े पैमाने पर विरोध क्यों हो रहा है? गांवों में आज भी यही सवाल गूंज रहा है, “क्या विकास के नाम पर हमारी जड़ें काटी जा सकती हैं?”

कैसी है काशी द्वार योजना

उत्तर प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी काशी द्वार योजना को पिंडरा इलाके में एक हाईटेक सिटी के रूप में विकसित करने की तैयारी है। सरकार इसे सिर्फ वाराणसी ही नहीं, बल्कि आसपास के जिलों-खासकर जौनपुर के लिए भी विकास का नया केंद्र मान रही है। इस परियोजना को औपचारिक तौर पर “काशीद्वार भूमि विकास गृहस्थान योजना” के नाम से लागू किया जाना प्रस्तावित है। इसके साथ ही आवास विकास परिषद की जीटी रोड योजना को एक नए मार्ग से जोड़ने की मंजूरी भी शासन स्तर पर दी जा चुकी है।

इस पूरी परियोजना पर लगभग 6964.18 करोड़ रुपये खर्च किए जाने का अनुमान है। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा—करीब 4961.17 करोड़ रुपये किसानों को भूमि मुआवजे के रूप में दिया जाना प्रस्तावित है, जबकि शेष 2003.01 करोड़ रुपये विकास कार्यों पर खर्च किए जाएंगे। सरकार का दावा है कि किसानों को वर्तमान सर्किल रेट का चार गुना तक मुआवजा दिया जाएगा।

साथ ही इस योजना में विकसित होने वाले प्लॉट के शुरुआती रेट भी तय कर दिए गए हैं, जिन्हें करीब 40215 रुपये प्रति वर्गमीटर के हिसाब से बेचने का प्रस्ताव स्वीकृत किया गया है। हालांकि, भविष्य में लागत के आधार पर इन दरों में बदलाव की संभावना भी जताई गई है।

परियोजना के दायरे में आने वाले गांवों की सूची भी काफी लंबी है। समोगरा, कैथौली, चकइन्दर, पिंडरा, बेलवा, पिंडराई, पुरा रघुनाथपुर, बसौली, बहुतरा और जद्दूपुर जैसे गांवों की कुल 1572 खसरों की जमीन इस योजना के लिए अधिग्रहित की जानी है। इसके अलावा ग्राम समाज की 45.419 हेक्टेयर भूमि भी इसमें शामिल है। वहीं, जीटी रोड बाईपास को जोड़ने के लिए निबिया गांव की करीब 4.8410 हेक्टेयर भूमि भी ली जाएगी।

इस परियोजना की लोकेशन भी रणनीतिक रूप से चुनी गई है। यह इलाका लालबहादुर शास्त्री अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के बेहद करीब है। यहां से काशी विश्वनाथ मंदिर और काल भैरव मंदिर की दूरी लगभग 30 किलोमीटर और कैंट रेलवे स्टेशन करीब 25 किलोमीटर है। यानी सरकार इसे एक ऐसे आधुनिक शहरी केंद्र के रूप में विकसित करना चाहती है, जो धार्मिक और यातायात—दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण हो।

लेकिन इन तमाम आंकड़ों, योजनाओं और दावों के बीच एक सच्चाई और भी है जो कागजों में नहीं दिखती। वह है उन किसानों की चिंता, जिनकी जमीन इस पूरे विकास की नींव बनने जा रही है।

आज काशी द्वार योजना को लेकर चल रहा संघर्ष सिर्फ जमीन का विवाद नहीं रह गया है। यह धीरे-धीरे सम्मान, अधिकार और पहचान की लड़ाई में बदलता जा रहा है। एक तरफ सरकार का विकास मॉडल है जहां शहरों का विस्तार, निवेश और आधुनिक सुविधाएं प्राथमिकता हैं। दूसरी तरफ वो किसान हैं जिनके लिए यही जमीन उनका अतीत भी है, वर्तमान भी और भविष्य भी।

इन दोनों के बीच खड़ा है एक गहरा अविश्वास जो हर बीतते दिन के साथ और गहराता जा रहा है। शाम जब गांवों में ढलती है और सूरज खेतों के पीछे छिप जाता है तब भी यह सवाल हवा में तैरता रहता है, क्या विकास के नाम पर हमारी जड़ें काट दी जाएंगी?” और शायद यही सवाल तय करेगा कि आने वाले समय में काशी की यह मिट्टी विकास की कहानी सुनाएगी… या विस्थापन की।

(विजय विनीत बनारस के वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक हैं)

Leave a Reply