बनारस में 14 मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारी पर सवाल, हम आस्था की रक्षा कर रहे या उसे एक हथियार बना रहे हैं?

उत्तर प्रदेश के वाराणसी में इन दिनों दो घटनाएं एक साथ चर्चा के केंद्र में हैं। एक तरफ गंगा के बीच नाव पर इफ्तार के दौरान बिरयानी परोसे जाने के आरोप और उसके बाद 14 मुस्लिम युवकों की आनन-फानन में गिरफ्तारी; दूसरी ओर एक विवेकानंद क्रूज से इसी पवित्र नदी में खुलेआम मल-मूत्र गिराए जाने का मामला, जिसमें कार्रवाई के नाम पर महज 5000 रुपये का जुर्माना लगाया गया।

कार्रवाई का यह अंतर चौंकाने वाला है। एक तरफ 14 लोग जेल की सलाखों के पीछे हैं और दूसरी तरफ एक बड़े कारोबारी पर सिर्फ औपचारिक जुर्माना। यहीं से बनारस एक गहरे और असहज सवाल के केंद्र में खड़ा हो जाता है कि क्या हम सच में आस्था की रक्षा कर रहे हैं या फिर उसे परिस्थितियों के अनुसार एक औजार में तब्दील कर रहे हैं?

दोनों घटनाएं गंगा से जुड़ी हैं और लगभग दो महीने के अंतराल पर सामने आईं। दोनों में “पवित्रता” और “भावनाओं” का प्रश्न उठाया गया। लेकिन प्रश्न यह भी है कि विवेकानंद क्रूज से गंगा में खुलेआम मल-मूत्र गिराए जाने पर किसी की भावनाएं क्यों आहत नहीं हुईं?

जब सवालों के घेरे में मुसलमान आए तो उनके खिलाफ संगीन धाराओं में मुकदमा दर्ज हुआ। खाकी वर्दी तत्काल सक्रिय हुई।गिरफ्तारी की तेजी दिखी और सभी रोजेदारों को पकड़कर जेल भेज दिया गया।

कैसे आहत हुई भावना

ताजा घटनाक्रम को समझना जरूरी है। बनारस के कोतवाली थाना क्षेत्र में पंचगंगा घाट के पास 16 मार्च 2026 की शाम कुछ मुस्लिम युवक रोज़ा खोल रहे थे। यह रमज़ान के दौरान की एक सामान्य धार्मिक प्रक्रिया थी। जैसे ही इसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, पूरा मामला अचानक संवेदनशील हो उठा।

आरोप लगाए गए कि रोजा खोलते समय बिरयानी परोसी गई और हड्डियां गंगा में फेंकी गईं, जिससे धार्मिक भावनाएं आहत हुईं। घटनाक्रम ने बेहद तेजी से करवट ली और पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए 14 मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार कर लिया।

इस मामले में शिकायत भाजपा युवा मोर्चा के महानगर अध्यक्ष रजत जायसवाल द्वारा दर्ज कराई गई। शिकायत में कहा गया कि गंगा के बीच नाव पर आयोजित इफ्तार में नॉनवेज भोजन, विशेष रूप से बिरयानी परोसी गई, जिससे धार्मिक भावनाएं आहत हुईं। साथ ही यह भी आरोप लगाया गया कि भोजन के बाद हड्डियां गंगा में फेंकी गईं।

वायरल वीडियो में कुछ युवक नाव पर एकत्र होकर भोजन करते और सहज माहौल में दिखाई दे रहे हैं जिसे कुछ लोगों ने हिंदू आस्था के अपमान के रूप में देखा। वीडियो के आधार पर कमिश्नरेट पुलिस ने पहचान होने के बाद सभी 14 आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 298, 299, 196(1)(b), 270, 279 और 223(b) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया। इसके अलावा जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974 की धारा 24 भी जोड़ दी गई।

धारा 298 के तहत किसी पूजा स्थल या पवित्र वस्तु को अपवित्र करना दंडनीय अपराध है। धारा 299 जानबूझकर किसी धर्म या धार्मिक मान्यता का अपमान कर भावनाएं आहत करने से जुड़ी है। धारा 196(1)(b) उन कृत्यों पर लागू होती है, जो समुदायों के बीच सौहार्द बिगाड़ सकते हैं। धारा 270 सार्वजनिक असुविधा और खतरे से संबंधित है, जबकि धारा 279 जल स्रोतों को प्रदूषित करने से जुड़ी है। धारा 223(b) सरकारी आदेश की अवहेलना के मामलों में लागू होती है।

इसके अतिरिक्त, जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974 की धारा 24 के तहत किसी भी जल स्रोत को गंदा करना दंडनीय माना गया है।

प्रशासन ने इस पूरे मामले को संवेदनशील मानते हुए त्वरित और सख्त कदम उठाए। रातों-रात गिरफ्तारी, गंभीर धाराओं का प्रयोग और कानून का तीखा रुख। सब कुछ इतनी तेजी से हुआ कि इसने आम लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। पंचगंगा घाट पर नाव चलाने वाले एक नाविक इस पूरे घटनाक्रम को याद करते हुए कहते हैं, “हमने तो देखा कि लड़के रोज़ा खोल रहे थे, लेकिन वीडियो वायरल होने के बाद मामला बहुत बड़ा बना दिया गया।”

क्यों नहीं उछला अलखनंदा का मामला

करीब दो महीने पहले वाराणसी में गंगा की पवित्रता को लेकर एक और गंभीर मामला सामने आया था, जिसने उस समय शहर में हलचल जरूर मचाई, लेकिन जिस तरह की संवेदनशीलता और सख्ती इस बार की घटना में दिखाई दी, वैसी प्रतिक्रिया उस समय कहीं नजर नहीं आई।

जनवरी 2026 के पहले पखवाड़े में गंगा में संचालित विवेकानंद क्रूज से कथित तौर पर मल-मूत्र गिराए जाने का आरोप लगा। इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो स्थानीय नाविकों ने बनाया जो देखते ही देखते सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया।

वीडियो में दावा किया गया कि रविदास घाट के पास खड़े विवेकानंद क्रूज से सीधे गंगा में गंदा पानी छोड़ा जा रहा है। स्थानीय नाविकों ने आरोप लगाया कि क्रूज में लगे शौचालयों का अपशिष्ट बिना किसी शोधन प्रक्रिया के सीधे नदी में प्रवाहित किया गया। यह आरोप केवल पर्यावरणीय दृष्टि से ही नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था के नजरिये से भी बेहद गंभीर था  क्योंकि गंगा को करोड़ों लोग ‘मां’ के रूप में पूजते हैं।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, खासकर इंस्टाग्राम पर यह वीडियो तेजी से फैल गया और देखते-देखते यह मुद्दा राजनीतिक रंग लेने लगा। कांग्रेस ने सरकार को घेरा और गंगा की स्वच्छता पर सवाल उठाए। काशी के लोगों में भी आक्रोश दिखा। कई स्थानीय निवासियों और आस्थावानों ने इसे गंगा की पवित्रता के साथ सीधा खिलवाड़ बताया। उनका कहना था कि जिस नदी को “मां” कहा जाता है, उसमें इस तरह का प्रदूषण असहनीय है।

मामले की जांच के बाद प्रदूषण विभाग ने क्रूज संचालक पर महज 5000 रुपये का जुर्माना लगाया और जवाब तलब कर अपनी कार्रवाई पूरी मान ली। आरोप लगे कि जांच में लीपापोती की गई और रिपोर्ट में यह कहा गया कि क्रूज के मेंटेनेंस के दौरान इमरजेंसी वाल्व गलती से खुल गया था। उसी दौरान किसी कर्मचारी द्वारा शौचालय का उपयोग किए जाने से अपशिष्ट सीधे गंगा में चला गया।

विवेकानंद क्रूज लाइन के निदेशक विकास मालवीय ने इसे मानवीय त्रुटि बताते हुए खेद जताया और मामला लगभग वहीं थम गया। सफाई दी गई कि संबंधित कर्मचारियों को फटकार लगाई गई है और भविष्य में ऐसी गलती नहीं दोहराई जाएगी।

हालांकि, इस स्पष्टीकरण के बावजूद काशीवासियों का आक्रोश पूरी तरह शांत नहीं हुआ। मां गंगा निषादराज सेवा न्यास के प्रमुख प्रमोद माझी समेत कई लोगों ने गंगा में बढ़ती व्यावसायिक गतिविधियों और क्रूज संचालन की मनमानी पर सवाल उठाए। प्रमोद कहते हैं, “विवेकानंद का मामला बिरयानी प्रकरण से भी ज्यादा खतरनाक और भयावह है। पर्यटन और व्यवसाय के नाम पर गंगा के साथ इस तरह का व्यवहार न केवल पर्यावरण के लिए नुकसानदेह है, बल्कि आस्था को भी ठेस पहुंचाता है।”

वह आगे जोड़ते हैं कि विवेकानंद प्रकरण में कार्रवाई महज 5000 रुपये के जुर्माने तक सीमित रही, जिसने अब दो महीने बाद फिर से यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या गंगा की पवित्रता से जुड़े मामलों में कार्रवाई का पैमाना सभी के लिए समान है? क्या प्रशासन का चाबुक कुछ खास वर्गों पर ही ज्यादा चलता है?

सियासत की एंट्री

बिरयानी प्रकरण में 14 मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारी के बाद यह मुद्दा राजनीतिक गलियारों में भी गूंजने लगा। लखनऊ में एक इफ्तार कार्यक्रम के दौरान अखिलेश यादव ने कहा कि इस तरह की कार्रवाई समाज में दूरी बढ़ाने का काम कर रही है। उन्होंने तंज करते हुए कहा कि प्रशासन को खुद इफ्तारी करानी चाहिए थी।

उन्होंने इशारों में पुलिस कार्रवाई पर भी सवाल उठाया, “हथेली गरम तो पुलिस नरम।” साथ ही यह भी पूछा कि क्या गंगा में इफ्तार नहीं हो सकता? उन्होंने एक कथित “फाइव स्टार जहाज” का जिक्र करते हुए सवाल उठाया कि उसमें परोसी जा रही शराब और गंगा में गिराए जा रहे अपशिष्ट पर क्या कार्रवाई हुई?

वहीं, कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी ने यूपी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि पुलिस कानून के दुरुपयोग की दिशा में आगे बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि एक शिकायत के आधार पर तत्काल गिरफ्तारी यह संकेत देती है कि कार्रवाई में संतुलन की कमी है।

दूसरी ओर, भाजपा सांसद दिनेश शर्मा ने कहा कि गंगा सनातन आस्था का केंद्र है और उसकी पवित्रता बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है। उन्होंने यह भी कहा कि इफ्तार जैसे आयोजनों के लिए उपयुक्त स्थान निर्धारित होते हैं।

इस पूरे प्रकरण पर अंजुमन इंतजामिया मसाजिद के संयुक्त सचिव एसएम यासीन ने भी नाराजगी जताई। उनका कहना था कि इफ्तार एक धार्मिक प्रक्रिया है, जिसे इस तरह पिकनिक की तरह आयोजित करना इस्लामी परंपरा के अनुरूप नहीं है और इससे धर्म की छवि प्रभावित होती है।

राजघाट पर नाव चलाने वाले दुर्गा माझी इस पूरे घटनाक्रम को अलग नजरिये से देखते हैं। वे कहते हैं, “आजकल वीडियो ही सबसे बड़ा सबूत बन जाता है। अगर कुछ गलत हुआ था तो उसकी गहराई से जांच होनी चाहिए थी। लेकिन सीधे जेल भेज देना… यह थोड़ा ज्यादा लगता है।”

दुर्गा माझी आगे कहते हैं, “वाराणसी का नाम ही वरुणा और असी नदियों से मिलकर बना है, लेकिन सच्चाई यह है कि इन नदियों में लगातार गंदगी, नालों का पानी और मल-मूत्र बहाया जा रहा है। ये वही नदियां हैं, जिनसे इस शहर की पहचान बनी, लेकिन आज वे प्रदूषण से जूझ रही हैं और इस पर किसी की भावनाएं आहत नहीं होतीं। इनके लिए कोई भगीरथ क्यों सामने नहीं आता?”

उनकी आवाज में एक ठहराव है, लेकिन सवाल बेहद तीखा, “अगर गंगा मां है, तो उसका सम्मान हर किसी से समान रूप से अपेक्षित होना चाहिए। अगर कानून न्याय है, तो उसका व्यवहार भी सबके लिए बराबर होना चाहिए।”

दोरंगी चाल से हर कोई आहत

बनारस के वरिष्ठ पत्रकार  कुमार विजय  कहते हैं कि मौजूदा समय में सरकार की नीतियों और कार्रवाई के तरीके पर सवाल उठना स्वाभाविक है। उनके अनुसार, ऐसा प्रतीत होता है कि साझी विरासत और गंगा-जमुनी तहजीब को कमजोर करने की प्रवृत्ति लगातार मजबूत हो रही है। वह कहते हैं कि हिंदू-मुस्लिम के बीच अविश्वास और दूरी पैदा करने का कोई अवसर छोड़ा नहीं जा रहा।

पंचगंगा घाट पर मुस्लिम युवकों द्वारा इफ्तार करने के मामले को वह इसी संदर्भ में देखते हैं। उनके शब्दों में, “युवकों की गिरफ्तारी सिर्फ एक कानूनी कार्रवाई नहीं, बल्कि उसके पीछे दो समुदायों के बीच खाई पैदा करने की मंशा भी दिखाई देती है। ऐसा लगता है कि सत्ता में बैठा तंत्र इस विभाजन को और गहरा करने की दिशा में काम कर रहा है।”

कुमार विजय यह भी जोड़ते हैं कि किसी भी धार्मिक मर्यादा में हस्तक्षेप या किसी की आस्था को ठेस पहुंचाना निश्चित रूप से अनुचित है, लेकिन गंगा की “पवित्रता” को समान दृष्टि से देखना भी उतना ही जरूरी है। वह कहते हैं, “बनारस में गंगा सिर्फ हिंदुओं की मां नहीं है। वह कबीर की भी मां है, उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की भी मां है। गंगा उन रंगरेजों और बुनकरों की भी मां है, जिनकी रोज़ी-रोटी इसी जल से जुड़ी है।”

कुमार विजय एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उठाते हैं, “गंगा की सहायक नदियां वरुणा और असी आज जिस हालत में हैं, उस पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। आखिर ये नदियां शहर की गंदगी और मलबे से क्यों बजबजा रही हैं? यह धारणा लगातार मजबूत हो रही है कि पुलिस की कार्रवाई हमेशा निष्पक्ष नहीं दिखती और उस पर सामाजिक व राजनीतिक दबाव भी असर डालता है। कुछ मामलों में संवेदनशीलता अचानक इतनी अधिक क्यों हो जाती है? क्या अब वायरल वीडियो ही न्याय की दिशा तय करने लगे हैं? जब किसी घटना में मुस्लिम पहचान जुड़ती है तो प्रतिक्रिया अधिक तीखी और त्वरित क्यों हो जाती है?”

पत्रकार कुमार विजय कहते हैं, “गंगा सिर्फ धार्मिक प्रतीक नहीं है, वह एक जीवित नदी है, जो प्रदूषण, व्यावसायिक शोषण और प्रशासनिक लापरवाही से जूझ रही है। यदि सच में गंगा की पवित्रता की चिंता है तो सवाल सिर्फ इफ्तार या भोजन तक सीमित नहीं होना चाहिए। औद्योगिक कचरा, सीवेज और पर्यटन-आधारित गतिविधियों पर समान कठोरता क्यों नहीं दिखाई जाती?”

इसी संदर्भ में वरिष्ठ पत्रकार विनय मौर्य कहते हैं कि यह मामला केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के भीतर विश्वास के संतुलन से भी जुड़ा हुआ है। वह कहते हैं, “जब कानून का इस्तेमाल समान रूप से होता हुआ नहीं दिखता तो यह धारणा बनती है कि न्याय का तराजू झुक रहा है। और जब ऐसा होता है तो उसका असर केवल एक समुदाय तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे समाज के विश्वास को प्रभावित करता है।”

विनय मौर्य आगे सवाल उठाते हैं, “क्या वास्तव में आस्था की रक्षा हो रही है, या फिर उसे परिस्थितियों के अनुसार एक औजार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है? गंगा आज भी बह रही है, लेकिन उसके किनारों पर खड़े लोग अब सिर्फ श्रद्धा से नहीं, बल्कि सवालों के साथ उसे देख रहे हैं।”

वह एक और उदाहरण देते हैं, “जब गंगा की रेत पर टेंट सिटी बसाई गई, तब क्या वहां से निकलने वाला मल-मूत्र नदी में नहीं गया? पिछले साल एक कथित बाबा ने अपने अनुयायियों के साथ गंगा तट पर कई दिनों तक डेरा डाला था तब गंगा तट की स्थिति क्या थी? समूची गंगा की रेत मल-मूत्र से पट गई थी। उस समय किसी की धार्मिक भावनाएं क्यों आहत नहीं हुईं?”

विनय मौर्य यह भी कहते हैं कि कई घाटों पर गंगा आरती से पहले सफाई के नाम पर सारा कचरा सीधे नदी में बहा दिया जाता है। आखिर यह कैसी विडंबना है कि एक ओर हम गंगा की आरती करते हैं और दूसरी ओर उसी जल को प्रदूषित करते हैं? 

वह वरुणा और असी नदियों का जिक्र करते हुए कहते हैं, “इन नदियों के किनारे जाकर देखिए। नालों का गंदा पानी, घरेलू कचरा और कई जगहों पर मल-मूत्र तक सीधे इनमें गिरता है। यही वे नदियां हैं, जिनसे इस शहर की पहचान बनी, लेकिन आज वे उपेक्षा और प्रदूषण का बोझ ढो रही हैं।”

पत्रकार विनय के अनुसार, सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि जब इन नदियों में लगातार गंदगी बह रही है, तब आस्था की रक्षा का मुद्दा उतनी मजबूती से क्यों नहीं उठता? सफाई के दावे जरूर किए जाते हैं, लेकिन जमीन पर बदलाव सीमित ही दिखाई देता है। दर्जनों नालों से गंगा में गिरता मल-मूत्र न प्रदूषण नियंत्रण विभाग को दिखता है, न पुलिस को और न ही उन हुक्मरानों को जो गंगा को अपनी मां बताने के लिए बनारस की जनता के सामने बार-बार दुहाई देते रहते हैं।

(विजय विनीत बनारस के वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक हैं।)

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