1- पिता-पति आदि की राय-इच्छा से स्वतंत्र वोट करने लगी हैं, लड़कियां-महिलाएं-
पिता-पति की राय-इच्छा की परवाह किए बिना महिलाएं वोट दे रही हैं। भारत में भले ही संविधान लागू होने के साथ महिलाओं को यह अधिकार मिल गया था कि वे अपने स्वतंत्र इच्छा से जिसको चाहे वोट करें। लेकिन वास्तविक हकीकत यह थी कि पति-पिता आदि की राय-इच्छानुसार ही महिलाएं वोट करती थीं।
यह स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। अब महिलाएं अपनी इच्छानुसार वोट कर रही हैं, वह इच्छा पति-पिता या किसी अन्य पुरुष की इच्छा से मेल खा सकती है या नहीं मेल खा सकती है। इसका नतीजा यह हुआ कि हर राजनीतिक दल या नेता को सीधे महिला वोटरों से संवाद कायम करना पड़ रहा है, उनके अनुसार एजेंडा तय करना पड़ रहा।
2- महिलाएं पुरुषों की गुलामी की आंतरिक स्वीकृति की मानसिकता से बुनियादी तौर पर मुक्त हो चुकी हैं-
भारत की बहुसंख्यक लड़कियां-महिलाएं इस मानसिकता से बुनियादी तौर पर तेजी से मुक्त हो रही हैं कि वे किसी भी तरह से पुरुषों की तुलना में दोयम दर्जे की हैं, उनकी अधीनता में ही उनको रहना चाहिए। आंतरिक तौर पर बहुसंख्यक महिलाएं गुलामी और खुद को दोयम दर्जे का मानने की मानसिकता से मुक्त हो चुकी हैं।
महिलाओं के संदर्भ में यह परिघटना कुछ वैसे ही पिछले 30-35 वर्षों में घटित हुई है, जैसे हिंदी पट्टी में दलितों के संदर्भ में कांशीराम परिघटना के बाद घटित हुई थी। कांशीराम परिघटना ने और क्या किया या नहीं किया, इस पर बातें होती रहेंगी, लेकिन यह ज़रूर कर दिया कि दलितों के भीतर से आंतरिक गुलामी की स्वीकृति की मानसिकता को खत्म कर दिया। दलित किसी गैर-दलित की तुलना में दोयम दर्जे के हैं, या उनकी अधीनता में जीने के लिए पैदा हुए इस संवेदना-चेतना की भीतरी स्वीकृति से मुक्त हो गए।
यहां यह कहने की जरूरत नहीं है कि गुलामी-अधीनता की आंतरिक स्वीकृति से मुक्त हो जाने मात्र से कोई समाज या समुदाय या व्यक्ति पूरी तरह आजाद या मुक्त नहीं हो जाता, बराबरी-समता को लागू करने की भौतिक जमीन भी जरूरी होती है, लेकिन गुलामी-अधीनता की आंतरिक स्वीकृति से मुक्ति आजादी की पहली बुनियादी शर्त होती है।
3- पहनने-ओढ़ने, खाने-पीने, चलने-फिरने, हंसने-गाने और बोलने-बतियाने की आजादी महिलाओं के बड़े हिस्से ने हासिल कर लिया, विशेषकर नई पीढ़ी की लड़कियों ने-
पितृसत्तात्मक समाज और वर्चस्व की विचारधारा ने महिलाओं को नियंत्रित करने के लिए सबसे पहला काम यह कि वे क्या पहने और क्या नहीं पहने, क्या खाएं-क्या पीएं और क्या न खाएं और क्या न पीएं, कैसे चलें, कैसे बोले, कैसे हंसे, कैसे बतियाएं, कब गाएं, कब न गाएं, कहां बोले, किससे बोले, धीरे हंसे या ठहाका मारकर हंसे आदि।
महिलाओं, विशेषकर पिछली दो-तीन पीढ़ी की लड़कियों ने इस सब पर लात मार दिया। वे अपने हिसाब से पहन रहीं, खा रही हैं, पी रही हैं, बोल रही हैं, बतिया रही हैं, हंस रही हैं, गा रही हैं, चल रही हैं। खुलेआम या चोरी से या धोखा देकर तरीके भिन्न-भिन्न हो सकते हैं, पर यह हो रहा है।
दुपट्टा गायब हो जाना, सलवार-कमीज और साड़ी की बाध्यता का कमजोर होते जाना छोटी-मोटी परिघटना लग सकती है, लेकिन लड़कियों की जिंदगी में एक किस्म की क्रांति है।
4-जीवन-साथी के चुनाव में लड़कियों की निर्णायक भूमिका-
पिता-भाई कन्यादान करके लड़की जिसे चाहें सौंप दे, यह स्थिति पिछले वर्षों में तेजी से टूटी है। बात सिर्फ प्यार-पसंद के आधार पर जीवन-साथी चुनने या लिव इन में रहने या शादी न करना नहीं है। इस मामले में तो कुछ लड़कियां जान जोखिम में डालकर भी यह सब कर रही हैं। पर यह तो छोटे दायरे की परिघटना है।
बड़े दायरे की परिघटना यह है कि जिसे अरेंज मैरेज कहते हैं, जो भारत की आम परिघटना है। इस अरेंज मैरेज में लड़कियां अब मूकदर्शक नहीं रह गई हैं। नई पीढ़ी की लड़कियों के मामले में उनकी पसंद-नापसंद, विशेषकर ना पसंद बड़ी भूमिका निभाने लगी है। पिता-परिवार द्वारा तय शादी में उनका जीवन-साथी कौन है, क्या करता है, कैसे है, आदि-आदि बातों में लड़कियों की भूमिका काफी बढ़ गई है। परिवार-पिता आदि ने भी उनकी भूमिका को अनिवार्य मान लिया है। शादी के बाद अलग होने (तलाक) या तीखे संघर्ष (झगड़े) भी इसके प्रमाण हैं।
5- जीवन के सभी क्षेत्रों में लड़कियां यह साबित कर दी हैं कि वे लड़कों से रत्ती भर भी कम नहीं, हां इसके उलट उनकी कुछ उपलब्धियां लड़कों से फिलहाल ज्यादा-
अवसर मिलते ही लड़कियों ने जीवन के सभी क्षेत्रों में पिछले दशकों में परचम लहरा दिया है। इस परिघटना ने भारतीय समाज की शेष लड़कियों के अंदर यह विश्वास भर दिया कि वे भी कुछ भी कर सकती हैं। इस विश्वास के चलते वे ऐसे-ऐेस कारनामे कर रही हैं, जो कभी असंभव सा लगता था। समाज ने भी काफी हद तक यह स्वीकार कर लिया है कि लड़कियां किसी भी तरह से लड़की होने के चलते किसी लड़के से कमतर नहीं हैं।
6- पिता-परिवार इस बात के लिए तैयार, एक हद तक बाध्य हो गया है कि वह अपनी लड़की को अधिक से अधिक शिक्षा दें, योग्य बनाएं। इसके साथ ही वह सुंदर और स्मार्ट दिखे और रहे यह भी बाध्यता पैदा हो गई है, क्योंकि इसके बिना लड़की की शादी करना ही मुश्किल हो गया है।
क्योंकि लड़कों-पुरुषों ने अपनी जीवन-संगिनी (पत्नी) में अपनी प्रेमिका- हर तरह की पार्टनर तलाश करना शुरू कर दिया है। यह क्यों और कैसे हुआ, पर यह हो गया है। इसने लड़कियों-महिलाओं की जिंदगी में एक बड़ा परिवर्तन ला दिया है।
सवाल यह है कि यदि ऐसा हुआ तो कैसे हुआ?
दो स्पष्ट कारण है-
1- पिछले तीन दशकों में दुनिया में और भारत में तकनीकी के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ है। ऐसा परिवर्तन कि जिसने दुनिया की गतिकी में आमूल-चूल परिवर्तन ला दिया है। लड़कियों के हाथ में मोबाइल और दुनिया की हर हल-चल तक उनकी पहुंच तो बस एक सबसे सतह पर दिखती चीज है। सोशल मीडिया, इंटरनेट, एआई आदि, जो सबको दिख रहा है और बहुत सारी चीजें।
2- पिछले तीन दशकों में भारत में आर्थिक गतिविधियों में आमूल-चूल परिवर्तन आ गया है। उत्पादन में द्रुत गति से इजाफा हुआ है, जो ट्रिलियन डॉलर के जीडीपी में अभिव्यक्त हो रहा है। इसके चलते जीवन-स्तर और जीवन जीने के स्वरूप में बड़े पैमाने पर परिवर्तन आया है।
मार्क्स ने कहा था कि दुनिया को तीन चीजें आगे बढ़ाती हैं- पहला वैज्ञानिक आविष्कार और उस पर आधारित तकनीकी परिवर्तन, मतलब उत्पादन के उपकरणों में परिवर्तन। दूसरा उत्पादन में वृद्धि और तीसरा क्रांतिकारी वर्ग-संघर्ष मतलब वर्चस्व और अधीनता के हर रिश्ते को खत्म कर देना वाला संघर्ष।
महिलाओं की जिंदगी में पिछले तीन दशकों में आए सकारात्मक परिवर्तन में तकनीकी और उत्पादन ही निर्णायक भूमिका निभाई है। यदि इसके साथ वर्चस्व और अधीनता के हर रिश्ते को खत्म कर देने वाला संघर्ष भी व्यापक और तेज होता तो महिलाओं की जिंदगी में गुणात्मक छलांग आ जाती।
(डॉ. सिद्धार्थ वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं।)