मुस्लिम महिलाओं के बराबर विरासत अधिकार पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देश की सभी महिलाओं को समान अधिकार सुनिश्चित करने का एक तरीका समान नागरिक संहिता यानी कि यूसीसी लागू करना भी हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर मुस्लिम महिलाओं को पुरुषों के बराबर संपत्ति में हिस्सेदारी देने की मांग उठाई गई है। इस पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि अगर पूरे देश में सभी महिलाओं के लिए समान उत्तराधिकार अधिकार सुनिश्चित करने हैं, तो इसके लिए यूनिफॉर्म सिविल कोड जैसे व्यापक विधायी उपाय पर विचार किया जा सकता है।
हालांकि सुप्रीमकोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि यह नीतिगत और विधायी क्षेत्र का मुद्दा है, जिस पर अंतिम निर्णय विधायिका और सरकार को लेना होता है।
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उस रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें मुस्लिम पर्सनल लॉ के उन प्रावधानों को चुनौती दी गई है, जो महिलाओं को पुरुषों के बराबर विरासत अधिकार नहीं देते।
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील प्रशांत भूषण से पूछा कि क्या अदालत पर्सनल लॉ की संवैधानिक वैधता की जांच कर सकती है? जस्टिस बागची ने एक मामले का हवाला देते हुए कहा कि इस फैसले में माना गया था कि पर्सनल लॉ को संविधान की कसौटी पर नहीं परखा जा सकता।
जस्टिस बागची ने बॉम्बे हाईकोर्ट के प्रसिद्ध ‘नरसू अप्पा माली’ फैसले का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि पर्सनल लॉ को संवैधानिक परीक्षण के अधीन नहीं लाया जा सकता।
पीठ ने यह भी सवाल उठाया कि यदि अदालत शरीयत कानून के उत्तराधिकार संबंधी प्रावधानों को रद्द कर देती है, तो क्या इससे कानूनी शून्य पैदा नहीं होगा, क्योंकि मुस्लिम उत्तराधिकार को नियंत्रित करने वाला कोई अन्य विधिक कानून मौजूद नहीं है। इस पर भूषण ने कहा कि ऐसी स्थिति में भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम लागू हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि अदालत यह घोषणा कर सकती है कि मुस्लिम महिलाओं को भी पुरुषों के समान उत्तराधिकार अधिकार मिलना चाहिए।
जब पीठ ने पूछा कि क्या वह पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप कर सकती है, तो भूषण ने सुप्रीम कोर्ट के 2017 के ‘शायरा बानो’ फैसले का हवाला दिया, जिसमें ट्रिपल तलाक को असंवैधानिक घोषित किया गया था। उन्होंने तर्क दिया कि उस फैसले के बाद ऐसी स्थिति नहीं हो सकती कि मुस्लिम महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार न मिलें।
भूषण ने यह भी कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) आवेदन अधिनियम, 1937 एक वैधानिक कानून है, जो ऐसे भेदभावपूर्ण प्रावधानों को मान्यता देता है, इसलिए अदालत उस सीमा तक इस कानून में हस्तक्षेप कर सकती है।
उन्होंने आगे कहा कि उत्तराधिकार का विषय धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25) के तहत संरक्षित नहीं है, क्योंकि यह नागरिक अधिकार से जुड़ा मामला है और इसे किसी आवश्यक धार्मिक प्रथा के रूप में नहीं माना जा सकता। हालांकि चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने चिंता जताई कि यदि अदालत हस्तक्षेप करती है तो कहीं ऐसा न हो कि सुधार की कोशिश में मुस्लिम महिलाओं को वर्तमान से भी कम संरक्षण मिल जाए। उन्होंने कहा कि यदि 1937 का शरीयत अधिनियम हट जाता है, तो इससे अनावश्यक कानूनी खालीपन पैदा हो सकता है।
जस्टिस बागची ने भी कहा कि इस तरह के मामलों में विधायिका के विवेक पर छोड़ना बेहतर हो सकता है, क्योंकि संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों के अनुसार समान नागरिक संहिता लागू करने का अधिकार संसद के पास है।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि इसका समाधान समान नागरिक संहिता हो सकता है। जस्टिस बागची ने उदाहरण देते हुए कहा कि एक पति-एक पत्नी का सिद्धांत भी सभी समुदायों पर समान रूप से लागू नहीं है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि अदालत सभी बहुविवाह को असंवैधानिक घोषित कर दे। खंडपीठ ने यह भी कहा कि इस प्रकार के मामलों में यदि स्वयं मुस्लिम महिलाएं अदालत से राहत मांगते हुए याचिका दायर करें, तो न्यायिक हस्तक्षेप अधिक उपयुक्त हो सकता है। इस पर भूषण ने बताया कि याचिकाकर्ताओं में कुछ मुस्लिम महिलाएं भी शामिल हैं।
अंत में अदालत ने भूषण को याचिका में संशोधन कर यह बताने का सुझाव दिया कि यदि शरीयत के उत्तराधिकार प्रावधान रद्द किए जाते हैं तो उसका वैकल्पिक समाधान क्या होगा। भूषण के सहमत होने पर अदालत ने मामले की सुनवाई स्थगित कर दी।
(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)