ईरान के साथ विश्व के बहुलांश लोग खड़े हैं, अमेरिका-इजरायल के साथ नहीं। ईरान की हर छोटी से छोटी जीत या बढ़त पर लोग खुश हो रहे हैं। अमेरिका-इजरायल की हर छोटी-बड़ी हार का लोग जश्न मना रहे हैं। लोग तहेदिल से यह कामना कर रहे हैं कि ईरान इस युद्ध में विजयी होकर उभरे, अमेरिका और इजरायल हार जाएं।
ईरान की एक मिसाइल भी यदि इजरायल में गिर रही है, थोड़ा भी नुकसान हो रहा है तो लोगों के दिलों में उत्साह और खुशी की लहर पैदा हो रही है। यही स्थिति अमेरिका की हर छोटी से छोटी हार पर हो रही है। ऐसा लग रहा है कि लोग तहेदिल से इबादत कर रहे हों कि ईरान एक विजयी के रूप में उभरे और अमेरिका-इजरायल हारे।
इसके बावजूद की लोग यह अच्छी तरह जानते हैं कि ईरान की तुलना में अमेरिका-इजरायल की सैन्य शक्ति और पैसे की शक्ति अकूत है, फिर भी दुनिया के बहुलांश लोग यह उम्मीद लगाए हैं कि ईरान ही जीतेगा, यह उनके भीतर की ईरान को जीतते हुए देखने की गहरी चाहत की अभिव्यक्ति है। यह उसी तरह है जैसे फिल्मों-कहानियों में लोग अन्याय के शिकार व्यक्ति या समुदाय को ही जीतना देखना चाहते हैं, चाहे वह कितना ही कमजोर क्यों न हो और अन्यायी को हारते हुए देखना चाहते हैं, चाहे वह कितना ही ताकतवर क्यों न हो? इस तरह ईरान के पक्ष में लोगों का खड़ा होना इस बात का साक्षी है कि मानव-जाति की सामूहिक संवेदना-चेतना न्याय के पक्ष में होती है।
यह स्थिति केवल भारत के बहुलांश लोगों की नहीं है, बल्कि हर महाद्वीप और देश के लोगों की है। चाहे वर यूरोप या उत्तरी अमेरिका (अमेरिका-कनाडा और मेक्सिको) या लैटिन अमेरिका, अफ्रीका या एशिया हो। इस तथ्य की पुष्टि हर कोई कर सकता है, जो देश-दुनिया की गतिकी पर थोड़ी निगाह रखता हो, क्यों न सोशल मीडिया के माध्यम से ही सही। तकनीक ने हमें वहां तो पहुंचा ही दिया है कि हम जान सकें कि दुनिया के अलग-अलग कोनों में, देशों में, महाद्वीपों में और व्यक्तियों के भीतर क्या कुछ घटित हो रहा है।
दुनिया के बहुलांश लोग ईरान के साथ सहानुभूति रखते हैं, उसके जीत की कामना कर रहे हैं या किसी हालात में वह पराजित न हो यह चाह रहे हैं। इसका सबूत हम भारत में साफ-साफ देख सकते हैं। इसको देखने के लिए हमें सबसे पहले गोदी-मोदी मीडिया को देखना चाहिए। गोदी मीडिया का हर चैनल आज की तारीख में उन्हीं खबरों और सूचनाओं को प्राथमिकता दे रहा है, जिससें ईरान की ताकत सामने आ रही है, उसके लड़ने की कूबत और क्षमता, उसका प्रतिवाद और प्रतिरोध सामने आ रहा है।
इजरायल और अमेरिका को पहुंचने वाले हर नुकसान को बार-बार दिखाया जा रहा है। यहां तक की बढ़ा-चढ़ा कर भी दिखाया जा रहा है। उन्हीं विशेषज्ञों की इन चैनलों पर सबसे अधिक मांग है, जो अमेरिका-इजरायल की खुली मुखालफत कर रहे हैं और ईरान के साथ खड़े हैं। इसके एक सबसे बड़े उदाहरण सेवानिवृत जनरल जीडी बख्शी हैं। उनकी इतनी मांग हैं कि वे अपनी शर्तों पर चैनलों पर बोल रहे हैं, अंजना ओम कश्यप जैसे एंकरों को अमेरिका-इजरायल का पक्ष लेने पर डांट देते हैं और शो छोड़ देते हैं। बार-बार लोग ऐसे रील देख रहे हैं, जिसमें ईरान जीतता हुआ दिखे।
गोदी मीडिया-मोदी मीडिया तक ईरान की तरफ तब झुकी हुई है जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारत सरकार अमेरिका-इजरालय के साथ खड़ी, साफ-साफ दिख रही है। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है, क्योंकि गोदी-मोदी मीडिया के भी बहुलांश दर्शक-स्रोता ईरान को जीतता देखना चाह रहे हैं, अमेरिका-इजरायल की हार की कामना कर रहे हैं।
यह हाल तो गोदी-मोदी मीडिया की है। गोदी-मोदी मीडिया से इतर चैनल या यूट्यूब या पॉडकास्ट तो ईरान की प्रशंसा, ईरान की बहादुरी, ईरानियों की शहादत, ईरानियों की लड़ने की कूबत की प्रशंसा पूरा दिल खोलकर कर रहे हैं। भारत की गोदी-मोदी मीडिया हो या वैकल्पिक मीडिया या सोशल मीडिया इस कदर ईरान के साथ क्यों खड़े दिख रहे हैं, क्योंकि अमेरिका-इजरायल को कोस रही है, लान-मलानत कर रही है, क्यों संदेश ऐसा दे रही है कि अमेरिका-इजरायल को हारना ही चाहिए और ईरान को जीतना ही चाहिए?
इसका सिर्फ एक उत्तर है कि भारत के बहुलांश लोग किसी न किसी तरह और किसी न किसी कारण अमेरिका-इजरायल के खिलाफ फिलहाल खड़े हो गए हैं और उनकी इस समय ईरान के साथ पूरी सहानुभूति और समर्थन है। यहां ईरान एक इस्लामिक देश है या उसकी बहुलांश आबादी मुस्लिम है, इससे भी भारत के बहुलांश लोगों पर कोई फर्क पड़ता हुआ नहीं दिखाई दे रहा है। सुखद संयोग यह है कि इसमें उन लोगों का भी एक बड़ा हिस्सा है, जो मोदी भक्त हैं और रात-दिन हिंदू-मुस्लिम करते रहे हैं और मुसलमानों के खिलाफ अकारण ही जहर से भरे हुए हैं। ऐसे लोग भी अमेरिका-इजरायल को हारते हुए देखना चाह रहे हैं और ईरान को जीतते हुए।
यह स्थित सिर्फ भारत की नहीं, कमोबेश दुनिया की भी यही स्थिति है। इसका सबसे साफ-साफ दिखता हुआ उदाहरण यूरोप है। यूरोप का कोई देश खुलेआम अमेरिका-इजरालय का पक्ष लेने का साहस नहीं जुटा पाया। जर्मनी, फ्रांस, इटली ने तो अपने को इस युद्ध से घोषित और औपचारिक तौर पर अलग कर ही लिया है, लेकिन अमेरिका का ऐतिहासिक उपग्रह ब्रिटेन भी खुलकर अमेरिका का साथ नहीं दे पा रहा है। तरह-तरह के अंतर्विरोधी बयान ब्रिटिश सरकार दे रही है।
ज्यादा से ज्यादा यह कह पाई है कि हम आत्मरक्षा में तो अमेरिका के साथ हैं, लेकिन ईरान पर हमले में साथ नहीं हैं। नाटों का सदस्य स्पेन तो खुले तौर अमेरिका के खिलाफ खड़ा है। ईरान के खिलाफ युद्ध में अमेरिका नाटो को खड़ा नहीं कर पाया। यूरोपीय देशों संसद, मीडिया और बौद्धिक वर्ग में पूरा माहौल अमेरिका-इजरायल के खिलाफ है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि इन देशों की बहुलांश आबादी की सहानुभूति ईरान के साथ और अमेरिका-इजरायल के खिलाफ है, भले ही स्टैब्लिशमेंट में इजरायली यहूदी लॉबी की पकड़ हो।
एशिया के बहुलांश लोग ईरान के साथ हैं, भले ही शासक और सरकारें जो कर रही हों। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका ही नहीं, इंडोनेशिया, मलेशिया, वियतनाम, उत्तर कोरिया और पश्चिम एशिया में ईरान के साथ बहुलांश लोगों की सहानुभूति है। दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देश चीन की बहुलांश आबादी तो ईरान के साथ है ही। लैटिन अमेरिका ट्रंप के आक्रामक रूख, उनकी संप्रभुता पर हमला और वेनेजुएला के राष्ट्रपति और उनकी पत्नी का गुंडागर्दी के साथ अपहरण से पहले ही आहत है। ब्राजील के राष्ट्रपति लूला तो खुलकर ही अमेरिका के खिलाफ बोल रहे हैं।
खुद के ट्रंप के देश अमेरिका में जनता का बहुलांश हिस्सा उनके साथ नहीं है, उनकी लोकप्रियता की रेटिंग इस समय 25 प्रतिशत के आस-पास पहुंच गई है। सीनेट और प्रतिनिधि सभा में उनके खिलाफ न केवल डेमोक्रेट बल्कि रिपब्लिकन भी बोल रहे हैं। अमेरिका शासक वर्ग भी एकजुट नहीं है, इसे ट्रंप और उनके कुछ सहयोगियों की सनक भरे स्वार्थ के रूप में देखा जा रहा है।
दो कारणों से दुनिया के बहुलांश लोग ईरान का साथ और अमेरिका-इजरायल के खिलाफ हैं-
1-पूरी दुनिया में यह संदेश गया है कि ईरान पूरी तरह निर्दोष है। उसके खिलाफ अकारण हमला किया गया है। ईरान इस हमले का मुकाबला करने के लिए जो कुछ कर रहा है, वह अपनी आत्मरक्षा में कर रहा है। ईरान अपने देश की संप्रभुता, गरिमा और देश के लोगों की रक्षा के लिए लड़ रहा है।
2-अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू दुनिया में अपनी साख और सम्मान खो चुक हैं। ट्रंप दूसरी बार राष्ट्रपति बनते ही यूरोप के देशों, कनाड़ा, लैटिन अमेरिका, भारत और खुद अपन देश में जो कुछ किया, उसके बाद उनकी छवि एक आत्ममुग्ध, शोहरत के भूखे, किसी कीमत पर इतिहास में अपना नाम दर्ज कराने वाले, दूसरे देशों और व्यक्तियों को अपमानित करके सुख महसूस करने वाले और एक हद तक सनकी व्यक्ति की बनी है। जो अपने व्यक्तिगत महात्वाकांक्षा, परिवार और अपनी संपत्ति को बढ़ाने और शोहरत पाने के लिए अपने देश और दुनिया को दांव पर लगा रहा है और मानव-जाति को संकट में डालने पर उतारू है।
नेतन्याहू को अंतरराष्ट्रीय अदालत युद्ध अपराधी ठहरा चुकी है। फिलिस्तीन में नरसंहार का दोषी। दुनिया में उसकी छवि लाखों फिलिस्तीनी बच्चों, बूढ़ों, महिलाओं और किशोरों-युवाओं के हत्यारे की है। जो अपने देश में भ्रष्टाचार का मुकदमा झेल रहा है।
ट्रंप-नेतन्याहू दुनिया के ताकतवर देशों की सरकारों के प्रमुख हैं, लेकिन दुनिया के बहुलांश आबादी को उनमें शैतान की छवि दिख रही है। दूसरी तरफ ईरान न्याय, सच और गरिमा के लिए लड़ने वाले शहीदों का देश दिख रहा है।
ईरान के प्रति विश्वव्यापी सहानुभूति और पक्षधरता इस बात का सबूत है कि दुनिया के लोगों की सामूहिक संवेदना-चेतना न्याय के पक्ष में होती है। मानव-जाति की सामूहिक संवेदना-चेतना को कोई भी शक्ति बर्बर, अन्यायी और नरसंहारक नहीं बना सकती है और न ही राष्ट्रों, समुदायों और व्यक्तियों की गरिमा को रौंदने वाली शक्तियों-व्यक्तियों के साथ खड़ा कर सकती है, लंबे समय के लिए खड़ी कर सकती है। यही तथ्य इस बात की गारंटी है कि देर-सबेर ही सही, हर देश के लिए, हर समुदाय के लिए और हर इंसान के लिए न्यायपूर्ण दुनिया का निर्माण होगा। वर्चस्व और अधीनता, शोषण-उत्पीड़न और गैर-बराबरी आधारित रिश्ते खत्म होंगे।
(डॉ. सिद्धार्थ लेखक और पत्रकार हैं।)