शत्रु कहीं बाहर नहीं हमारे भीतर छिपा होता है – शत्रुगंध नाट्य समीक्षा

समकालीन समाज में यह प्रश्न बार-बार उभरता है कि आखिर क्यों आज की संतानें विदेश जाकर अपने माता-पिता से दूर होती चली जाती हैं और कई बार उन्हें पूरी तरह भूल भी जाती हैं। इसी गहरे और संवेदनशील विषय को केंद्र में रखकर “शत्रुगंध” नाटक का मंचन विश्व रंगमंच दिवस के अवसर पर 27 मार्च 2026 को दिल्ली के एलटीजी ऑडिटोरियम के “द ब्लैंक कैन्वस” में “मास्क प्लेयर्स आर्ट ग्रुप” द्वारा किया गया।

यह नाटक न केवल बुजुर्ग माता-पिता की पीड़ा को सामने लाता है, बल्कि दर्शकों के मन में कई महत्वपूर्ण प्रश्न भी छोड़ जाता है। क्या हम अपने बच्चों को केवल पैसा कमाने का माध्यम बना रहे हैं? क्या उनके सामने केवल उच्च पद और अधिक आय को ही जीवन का अंतिम लक्ष्य बनाकर प्रस्तुत करना उचित है? क्या उन्हें केवल पढ़ाई में श्रेष्ठ बनाने के लिए सामाजिक जीवन से दूर कर देना सही है? इन सभी प्रश्नों के माध्यम से नाटक समाज की सोच पर गंभीर प्रहार करता है।

लेखक योगेश त्रिपाठी ने इस कथा के माध्यम से यह दिखाया है कि कैसे माता-पिता अपने बेटे के उज्ज्वल भविष्य के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर देते हैं। वे हर त्याग करते हैं, हर कठिनाई सहते हैं, लेकिन वही बेटा आगे चलकर उनसे दूरी बना लेता है। वह उन्हें अपने साथ विदेश नहीं ले जाता, उनसे संपर्क तक नहीं रखता और अंततः उन्हें अकेलेपन के हवाले कर देता है।

नाटक का सबसे मार्मिक पक्ष वह है, जहाँ माता-पिता अकेले घर में अपने बेटे की यादों के सहारे जीवन बिताते हैं। वर्तमान की कठिनाइयों, सामाजिक असुरक्षा और मानसिक निराशा के बीच उनका संघर्ष दर्शकों को भावुक कर देता है। यह द्वंद्व कि वे जीवन को स्वीकार करें या मृत्यु को, पूरे वातावरण को गहन बना देता है।

अभिनय की दृष्टि से रविन्द्र सिंह ने पिता की भूमिका में अद्भुत गहराई दिखाई। सरिता शर्मा ने माँ के रूप में ममता और पीड़ा को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। निखिल झा (सुयश), संजीव कुमार (इंस्पेक्टर), आशुतोष श्रीवास्तव (पुत्र) और राकेश शर्मा (जामदार) ने भी अपने अभिनय से नाटक को मजबूती प्रदान की।

मंच संचालन माला नेगी द्वारा किया गया। मंच के पीछे जतिन चौहान ने संगीत के माध्यम से भावनात्मक वातावरण को सशक्त बनाया। अमित कुमार शाह की लाइटिंग, ममता रानी के कास्ट्यूम और मनोज के मेकअप ने प्रस्तुति को और अधिक प्रभावी बना दिया।

कुल मिलाकर, “शत्रुगंध” एक ऐसा नाटक है, जो दर्शकों को यह सोचने पर मजबूर करता है कि असली शत्रु कहीं बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर छिपा होता है, जिसे पहचानना और सुधारना आवश्यक है।

(जनचौक ब्यूरो)

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