नोएडा मामले में गिरफ़्तारियों, कार्रवाई की स्वतंत्र, निष्पक्ष न्यायिक समीक्षा हो

3 जून 2026 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के जस्टिस विनोद दिवाकर ने राजेंद्र त्यागी एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में जो निर्णय दिया, वह केवल एक गैंगस्टर एक्ट के मुकदमे में हस्तक्षेप नहीं था। यह निर्णय उत्तर प्रदेश की पुलिस व्यवस्था, प्रशासनिक संस्कृति और राजनीतिक हस्तक्षेप पर एक गहरी न्यायिक टिप्पणी के रूप में सामने आया। न्यायालय ने कहा कि उत्तर प्रदेश में लंबे समय से विकसित राजनीतिक-प्रशासनिक ढाँचे ने संवैधानिक शासन को जनसेवा के बजाय सत्ता व प्रभाव के साधन में बदल दिया है।

न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि क्षेत्रीय अधिकारी ट्रांसफर-पोस्टिंग की राजनीति से प्रभावित होकर अपने राजनीतिक वरिष्ठों को संतुष्ट करने के लिए अपना आचरण निर्धारित करते हैं, जबकि सत्ता के प्रति वफादार समझे जाने वाले अधिकारियों को पसंदीदा पदों से पुरस्कृत किया जाता है।

न्यायालय ने यह भी कहा कि कई बार एफआईआर दुर्भावनापूर्ण उद्देश्यों से दर्ज की जाती हैं या दबा दी जाती हैं, निवारक निरोध संबंधी कानूनों का मनमाना उपयोग होता है और न्यायालयी आदेशों का पालन केवल औपचारिक रूप से किया जाता है जबकि उनकी वास्तविक भावना को निष्प्रभावी कर दिया जाता है।

न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि पुलिस अधिकारियों का एक बड़ा वर्ग विधि के शासन को संवैधानिक दायित्व के बजाय प्रशासनिक असुविधा के रूप में देखता है तथा चुनिंदा कार्रवाई, लक्षित मुकदमेबाजी और गैंगस्टर एक्ट जैसे कठोर कानूनों के उपयोग को लेकर समय-समय पर न्यायिक चिंता व्यक्त की जाती रही है।

ऐसे समय में अप्रैल 2026 का नोएडा मज़दूर आंदोलन और उसके बाद की घटनाएँ विशेष महत्व ग्रहण कर जाती हैं। 13 अप्रैल 2026 को न्यूनतम वेतन वृद्धि और कार्य परिस्थितियों से जुड़े मुद्दों को लेकर बड़े पैमाने पर श्रमिक प्रदर्शन हुए। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार हजारों श्रमिक कई औद्योगिक क्षेत्रों में सड़कों पर उतरे। बाद में कुछ स्थानों पर हिंसा, आगज़नी और पथराव की घटनाओं की सूचना दी गई, जिसके बाद पुलिस ने व्यापक कार्रवाई शुरू की।

सात मुकदमे दर्ज किए गए और सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार किया गया। पुलिस का आरोप था कि हिंसा पूर्वनियोजित थी और कुछ बाहरी तत्वों ने इसमें भूमिका निभाई, जबकि श्रमिक संगठनों और नागरिक अधिकार समूहों ने इस दावे झूठ बताया।

इसके बाद जिन नामों की राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा हो रही है, उनमें रुपेश राय, आदित्य आनन्द, हिमांशु ठाकुर, मनीषा, सृष्टि, योगेश मीणा, आकृति चौधरी और सत्यम वर्मा शामिल है। पुलिस का आरोप है कि इनमें से कुछ लोगों ने आंदोलन को हिंसक दिशा देने में भूमिका निभाई, जबकि उनके अधिवक्ताओं, बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, मजदूर और नागरिक अधिकार समूहों ने स्पष्ट रूप से दावा किया कि इन गिरफ्तारियों में गंभीर कानूनी अनियमितताएँ थीं।

सत्यम वर्मा, जो लंबे समय तक पत्रकारिता और श्रमिक मुद्दों पर लेखन से जुड़े रहे हैं, उन्हें लखनऊ से गिरफ्तार किया गया। आकृति चौधरी, जो छात्र और सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़ी रही हैं, उन्हें भी गिरफ्तार किया गया। बाद में उत्तर प्रदेश पुलिस ने सत्यम वर्मा और आकृति चौधरी पर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम लागू कर दिया।

पुलिस का कहना था कि दोनों की भूमिका सार्वजनिक व्यवस्था भंग करने में महत्वपूर्ण थी, जबकि नागरिक अधिकार समूहों, वकीलों, शिक्षकों, छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनेक समूहों ने इस कार्रवाई का विरोध किया तथा इसे असहमति और श्रमिक अधिकारों की आवाज़ को दबाने का प्रयास बताया।

मामला यहीं नहीं रुका। विभिन्न शहरों में प्रेस कॉन्फ्रेंस, विरोध सभाएँ और ज्ञापन अभियान आयोजित किए गए। लखनऊ, दिल्ली, देहरादून तथा अन्य स्थानों पर सामाजिक कार्यकर्ताओं, अधिवक्ताओं, पत्रकारों, शिक्षकों, छात्र संगठनों और नागरिक अधिकार समूहों ने गिरफ्तार लोगों की तत्काल रिहाई तथा एनएसए हटाने की माँग की गई है। देश के कई जनवादी संगठनों ने राज्यपाल और राष्ट्रपति को ज्ञापन भेजे। उपरोक्त लोगों ने कहा कि श्रमिक आंदोलन और उससे जुड़े कार्यकर्ताओं के विरुद्ध जिस प्रकार कठोर कानूनी प्रावधानों का उपयोग किया गया, वह लोकतांत्रिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं के लिए चिंताजनक संकेत है।

इसी दौरान सत्यम वर्मा की गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली हेवियस कॉरपस की याचिका पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार से जवाब भी माँगा। याचिका में गिरफ्तारी और हिरासत की प्रक्रिया को लेकर गंभीर अनियमितताओं के आरोप लगाए गए। दूसरी ओर राज्य सरकार और पुलिस ने अपने सार्वजनिक बयानों में कहा कि कार्रवाई कानून सम्मत थी और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक थी। इस प्रकार विवाद केवल कुछ व्यक्तियों की गिरफ्तारी का नहीं रह गया, बल्कि यह प्रश्न बन गया कि राज्य की पुलिस शक्ति, निवारक निरोध कानूनों और संवैधानिक स्वतंत्रताओं के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए।

यही वह बिंदु है जहाँ जस्टिस विनोद दिवाकर की टिप्पणियाँ विशेष महत्व रखती हैं। जब उच्च न्यायालय स्वयं यह कह रहा हो कि एफआईआर के दुरुपयोग, निवारक कानूनों के मनमाने प्रयोग, राजनीतिक प्रभाव और पुलिस की संस्थागत जवाबदेही से जुड़े प्रश्न वास्तविक हैं, तब नोएडा जैसे मामलों को केवल एक कानून-व्यवस्था की घटना मानकर नहीं देखा जा सकता। यह आवश्यक हो जाता है कि प्रत्येक गिरफ्तारी, प्रत्येक निरोधात्मक कार्रवाई और प्रत्येक कठोर कानूनी कदम की स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायिक समीक्षा हो।

लोकतंत्र की मजबूती का अर्थ केवल राज्य की शक्ति नहीं है; लोकतंत्र की मजबूती का अर्थ यह भी है कि श्रमिक, छात्र, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता और असहमत नागरिक बिना भय के अपने अधिकारों का प्रयोग कर सकें और यदि राज्य उनके विरुद्ध कार्रवाई करे तो वह कार्रवाई संविधान और विधि के शासन की कसौटी पर पूरी तरह खरी उतर सके।

जस्टिस विनोद दिवाकर का निर्णय अंततः हमें यही याद दिलाता है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस, प्रशासन और सरकार की वैधता उनकी शक्ति से नहीं, बल्कि संविधान के प्रति उनकी निष्ठा से निर्धारित होती है। राज्य की संस्थाएँ यदि संविधान के प्रति जवाबदेह रहेंगी तो लोकतंत्र मजबूत होगा। लेकिन यदि राजनीतिक सुविधा, प्रशासनिक मनमानी और असाधारण कानूनों का प्रयोग सामान्य शासन पद्धति का हिस्सा बन जाएगा, तो सबसे बड़ा नुकसान नागरिक स्वतंत्रताओं और संवैधानिक शासन को होगा।

(महा प्रसाद अधिवक्ता हैं और लॉयर्स कलेक्टिव फॉर पीपल्स राइट्स (एलसीपीआर) के संयोजक हैं।)


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