पहले हाल के छात्र आंदोलन को देख लीजिए। अभिजीत दीपके के द्वारा शुरु और तीन-चार लोगों के नेतृत्व में लड़ा गया (बल्कि यूं कहिए एक व्यापक छात्र समूह द्वारा तिलचट्टा शब्द की टिप्पणी पर आहत होकर लड़ने को उद्धत बेरोजगारों, छात्रों को एक चेहरा मिल गया)।
अभिजीत दीपके दो साल पहले तक वह आम आदमी पार्टी में थे। और केजरीवाल सरकार ने पिछले पूरे दशक में भला कब न्यूनतम मजदूरी को पूरे दिल्ली में रहने वाले 50-60 लाख मजदूर लोगों को उपलब्ध कराया है? क्या हर साल ही जाड़ों में दर्जन भर अग्निकांड को घटनाओं में मजदूर नहीं मरते थे दीपके जी?? साफ है कि अभिजीत दीपके की चिंताओं में वह मजदूर वर्ग कभी नहीं रहा जिसने हालिया मानेसर, नोएडा और ग्रेटर नोएडा आंदोलन में आगे बढ़ कर शिरकत की, और अपने वेतन में मामूली वृद्धि करवाई)
दीपके धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग करते हैं।अब इस्तीफे के साथ ही मानो सभी छात्रों की की मुराद पूरी हो गई है।
इसमें अभिजीत दीपके या वांगचुक को ही एक अति मानव के रूप में प्रस्तुत कर दिया गया है।
यानि जैसे कोई कार्ल मार्क्स, भगत सिंह, लेनिन को ही अति मानव मान उसकी मूर्ति पूजा करे। ऐसे ही किसी अन्ना, किसी की व्यक्ति पूजा करना।
यह विचार हमेशा पूंजीपति वर्ग की विचारधारा भी रहा है और उसके हितों की सेवा भी करता है।
मानो व्यापक जर्मनी के पूंजीपति वर्ग को न देखकर मात्र एक हिटलर, मुस्सोलिनी, धर्मेंद्र प्रधान या फिर मोदी को ही देखना।
यह पूंजीवादी व्यवस्था को बचाए रखने का बहुत ही चतुर कदम है।
यह ठेठ पूंजीवादी रवैया है। जिसमें एक व्यक्ति को ही न कि उसकी पूरी पार्टी या ( जेसा होना चाहिए) पूरी पूंजीवादी व्यवस्था को निशाने पर लेता है।
क्या केवल पूंजीवाद के एक नन्हे मुन्ने प्यादे के इस्तीफे से परीक्षाओं की भारी फीस का मुद्दा हल हाल हो जाएगा? क्यों नहीं प्रवेश परीक्षाओं में मात्र नाम मात्र की या फीस ली जाती है।
क्यों नहीं जीआरई की तर्ज पर सभी परीक्षाओं को एक बार में करवा कर उसके स्कोर की गणना कर सीधा अभ्यर्थियों को इंटरव्यू के लिए बुलाया जाता?
तथ्य तो यह भी है कि इस भुखमरे देश में आईआईटी, एम्स जैसे करोड़ों की सब्सिडी प्राप्त मेडिकल और इंजीनियरिंग संस्थानों से डिग्रियां लेकर हमारे बच्चे विदेशी कंपनियों की सेवा करते हैं जैसे गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, फेसबुक आदि।
डॉक्टरी परीक्षा में हम चीनी मॉडल क्यों नहीं अपना सकते? जैसे कि माओ के नेतृत्व में किया गया था। यानि समाज के प्रति अटूट निष्ठावान युवक युवतियों को ही डॉक्टरी कोर्स हेतु प्रवेश देना, डॉक्टर की डिग्री देना।
इस कंप्यूटर युग में क्यों छात्रों को परीक्षा देने के लिए किसी एक या कुछ केंद्रों में बुलाया जाता है, जबकि जिला मुख्यालय पर ही ये परीक्षाएं आयोजित की जा सकती हैं। पेपर उसी समय चार घंटे पहले ही तैयार हो। आईएएस एग्जाम जब ठीक से करवा सकते हैं तो अन्य क्यों नहीं?
पूरे भारत में मुफ्त शिक्षा क्यों नहीं दी जा सकती है? पूरे भारत में मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई क्यों नहीं मुफ्त में दी जा सकती है? पीएचडी में हर छात्र को तीन-चार सालों तक अनिवार्य रूप से जीवन निर्वाह युक्त के लायक मुफ्त आवास भोजन आदि उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
फिर शिक्षा ही क्यों स्वास्थ्य की व्यवस्था को भी निशाने पर क्यों नहीं लिया जाता? फिर इस पूरी पूंजीवादी व्यवस्था को ही निशाने पर लेना पड़ेगा। इसमें न तो अभिषेक, न वांगचुक न राहुल गांधी न कोई और पूंजीवादी नेता बात करेगा।
आखिर प्रधानमंत्री के घर के सामने धरना देने वाले राहुल गांधी क्या नहीं जानते कि किस तरह आजादी के बाद कम्युनिस्टों का दमन किया गया? दुनिया की पहली चुनी हुई कम्युनिस्ट सरकार को उसके शानदार भूमि सुधार आदि जनकल्याणकारी कार्यों के बावजूद 1959 में बर्खास्त कर दिया गया?
आजकल यही सब भ्रम प्रगतिशील लोगों के लेखन में नजर आता है। हमेशा लोकतंत्र लोकतंत्र रटना!! बिना यह साफ किए कि कौन सा लोकतंत्र? समाजवादी लोकतंत्र या पूंजीवादी लोकतंत्र? समाजवादी लोकतंत्र में 99% जनता की एक प्रतिशत पूंजीपति वर्ग पर तानाशाही होती है तो पूंजीवादी व्यवस्था में मात्र एक प्रतिशत से भी काम लोगों की 99% जनता पर नंगी तानाशाही होती है, जैसी आज हमारे और सभी देशों में भी है। चीन, रूस में भी !
तमाम संसद, न्यायालय आयोग, ट्रिब्यूनल आदि जनता की आंख में धूल झोंकने के अलावा कुछ नहीं करते हैं।
तो आज इस आंदोलन को गिन कर तीन चार मांगों पर सीमित कर दिया गया है।
और अभिजीत दीपके ही क्यों तमाम कथित प्रगतिसील लेखन में सरकार को ऐसे प्रस्तुत किया जाता है मानो वह सारी जनता की सरकार हो, सभी आम मजदूर, छोटे किसानों, खेती, बेरोजगार छात्रों की हित साधक सरकार है, न कि आठ दस पूंजीपतियों की।
और यही वह राज्य सत्ता (या सरकार जिसमें पूंजीवादी, विधायिका, न्यायपालिका भी आती है ) का सवाल है जिसे अपने को समाजवादी यहां तक कि कम्युनिस्ट कहने वाले भारत के तमाम लोग सिरे से गायब कर जाते हैं। ज्यादातर तो जानबूझकर। अब देखिए फांसी से 3 सप्ताह पहले भगत सिंह अपने लेख “क्रांतिकारी कार्यक्रम का मसौदा” में क्या लिख रहे हैं।
“असेम्बली बम केस में दी गयी हमारी परिभाषा के अनुसार इन्कलाब का अर्थ मौजूदा सामाजिक ढाँचे में पूर्ण परिवर्तन और समाजवाद की स्थापना है। इस लक्ष्य के लिए हमारा पहला कदम ताकत हासिल करना है। वास्तव में ‘राज्य’, यानी सरकारी मशीनरी, शासक वर्ग के हाथों में अपने हितों की रक्षा करने और उन्हें आगे बढ़ाने का यंत्र ही है। हम इस यंत्र को छीनकर अपने आदर्शों की पूर्ति के लिए इस्तेमाल करना चाहते हैं। हमारा आदर्श है — नये ढंग से सामाजिक संरचना, यानी मार्क्सवादी ढंग से। इसी लक्ष्य के लिए हम सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल करना चाहते हैं। जनता को लगातार शिक्षा देते रहना है ताकि अपने सामाजिक कार्यक्रम की पूर्ति के लिए अनुकूल व सुविधाजनक वातावरण बनाया जा सके। हम उन्हें संघर्षों के दौरान ही अच्छा प्रशिक्षण और शिक्षा दे सकते हैं।”
यह देखिए न ऊपर कह गए समाजवादीयों, कम्युनिस्टों से भगत सिंह कितना आगे पहुंच गए हैं।
राज्य का सवाल क्रांति से इतना जुड़ा हुआ है कि ऐन 1917 के दौरान ही लेनिन इसे लिख रहे हैं। फिर इसी शीर्षक से एक पुस्तिका निकलते हैं जिसका नाम है “राज्य और क्रांति”!
फिर इसके दो साल बाद छात्रों को राज्य के बारे में पढ़ते हुए प्रशिक्षित करते हुए लेनिन 11 जुलाई 1919 को एक भाषण स्वरदेलेव विश्वविद्यालय में देते हैं जो निम्न प्रकार है।
… “यह सारी राजनीति में इतना आधारभूत, इतना मूलभूत प्रश्न है कि न केवल ऐसे तूफानी क्रांतिकारी काल में जिससे हम इस समय गुजर रहे हैं अपितु अत्यंत शांतिपूर्ण काल में भी आप किसी भी आर्थिक या राजनीतिक प्रश्न के सिलसिले में हर रोज किसी भी अखबार में इस प्रश्न का सामना करते हैं— राज्य क्या है? उसका सार तत्व क्या है? उसका महत्व क्या है? हमारी पार्टी का पूंजीवाद का तख्ता उलटने के लिए लड़ रही पार्टी का कम्युनिस्ट पार्टी का रुख क्या है? राज्य के प्रति उसका रुख क्या है? हर रोज आप इस या उस प्रसंग में इस प्रश्न की ओर लौटेंगे।”
राज्य का विषय इतना महत्वपूर्ण होता है कि लेनिन (17 पेज में से 2 पेज) अपने भाषण के समय का दसवां हिस्सा इसी बात पर खर्च कर देते हैं। वो कहते हैं कि राज्य का विषय इतना पेचीदा, इतना उलझाया हुआ है कि शायद अधिकांश छात्रों को एक, दो या तीन बार पढ़ने पर भी पल्ले नहीं पढ़ सके। लेकिन इस विषय को समझने के लिए लेनिन छात्रों से धैर्य पूर्वक पुनः पढ़ने और गंभीरता से अच्छी पकड़ बनाने का अनुरोध करते हैं।
यही राज्य का सवाल अन्ना आंदोलन के दौरान भी अति वर्ग चेतन मजदूरों ने अपने आंतरिक अध्ययनों में उठाया था।आज भी यह राज्य का प्रश्न इस तरह और उतना ही महत्व रखता है जितना रूसी समाजवादी क्रांति वर्ष 1917 में या 1870 के पेरिस कम्यून के दौरान।
आज पूंजीवाद अपने ही आंतरिक अंतरविरोधों से ग्रसित है। आज पूंजीवाद मरणशील है। कभी यह प्रगतिशील हुआ करता था। लेकिन वह इसकी बचपन और युवावस्था के यौवन के दिन थे। आज सड़े गले बूढ़े बंदर का रूप ले चुके इस पूंजीवाद को मजदूर वर्ग के नेतृत्व में ही पराजित किया जा सकता है।
(उमेश चंदोला का लेख)