बार कौंसिल ऑफ़ इंडिया के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा पर इस्तीफ़े का दबाव बढ़ने लगा है।
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन अध्यक्ष डॉ. विकास सिंह ने 13 अगस्त को लिखे अपने पत्र में बार कौंसिल चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा द्वारा नालसार यूनिवर्सिटी के कुलपति को पत्र लिखकर छात्रों के मुख्य न्यायाधीश की दीक्षांत समारोह में उपस्थिति का विरोध करने पर छात्रों के एनरोलमेंट पर रोक लगाने वाले निर्देश (जो बाद में वापस ले लिया गया) को पूरी तरह मनमाना, गैरकानूनी और असंगत करार दिया है।
डॉ. विकास सिंह ने कहा कि यह निर्देश छात्रों को उनके मौलिक अधिकारों का इस्तेमाल करने से डराने का एक प्रयास है। डॉ. विकास सिंह ने जोर देकर कहा कि विश्वविद्यालय स्वतंत्र विचार, निर्भीक बहस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के केंद्र होते हैं. किसी संवैधानिक अथॉरिटी के साथ असहमति या विवाद के कारण छात्रों को कानूनी पेशे में प्रवेश करने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
उन्होंने स्पष्ट किया कि एडवोकेट्स एक्ट, 1961 वकीलों के एनरोलमेंट और योग्यता को नियंत्रित करता है और इसमें इस तरह के सामूहिक प्रतिबंध का कोई स्थान नहीं है।
पत्र में डॉ. विकास सिंह ने संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) का हवाला देते हुए कहा कि बीसीआई का निर्देश नागरिकों के अपनी पसंद का पेशा चुनने और प्रैक्टिस करने के मौलिक अधिकार का सीधा हनन करता है। बीसीआई देश में कानूनी पेशे की सर्वोच्च नियामक संस्था है और उस पर संवैधानिक मूल्यों को कायम रखने की जिम्मेदारी है। बीसीआई को सामूहिक दंड का सहारा नहीं लेना चाहिए।
शुक्रवार को कॉकरोच जनता पार्टी के मुख्य प्रवक्ता सौरव दास ने मिश्रा के इस्तीफे की माँग की थी।
इस बीच नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ़ लॉ के दो पूर्व छात्रों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। वे इस बात की जांच चाहते हैं कि बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा ने किस तरह से यूनिवर्सिटी को पत्र जारी किए। इन पत्रों में यूनिवर्सिटी से उन छात्रों की पहचान करने को कहा गया था जो मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत को दीक्षांत समारोह में बुलाने के खिलाफ अभियान में शामिल थे। साथ ही, यूनिवर्सिटी के 2026 बैच के छात्रों के एनरोलमेंट (पंजीकरण) पर रोक लगाने का निर्देश भी दिया गया था।
बीसीआई चेयरमैन ने बाद में खुद ही ये आदेश वापस ले लिए थे। याचिकाकर्ताओं का सवाल है कि क्या बीसीआई चेयरमैन को ये निर्देश जारी करने के लिए काउंसिल की उचित बैठक में अधिकृत किया गया था। याचिका में कहा गया है कि एडवोकेट्स एक्ट, 1961 के तहत छात्र अभियान में शामिल होना एनरोलमेंट से इनकार करने का आधार नहीं है।
याचिका में कहा गया है, “बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने एडवोकेट्स एक्ट, 1961 के दायरे से बाहर जाकर काम किया है। उसने सेक्शन 24ए की सख्त सीमाओं से परे एक अतिरिक्त-कानूनी अयोग्यता बनाने की कोशिश की है, जबकि सेक्शन 24ए में अयोग्यता के आधारों की पूरी सूची दी गई है। विवादित पत्रों के माध्यम से, बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया असल में अयोग्यता का एक और आधार बना रही है – छात्र अभियान में शामिल होना और फिर यूनिवर्सिटी स्तर पर जांच का लंबित होना।”
याचिका में यह भी कहा गया है कि दीक्षांत समारोह के लिए मुख्य अतिथि के चयन को लेकर छात्रों का विरोध या अपनी बात रखना संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आता है। इसमें तर्क दिया गया है कि विवादित पत्रों से छात्रों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर “दबाव” पड़ता है।
याचिका में कहा गया है, “किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को दिए गए निमंत्रण पर असहमति जताना या उस पर पुनर्विचार की मांग करना अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत संरक्षित अभिव्यक्ति है। ऐसे विरोध या मांग करने वालों की पहचान करने के निर्देश और साथ ही उनके आचरण पर बार काउंसिल द्वारा ‘कानूनी कार्रवाई’ की धमकी, भविष्य के छात्रों और फैकल्टी को कानूनी, शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीकों से असहमति जताने से रोकती है।”
आज वरिष्ठ वकील के. परमेश्वर ने मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच के सामने यह मामला उठाया। कोर्ट ने नोटिस जारी करते हुए निर्देश दिया कि पत्रों में उल्लिखित घटनाओं के संबंध में नालसार के छात्रों या फैकल्टी के खिलाफ बीसीआई या किसी भी बार काउंसिल द्वारा कोई दंडात्मक कार्रवाई न की जाए।
गौरतलब है कि गुरुवार को पहला पत्र जारी होने के कुछ ही घंटों बाद दूसरा पत्र जारी किया गया और बार कौंसिल ने ने नालसार के 2026 बैच के ग्रेजुएट्स के एनरोलमेंट (पंजीकरण) पर रोक लगाने के चेयरमैन के निर्देश को वापस ले लिया।
पहले पत्र में नालसार को तीन दिनों के भीतर उन लोगों की पहचान करने वाली रिपोर्ट देने का निर्देश दिया गया था जो दीक्षांत समारोह में मुख्य न्यायाधीश की भागीदारी के संबंध में अभियान शुरू करने, आयोजित करने या जुटाने में “मुख्य भूमिका” में थे। इसमें हस्ताक्षर करने वाले छात्रों की पूरी सूची और संबंधित मिनट्स (बैठक का विवरण) या प्रस्ताव भी मांगे गए थे।
पहले पत्र में सभी स्टेट बार काउंसिल्स को नालसार के 2026 में पास होने वाले छात्रों के एनरोलमेंट को अगले आदेश तक रोकने का निर्देश भी दिया गया था। दूसरे पत्र में उनके एनरोलमेंट की अनुमति दे दी गई और कहा गया कि ज़्यादातर छात्र निर्दोष थे।
हालांकि, इसमें शामिल लोगों की पहचान करने वाली रिपोर्ट जमा करने का निर्देश बरकरार रखा गया और कहा गया कि वाइस-चांसलर की रिपोर्ट मिलने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी। बाद में इसे भी रद्द कर दिया गया।
पहला पत्र जारी होने की खबर आते ही सोशल मीडिया में इसकी कड़ी प्रतिक्रिया हुई।
मुख्य न्यायाधीश ने शुक्रवार को कहा था “शांतिपूर्ण और वैध विरोध प्रदर्शन का अधिकार संविधान में सबको है इसलिए छात्रों को प्रोटेस्ट का पूरा अधिकार है। छात्रों के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी। अगर युवावस्था में कोई गलत बयान देता है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि उन्हें विरोध करने का अधिकार नहीं है। सभी छात्रों से कहें कि वे नामांकन कराएं और सुप्रीम कोर्ट बार से जुड़ें, हम उन्हें कानूनी सहायता कोर्स के लिए पैनल में शामिल करेंगे।”
मुख्य न्यायाधीश ने कहा “मैं भी छात्र के तौर पर एक्टिव रहा हूं, अगर मान भी लें कि वे गलत हैं, तब भी उन्हें विरोध करने का अधिकार है। यह मेरे और छात्रों के बीच की बातचीत है। वे (बार कौंसिल) कौन होते हैं जो इस मुद्दे को उठा रहे हैं? यह पूरी तरह से गैर-जरूरी है। बीसीआई का इसमें कोई लेना-देना नहीं है।
(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)