मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव अभियुक्त कहा जाना चाहिए: दीपंकर भट्टाचार्य

पटना। भाकपा माले महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने रविवार को कहा कि चुनाव आयोग के भाजपा के साथ मिलकर काम करने का मुद्दा विपक्ष उठाते रहा है, लेकिन अब आयोग के भीतर से ही सामने आए तथ्यों ने इस मिलीभगत का खुलासा किया है।

उन्होंने यहाँ प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए कहा कि 26 सितंबर को चुनाव आयोग का प्रेस बयान एक तरह से उसका कबूलनामा है और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव अभियुक्त कहा जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग ने अपनी प्रेस विज्ञप्ति में स्वीकार किया है कि आगे से बैठकों का एजेंडा पहले ही सर्कुलेट किया जाएगा। इससे पहले ऐसा क्यों नहीं किया गया, इस पर आयोग को जवाब देना चाहिए। प्रेस विज्ञप्ति की कॉपी दिखाते हुए उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग पर जो गंभीर आरोप लगे थे उसका कबूलनामा उनके प्रेस कॉन्फ्रेंस से जारी विज्ञप्ति में है और इसके बाद उस कुर्सी पर बैठने का कोई हक़ नहीं है।

भट्टाचार्य ने पश्चिम बंगाल का मामला उठाते हुए कहा कि वहां 16 लाख लोगों को पहले योग्य मतदाता माना गया था, लेकिन बाद में उन्हें अयोग्य ठहराने के लिए चुनाव आयोग ने ट्रिब्यूनल में अपील की। उन्होंने कहा कि इस पर आयोग ने अब तक कोई जवाब नहीं दिया है। उन्होंने सवाल उठाया कि चुनाव आयोग की गड़बड़ियों के कारण मतदाता सूची से बाहर हुए लोग आखिर फॉर्म-6 क्यों भरें? 

उन्होंने कहा कि अब बहुत हो चुका है। ज्ञानेश कुमार को पद छोड़ना होगा। उनके नेतृत्व में चुनाव आयोग नहीं चल सकता। पहले कहा गया था कि एसआईआर के जरिए शुद्ध मतदाता सूची तैयार की गई है, लेकिन अब कहा जा रहा है कि इसमें छूटे हुए लोगों को जोड़ा जाएगा। हमारी स्पष्ट मांग है कि एसआईआर पर तत्काल रोक लगाई जाए और एसआईआर के बाद हुए चुनावों को फिर से कराया जाए। मुख्य चुनाव आयुक्त के नियुक्ति प्रक्रिया को भी ठीक किया जाए।

दीपंकर भट्टाचार्य ने आगे कहा कि वे जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करना चाहते थे, लेकिन उन्हें इसकी अनुमति नहीं दी गई। इसके बजाय उन्हें 40–50 किलोमीटर दूर डिटेन कर के थानों में रखा गया। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की रक्षा की लड़ाई में केवल राजनीतिक दलों को ही नहीं, बल्कि उन सभी नागरिकों को एकजुट होना होगा जो लोकतंत्र की रक्षा के लिए सक्रिय हैं। 

उन्होंने कहा कि हम निर्णायक आंदोलन की ओर बढ़ रहे हैं। यह आंदोलन ज्ञानेश कुमार से शुरू होकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक जाएगा।

पत्रकारों के सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि सम्राट चौधरी जो ये कह रहे हैं कि एसआईआर में कोई गड़बड़ी नहीं हुई और ऐसे लोग सामने नहीं आ रहे हैं जिन्हें वोट के अधिकार से वंचित किया गया है, वो1 अक्टूबर को स्वयं आ के देख लें। 1 अक्टूबर को हम जनसुनवाई करने जा रहे हैं जहां बिहार के 10 विधानसभा से हम ऐसे लोगों को लाएंगे, जो जीवित हैं और बिहार में रह रहे हैं और उनको पिछले विधानसभा चुनाव में वोट के अधिकार से वंचित किया गया है।

बिहार के कानून व्यवस्था पर भी उन्होंने निशाना साधा और कहा कि सम्राट चौधरी बिहार के कानून व्यवस्था पर जवाब दें, जमुई की घटना ने पुरे देश में बिहार को शर्मसार किया है। कानून व्यवस्था फेल है।

प्रेस वार्ता को ऐपवा की महासचिव मीना तिवारी ने भी संबोधित किया। उन्होंने महिलाओं और लड़कियों पर हो रहे हमलों को लेकर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि बिहार सहित पूरे देश में महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं। लड़कियों पर लगातार हमले हो रहे हैं, लेकिन अपराधियों पर कार्रवाई करने के बजाय सरकार और उसका तंत्र लड़कियों को ही दोषी ठहरा रहा है।

मीना तिवारी ने बिहार की मंत्री श्रेयसी सिंह के नैतिक पहरेदारी संबंधी बयान का जिक्र करते हुए कहा कि लड़कियों पर हमले हो रहे हैं और पाबंदियां भी उन्हीं पर लगाई जा रही हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर अपराधियों पर कार्रवाई करने के बजाय लड़कियों को ही निशाना क्यों बनाया जा रहा है?

(विशद कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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