‘वान डाइक’ और 6 उक्रेनी नागरिकों को रिहा करना सरकार के बेशर्म समर्पण का प्रतीक है

85 साल के वरवर राव ने पिछले साल अक्टूबर में जब कोर्ट से यह मांग की कि उन्हें दांत की सर्जरी के लिए उनके गृह शहर हैदराबाद जाने दिया जाए तो कोर्ट ने बेशर्मी से इंकार कर दिया। 2018 में गिरफ्तारी के बाद ढाई साल तलोजा जेल में बिताने के बाद जब वरवर राव को मेडिकल बेल दी गयी तो उन पर यह पाबन्दी लगा दी गयी कि वे मुंबई छोड़ कर कहीं नहीं जा सकते। लगभग यही पाबंदी कुख्यात भीमाकोरेगांव केस में सालो साल जेल में रहने के बाद जमानत पर बाहर आये सभी लोगों पर है।  

लेकिन 24 सितम्बर को कुख्यात UAPA केस में इसी साल 13 मार्च को गिरफ्तार एक अमेरिकी नागरिक मैथ्यू वान डाइक [Mathew Van Dyke] और 6 उक्रेनियन नागरिकों को दिल्ली कोर्ट ने घर जाने यानी क्रमशः अमेरिका और उक्रेन जाने की इजाजत दे दी। जाहिर है, इससे पहले उन पर आश्चर्यजनक तरीके से UAPA हटा लिया गया और ‘एनआईए’ [NIA] ने समय पर चार्जशीट न पेश कर उन्हें डिफ़ॉल्ट जमानत मिल जाने दिया। 

एफआईआर [FIR] में इनके खिलाफ जो आरोप लगाया गया है वह बहुत ही संगीन है। ये सभी बिना किसी कानूनी-दस्तावेज के भारत में घुसे और फिर उत्तर-पूर्व के मिलिटैंट्स के सहयोग से पड़ोसी देश म्यांमार में सैन्य शासन के खिलाफ लड़ रहे विद्रोहियों को ड्रोन समेत अन्य घातक हथियार उपलब्ध कराये और उन्हें ट्रेनिंग भी दी। कुछ समय पहले ही उत्तर-पूर्व के मिलिटैंट्स के पास ‘स्टारलिंक’ के डिवाइस मिले थे, जो भारत में पूरी तरह प्रतिबंधित है। 

दिलचस्प बात यह है कि भारत में गिरफ्तारी से कुछ ही दिन पहले मैथ्यू वान डाइक ने लीबिया के ‘लिबरेशन’ के 15 साल पूरा होने के उपलक्ष्य में अपने एक्स हैंडल पर लिखा कि मैं इस वक़्त एक और सीक्रेट मिशन पर हूँ, लेकिन सुरक्षा कारणों से अपना लोकेशन नहीं बता सकता। लेकिन अब तो यह साफ़ हो गया कि उस वक़्त वह भारत-म्यांमार सीमा क्षेत्र में ही अपने 6 उक्रेनी सहयोगियों के साथ आतंकवादी गतिविधियों में लीन था। मैथ्यू वान डाइक पहले भी लीबिया, उक्रेन, मध्य-पूर्व व अन्य जगहों में अमेरिका प्रायोजित आतंकवादी गतिविधियों का हिस्सेदार रहा है। 

यह बहुत ही संगीन और देश की सुरक्षा से जुड़ा मसला है लेकिन फिर भी मोदी सरकार की मेहरबानी से गिरफ्तारी के महज 7 माह के अंदर वे अपने घर क्रमशः अमेरिका और उक्रेन पहुच गए। 

यह इस बात का सबूत है कि कोर्ट और सुरक्षा एजेंसियां किस तरह से सरकार के सीधे दबाव में काम करती हैं। लेकिन इससे भी बड़ी बात यह है कि मोदी सरकार किस कदर अमेरिका के दबाव में काम कर रही है। या यों कहें कि अमेरिका के चरणों में लोट गयी है। 

आपको याद होगा कि पिछले दिनों अमेरिका ने किस तरह से हाथों और पैरों में बेड़िया डालकर बेहद आमानवीय तरीके से भारतीयों को वापस भारत भेजा था और हम इतने संगीन आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त अमेरिकी और उक्रेनी अपराधियों को ससम्मान घर भेज रहे हैं। ‘द वायर’ ने अपनी एक रिपोर्ट में यह जानकारी दी है कि भारत में अमेरिकी दूत सर्गियो गोर [Segio Gor] ने मैथ्यू वान डाइक की स्थिति के बारे में अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो और भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिसरी से बात की थी। इसी से आप इस मामले में अमेरिका के ‘डीप स्टेट’ की भूमिका का अंदाजा लगा सकते हैं।  

‘न्यूज़ 18’ की एक रिपोर्ट के अनुसार मैथ्यू वान डाइक और 6 उक्रेनी नागरिकों की म्यांमार-भारत सीमा पर गतिविधियों की जानकारी भारत की सुरक्षा एजेंसियों को रूस की सुरक्षा एजेंसी ने उपलब्ध करायी। इसमें भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसियों की नाकामी का भी पता चलता है।

अब इसके आगे का विश्लेषण करना कोई मुश्किल काम नहीं है। इस सूचना के आधार पर जब एनआईए ने इन्हें गिरफ्तार किया तो पता चला कि ये लोग सीआईए के निर्देश पर काम कर रहे हैं। और फिर अमेरिकी दबाव में इन्हें रिहा करना ही था। 

इससे एक और गंभीर बात का खुलासा होता है कि अमेरिका बिना भारत को या भारत की सुरक्षा एजेंसियों को विश्वास में लिए भारत की धरती से आतंकवादी कार्यवाही कर रहा है। इसका मतलब अमेरिका को भारत की रत्ती भर परवाह नहीं है। निश्चित रूप से यह मोदी की बेशर्म अमेरिका परस्त नीतियों के कारण ही है। 

हम जानते हैं कि म्यांमार में सैनिक शासन को चीन भरपूर मदद कर रहा है और अमेरिका सैन्य शासन के खिलाफ हथियारबंद विद्रोहियों की मदद कर रहा है। वान डाइक और 6 उक्रेनी नागरिक अमेरिका की इसी परियोजना का हिस्सा थे। लेकिन खतरनाक बात यह है कि  इसमें भारत की उस जमीन का इस्तेमाल किया जा रहा है जो पिछले 3 साल से जातीय हिंसा में धधक रहा है। चीन से भारत के रिश्ते बेहद ख़राब दौर में हैं। ऐसे में इस तरह की घटनाएँ भारत-चीन संबंधों को और भी ज्यादा खतरनाक स्तर पर ले जा सकती हैं। युद्ध की स्थिति भी पैदा हो सकती है। मोदी की गलत विदेश नीति के कारण हम पहले ही अमेरिका की चीन को घेरने की रणनीति का हिस्सा बन चुके हैं, और इसके एवज में चीन सहित सभी पड़ोसियों से अपने रिश्ते खराब कर चुके है।  

हमें यह बात नहीं भूलना चाहिए कि अफगानिस्तान को अस्थिर करने में अमेरिका ने किस तरह पाकिस्तान की जमीन का इस्तेमाल किया और उसके बाद पाकिस्तान का क्या हाल हुआ। हमें 2023 का वह वायरल विडियो शायद याद हो जहाँ एक अमेरिकी भूतपूर्व सैनिक ‘डैनियल स्टीफन कॉर्टनी’ [Daniel Stephan Courtney] मणिपुर में कुकी विद्रोहियों को बुलेट प्रूफ जैकेट और ड्रोन वितरित कर रहा था।

दरअसल वान डाइक और 6 उक्रेनी नागरिकों का यह केस कोई सामान्य केस नहीं है, यह भारत की अनेक विफलताओं का प्रतीक है। या यूं कहे कि भारत के अमेरिका का ‘सैटेलाइट’ बन जाने का प्रतीक है। 

हमें यह याद रखना चाहिए कि हेनरी किसिंजर [Henry Kissinger] ने कभी कहा था कि अमेरिका का दुश्मन होना खतरनाक है, लेकिन दोस्त होना तो जानलेवा है।  

(मनीष आजाद लेखक और एक्टविस्ट हैं।)

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