मुल्क में महात्मा गाँधी एक अदद लीडर हैं, जिन पर कई फ़िल्में और डॉक्यूमेंट्री बनी हैं। इसके अलावा कई फ़िल्में और डॉक्यूमेंट्री ऐसी भी हैं, जिनमें भले ही वे प्रत्यक्ष तौर पर मौजूद नहीं हैं, लेकिन उनके विचारों की अक्कासी इनमें ज़रूर दिखाई देती है। कभी गीतों के माध्यम से, तो कभी विचार के स्तर पर। और यह तब है, जब महात्मा गाँधी ख़ुद सिनेमा को पसंद नहीं करते थे। वे सिनेमा की तुलना शराब, जुआ और सट्टा जैसी बुराइयों से करते थे। इसे नौजवानों को पथभ्रष्ट करने वाला माध्यम मानते थे। उनकी नज़र में ‘सिनेमा से पैसे की बर्बादी के साथ-साथ संस्कृति भी बर्बाद होती है।’
सिनेमा के प्रति गाँधी जी इतने असहिष्णु थे कि एक जनसभा में उन्होंने यहाँ तक कहा था कि ‘‘..मेरा वश चले, तो सारे हिन्दुस्तान से सिनेमा थियेटर के स्थान पर कताई थियेटर की स्थापना कर दूँ।’’ बहरहाल, महात्मा गाँधी का सिनेमा से क्या रिश्ता था, उन्होंने सिनेमा को कितना प्रभावित किया, फ़िल्म निर्देशक महात्मा गाँधी और उनके ख़यालात से कितने मुतास्सिर थे? और वे कौन-सी फ़िल्में और डॉक्यूमेंट्री हैं, जो गाँधी पर केन्द्रित हैं? इन सब सवालों के जवाब लेखक-पत्रकार इक़बाल रिज़वी की किताब ‘महात्मा गाँधी और सिने संसार’ में एक साथ मिलते हैं।
लेखक ने बड़े ही जतन और गहन रिसर्च के बाद इस अहम किताब को तैयार किया है। किताब आठ दिलचस्प अध्यायों ‘चलती फिरती तस्वीरें’, ‘सिनेमा से असहमति’, ‘तस्वीरें बोलने लगीं’, ‘सिनेमा को आशीर्वाद दीजिए महात्मा जी’, ‘सिनेमा पर महात्मा गाँधी का प्रभाव’ ‘पर्दे पर बार-बार गाँधी’, ‘सिनेमा और काँग्रेस’, ‘कितनी फ़िल्में कितने गाँधी’ में बंटी हुई है। लेखक ने इसमें शब्दाडंबर से बचते हुए कम लफ़्ज़ों में बड़े ही सुलझे अंदाज़ में अपनी बात की है।
‘चलती फिरती तस्वीरें’ अध्याय में लेखक ने भारतीय सिनेमा के आग़ाज़ से लेकर देश में फ़िल्म उद्योग की किस तरह से बुनियाद पड़ी? का मुख़्तसर में ब्यौरा दिया है। किताब के दूसरे अध्याय में वे महात्मा गाँधी की सिनेमा से क्यों असहमति थी और वे इसे क्यों नापसंद करते थे? इसका उन्होंने विस्तार से वर्णन किया है। यही नहीं वे पाठकों को इस तथ्य से भी अवगत कराते हैं कि गाँधी जी को मनोरंजन से कोई बैर नहीं था। वे भारतीय लोक जीवन में प्रचलित मनोरंजन की बहुतेरी शैलियों को पसंद करते थे। संगीत में भी उनकी गहरी दिलचस्पी थी। उन्होंने अपने बचपन में नाटक ‘हरिश्चंद्र’ को कई मर्तबा देखा था।
गाँधी जी मनोरंजन को ज़रूरी मानते थे, लेकिन ऐसा मनोरंजन जो मनुष्य को ऊपर उठाए, उसकी रुचियों को परिष्कृत करे। सिनेमा के प्रति नकारात्मक राय महात्मा गाँधी अकेले की ही नहीं थी, महान उपन्यासकार प्रेमचंद का भी यह मानना था कि ‘‘सिनेमा के माध्यम से पश्चिम की सारी बेहूदगी हमारे अंदर दाख़िल की जा रही है।’’ ‘सिनेमा को आशीर्वाद दीजिए महात्मा जी’ अध्याय में लेखक ने न सिर्फ़ फ़िल्मकार और स्क्रिप्ट राइटर ख़्वाजा अहमद अब्बास का वह ऐतिहासिक पत्र पूरा दिया है, जो उन्होंने बापू के नाम लिखा था, बल्कि प्रेमचंद की सिनेमा के बारे में क्या राय थी? इसका भी तफ़सील से ब्यौरा दिया है।
जर्नलिज्म और लिटरेचर के अलावा अब्बास की फ़िल्मों और ड्रामों से भी गहरी वाबस्तगी थी। वे वह शख़्स थे, जिन्होंने सिनेमा की ताक़त को शुरू में ही पहचान लिया था। सिनेमा के बारे में महात्मा गाँधी की नकारात्मक राय को वे बर्दाश्त नहीं कर सके और उन्होंने बापू के नाम अक्टूबर 1939 में ‘फ़िल्म इंडिया’ पत्रिका में एक खुला ख़त लिखा, जिसमें उन्होंने तमाम दलीलों के साथ गाँधी जी को बताने की कोशिश की कि सिनेमा का यदि बेहतरी से इस्तेमाल किया जाए, तो ये दुनिया के लिए बेहतरीन औज़ार साबित हो सकता है।
अब्बास ने कई उदाहरण देकर यह साबित किया कि विदेशों में फ़िल्मों के ज़रिए सामाजिक और शैक्षणिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके लिए उन्होंने कुछ विदेशी ‘लाइफ ऑफ लुइस पास्टर’, ‘लाइफ ऑफ ऐमिल जोला’, ‘लॉस्ट होरिजोन’, ‘जुआरेज’ और कुछ भारतीय फ़िल्मों ‘संत तुकाराम’, ‘विद्यापति’, ‘जन्मभूमि’ आदि का भी ज़िक्र किया।
अब्बास ने अपना यह ख़त इस बात के साथ ख़त्म किया है-‘‘आप महान हैं बापू। आपके मन में पूर्वाग्रहों के लिए कोई जगह नहीं है। सिनेमा जैसा अनुपयोगी दिखता है, वैसा नहीं है। आप सिनेमा में थोड़ी-सी दिलचस्पी लें और मुस्कराहट के साथ उसे आशीर्वाद दें।’’(पेज—44) ख़्वाजा अहमद अब्बास के इस पत्र के बाद देश में उस वक़्त सिनेमा के उपयोग और दुरुपयोग को लेकर काफ़ी चर्चा हुई। लेकिन महात्मा गाँधी और प्रेमचंद की राय बिल्कुल नहीं बदली।
प्रेमचंद का कहना था, ‘‘साइंस एक रहमत है, मगर मूर्खों के हाथों में पड़ कर लानत हो रही है। जिन हाथों में फ़िल्म की क़िस्मत है, वो बदक़िस्मती से इसे इंडस्ट्री समझ बैठे हैं। समाज में सुधार के बजाए शोषण कर रहे हैं।’’ अलबत्ता प्रेमचंद, गाँधी जी के विचारों से जुदा सिनेमा को प्रभावशाली कला माध्यम मानते थे, लेकिन वे फ़िल्मकारों के काम करने के तौर-तरीक़ों से नाख़ुश थे। प्रेमचंद ने फ़िल्मों के लिए लेखन भी किया। उनकी कुछ प्रसिद्ध कहानियों और पटकथा पर फ़िल्में बनीं। लेकिन एक साल के अंदर वे बम्बई से वापस बनारस लौट गए।
इस अध्याय में लेखक ने जहाँ सिनेमा को लेकर भारत में उस वक़्त चल रही बहस को सामने लाने की कोशिश की है, तो वहीं उन्होंने यह भी बताया है कि रूस, इटली, फ्रांस, इंगलैंड, जर्मनी और अमेरिका में सिनेमा को लेकर नये-नये प्रयोग हो रहे थे। रूस में लेनिन ने सिनेमा को लेकर मज़बूत नीति बनाई, तो इटली में नवयथार्थवादी सिनेमा की इब्तिदा हो गई थी।
एक तरफ़ सिनेमा से महात्मा गाँधी की नाइत्तिफ़ाक़ी थी, तो दूसरी ओर हिन्दी सिनेमा गाँधी और उनके विचारों से प्रेरित होकर लगातार फ़िल्में बना रहा था। ‘सिनेमा पर महात्मा गाँधी का प्रभाव’ अध्याय में लेखक ने उन हिन्दी फ़िल्मों मसलन ‘भक्त विदुर’ (साल 1921), ‘बॉम्बे’ या ‘ख़ुदा का बंदा’, ‘चरखा’ (साल 1925), ‘राजबा उर्फ़ हिन्दुस्तान की बेटी’ (साल 1928), ‘यंग इंडिया’, ‘राम रहीम’ या ‘बसंत बंगाली’ (साल 1929), ‘फादर इंडिया उर्फ़ हमारू हिन्दुस्तान’ (साल 1930), रैथ उर्फ़ क्रोध’ या ‘ख़ुदा की शान’, ‘ब्रांडी की बोतल’, ‘चंद्रसेन’ (साल 1939), ‘अछूत’, ‘महात्मा’, ‘पड़ोसी’ (साल 1940), ‘अपना घर’ (साल 1941), ‘हिन्द का लाल’, ‘हिन्दोस्ताँ हमारा’, ‘लहरी जवान’, ‘सोने की चिड़िया’, ‘जागृति’, ‘दो आँखें बारह हाथ’ का तफ़सील से ज़िक्र किया है, जिनमें गाँधी जी और उनकी अहिंसावादी विचारधारा को अहमियत के साथ दिखाया गया था।
इसी अध्याय में उन गीतों का भी ज़िक्र है, जिनमें महात्मा गाँधी के चरखा चलाओ आंदोलन और स्वदेशी के विचार को आगे बढ़ाया था। इस अध्याय में वर्णित कई जानकारियाँ चकित करती हैं।
‘पर्दे पर बार-बार गाँधी’ अध्याय बताता है कि साल 1921 में एक न्यूज रील के माध्यम से महात्मा गाँधी पहली बार पर्दे पर आये। इसके बाद यह सिलसिला शुरू हो गया। स्वतंत्रता आंदोलन में गाँधी जी के योगदान को लेकर फ़िल्मकार छोटी-बड़ी डॉक्यूमेंट्री बनाते रहे। लेखक का शोध कहता है कि ‘‘1935 से पहले सात ऐसी डॉक्यूमेंट्री फ़िल्मों को सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया, जो गाँधी जी को केन्द्र में रख कर बनायी गयी थीं।’’(पेज-62)
किताब में इन फ़िल्मों के बारे में तो विस्तार से बात की ही गई है, साथ ही उन डॉक्यूमेंट्री, न्यूज रील आदि का भी ज़िक्र है, जो बाद में महात्मा गाँधी को केन्द्र में रखकर बनायी गयीं। इन डॉक्यूमेंट्री का नाम अगर जानें, तो यह थीं-‘टॉपिकल ऑफ महात्मा गाँधी एंड अदर्स’, ‘महात्मा गाँधी रिटर्न फ्रॉम लंदन’, ‘महात्मा गाँधी रिटर्न फ्रॉम दि पिलिग्रिमेज ऑफ पीस’, ‘बॉम्बे वेलकम्स महात्मा गाँधी’, ‘महात्मा गाँधीज मार्च फॉर फ्रीडम’, ‘महात्मा गाँधी हिस्टॉरिक मार्च’, ‘महात्मा गाँधी स्पीक इन पब्लिक मीटिंग’, ‘महात्मा गाँधी मार्च एन अहमदाबाद’, ‘महात्मा गाँधी फ्रॉम द राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस’, ‘महात्मा गाँधी आफ्टर हिज रिलीज’, ‘महात्मा गाँधी आफ्टर टूर’, ‘एपिक मेकिंग वॉयस ऑफ महात्मा’ आदि।
इस अध्याय में हमें और भी कई दुर्लभ जानकारियाँ मिलती हैं। जैसे फ़िल्मकार ए. चेट्टियार की 81 मिनट की डॉक्यूमेंट्री ‘बीसवीं सदी का पैगम्बर महात्मा गाँधी’ गाँधी जी पर बनी पहली आधिकारिक डॉक्यूमेंट्री थी, जिसे बाक़ायदा सेंसर बोर्ड का प्रमाण-पत्र मिला था। एक तरफ़ महात्मा गाँधी फ़िल्मों को नापसंद करते थे, तो दूसरी ओर ‘नरसी भगत’ वह फ़िल्म थी, जिसे निर्देशक विजय भट्ट ने गाँधी जी के कहने पर बनाया था। और इस फ़िल्म में उनका पसंदीदा भजन ‘वैष्णव जन तो तैने कहिए जे पीर पराई जाणे रे’ भी शामिल किया गया था।
अफ़सोस अपनी तमाम मसरूफ़ियात के चलते महात्मा गाँधी यह फ़िल्म कभी नहीं देख सके। लेकिन उन्होंने अपनी ज़िंदगी में एक मात्र हिन्दी फ़िल्म जो देखी, वह विजय भट्ट की ही फ़िल्म ‘रामराज्य’ थी। किताब में यह सारे प्रसंग विस्तार से दिये गये हैं। किताब में इसके अलावा महात्मा गाँधी से चार्ली चैप्लिन की मुलाक़ात का भी पूरा ब्यौरा दिया हुआ है, तो वहीं लेखक का मानना है कि चार्ली चैप्लिन ने अपनी मशहूर फ़िल्म ‘मॉडर्न टाइम्स’ और ‘द ग्रेट डिक्टेटर’ में गाँधी जी की विचारधारा को ही दर्शाया है।
किताब के आख़िरी अध्याय ‘कितनी फ़िल्में कितने गाँधी’ में लेखक ने उन फीचर फ़िल्मों के बारे में विस्तार से लिखा है, जो महात्मा गाँधी को केन्द्र में रखकर बनायी गयीं। इस अध्याय से पता चलता है कि गाँधी जी पर पहली फ़िल्म ‘नाइन ऑवर्स टू रामा’ थी, जो अमेरिका में 1963 में बनी थी। रिचर्ड एटनबरो की विश्वप्रसिद्ध फ़िल्म ‘गाँधी’ का निर्माण किस तरह से परवान चढ़ा, किताब में इसका भी विस्तार से वर्णन है। यह जानना बड़ा दिलचस्प लगता है कि रिचर्ड एटनबरो के इस प्रोजेक्ट से भारत के अंतिम वायसराय लार्ड माउंटबेटन और देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू भी बेहद उत्साहित थे।
नेहरू के आकस्मिक निधन के बाद यह प्रोजेक्ट लटक गया, लेकिन दो दशक बाद एटनबरो का सपना साकार हुआ। कुल मिलाकर किताब ‘महात्मा गाँधी और सिने संसार’ अपने शीर्षक को पूरी तरह से चरितार्थ करती है। जिस तरह का अनूठा विषय है, लेखक इक़बाल रिज़वी ने उतने ही बेहतरीन तरीक़े से इसे पेश किया है। ग्लेज्ड पेपर में रंगीन तस्वीरों से सजी यह किताब पहली ही नज़र में पाठकों को अपनी ओर आकर्षित करती है। और ‘इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र’ ने इसे बड़े ही ख़ूबसूरत ढंग से प्रकाशित किया है।
किताब की ख़ामियों पर अगर बात करें, तो कहीं-कहीं वर्तनी की त्रुटियाँ पढ़ने का मज़ा ख़राब करती हैं। चैप्लिन-चौप्लिन और प्रेमचंद-प्रेमचन्द्र हो गये हैं। यही नहीं कई जगह कोमा और फुल स्टॉप भी नदारद हैं। हाँ, अगर किताब में नुक्तों का भी ख़याल रखा होता, तो वह भी अच्छा होता। इक़बाल रिज़वी ‘इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र’ से जुड़े हुए हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि किताब में उनका बायोडाटा भी न हो। अगर उनका बायोडाटा होता, तो संस्थान को क्या परेशानी पेश आती?
किताब : महात्मा गाँधी और सिने संसार
लेखक : इक़बाल रिज़वी
प्रकाशक : इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र नई दिल्ली,
मूल्य : 220 रुपए
पेज : 110