क्या संघी-भाजपाई लोगों की नियुक्ति के लिए सहायक प्रोफेसरों की भर्ती में पीएचडी की अनिवार्यता खत्म की गई?

Estimated read time 1 min read

नई दिल्ली। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में सहायक प्रोफेसर पद के लिए पीएचडी की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया है। अब आवेदन करने वाले को सिर्फ नेट/सेट उत्तीर्ण करना अनिवार्य होगा। यूजीसी के सचिव प्रो. मनीष जोशी ने कहा कि 2021 में सहायक प्रोफेसर की भर्ती के लिए पीएचडी की डिग्री अनिवार्य की गई थी। लेकिन अब यह देखने को मिल रहा है कि इससे शोध के स्तर में गिरावट आ रही है। इसलिए पीएचडी की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया गया। लेकिन यह पूरा सच नहीं है। दरअसल, मोदी सरकार अपने शेष कार्यकाल में ज्यादा से ज्यादा संघ की विचारधारा के लोगों को नियुक्त कराना चाहती है।

मोदी सरकार केंद्रीय विश्वविद्यालयों और जिन राज्यों में बीजेपी की सरकारें हैं, वहां के राज्य विश्वविद्यालयों में संघ-भाजपा के संगठनों से जुड़े युवाओं को प्राथमिकता के स्तर पर नियुक्त कर रही है। कहा जा रहा है कि इस समय सहायक प्रोफेसर के लिए होने वाले साक्षात्कार महज औपचारिकता है। संघ के पदाधिकारियों के यहां से जो नाम जाते हैं, उसी को चयन समिति नियुक्त करती है। फिलहाल देश भर के विश्वविद्यालयों में संघ समर्थकों के नियुक्ति का सिलसिला चल रहा है लेकिन अभी भी सभी सीटों पर नियुक्ति नहीं हो सकी है। ऐसे में मानक को कम करके ज्यादा से ज्यादा अपने लोगों को भर्ती करने का खेल रचा गया है।

दरअसल, पिछले कुछ महीनों में देश की राजनीति में कई बदलाव देखे गए। इस बदलाव के बाद मोदी और संघ-भाजपा को यह आशंका है कि उनकी सरकार नहीं भी बन सकती, ऐसे में केंद्रीय विश्वविद्यालयों में रिक्त पड़े पदों पर भर्ती के लिए यह कदम उठाया गया है।

केंद्र ने विश्वविद्यालयों में सहायक प्रोफेसर के पद के लिए आवेदन करने के लिए पीएचडी की आवश्यकता को खत्म कर दिया है। विश्वविद्यालय और कॉलेज भी समय-समय पर यूजीसी द्वारा निर्धारित किये गये न्यूनतम योग्यता आवश्यकताओं की पूर्ति के आधार पर ही सहायक प्रोफेसरों की भर्ती करता रहा है।

2018 के नियमों से पहले, यूजीसी द्वारा आयोजित राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (एनईटी), या राज्य पात्रता परीक्षा (एसईटी), जिसे कुछ राज्यों में राज्य स्तरीय पात्रता परीक्षा (एसएलईटी) कहते हैं जो राज्य द्वारा आयोजित होता था। वहां योग्यता प्राप्त करने वाले उम्मीदवार कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में सहायक प्रोफेसर के पद के लिए आवेदन करने के पात्र होते थे। पीएचडी डिग्री वालों को एनईटी /एसईटी /एसएलईटी जैसी आवश्यक परीक्षाओं से छूट दी गई थी।

यूजीसी ने अपने 2018 के नियमों में, विश्वविद्यालयों में सहायक प्रोफेसर के पद के लिए आवेदन करने के लिए पीएचडी डिग्री को अनिवार्य करने का प्रावधान पेश किया था। हालांकि, कॉलेजों में सहायक प्रोफेसर के पदों पर आवेदन के लिए एनईटी /एसईटी /एसएलईटी के माध्यम से प्रवेश का प्रावधान अपरिवर्तित रखा गया था।

मंगलवार को यूजीसी ने एक संशोधित विनियमन पेश किया, जिसमें विश्वविद्यालयों में सहायक प्रोफेसर की नौकरियों के लिए अनिवार्य पीएचडी डिग्री के प्रावधान को रद्द कर दिया गया है।

नये प्रावधान के अनुसार “सभी उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए सहायक प्रोफेसर के पद पर सीधी भर्ती के लिए एनईटी /एसईटी /एसएलईटी न्यूनतम मानदंड होगा।”

दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) की कार्यकारी परिषद के पूर्व सदस्य आभा देव हबीब और राजेश झा ने कहा कि “प्रस्तावित प्रावधान पर शिक्षण समुदायों के साथ कभी चर्चा नहीं की गई।”

हबीब ने कहा कि “डीयू शिक्षक संघ ने हमेशा विश्वविद्यालयों में सहायक प्रोफेसरों की बहाली के लिए पीएचडी की आवश्यकता अधिनियम का विरोध किया है। इस तरह की आवश्यकता हाशिए पर रहने वाले वर्ग के उम्मीदवारों की नियुक्ति को प्रभावित करती है क्योंकि उनमें से अधिकांश के पास पीएचडी करने के संसाधन नहीं होते हैं।”

उन्होंने कहा कि न्यूनतम योग्यता इतनी कठोर नहीं होनी चाहिए क्योंकि अंतिम चयन संबंधित संस्थानों में विषय विशेषज्ञों द्वारा किया जाना है।

+ There are no comments

Add yours

You May Also Like

More From Author