एआई बनाम आंखों का इंटेलिजेंस : बनारस के मणिकर्णिका पर टूटी मूर्तियां, प्रशासन की स्वीकारोक्ति से कटघरे में योगी का दावा!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र बनारस के मणिकर्णिका घाट का मामला अब साफ तौर पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता बनाम आंखों की लड़ाई बन गई है। जिस तस्वीर को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता से बनाई गई बताकर खारिज करने की कोशिश की थी, उसी मामले में सच ने सत्ता के दावों को कटघरे में खड़ा कर दिया है।

देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्र इंडियन एक्सप्रेस ने इस मुद्दे पर पहले पन्ने पर विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की है। यह रिपोर्ट केवल तस्वीरों या दृश्यों की नहीं, बल्कि सत्ता के दावे, प्रशासन की स्वीकारोक्ति और गढ़े गए कथानक के बिखरने की कहानी है।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में वाराणसी के दो शीर्ष प्रशासनिक अधिकारियों-जिलाधिकारी और अपर जिलाधिकारी के बयान दर्ज हैं। वाराणसी के अपर जिलाधिकारी आलोक कुमार ने समाचार पत्र से बातचीत में स्पष्ट स्वीकार किया कि “पुनर्निर्माण के दौरान एक मूर्ति टूटी है। हम जांच कर रहे हैं कि वह किसकी है।” यह स्वीकारोक्ति अपने आप में बहुत कुछ कह जाती है। जब सत्ता यह कह रही थी कि कुछ टूटा ही नहीं तो फिर जांच किस बात की हो रही है?

जिलाधिकारी सत्येंद्र कुमार ने इस सच्चाई को माना कि मणिकर्णिका घाट की मणि या चबूतरे पर कुछ मूर्तियां उकेरी गई थीं जो वास्तव में क्षतिग्रस्त हुई हैं। यानी प्रशासनिक स्तर पर यह स्वीकार कर लिया गया है कि नुकसान हुआ है। मूर्तियां टूटी हैं और यह कोई कल्पना या कृत्रिम बुद्धिमत्ता की करतूत नहीं है। जिलाधिकारी के बयान मुख्यमंत्री की कृत्रिम बुद्धिमत्ता वाली थ्योरी को पूरी तरह धराशायी कर देते हैं।

17 जनवरी को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ वाराणसी पहुंचे और मणिकर्णिका घाट पर चल रहे कार्यों का मौके पर जाकर निरीक्षण किया। इसके बाद सरकार की ओर से दावा किया गया कि सोशल मीडिया पर वायरल हो रही तस्वीरें और वीडियो वास्तविक नहीं हैं, बल्कि उन्हें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से तैयार किया गया है।

सरकारी बयान के बाद वाराणसी पुलिस हरकत में आई और मणिकर्णिका घाट के सुंदरीकरण को लेकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर झूठी और भ्रामक तस्वीरें फैलाने के मामले में कड़ी कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी। पुलिस ने इस मामले में चौक थाने में आठ लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है।

पुलिस का कहना है कि कुछ असामाजिक तत्वों ने मणिकर्णिका घाट पर चल रहे विकास, सुंदरीकरण और श्रद्धालुओं की सुविधाओं से जुड़े कार्यों को गलत तरीके से पेश किया। सोशल मीडिया पर ऐसी मनगढ़ंत तस्वीरें और सामग्री साझा की गईं जिनमें हिंदू देवी-देवताओं से जुड़े फर्जी चित्र दिखाए गए। पुलिस के अनुसार, इससे हिंदू धर्म को मानने वाले लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत हुईं और समाज में आक्रोश व तनाव फैलाने की कोशिश की गई।

इस मामले में तमिलनाडु के रामनाथपुरम जिले के निवासी मानो पुत्र पचमल ने चौक थाने में लिखित शिकायत दर्ज कराई है। शिकायतकर्ता के अनुसार उनकी कंपनी 15 नवंबर से मणिकर्णिका घाट पर श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए सुंदरीकरण और बुनियादी ढांचे के सुदृढ़ीकरण का कार्य कर रही है।

शिकायत में यह भी कहा गया है कि 16 जनवरी की रात करीब 10 बजकर 02 मिनट पर सोशल मीडिया पर सक्रिय अशुतोष पोटनिस नामक व्यक्ति ने एक्स पर घाट से संबंधित एआई से बनाई गई भ्रामक और झूठी तस्वीरें पोस्ट कीं जो वास्तविक तथ्यों से बिल्कुल अलग थीं। इन पोस्टों के जरिए लोगों को गुमराह करने और धार्मिक भावनाएं भड़काने का प्रयास किया गया।

बनारस के कमिश्नरेट पुलिस का दावा है कि सोशल मीडिया पर सरकार की तुलना विदेशी आक्रांता औरंगज़ेब से किए जाने वाले पोस्ट भी सामने आए, जिससे सरकार में आस्था रखने वाले नागरिकों में नाराज़गी बढ़ी और सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुंचा। इसके बाद सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक और भड़काऊ टिप्पणियों की संख्या तेजी से बढ़ गई।

पुलिस के मुताबिक, इन पोस्टों, रीपोस्ट और टिप्पणियों के चलते समाज में भ्रम और आक्रोश की स्थिति बनी जिससे कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका पैदा हो गई थी।

मणिकर्णिका घाट से जुड़े विवाद में अब कानूनी कार्रवाई भी शुरू हो गई है। इस मामले में संजय सिंह, पप्पू यादव, रितु राठौर, संदीप देव, जसविंदर कौर, मनीष सिंह और आशुतोष सहित कई अन्य लोगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई गई है। प्रशासन का कहना है कि मणिकर्णिका घाट प्रकरण से जुड़े घटनाक्रम और उससे फैली परिस्थितियों के संबंध में यह रपट दर्ज की गई है।

मामले की जांच जारी है और आगे की कार्रवाई जांच के निष्कर्षों के आधार पर की जाएगी।

चौक थाना पुलिस का दावा है कि शिकायतकर्ता ने पुलिस को भ्रामक पोस्टों से जुड़े तस्वीरों के प्रमाण और डिजिटल साक्ष्य भी सौंपे हैं। इन्हीं साक्ष्यों के आधार पर थाने में मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी गई है। पुलिस का कहना है कि जांच के बाद दोषियों के खिलाफ और सख्त कार्रवाई की जाएगी।

इस बीच वाराणसी पुलिस ने आम नागरिकों से चेतावनी दी है कि किसी भी अपुष्ट, झूठी या भ्रामक जानकारी को न फैलाएं और न ही सोशल मीडिया पर साझा करें। ऐसा करने पर संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कानून के तहत कठोर कार्रवाई की जाएगी।

सवालों के घेरे में अफ़सर

वाराणसी के मणिकर्णिका घाट को लेकर उठा विवाद अब सिर्फ टूट-फूट या निर्माण कार्य तक सीमित नहीं रहा। यह मामला अब सत्ता के बयान और ज़मीनी सच्चाई के बीच टकराव का रूप ले चुका है। सवाल सीधा है। जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सार्वजनिक रूप से यह कह रहे थे कि मणिकर्णिका घाट से जुड़ी तस्वीरें और वीडियो कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) से बनाए गए हैं तो फिर वाराणसी के जिलाधिकारी सत्येंद्र कुमार और अपर जिलाधिकारी आलोक कुमार ने नुकसान होने की बात क्यों मानी? 

क्या जिला प्रशासन को यह जानकारी नहीं दी गई थी कि तस्वीरों को “आभासी” बताया जाना है या फिर अफसरों ने सत्ता के दावों से ज्यादा भरोसा अपनी आंखों से देखी सच्चाई पर किया? यही सवाल अब चर्चा के केंद्र में है।

मणिकर्णिका घाट काशी का सबसे प्राचीन और पवित्र स्थल माना जाता है। यह महाश्मशान है जहां मोक्ष की अवधारणा सदियों से जुड़ी है। ऐसे में यहां किसी भी तरह की क्षति केवल प्रशासनिक मामला नहीं रहती, बल्कि सीधे आस्था और भावनाओं से जुड़ जाती है। यही वजह है कि इस मुद्दे पर जनता की प्रतिक्रिया तेज़ है।

एक तरफ मुख्यमंत्री स्तर से कहा गया कि वायरल हो रही तस्वीरें और दृश्य वास्तविक नहीं हैं, तो दूसरी ओर वाराणसी के शीर्ष प्रशासनिक अधिकारियों के अलावा राज्यमंत्री रविंद्र जायसवाल ने भी स्वीकार किया कि घाट और मूर्तियों को नुकसान पहुंचा है। इन बयानों के बीच का अंतर लोगों को असमंजस में डाल रहा है।

बनारस में शिव बारात समिति के संस्थापक दिलीप सिंह चौक इलाके के उन प्रबुद्ध नागरिकों में गिने जाते हैं जिनकी बात केवल भावनाओं से नहीं, ज़मीनी अनुभव और सामाजिक चेतना से उपजती है। उनका स्पष्ट कहना है कि बनारस का समाज विकास के खिलाफ नहीं है, लेकिन विकास के नाम पर काशी की आत्मा से खिलवाड़ स्वीकार नहीं किया जा सकता। काशी कोई प्रयोगशाला नहीं है और न ही इसकी पहचान किसी एक परियोजना की उपज है।

मणिकर्णिका घाट प्रकरण का जिक्र करते हुए दिलीप सिंह सवालों को और तीखा कर देते हैं।

वह कहते हैं, “या तो वाराणसी के डीएम और एडीएम मुख्यमंत्री योगी की एआई वाली थ्योरी से अनजान थे या फिर उन्होंने सत्ता के बयान से ज़्यादा अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी और ज़मीनी सच्चाई को महत्व दिया। दोनों ही स्थितियां सरकार के लिए असहज करने वाली हैं।” 

दिलीप के अनुसार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता का तर्क अचानक इसलिए सामने आया ताकि वास्तविक क्षति की जिम्मेदारी से बचा जा सके और उभरते जनाक्रोश को तकनीकी बहस में उलझाकर ठंडा किया जा सके। यह एक सोची-समझी रणनीति हो सकती है-तस्वीरों और वीडियो को ‘डिजिटल हेरफेर’ बताकर लोगों की आंखों देखी सच्चाई पर ही सवाल खड़े कर देना। लेकिन जब स्वयं जिला प्रशासन यह स्वीकार कर रहा है कि घाट पर नुकसान हुआ है तो एआई का यह पूरा तर्क अपने ही बोझ से ढह जाता है।

दिलीप सिंह इस पूरे प्रकरण के प्रशासनिक और राजनीतिक निहितार्थों की ओर भी इशारा करते हैं। वह कहते हैं, “मणिकर्णिका घाट मामले में किसी भी बनारसी के खिलाफ एफआईआर नहीं हुई, क्योंकि सरकार इस वक्त बैकफुट पर है।” उ

नका आरोप है कि सीएसआर फंड से मणिकर्णिका घाट के जीर्णोद्धार का काम जिस संस्था को सौंपा गया है, उसका मूल कार्यक्षेत्र गरीब बच्चों की शिक्षा से जुड़ा है, न कि तीर्थों या पूजा स्थलों के संरक्षण से। यह न केवल नियमों की अवहेलना है, बल्कि यह दर्शाता है कि पूरे प्रकरण में मनमानी हावी है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस मनमानी पर कोई सवाल उठाने वाला नहीं है-न राजनीतिक नेतृत्व, न जिम्मेदार संस्थाएं और न ही मुख्यधारा की मीडिया।

दिलीप सिंह इस मामले के सबसे खतरनाक पहलू की ओर इशारा करते हुए कहते हैं कि यह विवाद अब भरोसे के संकट में बदल चुका है। “जब सरकार कहती है कि कुछ हुआ ही नहीं और प्रशासन मानता है कि क्षति हुई है तो आम आदमी किस पर भरोसा करे? मुख्यमंत्री के बयान पर या जिलाधिकारी और अपर जिलाधिकारी की बात पर, जो मौके पर मौजूद हैं और हालात को प्रत्यक्ष देख रहे हैं?” 

वह कहते हैं कि घाट पर हुआ काम और मूर्तियों को पहुंची क्षति केवल तस्वीरों और वीडियो तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन सैकड़ों लोगों की आंखों देखी सच्चाई है जो रोज़ इस घाट से जुड़े हैं।

दिलाप के अनुसार, तकनीकी शब्दावली और डिजिटल दावों के सहारे इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता। “मणिकर्णिका घाट का विवाद अब निर्णायक मोड़ पर है। यह सिर्फ कृत्रिम बुद्धिमत्ता बनाम तकनीक की बहस नहीं रह गई है, बल्कि यह आंखों देखी सच्चाई बनाम आधिकारिक दावों की लड़ाई बन चुकी है।” यही वह बिंदु है, जहां यह मामला केवल घाट या मूर्तियों का नहीं रह जाता, बल्कि लोकतंत्र, जवाबदेही और जनता के भरोसे का सवाल बन जाता है।

मणिकर्णिका घाट पर क्या हुआ?

मणिकर्णिका घाट पर पुनर्विकास कार्य के दौरान जो कुछ हुआ उसकी पहली जानकारी पिछले हफ्ते घाट पर रोज़ मौजूद रहने वाले लोगों को मिली। स्थानीय निवासियों के अनुसार, कुछ दिन पहले अचानक भारी मशीनें घाट की सीढ़ियों की ओर लाई गईं। पहले हाइड्रा और फिर बुलडोज़र को घाट के निचले हिस्से तक आते देखा गया। घाट के पास रहने वाले संजय मिश्रा बताते हैं कि शुरुआत में लोगों को लगा कि सामान्य मरम्मत का काम होगा। जब सदियों पुराने पत्थर उखड़ने लगे और चबूतरे हटाए जाने लगे, तब चिंता बढ़ी।

उनके अनुसार, “जब मलबा हटने लगा, तभी पत्थरों के बीच मूर्तियां दिखीं। कुछ मूर्तियां टूटी हुई थीं। यह हमने अपनी आंखों से देखा।”

इसी दौरान घाट पर मौजूद लोगों ने देखा कि कुछ छोटे मंदिर, शिवलिंग और धार्मिक चिह्न भी हटाए जा रहे हैं। यह दृश्य देखकर कई लोगों ने अपने मोबाइल फोन से वीडियो और तस्वीरें बनानी शुरू कीं। घाट पर काम करने वाले समाजों में से एक, पाल समाज में इस बात की जानकारी सबसे पहले फैली कि देवी अहिल्याबाई होल्कर से जुड़ी प्रतिमाओं को नुकसान पहुंचा है।

13 जनवरी 2026 की दोपहर पाल समाज के अध्यक्ष महेंद्र पाल पिंटू मणिकर्णिका घाट पहुंचे। उन्होंने वहां मौजूद लोगों से बात की और टूटे पत्थरों व मूर्तियों को खुद देखा। उनके साथ मौजूद लोगों के अनुसार, मौके पर उन्होंने कहा कि विकास के नाम पर धरोहरों के साथ यह व्यवहार स्वीकार्य नहीं है। घाट पर मौजूद पुरोहितों और डोम समाज के लोगों ने भी उसी समय यह बात दोहराई कि उन्होंने देवी अहिल्याबाई होल्कर की प्रतिमाओं, छोटे मंदिरों और शिवलिंग को क्षतिग्रस्त अवस्था में देखा है।

उनके अनुसार, यह केवल पत्थरों का हटना नहीं था, बल्कि धार्मिक संरचनाओं को सीधा नुकसान था।

इसी बीच, सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ, जिसे स्थानीय लोग “पगला बाबा का वीडियो” कहकर पहचान रहे हैं। वीडियो में बुलडोज़र से मंदिरों और संरचनाओं को तोड़ते हुए दृश्य दिखाई दिए। इस वीडियो को बनाने वाले प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, यह रिकॉर्डिंग उसी समय की है, जब मशीनें घाट पर काम कर रही थीं। वीडियो फैलते ही घाट पर लोगों की संख्या बढ़ने लगी।

कोई सवाल पूछ रहा था, कोई टूटे पत्थरों को देखकर चुप खड़ा था। कई बुज़ुर्गों ने बताया कि उन्होंने अपने जीवन में पहली बार मणिकर्णिका घाट पर इस तरह की तोड़फोड़ देखी।

कुछ समय बाद, प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, प्रशासनिक अधिकारी और पुलिस बल घाट पर पहुंचे। लोगों को वहां से हटाया गया और मशीनों के आसपास घेरा बना दिया गया। इसके बाद आम लोगों की घाट पर आवाजाही सीमित कर दी गई। घाट से हटाई गई मूर्तियों और संरचनाओं को बाद में गुरुधाम मंदिर परिसर में ले जाया गया। वहां पहुंचे लोगों ने देखा कि कुछ मूर्तियां साबूत हैं, लेकिन कुछ खंडित अवस्था में हैं।

प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि मूर्तियों को कपड़े में लपेटकर रखा जा रहा था और पूरे परिसर में सुरक्षा बढ़ा दी गई थी।

मीडिया को दिए गए बयान के मुताबिक, संजय मिश्रा कहते हैं, “हम पीढ़ियों से जानते हैं कि कौन-सी मणि कहां है और कौन-सी मूर्ति किस कथा से जुड़ी है। जब वही मूर्तियां टूटी हुई दिखीं तो यह सिर्फ निर्माण का मामला नहीं रहा। यह केवल प्रशासनिक कार्रवाई नहीं थी, बल्कि स्मृति, परंपरा और आस्था का टूटना था। मणिकर्णिका घाट पर निर्माण कार्य के दौरान धार्मिक मूर्तियों और संरचनाओं को क्षति पहुंची, जिसे लोगों ने अपनी आंखों से देखा।”

घबरा रही सत्ताबीजेपी विचलित

मणिकर्णिका घाट से जुड़ा विवाद अब धार्मिक या सांस्कृतिक चिंता तक सीमित नहीं रहा। यह मामला खुलकर राजनीतिक टकराव का रूप ले चुका है। घाट पर मूर्तियों को नुकसान पहुंचने के आरोपों के बाद सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की बेचैनी साफ नजर आने लगी है। हालात को संभालने के लिए पार्टी ने बनारस के मंत्रियों और स्थानीय नेताओं को मैदान में उतार दिया है। उन्हें जिम्मेदारी सौंपी गई है कि वे जनता को समझाएं, गुस्से को शांत करें और यह भरोसा दिलाएं कि मंदिरों और मूर्तियों को नहीं तोड़ा गया है।

हालांकि, तमाम कोशिशों के बावजूद लोगों का आक्रोश कम नहीं हो रहा। बनारस के नागरिक सोशल मीडिया पर मणिकर्णिका घाट के पुराने स्वरूप की तस्वीरों को नए प्रस्तावित मॉडल के साथ साझा कर रहे हैं। इन तस्वीरों के जरिए सीधा सवाल उठाया जा रहा है कि काशी को कैसा मणिकर्णिका तीर्थ चाहिए? यह सवाल अब केवल ऑनलाइन चर्चा तक सीमित नहीं है, बल्कि गलियों, घाटों और मंदिरों में आम बातचीत का हिस्सा बन चुका है।

मूर्तियों को नुकसान पहुंचने का मामला जैसे-जैसे तूल पकड़ता जा रहा है, वैसे-वैसे बीजेपी का नेतृत्व असहज और विचलित दिखाई दे रहा है। सत्ता के गलियारों में यह सवाल गूंजने लगा है कि आखिर पार्टी इतनी घबराई हुई क्यों नजर आ रही है? विरोध का दायरा अब स्थानीय स्तर से निकलकर सीधे सत्ता के केंद्र तक पहुंच गया है।

आलोचकों का आरोप है कि बीजेपी के नेता वर्षों से औरंगजेब और मध्यकालीन शासकों के दौर में मंदिरों को तोड़े जाने का हवाला देते रहे हैं। चुनावी भाषणों से लेकर सार्वजनिक मंचों तक यह आरोप दोहराया जाता रहा कि मुस्लिम शासकों ने हिंदू आस्था और संस्कृति को नुकसान पहुंचाया। लेकिन अब जब मौजूदा सरकार के कार्यकाल में बनारस जैसे पवित्र शहर में मंदिरों और मूर्तियों को क्षति पहुंचने की बात सामने आई है तो वही नैतिक मापदंड क्यों बदलते नजर आ रहे हैं? यही सवाल आज बनारस की जनता सत्ता से पूछ रही है।

पत्रकार राजीव मौर्य कहते हैं, “अगर इतिहास में मंदिर तोड़ना अपराध और आस्था पर हमला माना जाता है तो आज कथित तोड़फोड़ को “विकास” या “पुनर्विकास” के नाम पर कैसे सही ठहराया जा सकता है? यह सवाल अब किसी एक राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध का नहीं रह गया है। यह समाज की सामूहिक स्मृति, धार्मिक चेतना और न्यायबोध से जुड़ चुका है। काशी की जनता पूछ रही है कि क्या सत्ता में आते ही नैतिकता के मायने बदल जाते हैं?”

“प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में विकास और कायाकल्प के नाम पर आस्था और धरोहर की सीमाओं को बार-बार लांघा जा रहा है। वहीं समर्थक दावा करते हैं कि काशी का कायाकल्प हो रहा है, सुविधाएं बढ़ रही हैं और शहर को वैश्विक पर्यटन के नक्शे पर स्थापित किया जा रहा है। लेकिन विरोधियों का सवाल सीधा है कि अगर इस प्रक्रिया में काशी की मूल पहचान, उसकी आत्मा और उसकी स्मृति ही मिटा दी गई तो ऐसे विकास का क्या मतलब रह जाएगा? ”

राजीव कहते हैं, ”इसी बिंदु पर सत्ता की घबराहट सबसे ज्यादा स्पष्ट होती है। जैसे ही विरोध की आवाज तेज हुई, असहमति को दबाने की कोशिशें शुरू हो गईं। कहीं मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं तो कहीं धमकियों की बात सामने आ रही है और कहीं भय का माहौल बनाने के आरोप लग रहे हैं। हालांकि, इस बार यह रणनीति उलटी पड़ती दिख रही है। बनारस के लोगों ने संगठित और निर्भीक स्वर में साफ कर दिया है कि वे अब डरने वाले नहीं हैं। यह वही बनारस है जिसे लंबे समय तक “धर्मभीरू और शांत” मानकर सत्ता ने इस धार्मिक नगर को प्रयोग का क्षेत्र समझ लिया था।”

क्या पुनः स्थापित की जा सकेंगी मूर्तियां?

मणिकर्णिका घाट प्रकरण में प्रशासनिक अधिकारियों की ओर से यह कहा गया है कि जिन मूर्तियों को हटाया गया है उन्हें बाद में पुनः स्थापित कर दिया जाएगा। लेकिन इस दावे पर काशी के विद्वानों ने गंभीर आपत्ति दर्ज कराई है। बनारस स्थित संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के मीमांसा विभाग के आचार्य कमलाकांत पांडेय का कहना है कि शास्त्रीय दृष्टि से ऐसी मूर्तियों की दोबारा स्थापना संभव नहीं है। 

उनके अनुसार मणिकर्णिका घाट पर जिन मूर्तियों को बुल्डोजर से उखाड़ा गया है वे अब पूजा और प्रतिष्ठा योग्य नहीं रहीं। सनातन परंपरा में मूर्ति केवल पत्थर या धातु का स्वरूप नहीं होती, बल्कि विधि-विधान से उसमें प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है। यदि किसी मूर्ति को शास्त्र-विरुद्ध तरीके से उखाड़ दिया जाए या वह खंडित हो जाए तो उसका धार्मिक स्वरूप समाप्त हो जाता है और ऐसी मूर्ति को दोबारा स्थापित नहीं किया जा सकता।

आचार्य पांडेय यह भी बताते हैं कि “प्रतिष्ठा प्रकाश”, “प्रतिष्ठा मयूख” और अन्य शास्त्रीय ग्रंथों में मूर्ति-स्थापना, उद्धार और जीर्णोद्धार के स्पष्ट नियम दिए गए हैं। इन ग्रंथों के अनुसार खंडित या बलपूर्वक निकाली गई मूर्ति को पुनः प्राण-प्रतिष्ठा के माध्यम से देवालय में स्थापित करने का कोई विधान नहीं है। शास्त्र इस बात को स्पष्ट रूप से निषिद्ध मानते हैं। शास्त्रीय परंपरा के अनुसार केवल वही मूर्ति विधिवत प्रतिष्ठित की जा सकती है जो परंपरा के अनुरूप निकाली गई हो, अखंड अवस्था में हो और नियमानुसार स्थापित की गई हो। विदेश से लाई गई या खंडित अवस्था वाली मूर्ति को देवालय में रखना भी शास्त्र-सम्मत नहीं है।

विश्वनाथ मंदिर परिसर में एक पंक्ति में रखी गई मूर्तियों को लेकर भी आचार्य पांडेय ने सवाल उठाए हैं। उनके अनुसार, मूर्तियों को बिना मंत्र, बिना शास्त्रीय विधान और बलपूर्वक उखाड़कर कहीं रख देना सनातन परंपरा के विरुद्ध है। यदि इन मूर्तियों को हटाना ही था तो काशी के विद्वानों, आचार्यों और जगद्गुरुओं से परामर्श लिया जाना चाहिए था और सामूहिक निर्णय के बाद शास्त्रीय विधि से कार्य होना चाहिए था। काशी जैसी पुण्यभूमि में उखाड़ी गई मूर्तियों को पुनः देवालय परिसर में स्थापित करना शास्त्र सम्मत नहीं है।

ऐसी मूर्तियों को मंदिर परिसर में रखना नियमों के विपरीत है। यदि उन्हें कहीं सुरक्षित रखना ही था तो उसके लिए संग्रहालय (म्यूजियम) उपयुक्त स्थान हो सकता था न कि सक्रिय पूजा स्थल।

 “भगवंत भास्कर” सहित कई प्राचीन ग्रंथों का उल्लेख करते हुए आचार्य कमलाकांत पांडेय कहते हैं कि मूर्तियों को शास्त्र-विरुद्ध तरीके से हटाना और फिर उन्हें पुनः स्थापित करने की बात करना हिंदू धर्म की मूल मान्यताओं के विपरीत है। उनका कहना है कि काशी में धर्म केवल आस्था का नहीं, बल्कि नियम और मर्यादा से जुड़ा हुआ विषय है। यदि इन मर्यादाओं की अनदेखी की गई तो उसका असर केवल एक घाट या एक मंदिर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे समाज पर पड़ेगा।

मंदिरों और मूर्तियों के जीर्णोद्धार के नियम स्पष्ट हैं और उनमें खंडित मूर्ति की पुनः प्रतिष्ठा की कोई अनुमति नहीं दी गई है। इन ग्रंथों में यह भी कहा गया है कि म्लेच्छ देश, यानी विदेश से लाई गई और खंडित मूर्ति को देवालय में नहीं रखा जा सकता।

शास्त्रपरंपरा और आस्था पर सवाल

काशी विश्वनाथ मंदिर के पूर्व महंत राजेंद्र तिवारी मणिकर्णिका घाट को लेकर बेहद कड़े और स्पष्ट शब्दों में अपनी बात रखते हैं। उनका कहना है कि मणिकर्णिका कोई साधारण घाट नहीं, बल्कि एक पौराणिक तीर्थ है, जिसकी महत्ता केवल काशी ही नहीं, बल्कि समूचे सनातन धर्म में विशेष स्थान रखती है। वह कहते हैं, “काशी के पांच प्रमुख धार्मिक स्थलों में मणिकर्णिका भी एक है। काशी विश्वनाथ इस नगर में राजा भी हैं और गुरु भी, और उन्हीं की छाया में मणिकर्णिका जैसे तीर्थों की मर्यादा सदियों से सुरक्षित रही है,”

राजेंद्र तिवारी का आरोप है कि अब एक सुनियोजित साजिश के तहत मणिकर्णिका को उसके पौराणिक और आध्यात्मिक स्वरूप से अलग कर ‘मोदी तीर्थ’ के रूप में स्थापित करने की कोशिश की जा रही है। वे इसे काशी की आत्मा पर सीधा हमला बताते हैं। उनके अनुसार, यह पहली बार नहीं है जब किसी ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल का नाम और स्वरूप बदला जा रहा हो।

वे उदाहरण देते हैं कि किस तरह खिड़किया घाट, जहां कभी प्रसिद्ध नरसिंह लीला हुआ करती थी, को ‘नमो घाट’ में बदल दिया गया। वे कहते हैं, “आज वह घाट श्रद्धा और परंपरा का केंद्र नहीं, बल्कि सैलानियों की मटरगश्ती का अड्डा बन चुका है।”

पूर्व महंत का कहना है कि अब सरकार की नजर काशी के सबसे पौराणिक स्थल पर पड़ी है। मणिकर्णिका का अस्तित्व गंगा के वर्तमान प्रवाह से भी पहले का है। वे बताते हैं, “गंगा के आने से पहले भी मणिकर्णिका तीर्थ का अस्तित्व था। यहां से बिंदु गंगा निकला करती थी, जिसमें देवता स्नान किया करते थे। इस पौराणिक मान्यता का विस्तृत उल्लेख शिवपुराण में मिलता है। कालांतर में यही तीर्थ महाश्मशान के रूप में प्रसिद्ध हुआ, जहां मृत्यु भी मोक्ष का द्वार मानी जाती है।”

राजेंद्र तिवारी इतिहास का हवाला देते हुए बताते हैं कि, “साल 1771 में जब अहिल्याबाई होल्कर ने काशी विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कराया, उसके बाद मणिकर्णिका तीर्थ का भी जीर्णोद्धार कराया गया था। उस समय भी किसी दैवी स्थान के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की गई। तीर्थ की पवित्रता को अक्षुण्ण रखा गया। तीर्थ यात्रियों के दर्शन के लिए कई मणियों का निर्माण किया गया और वहीं अहिल्याबाई का मंदिर स्थापित किया गया। उनका जोर इस बात पर है कि उस दौर में भी सुधार और संरक्षण हुआ, लेकिन परंपरा और आस्था की सीमाओं को नहीं लांघा गया।”

पूर्व महंत का आरोप है कि मौजूदा सरकार के दौर में मणिकर्णिका को एक ‘इवेंट सेंटर’ में तब्दील करने की तैयारी है। वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के उस बयान पर भी सवाल उठाते हैं, जिसमें गलियों में शवदाह होने की बात कही गई थी। वह कहते हैं, “हमें यह सुनकर आश्चर्य हुआ। गलियों में कब शवदाह हुआ है? अगर ऐसा हुआ है तो सरकार प्रमाण दे। बाढ़ के दिनों में भी शवदाह विड़ला द्वारा निर्मित छत पर होता रहा है, न कि गलियों में। 

पहली बार बनारस के लोगों ने जिस तरह सरकार के जोर-जुल्म और मनमानी पर खुलकर उंगली उठाई है, उससे सत्ता की ‘रूह हिल गई है’। सरकार ने बनारस के बीजेपी नेताओं की ड्यूटी लगा दी है कि वे जनता का मन बदलें, लोगों को समझाएं कि जो हो रहा है वही सही है।”

पूर्व महंत कहते हैं, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के निर्माण के दौरान सैकड़ों मंदिर तोड़े गए थे। उस समय भी सरकार ने विरोध को दबाने के लिए इसी तरह के हथकंडे अपनाए थे। 

“अब काशी के लोग इन हथकंडों को समझ चुके हैं। वे अफसरों के झूठ को भी पकड़ रहे हैं,” राजेंद्र तिवारी कहते हैं। मणिकर्णिका तीर्थ पर मूर्तियों को तोड़ने में सरकार की कितनी सीधी भूमिका है यह भले स्पष्ट न हो, लेकिन बनारस के प्रशासनिक अफसर पूरी तरह कसूरवार हैं। “जनता का यह प्रतिरोध शायद तभी रुकेगा, जब दोषी अफसरों की बनारस से विदाई होगी। काशी साधना की नगरी है, साधन की नहीं। यह शहर किसी भी सूरत में व्यावसायिक केंद्र नहीं, बल्कि आध्यात्मिक केंद्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।”

व्यवस्था की नीयत और दिशा पर गहरी शंका व्यक्त करते हुए महंत राजेंद्र तिवारी कहते हैं, “बनारस के लोग सरकार की धमकियों से डरने वाले नहीं हैं। संभव है कि सरकार शवदाह पर भी टैक्स लगाने की कोशिश करे, लेकिन काशीवासी किसी भी हाल में मनमानी नहीं चलने देंगे,” वे कहते हैं। उनका साफ कहना है कि मणिकर्णिका को व्यावसायिक या इवेंट सेंटर बनने नहीं दिया जाएगा। 

यह लड़ाई केवल एक घाट या एक परियोजना की नहीं है। यह काशी की आत्मा, उसकी पौराणिक स्मृति और सनातन परंपरा की रक्षा की लड़ाई है। अगर मणिकर्णिका जैसी जगह भी बाजार और ब्रांडिंग की भेंट चढ़ गई तो फिर काशी और किसी शहर में क्या फर्क रह जाएगा?”

सत्ताहिन्दुत्व और जनविरोध

काशी विश्वनाथ धाम की लगातार और जमीनी कवरेज करने वाले पत्रकार ऋषि झिंगरन का आकलन सीधा है और सत्ता को असहज करने वाला भी। उनके अनुसार, मणिकर्णिका घाट पर मूर्तियों को तोड़े जाने के बाद बनारस की जनता जिस तरह खुलकर और मुखर होकर सामने आई है, उससे भारतीय जनता पार्टी घबरा गई है। यह वही बनारस है, जहां पहले ऐसी खबरें आती थीं, लेकिन विरोध इतना तीखा नहीं होता था। फर्क सिर्फ इतना है कि अब पानी सिर के ऊपर चला गया है।

ऋषि झिंगरन कहते हैं कि, “सत्ता को यह भ्रम हो गया था कि हिन्दुत्व के नशे में सब कुछ किया जा सकता है और कोई सवाल नहीं उठेगा। जब लोग नहीं बोल रहे थे, तो मन बढ़ा हुआ था। सत्ता यह मानकर चल रही थी कि आस्था के नाम पर हर कार्रवाई को चुपचाप स्वीकार कर लिया जाएगा। लेकिन इस बार जो हरकत की गई, उसने बनारस ही नहीं, बल्कि देश भर में आक्रोश फैला दिया। यही वह मोड़ है, जहां बीजेपी की रणनीति लड़खड़ा गई। 

अब सरकार डैमेज कंट्रोल के लिए एक के बाद एक हथकंडे अपना रही है। सबसे पहले सच को झुठलाने की कोशिश की गई। जो वीडियो सामने आए, उन्हें एआई जनरेटेड बताने का दावा किया गया।”

“वीडियो वर्चुअल रचना नहीं, बल्कि जमीन पर हुई तोड़फोड़ की रिकॉर्डिंग है। कुछ जागरूक हिंदुओं ने खुद अपनी आंखों से यह सब देखा तस्वीरें उतारीं और वीडियो बनाए। इनमें पुनीत जेतली, शिवम शर्मा और अजय शर्मा जैसे लोग शामिल हैं और यही तथ्य सत्ता के लिए सबसे ज्यादा असहज करने वाला है। ये कोई विपक्षी कार्यकर्ता नहीं हैं, न ही सरकार विरोधी पेशेवर आंदोलनकारी।

ये वे लोग हैं जो लंबे समय तक बीजेपी की विचारधारा के कट्टर समर्थक रहे हैं। जब सत्ता के अपने ही वैचारिक समर्थक सवाल उठाने लगें तब संकट केवल राजनीतिक नहीं रह जाता वह वैचारिक हो जाता है।”

ऋषि झिंगरन बेहद तल्ख लहजे में कहते हैं, “अगर टूट-फूट का वीडियो झूठा है तो फिर सही वीडियो क्यों नहीं दिखाया जा रहा? अगर यह दावा किया जा रहा है कि मूर्तियां नहीं तोड़ी गईं, तो जमीनी सच्चाई को सामने क्यों नहीं लाया जा रहा? केवल बयान जारी करने, प्रेस नोट थमाने और एआई का नाम लेने से जनता भरोसा नहीं करेगी। भरोसा तब बनेगा जब तथ्य सामने रखे जाएंगे। सत्ता यह भूल रही है कि बनारस की जनता सिर्फ आस्था से नहीं, विवेक से भी सोचती है।

एक पक्ष अपनी बात रख चुका है-फोटो, वीडियो और प्रत्यक्षदर्शियों के साथ। अब सरकार दूसरा पक्ष रखे, लेकिन धमकी देकर नहीं। बनारस की जनता को डराकर आवाज बंद नहीं की जा सकती। यह वही शहर है जिसने सत्ता के सबसे बड़े प्रतीकों को भी समय-समय पर आईना दिखाया है। यहां चुप्पी को सहमति समझने की भूल पहले भी कई शासकों ने की है और परिणाम इतिहास में दर्ज हैं।”

“औरंगजेब के समय क्या हुआ था यह इतिहास की बहस है। आज जो हो रहा है वह वर्तमान की सच्चाई है। मौजूदा समय में मंदिर तोड़े गए हैं-इसके तमाम सबूत मौजूद हैं। फोटो हैं, वीडियो हैं और सबसे अहम बात यह है कि प्रत्यक्षदर्शी हैं। इसे इतिहास की आड़ में छिपाया नहीं जा सकता। राजनीतिक नजरिये से देखें तो यह मामला बीजेपी के लिए इसलिए भी खतरनाक है क्योंकि उसने वर्षों से मंदिरों और आस्था को अपना सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार बनाया है।

जब उसी राजनीति के दौर में मंदिर और मूर्तियां टूटने के आरोप लगें  और वह भी उन्हीं के शासन में, तो नैरेटिव उलट जाता है। हिन्दुत्व का जो कवच सत्ता ने पहन रखा था उसमें पहली बार दरार साफ दिखाई दे रही है।”

ऋषि झिंगरन कहते हैं, “सच को एआई कह देने से वह झूठ नहीं हो जाता। बनारस की जनता को धमकाकर उसकी आंखों देखी सच्चाई से पीछे नहीं हटाया जा सकता। यह सिर्फ एक घाट या कुछ मूर्तियों का मामला नहीं रह गया है। यह सत्ता के अहंकार और जनता की चेतना के बीच सीधी टकराहट बन चुका है। सरकार का संकट यह नहीं है कि तोड़फोड़ हुई या नहीं। असली संकट यह है कि अब बनारस चुप नहीं है।

अब सवाल पूछे जा रहे हैं और सवाल पूछने वाले वे लोग हैं, जिन्हें सत्ता अपना स्वाभाविक समर्थक मानती थी। यही वजह है कि डैमेज कंट्रोल में बयान, धमकी, खंडन और भ्रम फैलाने के तमाम तरीके अपनाए जा रहे हैं।”

मीडिया पर उठते असहज सवाल

मणिकर्णिका घाट का विवाद अब किसी एक घटना, एक मूर्ति या एक प्रशासनिक निर्णय तक सीमित नहीं रह गया है। यह प्रकरण धीरे-धीरे उस बुनियादी सवाल तक पहुंच चुका है जहां सत्ता, मीडिया और समाज-तीनों की नैतिक परीक्षा होती है। काशी की आत्मा कहे जाने वाले मणिकर्णिका घाट से जुड़ा यह मामला दरअसल यह पूछ रहा है कि क्या विकास के नाम पर परंपरा को चुपचाप कुर्बान किया जा सकता है और क्या पत्रकारिता सत्ता की तय की हुई रेखाओं के भीतर ही सांस लेगी?

घाट पर मूर्तियों को नुकसान पहुंचने के आरोप सामने आते ही काशी का सामाजिक और धार्मिक मानस आंदोलित हो उठा। साधु-संत, विद्वान, तीर्थ पुरोहित और आम नागरिक-सबके सवाल एक ही दिशा में थे कि यह किसकी अनुमति से हुआ, क्यों हुआ और इसके लिए जवाबदेह कौन है? सोशल मीडिया से लेकर चाय की दुकानों तक चर्चा गर्म रही। 

हिन्दुस्तान और दैनिक जागरण जैसे अखबारों ने इस बेचैनी को अपने पन्नों पर जगह दी। उन्होंने स्थल की वास्तविक स्थिति, प्रशासनिक तर्कों और जनाक्रोश-तीनों को सामने रखा।

इसी शोर के बीच एक असहज खामोशी भी थी। जनपक्षधर पत्रकारिता का दावा करने वाला अमर उजाला लगभग मौन रहा। न कोई प्रमुख खबर, न संपादकीय टिप्पणी, न ही संदर्भात्मक संकेत। यह वही अखबार है, जिसने अतीत में काशी और धार्मिक विरासत से जुड़े मुद्दों पर सत्ता को असहज करने में संकोच नहीं किया था। ऐसे में यह चुप्पी सामान्य संपादकीय चयन नहीं, बल्कि संदेह को जन्म देने वाली अनुपस्थिति बन जाती है।

जब इस मौन पर सवाल उठे तो तर्क दिया गया कि “सरकार के विकास से जुड़े मामलों में खबर नहीं चलाई जाएगी।” यहीं से विवाद का असली चेहरा सामने आता है। सवाल सीधा है-क्या मणिकर्णिका घाट का मामला केवल विकास परियोजना का है या यह आस्था, शास्त्र, परंपरा और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा एक गहन सामाजिक प्रश्न है? क्या पत्रकारिता का धर्म यह है कि वह सत्ता द्वारा गढ़ी गई ‘विकास’ की परिभाषा को बिना सवाल स्वीकार कर ले? यह केवल अखबार की चुप्पी का मामला नहीं है।

यह उस गहरे संकट की ओर इशारा करता है, जिससे मुख्यधारा की मीडिया गुजर रहा है। खबर का मूल्य अब उसकी सामाजिक प्रासंगिकता से नहीं, बल्कि सत्ता की सहूलियत से तय होने लगा है। ‘विकास’ एक ऐसा आवरण बन गया है, जिसके नीचे हर असहज सवाल दबाया जा सकता है।“

‘अचूक रणनीति’ के संपादक एवं वरिष्ठ पत्रकार विनय मौर्य के शब्द इस पूरे संकट को और तीखा बना देते हैं। वह कहते हैं, “ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बनारस आए तो अमर उजाला ने उनके बयान को प्रमुखता से छापा कि मणिकर्णिका घाट की तस्वीरों और वीडियो को एआई से बनाया गया है। इस अखबार ने यह सवाल खड़ा करने की जहमत नहीं उठाई कि क्या किसी लैब से उक्त फोटोग्राफ अथवा वीडियो की जांच कराई गई थी? 

मुख्यमंत्री के दौरे से पहले अमर उजाला ने मूर्तियों और मंदिरों को तोड़े जाने के बाद स्थानीय नागरिकों के आंदोलन की खबरों को क्यों घोंट गया? जहां समाज में व्यापक प्रतिक्रिया हो, साधु-संत और आम लोग सवाल उठा रहे हों वहां खबर को दबाना संपादकीय विवेक नहीं, बल्कि आत्मसमर्पण जैसा प्रतीत होता है। वही अखबार जिसने कभी जनता के सवालों से सत्ता और सिस्टम को असहज किया, आज उसी की खामोशी यह संकेत देती है कि या तो दबाव है या प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं?”

वरिष्ठ पत्रकार विनय यह भी कहते हैं, “मणिकर्णिका तीर्थ कोई साधारण स्थान नहीं है। यह काशी की आत्मा, उसकी धार्मिक पहचान और उसकी ऐतिहासिक निरंतरता है। ऐसे में किसी बड़े मीडिया संस्थान का इस पर चुप रहना केवल संपादकीय चूक नहीं, बल्कि पत्रकारिता के नैतिक दायित्व से पीछे हटना है। यह चुप्पी सिर्फ खबर को नहीं मारती, बल्कि जनता के भरोसे को भी कमजोर करती है। अब सवाल सीधे और असहज हैं कि सत्ता सवालों से क्यों घबरा रही है? 

मीडिया का एक हिस्सा सच दिखाने से क्यों बच रहा है? क्या विकास के नाम पर आस्था और विरासत से जुड़े हर सवाल को दबा दिया जाएगा? अगर मीडिया भी सत्ता के फैसलों पर सवाल नहीं उठाएगा तो लोकतंत्र में निगरानी की भूमिका कौन निभाएगा?”

 (विजय विनीत बनारस के पत्रकार एवं लेखक हैं)

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