भारत में वैश्विक भौगोलिक क्षेत्र 2.4% है और जल संसाधन लगभग 4.2% है लेकिन विश्व की जनसंख्या का 17.6% भारत में है। भारत की बढ़ती जनसंख्या के लिए खाद्यान अन्न उपलब्ध करवाना देश के लिए बड़ी चुनौतियों में से एक है।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार भारत में वार्षिक 93 .5 मि.टन गेहूं, 105.24 मि.टन चावल, 22.26 मि.टन टन मक्का, 16.03 मि.टन ज्वार बाजरा रागी आदि, 341.20 मि टन गन्ना, 7.79 मि टन फाइबर कपास जूट, 18.3 मि टन दालें, और 30.90 मि टन ऑइल सीड़ का उत्पादन खेतों में होता है।
इनमें से गेहूं और धान की फसल तुलनात्मक रूप से ज्यादा लाभकारी होती है इसलिए उतर भारत में किसान इनको प्राथमिकता देते हैं। कृषि अवशेषों के प्रबंधन की उचित व्यवस्था न होने के कारण किसानों के लिए पराली को जलना मजबूरी बन जाता है क्योंकि यह अवशेष धान की फसल के होते हैं जो चारा के काम नहीं आते क्योंकि उनमे सिलिका की बहुत अधिक मात्रा पायी जाती है जो पशुओं के खाने लायक नहीं मानी जाती और जिसका उपयोग केवल ऊर्जा या अन्य औद्योगिक कार्यों में ही किया जा सकता है।
यह आम तौर पर संयुक्त कटाई आधुनिक मशीन कंबाइन द्वारा की जाती है। आधुनिक मशीनों से पकी हुई फसल में से दाने निकालने के बाद बचे हुए पौधे खेत में अवशेष के रूप में रह जाते हैं। रबी की अगली फसल के लिए खेत को तैयार करने के लिए किसान के पास कम समय बचता है। यह प्रक्रिया अक्सर सितंबर के मध्य सप्ताह से अक्टूबर के अंत तक की होती है।
मशीन द्वारा पकी हुई फसल के ऊपरी भाग से अनाज एकत्रित करके बाकी पौधे जमीन में छोड़ दिए जाते हैं जिन्हें बाद में अलग से काट कर खेत को साफ किया जाता है। खेत से फिर से जोत कर अगली फसल की बुआई की जाती है जिसका समय नवंबर अंत होता है। मुख्य रूप से पराली जलाना किसानों के लिए कृषि अवशेषों से निपटने का सरल तरीका है। हर वर्ष यह स्थिति बार-बार बन जाती है क्योंकि किसानों के लिए धान की फसल के अवशेष का कोई मूल्य नहीं रहता है।
पराली प्रबंधन पर अतिरिक्त खर्च और मेहनत किसान को करनी पड़ती है और उसके पास कोई सरकारी सहायता का विकल्प नहीं है।अधिकतर किसान छोटे और मध्यम श्रेणी के हैं इस लिए यह सरल विधि किसान अपनाता है। आधुनिक तकनीक में बेलर मशीन के उपयोग से बचे हुए कृषि अवशेषों को खेत में बड़ी गांठों में परिवर्तित करने का विकल्प है लेकिन उनके भारी निवेश और खर्च किसानों के बूते से बाहर की बात है।
सुझाए गए यंत्रों हैप्पी सीडर, सुपर सीडर के प्रयोग के लिए आवश्यक ट्रैक्टर की क्षमता को भी बढ़ाना अस्वश्यक हो जाता जिसकी लगत बहुत अधिक हो जाती है। कृषि अवशेषों को नष्ट करने की प्रक्रिया उत्तर भारत में वायु प्रदूषण के प्रमुख कारणों से एक है। एक निश्चित ऋतू में वायु प्रदूषण के स्तर के बढ़ने में अन्य कारण भी है लेकिन उनकी चर्चा कम होती है। विभिन्न शोधों के अनुसार पराली जलाने से कुल वायु प्रदूषण में 8 – 12% तक इसकी मात्रा पाई जाती है।
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु प्रदूषण का एक बड़ा कारक हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पंजाब में जलाई जाने वाली परली को माना जाता है।
हर साल दिल्ली और आस-पास के शहरों में वायु गुणवत्ता का स्तर के सामान्य जीवन के लिए वायु के स्तर से घातक श्रेणी स्तर तक पहुँच जाता है। लेकिन इस समय में आम तौर पर अन्य त्योहारों को वायु प्रदूषण के मामले में छूट मिल जाती है। 2024 में संघीय सरकार ने स्पष्ट तौर पर रिपोर्ट में बताया था कि वायु प्रदूषण में वाहन प्रदूषण, औद्योगिक प्रदूषण, भवन व अन्य निर्माण, बायोमास ज्वलन, कचरा ज्वलन आदि गतिविधियां एक बड़ा स्त्रोत है।
लेकिन आम लोगों की निगाह में पंजाब और हरियाणा के किसान ही आते हैं जिन्हें कटघरे में खड़ा किया जाता है। बड़ी औद्योगिक इकाइयों, कल कारखानों, निर्माण कंपनियों और वाहन उत्सृजन पर ज्यादा ध्यान किसी का जाता नहीं।
पराली जलाने से उत्पन्न धुएं से ग्रीन हाउस गैस और अन्य कण पाए जाते हैं। गैसों में कार्बन मोनोऑक्साइड (सीओ 2), मीथेन (सीएच 4,) कार्बन केमिकल पॉलीक्रॉलिक, सिलिकॉन कार्बन कण और वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों (वीओसी) की उपस्थिति होती है जो वायुमंडल की पहली सतह पर एक गहन परत बना देती है जिस से वायु शुद्धता की प्रक्रिया बाधित हो जाती है। धुएं और गैस की यह परत ही साफ वायु सौर ऊर्जा को रोकती और विलंबित करती है। भूमंडलीय पर्यावरण की स्थिति पहले से ही विकट बनी हुयी है।
औद्योगिक इकाईयों, ऑटोमोबाइल संख्या, छोटे कल कारखानों , नगरीकरण, निर्माण की गतिविधियों के कारण प्रदूषण की मात्रा पर नियंत्रण में सरकारी तंत्र की विफलता पहले से ही स्पष्ट है।
भारत में 500 मी टन कृषि अवशेष हर साल बचता है। 2014 में भारत की संघीय सरकार द्वारा कृषि अवशेष प्रबंधन नीति की घोषणा की गई थी। राज्य को केंद्र की सहायता से पराली के उचित प्रबंधन के लिए कई विकल्प सुझाए गए हैं। किसानों को पराली न जलाने और उसके उचित प्रबंधन के लिए के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करने का सुझाव सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सरकार को दिया गया है।
लेकिन आधुनिक मशीनों पर निवेश और इनके सामुहिक उपयोग को लागू करने में विफलता भी राज्य सरकारों के सामने आ रही है। केंद्र और राज्य के वित्तीय आर्थिक अनुदान का सही समय पर सामंजस्य इसमें बड़ी बाधा है। हालांकि 2021 के मुकाबले 2024 में पराली जलाने की घटनाओं में 85% तक की कमी हुयी है लेकिन वायु प्रदूषण का कोई स्थाई समाधान सरकार अभी तक कर नहीं पायी है।
राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम भारत सरकार द्वारा वायु प्रदूषण को कम करने के लिए 2019 में शुरू किया गया एक कार्यक्रम है। इसका मुख्य लक्ष्य 2026 तक 131 गैर-प्राप्ति वाले शहरों में कणों (PM10 और PM2.5) की सांद्रता को 40% तक कम करना है, जो कि वायु गुणवत्ता मानकों को पूरा नहीं कर पाए हैं।
इस कार्यक्रम में वायु गुणवत्ता निगरानी नेटवर्क का विस्तार करना, प्रदूषण से निपटने के लिए क्षमता निर्माण और वायु प्रदूषण के बारे में जन जागरूकता बढ़ाना शामिल है। वायु प्रदूषण के खतरों के बारे में जागरूकता बढ़ाना और प्रदूषण नियंत्रण के लिए क्षमता का निर्माण करना भी इस के उद्देश्यों में शामिल है । हर साल 7 सितंबर को राष्ट्रीय स्वच्छ वायु दिवस के रूप में मनाया जाता है।
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली जहाँ वायु प्रदूषण सबसे अधिक है की सरकार ने स्वच्छ वायु कार्यक्रम के तहत आबंटित अपने बजट से केवल एक तिहाई ही खर्च किया है। सवाल उठता है कि सरकार की यह उपेक्षा राजनीतिक कारणों से है या कुप्रबंधन का परिणाम। नोएडा में आवंटित 30.89 करोड़ में केवल 3.44 करोड़ ही वायु प्रदूषण नियत्रण पर खर्च किया गया। हरियाणा में फरीदाबाद में 107.14 करोड़ आबंटित राशि से 28.60 करोड़ खर्च किया गया।
इसके अलावा पंजाब में आम आदमी पार्टी सरकार के बड़े बड़े दावों के विपरीत धान पराली अवशेषों के औद्योगिक प्रयोग के लिए कोई बड़े सयंत्र लगाने में रुचिकर निवेशकों को प्रदेश में स्थापित कर पाने की विफलता भी सामने साफ दिखई देती है। नए शोध और नई मशीनों की खोज से समाधान की संभावना बन सकती है।अगर सरकार गंभीरता से नीति निर्माण में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और आमजन के स्वास्थ्य के प्रति सचेत हो।
किसानों को कटघरे में खड़ा करना, दंडित करना कोई स्थाई समाधान नहीं, पूंजीवादी प्रवृत्ति का मिथ्या का प्रचार-प्रसार ही है। वायुमंडल में कार्बन उत्सर्जन को संतुलित करने में वांछित जंगलों के साथ साथ खेतों में पेड़ पौधों फसलों द्वारा किया गया संतुलन भी महत्वपूर्ण है जिसका कोई मुआवजा किसानों को कभी प्राप्त नहीं होता।