Thu. Nov 21st, 2019

कॉरपोरेट की ‘कल्याणकारी संस्था’ के रवैये ने कौशलेंद्र को पहुंचाया आईसीयू

1 min read
कौशलेंद्र प्रपन्न।

(कौशलेंद्र प्रपन्न अकादमिक दुनिया में एक पहचाना नाम है। आजकल वह टेक महिंद्रा में कार्यरत हैं और शिक्षा से जुड़े प्रश्नों पर वहां काम करते हैं। अभी हाल में इस मुद्दे को लेकर उन्होंने एक लेख लिखा। जिसमें सरकार की थोड़ी-बहुत आलोचना भी की गयी थी। उस लेख के प्रकाशित होने के बाद उनकी संस्था के अफसरों ने उनको इस तरह से उत्पीड़ित और अपमानित किया कि वह बेहद परेशान हो गये और इस क्षोभ और पीड़ा से वह इतने दुखी हुए कि उन्हें दिल का दौरा पड़ गया। इस समय वह एक अस्पताल के आईसीयू में भर्ती हैं और अभी भी उनकी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। इस मसले पर वरिष्ठ पत्रकार-साहित्यकार प्रियदर्शन और सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षा के ही क्षेत्र से जुड़े मित्र रंजन की दो महत्वपूर्ण टिप्पणियां सामने आयी हैं जिन्हें यहां दिया जा रहा है-संपादक)

प्रिय दर्शन, पत्रकार-साहित्यकार

देश दुनिया की अहम खबरें अब सीधे आप के स्मार्टफोन पर Janchowk Android App

यह जानकर बिल्कुल स्तब्ध हूं कि मित्र कौशलेंद्र प्रपन्न को दिल का दौरा पड़ा है और वह जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहे हैं।
यह बात और स्तब्ध करती है कि उनको टेक महिंद्रा ने नौकरी से सिर्फ इस बात के लिए निकाल दिया कि उन्होंने एक लेख लिखा था जिसमें सरकार की शिक्षा नीति के बारे में कुछ आलोचनात्मक टिप्पणियां थीं। जबकि शिक्षा के प्रश्नों पर काम कर रहे कौशलेंद्र जैसे संजीदा लोग कम हैं। टेक महिंद्रा के लिए उन्होंने बहुत सारे अनूठे काम किए थे और उनकी परियोजनाओं से हिंदी के लेखकों को जोड़ा था। उनके क़रीबी लोग बता रहे हैं कि यह लेख लिखने पर उनको बहुत अपमानित किया गया था।
कौशलेंद्र और उनके बड़े भाई राघवेंद्र को मैं दो दशक से भी ज्यादा लंबे समय से जानता रहा हूं। ‘जनसत्ता’ में जिन दिनों मैं संपादकीय पृष्ठ देखा करता था उन दिनों बहुत सारे युवा छात्र-छात्राएं मेरे पास आया जाया करते थे। इनमें राघवेंद्र और कौशलेंद्र के अलावा नीलिमा चौहान और विजयेन्द्र भी थे जो अब मसीजीवी कहलाते हैं और ऋतुबाला भी ‌जो बाद में राघवेंद्र की पत्नी बनीं।
इन सब से मोटे तौर पर मेरे संबंध बने रहे। लेकिन कौशलेंद्र से एक अलग तरह का नाता रहा। कौशलेंद्र अक्सर इतनी आत्मीयता के साथ मेरा लिखा हुआ पढ़ते रहे, ‌ अलग-अलग अवसरों पर मुझसे मिलते रहे कि मैं संकोच में पड़ जाता था। शिक्षा को लेकर वे बहुत गंभीरता से काम कर रहे थे। एक बार संभवतः कहानी पढ़ाने के ढंग को लेकर मैं भी उनकी किसी परियोजना में शामिल हुआ था।
लेकिन कौशलेंद्र के साथ जो कुछ हुआ, उसके बाद मैंने तय किया है टेक महिंद्रा के किसी आयोजन में मैं नहीं जाऊंगा। मुझे लगता है तमाम संवेदनशील और संजीदा लोगों को टेक महिंद्रा का बहिष्कार करना चाहिए।
फिलहाल कौशलेंद्र की सेहत सुधरने का इंतज़ार है। भरोसा करें कि इस दबाव के आगे वह घुटने नहीं टेकेंगे, फिर से खड़े होंगे और अपनी लड़ाई नए सिरे से लड़ेंगे।

मित्र रंजन, सामाजिक कार्यकर्ता-एकैडमीशियन

जो खबर मिली कौशलेंद्र जी के साथ व्यवहार की वो वाकई दिल को चीरनेवाली है। एक ऐसे संवेदनशील शख्स के साथ किस क्रूरता का व्यवहार किया गया! कॉरपोरेट घराने इसी तरह से लोककल्याणकारी काम करेंगे क्या? सब कुछ बदल देने का दावा करते हैं सरकार के नुमाइंदे और कहते हैं कि सार्वजनिक-निजी साझेदारी के बगैर विकास की राह पर एक कदम चलना भी संभव नहीं। कौशलेंद्र तो फिर भी अपनी बातों, अपनी लेखनी में इतने मृदुभाषी हैं। लेकिन, इतना सा सच भी बर्दाश्त नहीं हुआ। ना सरकार के प्रतिनिधियों को और ना ही जनता के लिए काम करने का ढोल पीटने वाले इन आत्मकेंद्रित, स्वहित-साधक व्यावसायिक घरानों के कारिंदों से। सूचना के मुताबिक कौशलेंद्र जी के पुराने लेखों की फाइल निकालकर उन्हें अपमानित – प्रताड़ित किया गया। आज शिक्षा जगत की बदहाली किसी से छुपी नहीं है चाहे वो प्राथमिक-प्रारंभिक स्तर पर हो या फिर उच्च स्तर पर।

शिक्षकों के ऊपर बढ़ते बोझ, बच्चों के साथ उनकी तारतम्यता के निरंतर ढीले होते तार और शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने में, स्कूलों को मजबूत करने में सरकार की विफलता किससे छुपी है भला? शिक्षा का अधिकार बच्चों का मौलिक अधिकार बने 10 साल होने को आए लेकिन उनके प्रावधान बमुश्किल 12.7 फीसदी स्कूलों मै लागू हो पाए है जबकि इसको तीन सालों में लागू करना था। किसकी जवाबदेही है ये और अगर लेखक उस तरफ इंगित करता है एक सचेत सामाजिक इकाई के बतौर तो किसको और क्यूं तकलीफ होनी चाहिए भाई?

लेकिन, कॉरपोरेट रिस्पांसिबिलिटी का सामाजिक कर्तव्य निबाह रही टेक महिंद्रा फाउंडेशन अपने ही एक बेहद हुनरमंद, कर्तव्यनिष्ठ, नवाचारी, भाषा विद- लेखक का साथ ना दे पाई बल्कि उन्हें अपमानित किया। ऐसे दुर्दांत निजी घरानों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और उनका सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए। लेकिन कार्रवाई करेगा कौन! सरकार तो नतमस्तक है कॉरपोरेट के सामने या फिर गलबहियां कर रही है और समाज को बदलने में उनकी बड़ी भूमिका के बारे में सामाजिक जनजागरण में लगी है विज्ञापनों के जरिए। और खुद अपने संवैधानिक दायित्वों से पल्ला झाड़ रही है। फिलहाल तो यही भरोसा है कि कौशलेंद्र जल्द स्वस्थ होकर सक्रिय जीवन में लौटें।

Donate to Janchowk
प्रिय पाठक, जनचौक चलता रहे और आपको इसी तरह से खबरें मिलती रहें। इसके लिए आप से आर्थिक मदद की दरकार है। नीचे दी गयी प्रक्रिया के जरिये 100, 200 और 500 से लेकर इच्छा मुताबिक कोई भी राशि देकर इस काम को आप कर सकते हैं-संपादक।

Donate Now

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *