Thu. Jun 4th, 2020

साहित्य अकादमी में यौन शोषण की शिकायत पर महिला को सजा! घटना को लेकर लेखकों में उबाल

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साहित्य अकादमी।

नई दिल्ली। साहित्य अकादमी अपने सचिव के श्रीनिवास राव पर लगे आरोपों की वजह से एक बड़ी बदनामी भरे विवाद से घिर गई है। राव पर यौन शोषण के गंभीर आरोप लगाने वाली एक महिला अधिकारी को उनका प्रोबेशन पीरियड पूरा होने से एक दिन पहले टर्मिनेट कर दिया गया है जबकि यह मामला अभी अदालत में विचाराधीन है। दो दिन बाद शुरू होने जा रहे अकादमी के साहित्योत्सव में शामिल होने वाले लेखकों के सामने भी नैतिक जवाबदेही का सवाल खड़ा हो गया है। 

कई वरिष्ठ रचनाकारों ने अकादमी सचिव को तुरंत सस्पेंड करने और महिला अधिकारी को बहाल करने की मांग की है। वरिष्ठ कवयित्री और एक्टिविस्ट शुभा ने अकादमी के घेराव का आह्वान किया है। अलबत्ता बहुत से लेखक अगर-मगर और जानकारी के अभाव की रेत में मुंह छुपा रहे हैं तो एक वरिष्ठ लेखिका मैत्रेयी पुष्पा ने पीड़ित महिला अधिकारी के लिए नसीहतों भरा बयान दिया है।

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देश की साहित्य से जुड़ी सबसे बड़ी सरकारी (स्वायत्त) संस्था पिछले कई सालों से लगातार गंभीर सवालों के घेरे में रही है। इस बार मामला उप सचिव स्तर की महिला अधिकारी के यौन शोषण से जुड़ा होने के कारण और भी ज़्यादा गंभीर है। `द वायर` में छपी ख़बर के मुताबिक, साहित्य अकादमी के सचिव के श्रीनिवास राव के खिलाफ़ बार-बार यौन शोषण करने का आरोप लगाने वाली महिला अधिकारी को उनका दो साल का प्रोबेशन पीरियड पूरा होने से एक दिन पहले टर्मिनेट कर दिया गया है। 

असम की रहने वाली इस महिला अधिकारी ने शिकायत की थी कि राव उन्हें नस्ली टिप्पणियों और यौन शोषण के दायरे में आने वाली अभद्र टिप्पणियों और हरक़तों से लगातार परेशान कर रहे थे। बुरी तरह परेशान होकर इस महिला अधिकारी ने पहले साहित्य अकादमी में ही, फिर डीएम के यहाँ और फिर दिल्ली हाई कोर्ट में शिकायत की थी। हाई कोर्ट ने पीड़ित को 16 मार्च तक पेड लीव देने का आदेश भी दिया था। इस केस की जांच अभी कोर्ट में लंबित हैं।

महिला ने शिकायत में के श्रीनिवास राव की हरकतों का जो ब्यौरा दिया है, वह बेहद भयानक और शर्मनाक है। गौरतलब है कि अकादमी दफ्तर में सचिव ही सर्वेसर्वा बॉस की तरह होता है। पीड़ित के ख़िलाफ़ प्रोबेशन पीरियड के एक दिन पहले अयोग्यता/अक्षमता के नाम पर की गई कार्रवाई को दुर्भावनापूर्ण माना जा रहा है और इसके पीछे सचिव के श्रीनिवास राव को ही ज़िम्मेदार माना जा रहा है।

हिन्दी के वरिष्ठ कवि असद ज़ैदी ने शनिवार शाम को एक अंग्रेजी वेबसाइट में छपी इस ख़बर को अपनी टिप्पणी के साथ फेसबुक पर शेयर किया तो साहित्यकारों की प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गईं। असद ज़ैदी ने लिखा, “Will this outrage make the literary community sit up and take notice?

साहित्य अकादेमी के बारे में बस यही सुनना बाक़ी था।

यौन उत्पीड़न और पीड़िता की बरख़ास्तगी का यह मामला एक राष्ट्रीय संस्थान और उसके सचिव के आचरण ही की बात नहीं है, बल्कि तमाम लेखकों और साहित्यिक बौद्धिकों की परीक्षा की घड़ी है।

अकादेमी का सालाना जश्न ‘साहित्योत्सव’ शुरू ही होने वाला है, जिसका भारी भरकम, महंगा, गरिमाहीन, बल्कि नवधनाढ्य क़िस्म की अश्लीलता से रंगा निमंत्रण पत्र लेखकों तक पहुंच चुका है।

क्या यह जश्न एक जश्न की तरह मौज में गुज़र जाएगा? जैसे कुछ हुआ ही न हो? जैसे हमें क्या? या फिर कहा जाएगा, “मामला कुछ जटिल है!”?

श्रीनिवास राव

वरिष्ठ कवयित्री और एक्टिविस्ट शुभा ने इस मसले पर कड़ी नाराज़गी जाहिर करते हुए अकादमी के घेराव की मांग की। उन्होंने लिखा, “लेखकों को साहित्य अकादमी का घेराव करना होगा। यह आदमी (के श्रीनिवास राव) फैसला आने तक सस्पैंड होना चाहिए और असम की उत्पीड़ित ऑफिसर की नौकरी तुरंत बहाल की जाने की ज़रूरत है। यह शर्मनाक अपराध है। राष्ट्रपति को इस सन्दर्भ में तुरंत बयान देना चाहिए। यह उनकी ज़िम्मेदारी है।“

मशहूर कवयित्री-एक्टिविस्ट कात्यायनी ने पीड़ित पर ही कार्रवाई की तीखी निंदा की। जनचौक से बातचीत में उन्होंने कहा कि वे साहित्य अकादमी के कार्यक्रमों में पहले ही नहीं जाती हैं। लेखकों को साहित्य अकादमी का बहिष्कार करना चाहिए। इस बारे में चुप नहीं रहना चाहिए और व्यापक विरोध के दूसरे रास्ते भी अपनाने चाहिए।

समयांतर पत्रिका के संपादक और वरिष्ठ लेखक पंकज बिष्ट ने जनचौक को कहा कि भारत में दफ़्तरों में महिलाओं को इस तरह की भयानक स्थितियों से गुज़रना पड़ता है। कला, साहित्य, संस्कृति का प्रतिनिधित्व करने वाली साहित्य अकादमी जैसी संस्था में कोई वरिष्ठ अधिकारी इस तरह की हरकत करे और उस पर लेखक बोलने के बजाय अगल-मगर करें तो कलाओं या संस्कृति से या अधुनिक मूल्यों से संबंध का कोई मतलब नहीं रह जाता है।

उन्होंने कहा कि शिकायत करने वाली अधिकारी के खिलाफ़ जिस तरह प्रोबेशन पीरियड पूरा होने से एक दिन पहले कार्रवाई की गई, उससे अकादमी के सचिव के श्रीनिवास राव के बारे में अपराध की शिकायत को और मज़बूती मिलती है। शिकायत की जांच पूरी होने से पहले अकादमी ने जिस तरह यह फ़ैसला लिया, वह नैतिक रूप से और सिंद्धांत के तौर पर भी ग़लत है।   

इस बारे में जनचौक ने जनवादी लेखक संघ (जलेस) के स्टैंड के बारे में उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष असग़र वजाहत से बात की। वजाहत ने इस बारे में संगठन के महामंत्री मुरली मनोहर प्रसाद सिंह से बात करने की सलाह दी कि वे इस बारे में मीटिंग बुलाते हैं या क्या करते हैं। इस बारे में उनकी व्यक्तिगत राय पूछी गई तो उन्होंने इस बारे में अपनी अज्ञानता का हवाला दिया।

जलेस के महामंत्री से तो बात नहीं हो सकी पर जलेस के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष जवरी मल्ल पारख ने इस मसले पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में सबसे पहली ज़रूरत आरोपी को संस्पैंड करने की ही होती है ताकि वह न तो शिकायतकर्ता को परेशान कर सके और न जांच को प्रभावित कर सके। उन्होंने अपनी फेसबुक वॉल पर भी लिखा – “बहुत ही शर्मनाक घटना। लेखकों को आगे आकर उस महिला अधिकारी के समर्थन में खड़े होना चाहिए। उन्हें न केवल तत्काल प्रभाव से नौकरी पर वापस लिया जाना चाहिए बल्कि साहित्य अकादमी के सचिव को सस्पेंड कर मामले की जांच की जानी चाहिए।“

वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल ने कहा कि इस घटना की निन्दा की जानी चाहिए। शिकायतकर्ता के ख़िलाफ़ कार्रवाई ग़लत है। अकादमी के पदाधिकारियों में कुछ बोल पाने का साहस नहीं है। भाजपा के शासन में अकादमी को यूं भी लगातार बर्बाद किया जा रहा है। उसका बजट भी कम कर दिया गया है। वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना ने कहा कि उन्हें इस बारे में जानकारी नहीं है लेकिन अगर शिकायत करने की वजह से महिला अधिकारी के खिलाफ़ कार्रवाई की गई है तो यह अन्याय है। इससे यह संदेश जाएगा कि कोई महिला यौन शोषण की शिकायत न करे। उन्होंने मांग की कि महिला अधिकारी को बिना देरी किए नौकरी पर वापस लिया जाए।     

जन संस्कृति मंच के सीनियर एक्टिविस्ट और जाने-माने अलोचक आशुतोष कुमार ने भी कवयित्री शुभा की मांग से सहमति जताते हुए के श्रीनिवास राव को फैसला आने तक सस्पैंड करने और उत्पीड़ित ऑफिसर की नौकरी तुरंत बहाल करने की ज़रूरत जताई। उन्होंने राष्ट्रपति से इस बारे में तुरंत बयान देने की मांग भी की। आशुतोष कुमार ने कहा कि उनका संगठन भी इस मामले में पीड़ित महिला के साथ है।

वरिष्ठ कवयित्री सविता सिंह को जनचौक ने फोन किया तो उन्होंने कहा कि इस बारे में उन्हें जानकारी नहीं है। उन्होंने कहा कि वे ख़ुद साहित्य अकादमी के कार्यक्रमों में नहीं जाती हैं। इस बारे में उन्होंने दो घंटे बाद फोन करने के लिए कहा ताकि वे इस मामले के बारे में जान सकें। बाद में फोन करने पर उन्होंने बताया कि ख़बर का लिंक नहीं खुल पाने के कारण वे इस बारे में कुछ नहीं कह सकती हैं।

वरिष्ठ लेखिका मैत्रेयी पुष्पा ने जनचौक से बात करते हुए सवाल उठाया कि जब यौन शोषण का पहला अटेम्पट किया गया तो तभी क्यों नहीं बताया गया। उन्होंने कहा कि मीटू के बारे में उन्होंने कहा था कि सालोंसाल बोलने की हिम्मत क्यों नहीं की गई। अपनी नौकरी को दाँव पर लगाकर तुरंत बोलना चाहिए। यह क्या है कि लाभ भी लेती रहें और तुरंत पोल न खोलें। ज़रूरी बात के लिए लालच त्यागना पड़ता है। उसके लिए अवसर नहीं देखना पड़ता।

मैं तो उस समाज से आई हूँ कि घर या समाज में कोई उत्पीड़न हो तो तुरंत बोल दिया जाए। इस तरह की घटनाएं लेखन, फिल्म आदि हर जगहों पर हैं। लेकिन झेलते रहने का क्या मतलब है? बेचारी क्यों बनी रहती हैं? कुछ तो गंवाना पड़ेगा। झेलने लगती हैं तो वे डराने लगते हैं। फिर टर्मिनेट, स्स्पेंड वगैराह की धमकी देने लगते हैं। मैत्रयी पुष्पा से पूछा गया कि क्या वे आरोपी के बारे में कुछ कहना चाहेंगी तो उन्होंने कहा कि किसी विशेष आदमी के नहीं बल्कि हर उस आदमी के ख़िलाफ़ हूँ जो घटिया काम करता है। कोई किसी पद पर हो या नहीं हो, घटियापन के साथ तो मैं कभी नहीं हो सकती हूँ। 

(जनचौक के रोविंग एडिटर धीरेश सैनी की रिपोर्ट।)

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