Sat. Dec 7th, 2019

ईश्वर भारत को हिंदी प्रदेशों की संकीर्णता से मुक्ति दे!

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सुंदर सिंह, गोरखपुर।

पोस्टकार्ट पर इतना ही लिखा था। सुंदर सिंह के घर खत पहुंच गया। 1945 में आज के पाक अधिकृत मुज़फ़्फ़राबाद से सुंदर सिंह काम की तलाश में गोरखपुर आ गए थे। उनके पीछे भारत-पाकिस्तान बंटवारा हो गया, फिर वह अपने घर कभी नहीं लौट सके। कश्मीर में जब कबाइली हमला हुआ तब उन्होंने अपने परिवार के लोगों को निकालने के लिए बहुत मेहनत की। सेना उनके परिवार के सदस्यों को लेकर दिल्ली आ गई मगर एक बहन के दो बेटे ग़ायब थे।

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पोस्टकार्ड में उन्हीं दो बच्चों के जीवित होने की ख़बर थी। अर्जन सिंह और हरि सिंह। सुंदर सिंह गोरखपुर से फिर दिल्ली आते हैं। रक्षा मंत्री बलदेव सिंह से मिलते हैं। फाइलें बनती है, और दोनों बच्चे वापस आ जाते हैं।

इसी सुंदर सिंह का बेटा अमरदीप सिंह बड़ा होता है। सिंगापुर में नौकरी करता है। नौकरी की दुनिया छोड़ देता है। अपनी पहचान की जड़ों की तलाश में निकल पड़ता है। उसके भीतर का जुनून उसे पाकिस्तान ले जाता है। पहले 30 दिनों और दूसरी बार 90 दिनों के वीज़ा पर जाता है। बग़ैर रुके वह शहर-शहर, गांव-गांव भागता है। बंटवारे के साथ सिखों की विरासत का अस्सी फीसदी हिस्सा पाकिस्तान चला गया। उनसे हमेशा के लिए बिछड़ गया। यूपी, बिहार और दिल्ली से पंजाब बहुत दूर है। मगर पंजाब और पाकिस्तान के बीच सिर्फ एक लाइन है।

अमरदीप सिंह लाहौर में सिख डॉक्टर मीमपाल सिंह के घर जाते हैं, जिनके क्लिनिक के बाहर लिखा है, सरदार जी चाइल्ड हेल्थ क्लिनिक और पाकिस्तान का झंडा है। क्लिनिक के बोर्ड में सिख बच्चे की तस्वीर है। उनकी क्लिनिक में माइकल काम करता है। ईसाई है। माइकल की बाइक पर अमरदीप सिंह डेरा साहिब गुरुद्वारा जाते हैं। पाकिस्तान में अब बहुत कुछ ख़त्म हो चुका है। फिर भी काफी कुछ बचा है।

सिखों की नज़र से बंटवारे और भारत पाकिस्तान के बीच आज के तनाव को देखें तो इंसान होने में मदद मिलेगी। सिर्फ जान नहीं, मज़हब से जुड़ी यादें मिट गईं। चप्पे-चप्पे का इतिहास सिख इतिहास है। गुरु अर्जन देव ने जब गुरु ग्रंथ साहिब का संकलन किया तो पवित्र ग्रंथ की बाइंडिंग के लिए लाहौर भेजा। रास्ते में भाई बन्नो ने उसकी एक और कॉपी बना ली। महाराजा रणजीत सिंह के समय में मन्नत गांव में भाई बन्नो की याद में एक बड़ा गुरुद्वारा बनाया गया। 

अमरदीप सिंह ने जब मन्नत गांव जाकर पहली बार गुरुद्वारे को खंडहर की तरह देखा होगा तो सब कुछ कितना व्यर्थ लगा होगा। बंटवारे के समय यहां के बड़ी संख्या में सिख मार दिए गए और बचे हुए भारत आ गए। वे अपने साथ भाई बन्नो की लिखावट वाली गुरुग्रंथ साहिब ले आए जो कानपुर के गुरुद्वारे में है।

अमरदीप की किताब में बन्नो वाली वीर गुरुद्वारे की तस्वीर देखिए। गुरुद्वारा अब खंडहर हो चुका है। तब भी उसकी भव्यता किसी नई इमारत से शानदार है। हमारी मज़हबी मूर्खताओं ने हमसे बहुत कीमत वसूली है। हम अद्भुत और अनमोल विरासत को गंवा बैठे। यूपी बिहार के लोग समझ ही नहीं पाएंगे। वे कभी पंजाब नहीं हो पाएंगे। जो हिंसा के तमाम दौर को झेलते हुए एक गलियारा पाकर खुश है। एक रास्ता तो निकला है, जिनसे चलकर अपनी बची हुई विरासत को देख पाएंगे।

पंजाब को समझ आ गया है कि हिंदी प्रदेशों की थोपी हुई मूर्खताओं से एक दिन किनारा करना ही होगा। हम और आप पंजाब में नहीं हैं, इसलिए करतारपुर गलियारे का महत्व सिर्फ एक दर्शन तक सीमित नज़र आएगा। दिलों का दरियादिल होना नज़र नहीं आएगा। ईश्वर भारत को हिंदी प्रदेशों की संकीर्णता से मुक्ति दे।

अमरदीप सिंह ने दो खंडों में LOST HERITAGE The Sikh Legacy in Pakistan नाम से भारी भरकम और ख़ूबसूरत किताब बनाई है। हिमालय प्रकाशन ने छापी है। एमेज़ान पर उपलब्ध है। 4000 रुपये की है। किताब की सामग्री के हिसाब से यह किताब बहुत सस्ती है। अमरदीप कई खंडों में डाक्यूमेंट्री बना रहे हैं। उन रास्तों और जगहों से गुज़रते हुए, जिनसे बाबा नानक गुज़रे। नानक ने आज के हिसाब से नौ देशों की यात्रा की थी। बांग्लादेश से लेकर कैलाश मानसरोवर तक। यात्रा का 70 फीसदी हिस्सा आज युद्ध और हिंसा की चपेट में है। अमरदीप सिंह ने महायात्री नानक पर डाक्यूमेंट्री बना ली है। भारत के हिस्से का ही काम रह गया है।

अमरदीप ने बताया कि नानक आज के भारत के 22 राज्यों में जा चुके हैं। एक से डेढ़ साल में उनकी डाक्यूमेंट्री बन जाएगी।

अमरदीप सिंह जैसे जुनूनी से बात कर मेरा दिन सार्थक हुआ।

जानते रहिए। जीते रहिए।

(रवीश कुमार चर्चित टीवी पत्रकार हैं।)

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