#MeToo अभियान के फलक को करना होगा व्यापक

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अजय कुमार

हॉलीवुड के बड़े निर्माताओं में शामिल हार्वी वेंस्टीन पर कई महिलाओं द्वारा यौन उत्पीड़न और बलात्कार का आरोप लगाए जाने के  बाद अक्तूबर 2017 में शुरू हुआ #MeToo अभियान अब भारत में पहुंच गया है। इसके माध्यम से महिलाएं अपने खिलाफ होने वाले यौन उत्पीड़न को सोशल मीडिया पर शेयर कर रही हैं। इस अभियान ने भारत में नेता से लेकर अभिनेता तक समाज के हर हिस्से से जुड़े लोगों को अपनी चपेट में ले लिया है।अजय कुमार

यहां कुछ घटनाएं तो ऐसी हैं जो लगभग एक दशक पुरानी हैं। ऐसे में सवाल यह भी उठ सकता है कि अभी तक पीड़ित महिलाओं ने इसके खिलाफ आवाज़ क्यों नहीं उठाई? इसका जवाब चाहे जो भी हो लेकिन यह स्पष्ट है कि #मी टू अभियान उन महिलाओं के लिये एक बड़ा संबल बनकर उभरा है, जिन्होंने यौन शोषण के मामले में चुप्पी तोड़ते हुए खुलकर बात करने का साहस दिखाया है।

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#MeToo अभियान की शुरुआत एक अमेरिकी सामाजिक कार्यकर्ता तराना बुर्के द्वारा साल 2006 में की गई थी लेकिन यह चर्चा में तब आया जब अक्टूबर 2017 में अमेरिका में काम करने वाली इतालवी मूल की अभिनेत्री आसिया अर्जेंटो ने मशहूर फिल्मकार हार्वी वेंस्टिन पर आरोप लगा कर इसकी शुरुआत की थी। आसिया अर्जेंटो ने ट्विटर पर अपने यौन उत्पीड़न की बात को #MeToo के साथ दुनिया के सामने लाया। अक्तूबर, 2017 में हॉलीवुड के बड़े निर्माताओं में शामिल हार्वी वेंस्टिन पर कई महिलाओं ने यौन उत्पीड़न और बलात्कार के रोप लगाए थे।

सामाजिक कार्यकर्ता तराना बुर्के ने वर्ष 2006 में “मी टू” शब्द का उपयोग करना शुरू किया था और इस शब्द को वर्ष 2017 में अमेरिकी अभिनेत्री एलिसा मिलानो द्वारा तब लोकप्रिय बनाया गया था, जब उन्होंने महिलाओं को इसके बारे में ट्वीट करने के लिये प्रोत्साहित किया। इस आंदोलन को टाइम पत्रिका द्वारा “पर्सन ऑफ द ईयर” के लिये भी चुना गया था। 

इस तरह भारत में अभी हाल ही में बॉलीवुड अभिनेत्री तनुश्री दत्ता के साथ ही कई अन्य फिल्म और टेलीविज़न अभिनेत्रियों ने भी अपने यौन उत्पीड़न की बात को सार्वजनिक तौर पर स्वीकार किया है। कई अभिनेत्रियों ने तो बकायदा उनके नाम लेकर भी आरोप लगाए हैं जिन्होंने उनका यौन उत्पीड़न किया या करने की कोशिश की। इस तरह से #MeToo अभियान अब एक आंदोलन का रूप ले चुका है।

इस अभियान ने ज़ोर तब पकड़ा जब पत्रकारिता जगत से जुड़ी महिलाओं ने भी इस दिशा में अपनी बात सामने रखनी शुरू की। महिला पत्रकारों ने भी अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न को सार्वजनिक तौर पर सामने लाने का काम किया है, जिससे ऐसे लोगों के चेहरे सामने आए हैं जो अपने काम के क्षेत्र में काफी लोकप्रिय माने जाते रहे हैं ।

इसके साथ ही #MeToo अभियान क्या सामाजिक न्याय के व्यापक सवालों को भी उठायेगा। ये एक बड़ा सवाल बन गया है।  महिलाओं का शोषण और दोयम दर्जे का व्यवहार कोई फौरी मामला तो है नहीं। यह सवाल तो सामाजिक न्याय के व्यापक सवाल का हिस्सा है जो समाज की व्यापक संरचना के साथ जुड़ा है। ये बात अलग है कि #MeToo ने अभी सिर्फ मीडिया जगत और बॉलीवुड की घटनाओं तक खुद को सीमित रखा है। लेकिन जब तक यह व्यापक फलक में महिलाओं से जुड़े सवाल जिसमें दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक महिलाओं पर रोजाना हो रहे उत्पीड़न के मुद्दे नहीं उठायेगा यह सिर्फ चार दिनों के लिये मीडिया में सुर्खियां बटोरने वाला अभियान ही साबित होगा। 

इसलिये #MeToo को यदि एक आंदोलन का रूप लेना हैं तो उसे इसके लिये उसकी आवश्यक शर्तों को भी पूरा करना पड़ेगा। सामाजिक आंदोलन के तौर पर विस्तार पाने के लिए इसे अपनी एक वैचारिक पृष्ठभूमि भी तैयार करनी होगी। नतीजतन एक नेतृत्वकारी विचारधारा, आंदोलन का उद्देश्य और महिलाओं के मुद्दों पर व्यापक गोलबंदी उसके आवश्यक अंग हो जाते हैं। इसके साथ ही #MeToo  को बॉलीवुड और पत्रकारिता जगत तक से बाहर निकालकर अकैडमियां आदि क्षेत्रों तक ले जाना होगा। नौकरशाही से जुड़े सवालों को भी #MeToo को ही उठाना होगा। जहां महिला अधिकारियों के साथ शासन-प्रशासन अक्सर दोयम दर्जे का व्यवहार करता है।

दरअसल, महिलाओं के खिलाफ यौन उत्पीड़न पर लगाम ना लग पाने का एक बड़ा कारण है उत्पीड़न के बाद भी महिलाओं का अपने लोक-लाज को ध्यान में रखकर चुप्पी साध लेना। अगर महिलाएं मुखर होकर अपने साथ हुए अपराधों एवं अपराधियों को सबके सामने लाने लगें तो हालात बहुत जल्दी बदल सकते हैं। महिलाओं के न बोलने से अपराधियों के हौसले बढ़ जाते हैं। एक अच्छी बात यह है कि इसकी शुरुआत 2018 में #MeToo  के माध्यम से हो चुकी है। लेकिन इसको आगे ले जाने के लिए अभी कोई रोडमैप सामने नहीं आया है। 

मेरी प्यारी #MeToo  बहनों, 

हम इस देश की दलित-आदिवासी महिलाएं जो रोज ब रोज इस देश की सभ्य कही जाने वाली व्यवस्था में बलात्कार और अनेक प्रकार के शोषण और उत्पीड़न का शिकार होती हैं। थानों में हमारी रिपोर्ट तक दर्ज नहीं की जाती है। वहां से दुत्कार कर भगाया जाना हमारी नियति बन चुकी है। मामला यही तक सीमित नहीं होता है। कई बार तो बलात्कार की शिकार महिला का ही थाने में बलात्कार कर दिया जाता है। और उसको अंजाम देने का काम खाकी वर्दीधारी करते हैं। न ही हम आप की तरह पढ़ी-लिखीं है और न ही कोई बड़ी पत्रकार, एंकर, लेखक, लेखिका और न ही कोई सेलीब्रिटी। न ही आप की तरह स्मार्ट जिसकी बात पुलिस आसानी से मान ले। हमें तो कई सालों तक सामने वाले द्वारा किए गए गुनाहों के सबूत देने पड़ते हैं।

ऐसे में हमारे पास रास्ता कहां बचता है। तमाम तरह के कानूनी प्रावधानों के बावजूद भी हमारी व्यवस्था ऐसी ही है। वैसे भी जिस तरह से आपको लोग और मीडिया हाथों-हाथ ले रहे हैं वैसा मेरे मामले में नहीं होता। कभी-कभार अखबार के किसी कोने में जगह मिल जाना ही हम लोगों के लिए बड़ी बात होती है।

बहरहाल इतने सालों बाद भी पूरी मजबूती के साथ खड़े होने के लिए आप लोगों की हिम्मत को सलाम। सलाम इस बात के लिए भी कि आप लोगों ने बंद कमरों में कामकाज के हालातों की सचाई समाज के सामने लाने का काम किया। हमें आप लोगों से कोई शिकायत नहीं है। दर्द एक जैसा ही है। बस फर्क है तो हमारी तुम्हारी जाति का। अमीरी और गरीबी का। काली और गोरी चमड़ी का। इसलिये हमें कुछ और भी चिंता सता रही है। 

कहते हैं कि आज भी बहुत सारी जगहों पर महिलाओं, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यक समूहों की भागीदारी कम है। जैसे अखबार, मीडिया, विश्वविद्यालय, शोध संस्थान आदि। मेरी प्यारी बहनों आप लोगों से अपील है कि जिस तरह का हमारा समाज है। जो बलात्कार जैसी घिनौनी चीजों में भी जाति के आधार पर चीजों को तय करता है। वहां ऐसे समाज से जुड़े लोगों की परेशानी और पीड़ा को आसानी से समझा जा सकता है।

अंत में आप से पूरी आशा और उम्मीद है कि अपने दर्द में इस हिस्से के दर्द को भी शामिल करेंगी। समाज में खुलेमाम घूम रहे दानवों से हम भारत की जनता को न्याय और सुरक्षा की दरकार है। इस देश में हिन्दू, मुस्लिम, दलित, आदिवासी और कमजोर तबकों की बच्चियों और महिलाओं के साथ बलात्कार और उसके बाद उनकी हत्या होना आम बात है। मामला तब और पीड़ादायक हो जाता है जब सजा मिलने की जगह बलात्कारी खुलेआम घूम रहा होता है। ऐसे हैवान किसी राजनीतिक दल से जुड़े होते हैं या फिर अपने इलाके का कोई रसूखदार या फिर दबंग शख्स होता है।

मंदसौर की आठ साल की मुस्लिम बच्ची के साथ बलात्कार होता है। लखनऊ के 17 साल की संस्कृति राय का बलात्कार करके उसकी हत्या कर दी जाती है। झारखण्ड के चतरा ज़िला में एक महिला के साथ बलात्कार करने के बाद उसकी निर्मम तरीके से हत्या कर दी जाती है। छत्तीसगढ़ में ना जाने कितनी आदिवासी बच्चियों का बलात्कार हुआ और उनकी हत्या कर दी गई। बिहार में दलित समाज पर अत्याचार हत्या और दलित महिलाओं के साथ बर्बरता पूर्वक दबंगों द्वारा बलात्कार की लंबी लिस्ट और उसका इतिहास है। 

हमारा समाज पहले से ही बीमार और रोगी है, हिंसा का मामला सिर्फ सरकारों तक सीमित नहीं है,  इसने अब विचारधारा का रूप ले लिया है। एक अंतरराष्ट्रीय एजेंसी ‘थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन‘ का अपने सर्वे में कहना है कि भारत अब महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं है। वैसे भी भारत उन देशों की फेहरिस्त में शुमार है जो महिलाओं के लिए सबसे ज्यादा असुरक्षित जगहों से एक है। रेप, एसिड अटैक, अपहरण जैसी कई तरह की घटनाओं के चलते भारत को सुरक्षित नहीं माना गया है।

बीच में निर्भया काण्ड के समय ऐसा महसूस हुआ था, जैसे देश अब महिला अत्याचारों के विरुद्ध मुखर हो रहा है। पर सरकारों की नाकामियों की वजह से बलात्कार और छेड़छाड़ जैसी घटनाओं में देरी से होने वाली सुनवाई के कारण अभी भी स्थिति जस की तस है। कभी बलात्कार के आरोपी जुवेनाइल एक्ट की वजह से बच निकलते हैं, तो कभी बदनामी के डर से बलात्कार और अन्य घरेलू हिंसाओं से जूझने वाली महिलाएं आगे नहीं आतीं। 

लिहाजा बलात्कार के अधिकतर मामलों में अपराधी सज़ा से बच जाते हैं। यानी महिलाओं पर होने वाले समग्र अत्याचारों में सज़ा केवल 30 फीसदी गुनाहगारों को ही मिल रही है। ऐसे में अगर बलात्कारियों और यौन उत्पीड़न करने वालों का हौसला बुलंद होता है तो यह अस्वाभाविक नहीं है। भारत में हर एक घंटे में 22 बलात्कार के मामले दर्ज होते हैं। अधिकांश मामले में तो पुलिस रिपोर्ट दर्ज करती ही नहीं है। दूसरे लोकलाज के कारण ऐसे मामलों को पीड़िता के परिजनों द्वारा दबा दिया जाता है।

(डॉ. अजय कुमार शिमला स्थित भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान में फेलो हैं।)

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