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शिक्षक दिवस पर विशेष: ‘गुरुओं ने खत्म की अंधभक्ति की गुंजाइश’

नित्यानंद जी से पढ़ने-सीखने का सुयोग मेरे बहुत से दोस्तों को नहीं मिला, खास कर पटना में सर गणेश दत्त पाटलिपुत्र हाई स्कूल, बीएन कॉलेज के ढेर सारे साथियों को, मेरे बहुत सारे भाइयों-रिश्तेदारों को भी नहीं। डीयू के नित्यानंद तिवारी जी से। मिला होता तो उनकी   बहुत सारी कुंदजहनी छिल-छंट गई होती। बीएन कॉलेज के महेश्वर का ही संग मिल गया होता, तब भी। 

महेश्वर शरण उपाध्याय बमुश्किल पांच-सात साल बड़े रहे होंगे। मैं एकाध साल घूम-भटक कर बीए हिन्दी आनर्स करने पहुंचा था और वह शायद बीएचयू से एमए कर लेक्चरार हो गये थे। तब इसके लिए एमए में अच्छा करना ही काफी होता होगा। और शिक्षकों की सेवा-टहल, उनकी हां में हां करना या कम से कम उनसे असहमत नहीं होना, जो अच्छा करने की शर्त रही होती तो मेरा अनुमान है कि महेश्वर के लिये अच्छा करना असंभव ही होता।

गुरुत्व में उनका भरोसा न था -न मानने में, न होने में। मुझे याद है, हिन्दी विभाग की ओर जाते हुये उन पर नज़र पड़ गयी थी। वह क्लास की ओर आ रहे थे। वह ऐन सामने थे। शायद दूसरी या तीसरी ही क्लास रही होगी। पता नहीं क्यों मैं मिस कर गया था। मैं झुका, चरण स्पर्श की मुद्रा में। तब हल्की लचक के साथ घुटना छू लेने की दिल्ली की रवायत से वाकिफ नहीं था। महेश्वर ने बीच में ही पकड़ लिया – दोनों बाजुओं से थामा नहीं, बल्कि एक बांह पकड़ ली और पकड़ की ही तरह सख्त लहजे में बोले, ‘‘यह क्या है? मैं तो पसंद नहीं करता यह सब…।’’

अब शब्दशः तो याद नहीं, 27-28 साल का गर्द-गुबार जम गया है, पर उन्होंने आगे जो जोड़ा था, उसका आशय यह था कि ‘बहुत सारे ऐसे शिक्षक मिलेंगे, मिले भी होंगे, जिन्हें यह अच्छा लगता होगा, जो चाहते भी होंगे कि चेला पैर छुये, बिना यह विचारे कि मन में सम्मान कतई न हो, पैरों पर तो तब भी झुका जा सकता है। पर आपकी भी तो पसंद-नापसंद होगी। आप लकीर पीटेंगे तो चाहे लकीर मैंने बनायी हो, यह विवेक का रास्ता नहीं होगा। और केवल गुरु नहीं, जो कोई भी समझ का, दुनिया को देखने का अपना नजरिया विकसित करने में आपका साथी, आपका भागीदार नहीं है, उसका सम्मान या तो रवायत होगी या चालाकी। वही नहीं, डीयू के, गुरुवर विश्वनाथ त्रिपाठी भी इस रवायत और चालाकी से मुतमईन नहीं रहे। बल्कि मेरे दिवंगत मित्र दीपक ने अपने डेजर्टेशन में जब उन पर ‘वहशीपन का शिकार हो जाने’ का तंज किया तब भी त्रिपाठी जी ने इसे दीपक का क्षोभ ही माना, स्वयं को लेकर उसका अनादर-भाव नहीं। गुरुवर ने अपनी किताब ‘गुरुजी की खेती-बारी’ में इस प्रसंग का लम्बा जिक्र किया है। उनसे मिली एक और टीप बेसाख्ता याद आ रही है, लेकिन उस पर बाद में, फिलहाल तो यह कि महेश्वर ने उस दिन मेरे लिये अंधत्व का, भक्ति का रास्ता बंद कर दिया था।

नित्यानंद जी ने एक नया आयाम उद्घाटित किया।

सभी शिक्षक, सबको नहीं भाते। मुझे भी नहीं भाते थे। मूल्यांकन केवल शिक्षक ही नहीं करते, वही नहीं तय करते रहते हैं कि अलां स्टूडेंट कुछ अच्छा, फलां कुछ कम अच्छा, छात्र भी यह करते रहते हैं, अपनी तरह से। शायद कहीं पढ़ा भी था कि क्लास में मलयज की उपस्थिति ही गुरु विजयदेव नारायण साही के लिये पर्याप्त थी।

उन्हें यह छूट नहीं रही होगी कि मलयज की गैर-हाजिरी की हालत में वह क्लास में न जायें। यह विकल्प किसी शिक्षक के पास नहीं होता। छात्र के पास होता है। मेरे पास भी था। मुझे जो पसंद नहीं थे, दो-एक तजुर्बे के बाद मैं उनकी क्लास में जाना छोड़ देता था। उस दिन भी ऐसे ही एक शिक्षक क्लास में थे और मैं ऐन बाहर बैठा था। पता नहीं शिक्षक की निगाहों की जद में था या नहीं, पर अचानक नित्यानंद जी वहां से गुजरे। उनका मुख्तसर आदेश था, ‘‘यहां नहीं, कहीं और जाकर बैठो।’’

उन्हें शिक्षक चुनने की मेरी आजादी पर कोई एतराज नहीं था, क्लास से बाहर रहने के मेरे फैसले पर भी नहीं, बस सबक यह था कि जो आपके मनोनुकूल नहीं है, वह भी सम्मान का अधिकारी है।

इसी क्रम में एक आखिरी बात यह कि 1984-85 में किसी वक्त हम पार्क में बैठे थे, डीयू की लाइब्रेरी के सामने, स्वामी विवेकानंद की मूर्ति के आसपास कहीं। यह अक्सर होता था। हम कई छात्र और कुछ शिक्षक भी। कुछ तो छात्र-शिक्षक की दोहरी भूमिका में थे या दोनों के बीच मुहाने पर बैठे। अजय तिवारी, द्वारिका प्रसाद चारुमित्र, गोविन्द प्रसाद, प्रेम सिंह, तेज सिंह वैसे ही मित्रों में थे। तब पार्कों में ईंट-गारे-सीमेंट के गोल घेरे नहीं बने थे, जिन पर बैठा तो जा सकता है, पर ऐसे कि किसी का चेहरा किसी के सामने न रहे। आफिसों में ही नहीं, मीडिया संस्थानों में क्यूबिकल्स और पार्कों में ऐसे गोल घेरे संवाद और विमर्श की सहज आकांक्षा और प्रक्रिया के खिलाफ ‘आर्किटेक्चरल कांस्पीरेसी’ है और तब यह साजिश शायद शुरु नहीं हुई थी। सवाल, संवाद, विमर्श के खिलाफ साजिश की परिणति चैनल-दर-चैनल आभासी बहसों और चिचियाहटों में होना तो और बाद की परिघटनायें हैं। तो हम वहां या आर्ट्स फैकल्टी के बाजूवाले या पाली विभाग के साथ वाले पार्क में कहीं बैठ जाते थे – गोल घेरा बना कर। लोग आते जाते और घेरा बड़ा होता जाता।

उस दिन हम शायद किसी या किन्हीं नये कवियों की रचनायें सुनने और उन पर चर्चा के तयशुदा कार्यक्रम के साथ बैठे थे। हमने सप्ताह या पखवारे में एक ऐसी स्ट्रक्चर्ड बैठक करना तय किया था और शायद दो-एक आयोजन पहले भी हो चुके थे। बहरहाल, हुआ यह कि एक युवा कवि ने कवितायें सुनाईं और कवितायें तो अब बहुत याद नहीं, पर यह याद रह गया कि उनमें आइसबर्ग बहुत थे। वह भी इसलिये कि एक साथी ने अपनी बारी आने पर कवि से सीधे पूछ लिया था कि ‘देखा भी है कभी आइसबर्ग?’ इस मायने में लगभग उसी समय, कविताओं में चिड़ियों की बहुतायत निरापद थी। पर जब गुरुवर की बारी आयी तो कमाल हो गया। विश्वनाथ जी मुस्कुराये और बोले, ‘‘आपको सुनते हुये मुझे अपने प्रिय कवि बॉदलेयर की याद आ गयी।’’ उन्होंने एक हल्का सा वक्फा दिया, चिर-परिचित अंदाज में। कवि महोदय मुदित। मामूली कवि नहीं था बॉदलेयर। फ्रेंच प्रतीकवादियों के बीच वह खासा लोकप्रिय था और फ्रांसीसी कविता पर तो उसका ऐसा असर था, जैसा कथा-साहित्य में ‘मैडम बॉवेरी’ के लेखक गुस्ताफ फ्लावेयर का।

यह टिप्पणी किसी को भी आसमान पर पहुंचा देने के लिये काफी थी। हम गुरुवर की पूरी बात सुनने को उत्सुक थे। अपनी सहज नाटकीयता के साथ हंसी दबाते हुये वह बोल पड़े, ‘‘लेकिन इसमें खुश होने की कोई बात नहीं। बीसवीं सदी के इस आखिरी दशक में भारत में किसी युवा कवि को सुनते हुये अगर उन्नीसवीं शताब्दी का एक पतनशील फ्रांसीसी कवि याद आ जाये तो यह प्रसन्नता की नहीं, चिंता की बात होनी चाहिये।’’ उन्होंने कहा नहीं कि बॉदलेयर कला, कला के लिये के सौन्दर्यशास्त्रीय सिद्धांत का आरम्भिक प्रवक्ता था। यह भी नहीं कि वह समाज में आध्यात्मिक और नैतिक मूल्यों के लोप का उत्सव मनाता, सेक्स, क्षय और मृत्यु के गीत गाता कवि था। ‘फ्लावर्स ऑफ इविल’ संग्रह की एक कविता में वह कहता भी है कि ‘‘अब तक नहीं हुए हैं/ जनसंहार, दंगे, हत्या और बलात्कार /हमारे सुख में शामिल/ नहीं हुए हैं ये सब, हमारे सौभाग्य/ तो महज इसलिये कि/ हममें साहस अब भी कम है।’’

गुरुवर विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा तो यह भी नहीं था, लेकिन टीप महत्वपूर्ण थी कि पसंद अलग मसला है, मूल्यांकन या मूल्य निर्णय अलग। कोई साहित्यकार, कलाकार, अभिनेता और नेता भी किसी एक छोटे-बड़े गुण-अवगुण के कारण आपको प्रिय-अप्रिय हो सकता है, कई बार सापेक्षता के सिद्धांत या एलीमिनेशन की प्रक्रिया में भी, पर उसका मूल्यांकन तो उसके सकल अवदान के आधार पर ही होगा। अलबत्ता महेश्वर ने अंधत्व की और अंध-भक्ति की गुंजाइश नहीं खत्म कर दी होती तो अवदान के मूल्यांकन का सवाल ही कहां पैदा होता!

और हमारा जो यह खास समय है, यह इस बात की गवाही है कि महेश्वर, नित्यानंद तिवारी और विश्वनाथ त्रिपाठी जैसे शिक्षक पाना और उन्हें अपने लिये उपलब्ध कर लेना सबके लिये संभव नहीं।

(राजेश कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

This post was last modified on September 5, 2019 9:53 am

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