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जन्म शताब्दी विशेषः अपेक्षित सम्मान से वंचित रह गए ‘महाराष्ट्र के गोर्की’ अन्नाभाऊ साठे

एक जुट का नेता हुआ मजदूर तय्यार!
बदलने दुनिया सारी गरज रही ललकार!
सदा लड़े, मरने से उसे ना मिले शांति
मर मर के दुनिया सजा के जीने की भ्रांति
उठा क्रोध से लड़ाई लड़ने
तूफान बांध कर बांध तोड़ने
निश्चय हुआ पैर उठे, चलने लगा करने नया प्रहार!!
मध्ययुग की जीर्ण हड्डियां है निरंकुश राज्य
स्वदेशी धनिकों ने फैलाए विदेशी सापरा साम्राज्य
फाड़के बुरका खोले दुनिया को दिखलाओ
जगाकर रंगमंच समरभूमि में जाओ
अब हमारा, यह आखिरी उठाया वार नहीं चूकनेवाला!!
किसान और दलित जनों को लेकर पीठ पर
जनतंत्र क्रांति के अपने एक नारा के लिए
कोटि कर हाथों ने झंडा लाल फहराया
मेघ समान अब राह पकड़कर हमारी
आगे चला रण में गरजा, करके अपना दृढ़ संकल्प
एकजुट जनता की साधकर जनराज्य की कर रचना
पूर्ण जनतंत्र लाकर, गाएं फिर यशगान
प्रकाशमय आसमान, अंतत: वर्ग-विहीन भारत का करें निर्माण
बंध तोड़े, कदम प्रथम, आगे बढ़ो पीछे न हटो…

साहित्यकार और लोकशाहीर, जनकवि, कॉ. अन्नाभाऊ साठे का दुनिया बदलने कि अपील करने वाला ये गीत लगभग सात-आठ दशकों से मजदूर वर्ग के आंदोलन में शामिल है। यह उनका जन्म शताब्दी वर्ष है। 1 अगस्त, 1920 कॉ. अन्नाभाऊ का जन्मदिन है। उनका जन्म दलित समझी जाने वाली मातंग जाति में हुआ था। अन्नाभाऊ को साहित्य रत्न, लोकशाहीर के नाम से सारी दुनिया जानती है, लेकिन यह महान कलाकार, साहित्यकार, लोकशाहीर मजदूर आंदोलन के माध्यम से कैसे उभरा, उनके क्रांतिकारी गीत, साहित्य की वैचारिक नींव जिस मजदूर कम्युनिस्ट आंदोलन ने डाली, उसका सच्चा इतिहास और उनका प्रत्यक्ष कार्य इस जन्म शताब्दी के अवसर पर जानना महत्वपूर्ण है।

कॉ. अन्नाभाऊ 1930 के दशक में तत्कालीन सतारा जिले में अपने मूल जन्मस्थली वाटेगांव को छोड़ कर मां-बाप के साथ बचपन में ही बंबई (अब बंबई) आ गए। यहां आने के बाद सर पर बोझा ढोया। फेरीवाले काम से लेकर कपड़ा मिल में हेल्पर (पोऱ्या) का काम किया। लाल बावटा मिल वर्कर्स यूनियन के नेतृत्व में बंबई में 1934 की ऐतिहासिक हड़ताल हुई। अन्नाभाऊ उस आंदोलन में एक मजदूर के रूप में प्रत्यक्ष भागीदार थे।

हड़ताल के दौरान शिवड़ी क्षेत्र में कार्यकर्ताओं और पुलिस के बीच झड़पें हुईं, उसके भी वे साक्षी रहे। ये हड़ताल मिल मजदूरों के संघर्ष में शहीदों तथा दलित समुदाय के परशुराम जाधव की याद में 23 अप्रैल, 1934 को शुरू हुई थी। सभी मिलों के गेट पर परशुराम जाधव के पोस्टर लगाए गए थे। इसी से अन्नाभाऊ श्रमिक आंदोलन की तरफ़ आकर्षित हुए, लेकिन कम्युनिस्ट आंदोलन के साथ उनका सीधा संबंध तब हुआ जब वे 1935-36 में बंबई के धारावी के पास ‘माटुंगा लेबर कैंप’ के पास एक गंदी झुग्गी में रहने चले गए। उस समय बड़ी संख्या में दिहाड़ी निर्माण श्रमिक, महानगरपालिका, रेलवे, गोदी कर्मचारी वहां झोंपड़ियों में रहते थे।

इन श्रमिकों को एकजुट करना और उनका संगठन बनाने का काम तत्कालीन कम्युनिस्ट नेता और डॉ. भीमराव बाबासाहेब अंबेडकर के ऐतिहासिक ‘महाड सत्याग्रह’ के प्रमुख सहयोगी कॉ. आरबी मोरे कर रहे थे। उनके साथ कॉ. केएम सालवी थे, जो अंबेडकर के नेतृत्व में हुए ‘कालाराम मंदिर सत्याग्रह’ में अग्रणी कार्यकर्ताओं में से एक थे।

समाजवादी विचारधारा के रूबरू
अन्नाभाऊ उन नेताओं और कार्यकर्ताओं के संपर्क में आने वाले पहले व्यक्ति थे, जो इस तरह के सामाजिक आंदोलन के माध्यम से आत्मजागरूक हुए थे। उनसे, अन्नाभाऊ को सामाजिक असमानता और अन्याय के खिलाफ़ संघर्ष के बारे में पता चला। इसी तरह उन्हें दुनिया भर के कामकाजी लोगों के शोषण, उत्पीड़न के खिलाफ वे कैसे लड़े, कैसे संघर्ष किया, रूसी क्रांति, वहां के श्रमिकों के समाजवादी राज्य की स्थिति आदि के बारे में पता चला।

उस समय, कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा मजदूर आंदोलन में श्रमिकों की वैचारिक जागरूकता बढ़ाने के लिए कॉ. आरबी मोरे, कॉ. बीटी रणदिवे, कॉ. एसवी देशपांडे आदि नेताओं के जरिये मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारधारा पर श्रमिकों का एक स्टडी सर्कल चलाया जाता था। इस अध्ययन वर्ग से कामगारों का पहला काडर निकला, जिसमें कॉ. सालवी, कॉ. शंकर नारायण पगारे, कॉ. किसन खवले, कॉ. सरतापे आदि थे।

बाद में उनके साथ, कॉ. अन्नाभाऊ ने भी इस मुहिम में भाग लेना शुरू कर दिया। इसी लेबर कैंप में कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर अन्नाभाऊ को अक्षरों का ज्ञान हुआ। वहीं पर उन्होंने मराठी भाषा में शाब्दिक रूप से क, ख, ग तक सीखा। (क्योंकि अस्पृश्यता के कारण उन्हें बचपन में ही स्कूल छोड़ना पड़ा था।) वर्णमाला की पहचान के बाद, उन्होंने शुरू में दुकानों के नामफलक और फिल्मों के पोस्टर पढ़ना शुरू किया। बाद में, उन्होंने ‘लेनिन का चरित्र’, रूसी क्रांति के प्रसिद्ध लेखक मैक्सिम गोर्की का उपन्यास ‘मां’, ‘रूसी क्रांति का इतिहास’, ‘श्रमिक साहित्य मंडल’ द्वारा मराठी में प्रकाशित मार्क्स-एंगेल्स का ‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र’, श्रमिक आंदोलन से निकलने वाली ‘बंबई कामगार’ साप्ताहिक पत्रिका आदि पढ़ना शुरू किया। इसी तरह वे कार्यकर्ताओं से मूल मामले को समझने लगे। इससे अन्नाभाऊ की राजनीतिक, सामाजिक तथा वैचारिक समझ बढ़ने लगी।

दलित युवक संघ की स्थापना
इसी दरमियान कॉ. आरबी मोरे के मार्गदर्शन में, कॉ. सालवी के सहयोग से अन्नाभाऊ ने माटुंगा लेबर कैंप में ‘दलित युवक संघ’ नामक एक युवा संगठन की स्थापना की और बेरोजगार युवाओं को संगठित करने और उन्हें राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन में शामिल करने की कोशिश की। इस तरह अन्नाभाऊ ने कम्युनिस्ट पार्टी, मजदूर आंदोलन में सक्रिय भाग लेना शुरू कर दिया।

1936-37 की इसी अवधि के दौरान, अन्नाभाऊ कम्युनिस्ट पार्टी के एक आधिकारिक सदस्य बन गए और उन्होंने पार्टी के सक्रिय सदस्य के रूप में काम करना शुरू कर दिया। पार्टी कार्यकर्ताओं के अनुरोध पर, उन्होंने तत्कालीन लेबर कैंप में मच्छरों के बारे में पहला गीत लिखा। उस समय, श्रमिक शिविरों में रहने वाले कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता कॉ. शंकर नारायण पगारे को पहले से ‘अंबेडकरी जलसे’ का अनुभव था। उनकी पहल से, अन्नाभाऊ ने श्रम शिविर में कम्युनिस्टों के प्रभाव में ‘दलित युवक संघ’ की पहली कला मंडली का गठन किया। इस तरह अन्नाभाऊ मजदूर-काश्तकारों के आंदोलन पर गीत लिखने लगे। उसी समय, कम्युनिस्टों की पहल पर बंबई में श्रमिकों के जो आंदोलन और लडाईयां शुरू थीं, उनमें (जैसे कपड़ा मिलों के गेट पर तथा मजदूरों की सभाओं में) अन्नाभाऊ और उनके सहयोगियों ने गाना शुरू किया।

प्रगतिशील लेखक संघ के सदस्य
इसी समय, 1936 में राष्ट्रीय स्तर पर, कम्युनिस्टों की पहल पर प्रगतिशील विचारकों की एक संस्था ‘प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन’ का गठन हुआ था। इनमें से अधिकांश लेखक रूस में समाजवादी क्रांति से प्रभावित थे। इनमें प्रेमचंद, सज्जाद ज़हीर, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, कृश्न चंदर, इस्मत चुग़्ताई, ख़्वाजा अहमद अब्बास, मंटो, मख़दूम मोहिउद्दीन, राजेंद्र सिंह बेदी, राहुल सांकृत्यायन, मुलकराज आनंद, कैफ़ी आज़मी, सरदार अली जाफरी, मजरूह सुल्तानपुरी आदि कई लोग शामिल थे।इनमें से कुछ लोगों के साहित्य के साथ ही गोर्की, चेखव, तुर्गनेव, टॉलस्टॉय, मायकोव्स्की आदि मराठी में प्रकाशित हो रहे थे। उसे अन्नाभाऊ भी पढ़ते थे।

उस साहित्य का वैचारिक प्रभाव अन्नाभाऊ पर भी पड़ने लगा। उसी से, उनको कहानी, नाटक, उपन्यास लिखने की प्रेरणा मिली। कम्युनिस्ट आंदोलन एक अंतरराष्ट्रीय आंदोलन था। उससे जुड़ने का अर्थ अंतरराष्ट्रीय राजनीति का परिचय भी था। दुनिया में जिस-जिस देश में साम्राज्यवाद, पूंजीवाद, फासीवाद और मेहनतकश जनता के शोषण के खिलाफ मुक्ति संघर्ष चल रहे थे, उनकी परिछाया यहां के आंदोलनों में दिखाई देती रही। यहां के कम्युनिस्टों द्वारा किए जाने वाले प्रतिरोध में इनकी झलक मिलती रही।

इन सबका असर अन्नाभाऊ की विचारधारा पर होने लगा और इससे उन्हें वैश्विक दृष्टिकोण का अहसास होने लगा। 1936 में स्पेन में फासीवाद उभरना शुरू हुआ और इसके खिलाफ संघर्ष शुरू हुआ। उसकी रिपोर्ट कम्युनिस्ट पत्रिकाओं में छपने लगीं, जिन्हें अन्नाभाऊ नियमित रूप से पढ़ते। इसे पढ़ने और कॉमरेडों के साथ चर्चा करने के बाद 1939 में, उन्होंने स्पेन के फासीवाद के खिलाफ पहला ‘स्पैनिश पोवाडा’ (लोकगीत का एक रूप जिसे गायन की लोक-शैली में प्रस्तुत किया जाता है) लिखा जिसे लेकर बंबई के मिल वर्कर्स यूनियन की ओर से मजदूर वर्ग में कई कार्यक्रम आयोजित किए गए थे। लोगों ने पहली बार अन्नाभाऊ को शायर के रूप में पहचाना और सराहा।

सांस्कृतिक जागरण
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान, फासीवादी हिटलर ने सोवियत रूस पर आक्रमण कर दिया। लाल सेना ने हिटलर के फासीवाद के खिलाफ जोरदार संघर्ष किया। इस सबका बखान करने वाला एक पोवाडा अन्नाभाऊ ने 1942 में लिखा। इसे काफी लोकप्रियता मिली। बंबई में मज़दूर आंदोलनों में इसका जोरदार स्वागत हुआ और अन्नाभाऊ की लोकप्रियता भी बहुत बढ़ गई।

कम्युनिस्ट पार्टियों के आयोजनों में भी ‘स्टेलिनग्राद का पोवाडा’ के विशेष कार्यक्रम हुए, जिसे कम्युनिस्ट पार्टी के तत्कालीन नेताओं ने देखा था और अन्नाभाऊ की प्रशंसा भी की थी। केवल इतना ही नहीं, बल्कि पार्टी ने `स्टेलिनग्राद का पोवाडा` नामक एक पुस्तिका भी प्रकाशित की, जिसे लोगों में वितरित किया गया।

1938 से 1943-44 तक, शायर अन्नाभाऊ और उनके साथियों ने बंबई के गिरणगांव में चल रही हड़तालों, आंदोलन, संघर्षों के समर्थन में कला मंडली की ओर से विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन करके कार्यकर्ताओं में जागरूकता पैदा करने का बड़ा काम किया। इस कला मंडली के माध्यम से होने वाले सांस्कृतिक जागरण का फायदा कम्युनिस्ट आंदोलन को पहुंचाने के लिए पार्टी ने सांस्कृतिक मोर्चे पर विशेष ध्यान देने का निर्णय लिया।

संयुक्त कला मंडली स्थापित
इस बीच, 1943 में बंबई में कम्युनिस्ट पार्टी का पहला सम्मेलन आयोजित किया गया था, जिसमें कॉमरेड पीसी जोशी को अखिल भारतीय सचिव चुना गया। उनके लेखकों और कलाकारों के साथ घनिष्ठ संबंध थे। चूंकि कम्युनिस्ट पार्टी का केंद्रीय मुख्यालय बंबई में था, इसलिए महाराष्ट्र के प्रमुख कवि कलाकारों को एक साथ लाने के लिए बंबई में एक संयुक्त कला मंडली स्थापित करने का निर्णय लिया गया।

इसके लिए पार्टी नें बार्शी-सोलापूर से शाहीर कॉ. अमर शेख और कोल्हापूर से कॉ. दत्तात्रय गव्हाणकर को बंबई बुलाया था। 1944 में, माटुंगा लेबर कैंप में इन तीन प्रमुख कवियों और अन्य कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं और कलाकारों की भागीदारी के साथ ‘लाल बावटा कला पथक’ नामक एक ऐतिहासिक कला मंडली का गठन किया गया था, जिसके प्रमुख कॉ. अन्नाभाऊ साठे, कॉ. अमर शेख और कॉ. दत्ता गव्हाणकर थे। प्रबंधक के रूप में वावि भट थे।

अन्नाभाऊ के जाति-वर्ग चेतना के गीत, पोवाडे, लावणियां, लोक नाटकों के साथ कॉ. अमर शेख के गीत और उनकी पहाड़ी आवाज, साथ में कॉ. दत्ता गव्हाणकर के गीत, लोक नाटक और उनकी लोकप्रिय तरस, संगीत के साथ और निर्देशन तमाम के एक साथ आने कि वजह से लाल बावटा कलापथक बंबई में मज़दूरों के बीच बहुत लोकप्रिय हो गया।

दर्द को बयां करते गीत
इस बीच, कम्युनिस्ट पार्टी ने जनवरी 1945 में बंबई के करीब ठाणे जिले के टिटवाला में महाराष्ट्र किसान सभा का पहला स्थापना सम्मेलन आयोजित करने का फैसला लिया, जिसे कॉ. शामराव परुलेकर, कॉ. गोदावरी परुलेकर और कॉ. बुवा नवले का नेतृत्व मिला। बंबई और आसपास के ठाणे तथा कोलाबा जिलों में इस ऐतिहासिक सम्मेलन के बारे में जागरूकता फैलाने में ‘लाल बावटा कलापथक’ का बड़ा योगदान था।

सम्मेलन के लिए कॉ. अमर शेख द्वारा लिखा गया एक खास गीत था, ‘किसान सभा शेतकऱ्याची माऊली’ (किसान सभा कृषकों की माता)। नारायण सूर्वे का इनकी ‘डोंगरी शेत माझ गाव, मी बेनू किती…’ (मेरी खेती पहाड़ी है, उसे कितना जोतूं…)। ग्रामीण किसान महिला के दुख, कठिनाई और दर्द को बयां करते ये गीत काफी चर्चा में आए। इस सम्मेलन में ही कॉ. अन्नाभाऊ, कॉ. अमर शेख और कॉ. गव्हाणकर इस तीन प्रमुख शाहीरों को महाराष्ट्र से आए तमाम किसान, मजदूर, काश्तकार, कार्यकर्ता, प्रतिनिधि, आदिवासी और श्रमिकों ने जाना। इन तीन प्रमुख शाहीरी के गीतों और लोक नाटकों को लोगों ने काफी सराहा।

इस सम्मेलन में अन्नाभाऊ ने किसानों कि समस्याओं और शिकायतों को व्यक्त करने के लिए ‘अकलेची गोष्ट’ नामक एक विशेष लोक नाटक लिखा था, बाद में जिसके पूरे महाराष्ट्र में कार्यक्रम हुए और बहुत लोकप्रिय भी हुए।

1943 से 1946 तक बंगाल में भीषण सूखा पड़ा। लोग भूख से मर रहे थे। इस दुखद घटना के बारे में बताने के लिए और लोगों को अपनी नाराजगी व्यक्त करने और मानवीयता का आह्वान करने के लिए अन्नाभाऊ ने 1944 में ‘बंगालची हाक’ (बंगाल की पुकार) नामक पोवाडा लिखा था।

नाटकों में आम लोगों को जगह
कॉ. अन्नाभाऊ, कॉ. अमर शेख और कॉ. गव्हाणकर अपने साथियों के साथ लाल बावटा कलापथक को लेकर बंगाल गए। वहां उन्होंने उस पोवाडे और गीतों के कई कार्यक्रम करके लाखों रुपये इकट्ठा किए। यह पोवाडा इतना लोकप्रिय हो गया कि बंगाल में ‘इप्टा’ के कलाकारों ने इसका बंगाली में अनुवाद किया और इसके कई कार्यक्रम किए। बाद में यह पूरे देश में लोकप्रिय हो गया। इस पोवाडा का बंगाली में एलपी रिकॉर्ड भी आया। इतना ही नही इप्टा के कलाकारों ने उसे लंदन के प्रसिद्ध रॉयल थिएटर में ‘बैले डांस’ के रूप में भी प्रस्तुत किया।

कॉमरेड अन्नाभाऊ की खासियत यह थी कि बंबई का मजदूर आंदोलन हो या चीन के कम्युनिस्ट पार्टी के नेता कॉ. माओ के नेतृत्व में हुई सामाजिक क्रांति, इन सबकी दखल उन्होंने ली। जैसे 1946 में बंबई में नाविकों का ऐतिहासिक विद्रोह, किसान आंदोलन, तेलंगाना के किसानों का निजामशाही और जमींदारों के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष, विभाजन को लेकर पंजाब और दिल्ली में हुए दंगे, अमलनेर में पुलिस की गोलीबारी में शहीद होने वाले किसानों का सवाल, हर एक अत्याचार को अन्नाभाऊ ने अपने गीतों, पोवाडे और जन नाटकों में लिखा है।

1946 में अन्नाभाऊ अपनी कला मंडली के साथ अमलनेर गए और सरकार की अंधाधुंध गोलीबारी का विरोध किया। ‘बंबईचा गिरणी कामगार’ (बंबई के मिल वर्कर्स), ‘माझी बंबई’ (मेरी बंबई), ‘बोनसचा लढा’ (बोनस के लिए संघर्ष), ‘लवादाचा ऐका परकार’, शेटजीचे इलेक्शन (सेठ का चुनाव), ‘बेकायदेशीर’ (गैरकानूनी) इत्यादी नाटकों में उन्होंने हाशिये पर धकेले गए समाज का चित्रण किया। वे अपने गीतों, पोवाडे, लोक नाटकों से मालिक-श्रमिक संबंध, पूंजीवादी लोकतंत्र, मजदूर और किसानों के शोषण, धोखाधड़ी आदि पर प्रहार करते। अपनी बहुचर्चित ‘बंबई लावणी’ में, उन्होंने पूंजीपति और गरीब के जीवन में अत्यधिक असमानता को दर्शाया है।

उपेक्षा की वजह
जग बदल घालूनी घाव, (दुनिया बदल दे..) सांगून गेले मला भीमराव, (कह चले भीमराव) गीत में अन्नाभाऊ कहते हैं, ‘पूंजीपतियों ने हमेशा लूटा है। धर्मांधों ने छला है’, गीत में, जाति और वर्ग के शोषण के खिलाफ डॉ. बाबासाहब अंबेडकर के नाम पर, वे दलितों को चोट, हमला करने के लिए कहते हैं। कॉ. अन्नाभाऊ की कहानियां, उपन्यास के नायक और नायिकाएं भी विद्रोही और संघर्षशील हैं। उन्होंने दलितों, शोषितों, श्रमिक और उपेक्षित लोगों के नायकों को अपने साहित्य में सम्मानीय स्थान देने का बड़ा मौलिक काम किया है।

अन्नाभाऊ के उपन्यास ‘फकीरा’ का नायक ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के खिलाफ विद्रोह करता है। उन्होंने इस प्रसिद्ध उपन्यास को डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर के उग्र लेखन के लिए समर्पित किया था। उपन्यास ने सर्वश्रेष्ठ साहित्य के लिए कई सरकारी पुरस्कार भी जीते हैं। इसके अलावा, इप्टा की मदद से, उस  समय मराठी फिल्म उद्योग के प्रसिद्ध अभिनेताओं के साथ ‘फकीरा’ नामक फिल्म बनाई गई थी। शाहीर कॉ. गव्हाणकर ने फिल्म फाइनेंस कॉर्पोरेशन से वित्तीय कर्ज लेकर इसका निर्माण किया था। अन्नाभाऊ और जाने-माने पटकथा लेखक ख़्वाजा अहमद अब्बास ने इसकी पटकथा लिखी थी और उसे कुमार चंद्रशेखर द्वारा निर्देशित किया गया था। इसके अलावा उनके कुछ उपन्यासों पर भी प्रदेश में फिल्में बनी हैं। उनके उपन्यास ‘चित्रा’ बंबई के नाविकों के विद्रोह पर है और नायिका भी एक विद्रोही है। अन्नाभाऊ के सोवियत रूस जाने से पहले यानी 1961 में इसका रूसी में अनुवाद छपा था।

अन्नाभाऊ साठे न केवल एक साहित्यिक व्यक्ति थे, बल्कि एक कम्युनिस्ट कार्यकर्ता भी थे, जिन्हें अक्सर ब्रिटिश और कांग्रेस अधिकारियों के क्रोध और दमन का सामना करना पड़ता था। कभी-कभी, उन्हें भूमिगत रहना पड़ता था और जेल में डाल दिया जाता था। उनके कई लोक नाटकों पर भी सरकार द्वारा प्रतिबंध लगा दिया गया था। अन्नाभाऊ एक कर्तव्यनिष्ठ पत्रकार भी थे। वे दलित-शोषितों और मेहनतकशों की दुर्दशा पर कम्युनिस्ट पार्टी की ‘मशाल’, ‘लोकयुद्ध’, ‘युगांतर’ और अन्य साप्ताहिक पत्रिकाओं के लिए नियमित रूप से लिखते थे। वह पुस्तकों और फिल्मों की समीक्षा भी लिखते थे। वे 1943 में बंबई में स्थापित ‘इंडियन पीपल्स थिएटर असोसिएशन’ इप्टा की स्थापना में भी सहायक थे। 1949 में वे इप्टा के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे।

कॉमरेड अन्नाभाऊ ने मराठी में दलित और विद्रोही साहित्य की वैचारिक नींव रखी है। आधुनिक मार्क्सवादी विचारक एंटोनियो ग्राम्शी की ‘जैविक बुद्धिजीवी’ की परिभाषा अन्नाभाऊ पर भी लागू होती है। मराठी के प्रसिद्ध विद्रोही साहित्यकार बाबुराव बागुल उन्हें महाराष्ट्र का मैक्सिम गोर्की कहते थे।

संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन और इसके निर्माण में अन्नाभाऊ के `लाल बावटा कलापथक` और उनके सहयोगी कॉ. अमर शेख तथा कॉ. गव्हाणकर ने भी अपना बहुमूल्य योगदान दिया, लेकिन, जिन लोकशाही साहित्यकारों ने अपने लेखन और गीतों के माध्यम से देश और दुनिया में पीड़ितों, मजदूरों, काश्तकारों, श्रमिकों, दलित-शोषितों के शोषण के खिलाफ आवाज उठाई, उन्हें तथाकथित साहित्यकारों तथा संस्कृति के ठेकेदार, तत्कालीन और वर्तमान अधिकारियों ने नज़रअंदाज़ किया है।

महाराष्ट्र  में, पीएल देशपांडे, कुसुमाग्रज, (साहित्यकार) यशवंतराव चव्हाण के नाम पर अकादमियां और सरकारी संस्थाएं स्थापित की जाती हैं, अख़बारों में स्मरण दिन मनाया जाता है, विशेष अंक निकलते हैं, चैनलों पर चर्चा की जाती है लेकिन जिनकी वजह से संयुक्त महाराष्ट्र अस्तित्व में आया, उन कॉ. अमर शेख, कॉ. अन्नाभाऊ साठे का जन्म शताब्दी वर्ष आया और चला गया, लेकिन न तो शासक और न ही तथाकथित महान संपादकों ने उन्हें याद किया है।

मुट्ठी भर उच्च वर्ग के लोग जिन्हें स्वातंत्र्यवीर (?), लोकमान्य (?) कहते हैं, उन पर दैनिक समाचार पत्रों के विशेष अंक निकालने, विशेष लेख प्रकाशित करने और इन पर तथाकथित गणमान्य लोगों के लेख पढ़ने पर कार्यक्रम और वेबिनार-सेमिनार आयोजित करने में लगे हुए हैं। यह और भी अफ़सोसनाक है कि हममें से कुछ लोग इनके बारे में रचे गए विशेष लेख पढ़कर उन्हें राष्ट्रीय नेता मान लेते हैं।

कॉ. अन्नाभाऊ, अमर शेख और गव्हाणकर के हिस्से में आई उपेक्षा का मुख्य कारण है, जाति-धर्म और वर्ग जिससे ये सभी लोकशाहीर आए थे। दूसरा यह है कि वे प्रस्थापित जाति-वर्ग और शासकों के खिलाफ कम्युनिस्ट के रूप में एक मजबूत भूमिका निभा रहे थे। यक़ीनन ये सच प्रस्थापितों के लिए गले की हड्डी है।

बंबई-महाराष्ट्र और देश के मेहनतकश लोगों और लोक कलाकारों की ओर से इन तीनों की स्मृति में जन-कलाकारों का संयुक्त स्मारक बंबई में खड़ा किया जाना चाहिए। इस जन्म शताब्दी वर्ष का अच्छा परिणाम तभी साबित होगा, जब हम अन्नाभाऊ साठे, अमर शेख और दत्ता गव्हाणकर के क्रांतिकारी विचारों को दैनिक संघर्ष के माध्यम से अमल में लाएं। कॉ. अन्नाभाऊ साठे को क्रांतिकारी अभिवादन कहने का यही एकमात्र सच्चा तरीक़ा होगा।

(सुबोध मोरे महाराष्ट्र के विद्रोही सांस्कृतिक आंदोलन संगठन के पूर्व जनरल सेक्रेटरी तथा उस संगठन के प्रमुख संस्थापकों में से एक हैं। वे महाराष्ट्र के प्रमुख प्रगतिशील, वामपंथी संस्कृतिकर्मी, वरिष्ठ सामाजिक-राजनैतिक कार्यकर्ता और मुक्त पत्रकार हैं। उनका लेख महाराष्ट्र के प्रमुख अखबारों, पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशित होता रहता है।)

(मराठी से हिंदी अनुवाद: कलीम अज़ीम)

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This post was last modified on October 18, 2020 8:52 pm

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