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कोरोना के चलते बाल मजदूरी बढ़ोतरी की आशंकाएं

पिछले कई वर्षों से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बाल अधिकारों के संरक्षण हेतु कई फोरम बने, इन सभी फोरमों का एक ही उद्देश्य है, किस प्रकार बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा की जा सके। विकसित देशों की अपेक्षा विकासशील देशों में बच्चों की स्थिति ज्यादा दयनीय है। वर्तमान स्थिति में जिस तरह से कोरोना महामारी ने वैश्विक स्तर पर अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है, इससे न सिर्फ बेरोजगारी बढ़ रही है बल्कि इससे बाल मजदूरी बढ़ने की संभावनाएं भी तेज होती दिख रही हैं।

पिछले दो दशकों से बाल मजदूरी को खत्म करने के लिए सकारात्मक प्रयास किये गये, नतीजन बाल मजदूरी में गिरावट आंकी गई परन्तु इस महामारी के चलते किये गये प्रयासों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार भारत में बाल मजदूरों की संख्या एक करोड़ से ज्यादा है जिसमें से करीब 60 लाख बाल मजदूर खतरनाक काम की श्रेणी के अन्तर्गत आने वाले कामों को करते हैं।

भारत में करीब 94 प्रतिशत मजदूर असंगठित क्षेत्र के तहत काम करते हैं इन मजदूरों में ज्यादातर मजदूर वंचित तबके से आते हैं। मजदूरों के लिए जीवन चलाना पहले ही असंभव था वर्तमान परिस्थितियों ने इसे और मुश्किल बना दिया, इन परिस्थितियों के चलते बच्चों को भी काम में धकेला जा रहा है। कोरोना के चलते पिछले तीन महीनों से स्कूल अस्थायी रूप से बंद हैं। स्कूलों द्वारा आन लाइन क्लासों की शुरुआत की गई, परन्तु समाज का एक बहुत बड़ा तबका जिसके पास ऑन लाइन क्लास लेने की सुविधा नहीं है, अधिकतर बच्चों के पास मोबाइल फोन, कम्पयूटर और इंटरनेट जैसे इलेक्ट्रानिक उपकरण नहीं हैं। जिसके चलते बच्चे आन लाइन क्लास नहीं ले सकते हैं , समाज के इस वंचित तबके के लिए मौजूदा सरकारों के पास किसी तरह का कोई प्लान नहीं है।

छोटे बच्चे जिनकी उम्र तकरीबन 10 से 14 साल के बीच है वह अपने घर के आसपास खुले मोटर गैरेजों, इलेक्ट्रॉनिक्स की दुकान पर काम सीखने लग गये हैं इसके अलावा बच्चे कूड़ा निपटान के काम, ईंट के भट्ठों आदि पर भी काम कर रहे हैं। दिल्ली के कुछ इलाकों में बच्चों से बातचीत करने पर बच्चों का कहना है कि स्कूल बंद हैं तो परिवार वालों ने कहा कि कुछ काम सीख लो तो हम ये काम सीखने लग गये। यह बच्चे सुबह 10 बजे से रात 8 बजे तक गैरेज पर काम सीखते भी हैं और काम भी करते हैं, परन्तु काम करने के बदले इन्हें पैसा नहीं दिया जाता है। कूड़ा बीनने के काम में पहले से ही बहुत बड़ी संख्या में बाल मजदूर कूड़ा बीनने और कूड़ा छांटने का काम करते थे।

वर्तमान परिस्थितियों में जिस तरह से बाकी उद्योग धन्धों पर नकारात्मक असर हुआ है उसी तरह से कूड़ा निपटान के काम में भी कमी आई है मजदूरों द्वारा बीने गये कबाड़ का मार्केट रेट बहुत कम को गया है प्लास्टिक, लोहा, कांच आदि काफी सस्ते दामों में मजदूरों को बेचना पड़ रहा है, नतीजतन मजदूर अपनी जीविका चलाने में असमर्थ होते जा रहे हैं, जिसके चलते कूड़ा निपटान के काम में 10 साल से भी छोटे बच्चे अपने माता-पिता के साथ कबाड़ बीनने और गोदाम पर कबाड़ छांटने का काम करने लगे हैं उनका कहना है कि जितने ज्यादा लोग होंगे हम उतना ज्यादा कबाड़ बीन पायेंगे। यहां समस्या यह है कि इतनी कम उम्र में काम सीखने और काम करने दोनों ही स्थितियों में बच्चे समय से पहले ही जिम्मेदार होने के आभास से परिपूर्ण हो जाते हैं, और परिवार वालों की भी उम्मीद बढ़ जाती है कि अब तुम काम ही करो और बच्चों को भी उसमें आनंद आने लगता है जो बच्चों के विकास के लिए सबसे खतरनाक स्थिति है।

जिस तरह से श्रम कानूनों के साथ मनमानी की जा रही है इनका प्रभाव बाल मजदूरों पर भी पड़ रहा है, बाल मजदूरों की स्थिति इस बदलते नियम कानूनों के चलते ज्यादा खराब होने की संभावनाए हैं। बच्चों के न सिर्फ काम के घंटे ही बढ़ जायेंगे बल्कि बच्चा होने के कारण उन्हें मजदूरी भी कम मिलती है। रोजगार में लगातार होती कमी ने भी बाल मजदूरों को बढ़ावा दिया है क्योंकि वयस्कों की तुलना में बच्चों को कम मजदूरी देकर ज्यादा काम करवाया जा रहा है।

मध्यान्ह भोजन केन्द्र सरकार द्वारा चलाई जाने वाली केन्द्रीय योजना है, इस योजना के तहत सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को मध्यान्ह भोजन मिलता था स्कूलों के अस्थायी रूप से बंद होने से पहले बच्चों को मध्यान्ह भोजन मिलता था। स्कूलों के अस्थायी रूप से बंद होने के बाद बच्चों के मध्यान्ह भोजन की व्यवस्था भी बंद हो गई जिसका असर बच्चों के स्वास्थ्य पर भी पड़ा है। कोरोना महामारी के संदर्भ में बार-बार इम्यून सिस्टम को मजबूत करने की बात कही जाती है, पर इम्यून सिस्टम को मजबूत कैसे करना है इसकी योजना पर ध्यान देना ज्यादा जरूरी है। दिल्ली स्थित गैरसरकारी संगठन द्वारा दिल्ली उच्च न्यायालय में पीआईएल डाली गई कि बच्चों को मिलने वाले मध्यान्ह भोजन की व्यवस्था की जाये या उनके खाते में पैसे डाले जायें। 

अभी हाल ही में यूनीसेफ एंव अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने रिपोर्ट जारी की जिसमें उन्होंने साफ तौर पर जिक्र किया है कि सन 2000 से 2020 में बाल मजदूर में अथक प्रयासों के बाद कमी आई थी, परन्तु वर्तमान स्थिति में जिसके दोबारा बढ़ने की संभावनायें तेज होती दिख रही है, इसके अलावा उन्होंने जोर देकर कहा कि पहले से ही बाल मजदूरों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी वर्तमान स्थिति में यह और भयावह रूप में सामने आई है जिसका असर बच्चों की सुरक्षा और स्वास्थ्य पर पड़ने वाला है।

(बलजीत मेहरा स्वतंत्र शोधार्थी हैं।) 

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This post was last modified on June 22, 2020 12:36 am

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