रघुवंश प्रसादः सत्ता के गलियारे में जनता का आदमी

बिहार की राजनीति के सबसे उथल-पुथल वाले दौर में अपने को टिकाए रखने वाले रघुवंश प्रसाद सिंह की मौत के साथ समाजवादी राजनीति का एक और स्तंभ गिरा है। रघुवंश जी ने समाजवादी मूल्यों को दलीय राजनीति में स्थिर बनाए रखने की उस समय कोशिश की जिस समय यह सबसे कठिन था। वह इस विचारधारा के उन अंतिम सिपाहियों में थे जो इसके लगातार क्षय होते दलीय स्वरूप को ढोने की कोशिश कर रहा था। उनकी मौत के पहले के पत्रों से यही पता चलता है कि जीवन की शाम में उन्हें अपनी पराजय का अहसास हो गया था और पता चल गया था कि इस राजनीति से विदा लेने का वक्त आ गया है। उन्होंने लालू को लिखे अपने आखिरी खत में शालीनता के साथ इसका ऐलान भी कर दिया था।

लालू के लिखे गए उनके पहले के पत्र में उस राजनीति के नष्ट हो जाने की शिकायत की थी जिसमें उन्होंने पोस्टरों से गांधी, आंबेडकर, लोहिया, जयप्रकाश और कर्पूरी ठाकुर की तस्वीरों की जगह लालू परिवार की तस्वीरों के आ जाने की ओर उनका ध्यान खींचा था। लालू की राजनीति में विचारधारा की तिलांजलि की ओर यह एक महत्वपूर्ण कदम था।

यह पत्र पार्टी में उन्हें किनारे भेजने के लगातार प्रयासों के बाद लिखा गया था। लेकिन पत्र से पता चलता है कि वह नेतृत्व के इस कदम के वैचारिक अर्थ को समझ गए थे। यह भावना के स्तर पर वाकई कठिन रहा होगा क्योंकि उन्होंने कर्पूरी ठाकुर के निधन के बाद लालू को पिछड़ों का नेता बनाने में बड़ी भूमिका निभाई थी। उन दिनों यादवों में भी कई शक्तिशाली नेता थे। समाजवादियों के बीच स्वीकार्य बनाने में जिन लोगों ने लालू की खुले दिल से मदद की, रघुवंश जी उनमें से एक थे।

इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि व्यक्तिगत तौर पर एक समाजवादी छवि बनाए रखना उनके लिए कितना कठिन रहा होगा। भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे और अपने राजनीतिक सहयोगियों के साथ दुर्व्यवहार की आदत वाले लालू के साथ रिश्ते बनाए रखने तथा सार्वजनिक रूप से उनका बचाव करना उनके लिए दु:साध्य था। लेकिन अपनी ईमानदारी और राजनीतिक अनुशासन के बल पर उन्होंने इसे संभव बनाया। राजनीति के उस दौर पर नजर डालने पर यही दिखाई देता है कि उस समय समाजवादी धारा से आए लोगों के बारे में कहना मुश्किल था कि वह किसके साथ खड़ा होगा।

लेकिन रघुवंश जी के साथ ऐसा कभी नहीं हुआ। सभी को पता था कि सेकुलर राजनीति में वह रहेंगे। वैसे, इसमें लालू का भी बड़ा योगदान था क्योंकि वह सेकुलर राजनीति के प़क्ष में मजबूती से खड़े रहे। इससे रघुवंश जी जैसों को गैर-कांग्रेसवाद के नाम पर भाजपा के साथ हाथ मिलाने वाले लोहियावादियों की कतार में शामिल होने की जरूरत नहीं पड़ी।

राजनीति में इस तरह की स्थिरता पाने की एक और वजह यह थी कि उन्होंने जनता से सीधे संपर्क रखने और बदलाव में लगे गैर-दलीय कार्यकर्ताओं को सहयोग करने की कर्पूरी ठाकुर की राजनीतिक शैली को अपनाए रखा। यही वजह है कि मनरेगा जैसे ऐतिहासिक कार्यक्रम को बनाना उनके लिए आसान रहा। इस काम में उन्होंने एनजीओ और विभिन्न विचारधारा के लोगों से लगातार संपर्क रखा। भूमि अधिग्रहण कानून के समय भी उन्होंने ऐसी ही कोशिश की थी।

समाजवादी धारा के असंगठित राजनीतिक क्षेत्र में बदल जाने के कारण रघुवंश जी की सामाजिक तथा राजनीतिक भूमिका को लेकर शायद ही कोई शोध होगा। लेकिन यह देखना दिलचस्प है कि समाजवादियों ने किस तरह आजादी के बाद कांग्रेस के नेतृत्व में खड़ी हुई राजनीति के विपरीत एक नई राजनीति खड़ा करने की कोशिश की। उनकी राजनीति उच्च वर्ग तथा वर्ण की राजनीति को हर स्तर पर चुनौती दे रही थी। रघुवंश जी उस दौर में कर्पूरी ठाकुर के साथ थे जब सत्येंद्र नारायण सिन्हा ठाकुरों के नेता थे और उन्हें छोटे साहब के नाम से पुकारा जाता था।

कर्पूरी ठाकुर ने 1977 के चुनावों के बाद मुख्यमंत्री पद के संघर्ष में सत्येंद्र नारायण सिन्हा को हराया था। रघुवंश जी कर्पूरी जी के मंत्रिमंडल में भी शामिल किए गए थे। राजनीति का वह दौर बड़े सामाजिक संघर्ष का दौर था। आरक्षण लागू करने के कारण कर्पूरी ठाकुर उच्च जाति की नफरत का शिकार हो गए थे और पूरा समाज बंट गया था। उच्च जाति से आने वाले कई अन्य नेताओं की तरह रघुवंश जी कर्पूरी ठाकुर के साथ डटे रहे। मंडल कमीशन के लागू होने और बिहार की राजनीति में लालू के उदय के काल में भी वह उन्हीं राजनीतिक उसूलों पर टिके रहे जिसे उन्होंने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के दौर में लोहिया के ‘पिछड़ा पावे सौ में साठ’ नारे के साथ अपनाया था। कर्पूरी के काल से यह ज्यादा कठिन था क्योंकि अपनी राजनीतिक आक्रामकता के कारण लालू के साथ उच्च जातियों का टकराव बहुत बढ़ गया था।  

 खादी के सफेद वस्त्र, गांधी टोपी और चिकनी-चुपड़ी बातों वाली कांग्रेसी संस्कृति के विपरीत समाजवादी एक नई राजनीतिक संस्कृति बनाने की कोशिश में लगे थे। गांधी जीे की खादी अब भ्रष्ट राजनीति का प्रतीक बन चुकी थी। समाजवादी इस राजनीतिक संस्कृति के विपरीत भदेस और गरीब लोगों से जोड़ने वाली राजनीतिक संस्कृति का निर्माण कर रहे थे जिसमें साधारण, बिना इस्त्री किए कपड़े और संस्कृतनिष्ठ भाषा की जगह स्थानीय भाषा का इस्तेमाल जरूरी था।

विधायक और सांसद बनने के बाद अक्सर यह बदल भी जाता था। लेकिन रघुवंश जी ने उसे बनाए रखा। अच्छी पढ़ाई-लिखाई के बाद भी उन्होंने अपनी भाषा, अपना पहनावा और रहन-सहन गांव के लोगों की ही तरह रखा। यह गांधी, लोहिया और कर्पूरी की परंपरा का ही विस्तार था। अस्सी के दशक के दौर में तो यह आम था, लेकिन भूमंडलीकरण और दिखावे के इस दौर में उसे कायम रख कर वह एक हारी हुई लड़ाई लड़ रहे थे। डिजिटलीकरण के इस दौर में हाथ से पत्र लिखना भी इसी लड़ाई का एक हिस्सा था।  

संयोग से उनकी मौत ऐसे समय में हुई है जब बिहार की राजनीति एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार फिर से सत्ता में वापस आना चाहते हैं। मौत से पहले रघुवंश जी ने राजद और लालू से अपना नाता तोड़ लिया था। राजनीति के सरल गणित के मुताबिक लोग मान रहे हैं कि वह जेडीयू में जाने वाले थे। नीतीश इस स्थिति का फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में नीतीश को लिखे रघुवंश जी के पत्र का जिक्र इसी उद्देश्य से किया है। लालू प्रसाद का राष्ट्रीय जनता दल रघुवंश जी की साख का फायदा उठाने की स्थिति में नहीं है। लेकिन नीतीश को लिखे पत्रों में रघुवंश जी ने जेडीयू में जाने का कोई संकेत नहीं दिया है और न ही उस राजनीति को लेकर कोई पछतावा दिखाया है जो इतने सालों तक वह करते रहे। इसमें उनका राजनीतिक संतुलन पूरी तरह साबूत दिखाई देता है। उन्होंने अपने पत्र में सिर्फ वैशाली के प्राचीन वैभव को सामने लाने और इसके विकास का कार्यक्रम बनाने का आग्रह किया है।  

(अनिल सिन्हा वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

This post was last modified on September 14, 2020 5:26 pm

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