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राहुल सांकृत्यायन और शिव पूजन सहाय की जयंती मनाने से मोदी सरकार का इनकार

पिछले दिनों पंडित दीन दयाल उपाध्याय और नानाजी देशमुख की जयंती भाजपा सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर मनाई, लेकिन आज़ादी की लड़ाई में चार बार  जेल जाने वाले और हिंदी में ज्ञान-विज्ञान का भंडार भरने वाले एक्टिविस्ट लेखक राहुल सांकृत्यायन और हिंदी गद्य की नींव तैयार करने वाले लेखक पत्रकार एवं त्याग तपस्या की मूर्ति शिव पूजन जी की 125वीं जयंती मनाने की मांग सरकार ने ठुकरा दी।

दोनों वाम दलों के महासचिव के अलावा सभी विपक्षी और सत्ता पक्ष के सांसदों और कुछ केंद्रीय मंत्रियों ने भी प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी से मांग की थी, लेकिन  हिंदी प्रेमियों को यह किंचित अप्रत्याशित नहीं लगा, क्योंकि आज वह सत्ता के चरित्र को अच्छी तरह जानने लगी है।

भारतीय सत्ता का चरित्र अब इतना विवेकवान नहीं रह गया है कि वह राहुल जी तथा शिव पूजन सहाय जैसे व्यक्तित्व के योगदान का आकलन कर सके। कभी डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और पंडित जवाहर लाल नेहरू तथा जयप्रकाश नारायण और आचार्य नरेंद्र देव ही नहीं पुरुषोत्तम दास टंडन जैसे लोग इन मनीषी लेखकों का आदर सम्मान करते थे।

राहुल जी के बारे में इलाहाबाद दीक्षांत समरोह में नेहरू जी का यह कथन मशहूर है कि राहुल जी जैसे विद्वान लेखकों को तो विक्षविद्यालय में होना चाहिए। इसी तरह शिव जी के बारे में राजेंद्र बाबू का यह कथन मशहूर है कि मूक हिंदी सेवा ही शिव पूजन जी के लिए राष्ट्रसेवा थी और उन्होंने यह सेवा निःस्वार्थ की थी।

आज जब भाषा का इतना अवमूल्यन हो रहा है। विवेक और तर्क को ताख पर रखा जा रहा हिंदी नवजागरण के इन दो अग्रदूतों और नायकों की स्मृति स्वाभाविक है, जिनके लिए राष्ट्र प्रेम छद्म और पाखंड नहीं था और न ही प्रदर्शन था। राहुल जी के लिए इस राष्ट्र में शोषित पीड़ित जनता की मुक्ति की कामना थी तो शिव पूजन जी ने मतवाला माधुरी जागरण हिमालय जैसी पत्रिकाओं के माध्यम से समाज में ज्ञान विज्ञान का अलख जगाया और ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ लिखने के अलावा अपने देश की सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ खुल कर लिखा।

वे खुद लखनऊ के दंगे में प्रेमचंद की रंगभूमि उपन्यास की पांडुलिपि (जिसका उन्होंने संपादन किया था) के साथ-साथ अपने आंचलिक उपन्यास देहाती दुनिया की पांडुलिपि खो बैठे और उन्हें अपना यह उपन्यास दोबारा लिखना पड़ा। राहुल जी ने ‘धर्म की क्षय’ हो में धार्मिक पाखण्डों पर कड़ा प्रहार किया।   

दोनों ने हिंदी के वांग्मय को समृद्ध करने का काम किया था। हिंदी भाषा के सवाल पर दोनों साथ थे। भाषा के सवाल पर ही राहुल जी पार्टी से निकाले गए थे। राहुल जी और शिव पूजन जी में बहुत साम्य भी था, जबकि एक गांधीवादी दूसरे वामपंथी थे। दोनों लोक के पक्षधर और ग्रामीण चेतना के लेखक। राहुल जी शिव पूजन जी एक ही साल पैदा हुए। एक ही साल 1963 में उन दोनों का देहांत हुआ।

दोनों को भागलपुर विश्विद्यालय द्वारा जयप्रकाश नारायण के साथ 1962 में मानद डीलिट की उपाधि मिली। दोनों को 1960 और 1962 में साहित्य में योगदान के लिए काज़ी नजरुल इस्लाम के साथ पद्मभूषण मिला। राहुल जी की तीन किताबें शिव पूजन जी ने ही छापीं। ‘मध्य एशिया का इतिहास’ भी जिस पर राहुल जी को साहित्य अकेडमी का अवार्ड मिला। उसकी भूमिका भी सहाय जी ने लिखी और उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर का विद्वान बताया।

राहुल जी की एक और पुस्तक की भूमिका में शिव जी ने लिखा कि राहुल जी जैसे दो-चार शोधार्थी हिंदी में हों तो हिंदी का भला हो। राहुल जी भी शिव पूजन जी का गहरा सम्मान करते थे उनके योगदान से प्रभावित थे। शायद इसलिए उन्होंने नलिन जी के साथ मिलकर शिवजी पर अभिनंदन ग्रंथ की योजना बनाई।

अपने समय के प्रख्यात इतिहासकार वासुदेव शरण अग्रवाल और  आचार्य विनय मोहन शर्मा (हजारी प्रसाद द्विवेदी के समधी) से लेख लिखवाए, लेकिन 1961 में ही नलिन जी नहीं रहे और राहुल जी का स्मृति लोप हो गया। एक ही साल पैदा हुए और दोनों एक ही वर्ष में दिवंगत हुए।

राहुल जी ने अपने भोजपुरी नाटकों में स्त्री की मुक्ति का सवाल उठाया और मेहरारू की दुर्दशा उनका चर्चित नाटक है। तो शिव पूजन जी ने कहानी का प्लॉट जैसी अमर कहानी लिखकर उसमें एक गरीब विधवा युवती की शादी अपने सौतेले पुत्र से करवाई। 1926 में यह एक क्रांतिकारी कदम था। मुण्डमाल कहानी से शुरू हुआ उनका राष्ट्रवादी आख्यान अंत में लोक आख्यान की तरफ मुड़ता है।

शिव पूजन जी ने बिहार राष्ट्र भाषा परिषद के निदेशक के रूप में हिंदी साहित्य के आदिकाल से लेकर मुंडारी लोक गीतों तथा पेट्रोलियम और रबर पर भी हिंदी में किताबें छापीं। निराला, प्रेमचंद और प्रसाद की भाषा का परिमार्जन भी किया और उन पर बेजोड़ संस्मरण भी लिखे।

निराला की पहली मुक्त चंद कविता प्रकाशित करने का श्रेय भी शिव जी को प्राप्त है। राहुल जी ने तो घुम्मकड़ शास्त्र का जन्म ही दिया और तिब्बत की अनेकों यात्रा कर दुर्लभ पांडुलिपियां लाईं। एक लाख प्रविष्टियां खुद लालटेन की रोशनी में अपने हाथों से लिखीं।

बकौल प्रभाकर माचवे राहुल जी 32 भाषाओं के जानकार थे तो बकौल निराला शिव पूजन जी हिंदी भूषण थे और तब उनके जैसा गद्य लिखने वाला कोई नहीं था। राहुल जी तो भारतीय ज्ञान परंपरा के साथ प्रगतिशील चेतना के भी नायक थे। 2018 से दोनों लेखकों की 125वीं जयंती मनाने का सिलसिला शुरू हुआ। सबसे पहले भारतीय ज्ञानपीठ ने इन दोनों पर एक कार्यक्रम कर इसका  शुभारंभ किया और ज्ञानोदय का विशेष अंक भी इन दोनों पर निकाला। 

इन दोनों लेखकों पर आजकल पत्रिका  के अलग-अलग सुंदर विशेषांक निकले। अब 24 जनवरी को शिव पूजन जी पर एक संवेद पुस्तिका का लोकार्पण भी हो रहा है। साहित्य अकेडमी ने भी दो आयोजन दोनों पर अलग अलग किए। अकेडमी ने शिव पूजन संचयन निकाला और अंग्रेजी में मोनोग्राफ भी। पर राहुल जी पर आज तक न संचयन निकल पाया  और न ही हिंदी में मोनोग्राफ।

दिल्ली विश्विद्यालय के दो कॉलेजों  किरोड़ी मल कालेज और आत्मा राम सनातन धर्म कॉलेज में भी आयोजन हुए। वाराणसी में महात्मा गांधी हिंदी अंतरराष्ट्रीय विश्विद्यालय, वर्धा ने तीन दिन का एक बड़ा आयोजन किया। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने राहुल जी की 125वीं जयंती मनाने का एक प्रस्ताव पहली बार पार्टी कांग्रेस में पारित किया। अब तक किसी कम्युनिस्ट पार्टी ने किसी हिंदी लेखक के लिए ऐसा नहीं किया।

राहुल जी भाकपा की किसान सभा के अध्यक्ष थे। पटना में प्रगतिशील लेखक संघ ने एक बड़ा आयोजन राहुल जी पर किया। पटना के कॉमर्स कॉलेज में शिव पूजन जी पर कार्यकम हुआ। छपरा मुज़फ़रपुर लखनऊ बेगूसराय में भी छोटे बड़े आयोजन हुए। इन दोनों लेखकों के गांव पर भी आयोजन हुए।

पटना में बिहार सरकार ने शिव पूजन जी पर एक प्रतिमा लगाई है। उनके गांव में भी पिछले दिनों नीतीश कुमार ने एक प्रतिमा का अनावरण किया। इस तरह कई जगह छोटे बड़े समारोह हुए, जिसमें हिंदी नवजागरण के इन दो अग्रदूतों के बहाने साहित्य भाषा, पत्रकारिता और ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में उनके योगदान को रेखंकित किया गया। जनता का लेखक जनता द्वारा ही जाना जाता है वह साहित्य प्रतिष्ठान का मोहताज नही होता।

विमल कुमार
(लेखक हिंदी के सुपरिचित कवि और वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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This post was last modified on January 23, 2020 4:04 pm

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