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‘पैरासाइट’ को मिले ‘ऑस्कर’ और एशियाई फिल्मों का सच

पिछले साल 30 मई को साउथ कोरिया में रिलीज़ हुई और बॉक्स ऑफ़िस में बेहद सफल फिल्म ‘पैरासाइट’ की कहानी किसी बॉलीवुड फिल्म जैसे ही दो ऐसे परिवारों के इर्द गिर्द घुमती है जिसमें एक धनवान है और दूसरा गरीब है। इन दोनों परिवारों में 4-4 सदस्य हैं, माता-पिता और दो भाई-बहन हैं। ये शहर में रहते हैं। फिल्म की कहानी में ग़रीब परिवार, अमीर घर में किसी तरह एंट्री ले लेता है, दोनों परिवारों की रोजमर्रा की जिन्दगी का संघर्ष दिखाते हुए दोनों की अलग-अलग जरूरतों के मद्देनज़र कई सारे हास्य के रोचक लम्हों का निर्माण होता है कि कहानी में एक टिवस्ट आता है और फिर परिवार से जुड़े कई राज सामने आते हैं ..वो राज क्या है इसके लिए आपको बहुत बड़ा दिमाग नहीं लगाना पड़ेगा अगर आप बॉलीवुड की मसाला फिल्मे देखते हैं।
दुर्भाग्य से ऑस्कर अवार्ड के जूरी मेंबर को बॉलीवुड की मसाला फिल्मे देखने का सौभाग्य नहीं मिला पाया था तो जैसे ही उन्होंने साउथ कोरिया की एक ब्लैक कॉमेडी थ्रिलर फ़िल्म पैरासाइट में इस कहानी को देखा तो उन्हें बहुत मजा आया और उन्होंने अपनी ही हॉलीवुड सिनेमा की 1917, वंस अपॉन ए टाइम इन हॉलीवुड, लिटिल वुमन, फोर्ड वर्सेज फरारी, जोजो रैबिट, जोकर, द आइरिशमैन और मैरेज स्टोरी जैसी बेस्ट फिल्मों को दरकिनार कर पैरासाइट को दुनिया की बेस्ट फिल्म का ऑस्कर अवार्ड दे डाला।
रोचक बात ये कि विदेशी भाषा की टॉप फाइव में साउथ कोरिया (पैरासाईट) के साथ पोलैंड (कॉर्पस क्रिस्टी) मैसेडोनिया (हनीलैंड) फ्रांस (लेस मिजरेबल्स) और स्पेन (पेन & ग्लोरी) जैसे देशों की फ़िल्में थी लेकिन जीत एशियाई कंट्री साउथ कोरिया के हिस्से में आई और वो भी एकेडमी अवॉर्ड्स के 92वाँ साल के इतिहास को तोड़ते हुए अंग्रेजी फिल्मों के दायरे से बाहर आकर अपने 92वें अकेडमी अवार्ड यानि ऑस्कर 2020 में पहली बार किसी गैर-अंग्रेजी फिल्म को बेस्ट फिल्म का ऑस्कर अवार्ड दे दिया गया।
इससे पहले विदेशी मूल की भाषा वाली फिल्में ऑस्कर ज़रूर जीतती थी लेकिन ऑस्कर की मुख्य धारा के अवॉर्ड कभी भी किसी भी एशियन देश के पास नहीं पहुंचे थे। लेकिन पैरा साईट के साथ यह अकाल खत्म हो गया और इस फिल्म ने ऑस्कर अवॉर्ड्स की मुख्य केटेगरी में 3 अवार्ड्स भी जीते हैं। जो अपने आपमें एक इतिहास था। इस फिल्म को 6 नॉमिनेशन मिले थे, जिसमें से 4 अवॉर्ड्स यह अपने नाम करने में कामयाब रही। इस फिल्म को बेस्ट फिल्म, बेस्ट इंटरनेशनल फीचर फिल्म बेस्ट ओरिजनल स्क्रीनप्ले और बेस्ट डायरेक्टर के लिए चार ऑस्कर मिले।
इस फिल्म के लिए बेस्ट डायरेक्टर का ऑस्कर अवार्ड पाए हुए बोंग जून हो, को तो पहले इस बात पर विश्वास ही नहीं हुआ और उन्होंने अपनी मूल भाषा में विनिंग स्पीच देते हुए कहा कि ‘मुझे लगा था कि मेरी फिल्म को एक अवॉर्ड मिल चुका है और अब मुझे और अवॉर्ड नहीं मिलेंगे। मेरे लिए तो नॉमिनेट होना ही बड़ी बात थी’ और यह वाकई एक अविश्वनीय घटना थी लेकिन ऐसा हुआ! सवाल ये कि क्यों हुआ? इस सवाल के जवाब के पहले यहां ये ध्यान देने की बात है कि ऑस्कर अवार्ड अमेरिकन सिनेमा के लिए 1929 में शुरू हुए थे और फिर कुछ दशकों में सिनेमा के फैलते दायरे और उसके समाज में बढ़ते प्रभाव से अमेरिका को लगा कि इसे पूरी दुनिया के लिए खोला जाय तो उसने 1956 में इसे खोला ज़रूर लेकिन महज “बेस्ट फाँरेन फिल्म’ की कटेगरी के अवार्ड को उसने इंट्रोड्यूज किया और विदेशी फिल्मों को मुख्य धारा के अवार्ड से वंचित रखा गया था।
इसी साल बॉलीवुड ने ‘मदर इंडिया’ फिल्म भेजी थी यानि कि हॉलीवुड के इतर फिल्मों के लिए अमेरिका ने अपना दरवाजा 1956 में खोला और अब 64 साल बाद (ना कि 92 साल बाद) उसने एशियाई फिल्मों के लिए अपने दरवाजे पूरी तरह से खोल दिए हैं और अब ये फ़िल्में मेंन कटेगरी के अवार्ड्स के लिए भी नामांकित हो सकेगीं जो यकीनन एक बड़ी घटना है। लेकिन इस बड़ी घटना के पीछे अमेरिका के अपने हित छुपे हैं।
हालांकि यहां ये कह सकते हैं कि यह ऑस्कर में एशिया की मज़बूत उपस्थित को दर्शाता है लेकिन इसके इतर यहां ये कहना ज्यादा समाचीन रहेगा कि यह दुनिया में एशिया की बढ़ती हैसियत का कमाल है ।यद्यपि इससे अब अमेरिकन सिनेमा के लिए पूरी दुनिया के सिनेमा से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना भी करना पड़ेगा जिसका यकीन मानिए कि देर सबेर दबे जुबान से ही सही विरोध के स्वर अवश्य उठेंगे। इसी का एक पहलू ये भी है कि ऑस्कर अवार्ड में कई दफा इस बात के आरोप भी उसी तरह लगते रहें हैं जैसे नेशनल अवार्ड में हमारा बॉलीवुड का एक वर्ग आरोप लगाता रहा है कि ये सत्ता की रूचि और अरुचि के हिसाब से दिए जाते हैं जो कई बार लगता है कि सही है। ऐसा ही आरोप ऑस्कर अवार्ड में भी लगता रहा है कि इसके अवार्ड में भी सत्ता प्रतिष्ठान की पसंद –नापसंद का ध्यान रखा जाता है।
ऑस्कर के लिए इसको एक उदहारण से समझते हैं जिसे हम-आप बखूबी परिचित हैं। बात 2001 की है जबकि आमिर खान स्टारर आशुतोष गवारीकर की बहुचर्चित फिल्म ‘लगान’ के मुकाबले बोस्निया की फिल्म ‘नो मेंस लेंड’ को सर्वश्रेष्ठ विदेशी फिल्म का अवार्ड दिया गया और कहा गया कि एक वोट से लगान यह अवार्ड अपने नाम नहीं कर सकी जबकि इसके इतर परदे के पीछे यह कहा गया कि यह उस समय इस क्षेत्र की युद्ध जैसी हालत और उसमें अमेरिकी हितों को ध्यान में रखने के लिए यह अवार्ड दिया गया था।
ऐसा ही इस बार हुआ कि उत्तरी कोरिया के विरूद्ध दक्षिणी कोरिया में छुपे हुए अमेरिकी हितों को ध्यान में रखते हुए ही यह अवार्ड दिया गया है। इसी के साथ यह भी कि अमेरिका के लिए अब एशिया को किसी भी तरीके से नज़रअंदाज़ करना संभव नहीं जबकि करीब डेढ़ दशक पूर्व 2006 में अमेरिका में नश्लीय भेदभाव के मद्देनज़र एशियाई लोगो को नीचा दिखाती फिल्म ‘क्रैश’ को बेस्ट फिल्म का ऑस्कर अवार्ड दिया गया और यह बिना नामांकन के ‘द स्टिंग’ के बाद दूसरी ऐसी फिल्म थी जिसे यह अवार्ड दिया गया था जबकि उस साल इस अवार्ड की प्रबल दावेदार ‘ब्रोकबैक माउंटेन’ फिल्म थी।
‘क्रैश’ को दिया गया अवार्ड दशक का सर्वाधिक विवादस्पद अध्याय माना जाता है। इस फिल्म में एशियाई लोगों को अत्यंत नकारात्मक भूमिका में दिखाया गया था लेकिन अमेरिका में कभी गोरे और काले लोगो का संघर्ष बेहद ख़राब स्थिति में था और सत्ता– प्रतिष्ठान अपने लोगो को ऊंचा रखने की भावना को बल दे रहा था जबकि कई अमेरिका में कई बड़े कलाकारों के साथ मर्लिन ब्रांडो जैसे लिजेंड कलाकार इस नस्लीय भेद के खिलाफ़ सदा बयान देते रहते थे। मर्लिन ने तो 1973 में द गॉडफादर में ऑस्कर अवार्ड मिलने बाद भी अमेरिकन भारतीय लोगो के रंग भेद के खिलाफ इस अवार्ड को लेने से मना कर चुके थे।
यह अंदरूनी तौर पर पूरी तरह से अभी भी खत्म हो गया गया है। ये कहना पूरी तरह से सही नहीं होगा लेकिन अब एशियाई देशों की बढ़ती ताक़त और उसमें शक्ति संतुलन में अमेरिकी को अपने हितों का ध्यान रखना बेहद ज़रूरी हो चला है। यानि आने वाले समय में अगर किसी भारतीय फिल्म को ऑस्कर मिल जाय तो अचरज मत कीजियेगा। कहा जाता है कि इस सबके पीछे अमेरिकन एजेंसी सी आई ए का दिमाग लगा होता है जो अमेरकी हितों के लिए कई स्तरों पर काम करती है जिसमें इस बात का ध्यान रखने के साथ कि सांस्कृतिक स्तर पर वे कैसे अपने हितों को संरक्षित रख सकते हैं इसका भी बखूबी ध्यान रखा जाता है कि दुनिया में अमेरिका की एक सकारात्मक छवि का विस्तार कैसे हो। अमेरिका के लिए वर्तमान परिदृश्य में एशिया और उससे ज्यादा कोरिया में उसे इस सबकी सख्त ज़रूरत है।
अब देखिए ‘पैरासाइट’ की जीत की गूंज ने पूरे एशिया के सिनेमा और सांस्कृतिक परिद्रश्य में एक हलचल सी मचा दी है। पूरी एशियाई फिल्म इंडस्ट्री के साथ भारतीय फ़िल्म इंडस्ट्री के कई सारे एक्टर्स,डायरेक्टर्स,फिल्म मेकर्स ने ‘पैरासाईट’ के मेकर्स को बधाई दी है! क्या आपको याद आता है कि इससे पहले कभी ऐसा हुआ है? अवॉर्ड के घोषित होने के कुछ ही मिनट बाद जैसे ही यह फिल्म सोशल मीडिया पर ट्रेंड हुई, तो ट्रेंड बताते हैं कि पूरे एशिया के साथ भारत में सबसे ज्यादा इसे साइटो में सर्च किया गया। यानि अमेरिका इस अवार्ड के साथ अपने छुपे मकसद में कामयाबी से आगे बढ़ रहा है।
अगर ऐसा नहीं है है तो जापान के महान फ़िल्मकार अकीरा कुरोसावा(1976 में ‘देरसू उजला’ को सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा की फिल्म के अवार्ड को छोड़कर) और हमारे देश के महान फ़िल्मकार सत्यजित रे को लाइफटाइम ऑस्कर अवार्ड तो दिया जाता है लेकिन उनकी ही फिल्मों को ऑस्कर की मुख्य धारा के अवार्ड के काबिल क्यों नहीं माना गया था? यह सब लिखने का मतलब फिल्म या फ़िल्मकार की गुणवत्ता की कोई तुलना करना या ऑस्कर अवार्ड का अपमान करना कतई नहीं है बल्कि इसके पीछे छुपे निहितार्थ को समझने की कोशिश करना हैं यद्दपि इससे असहमत होने का अधिकार आपका अपना है।
(आलोक शुक्ला वरिष्ठ रंगकर्मी,लेखक,निर्देशक एवं पत्रकार हैं।)

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This post was last modified on February 17, 2020 10:51 am

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