Saturday, September 30, 2023

धन्य है गोदी मीडिया जिसने प्रधानमंत्री के बयान को भी ‘अंडरप्ले’ कर दिया!

मुख्यमंत्रियों के साथ 27 अप्रैल को हुई वीडियो कॉन्फ्रेंस में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जो सबसे बड़ी बात कही, उसे उनके चहेते मेनस्ट्रीम (गोदी) मीडिया ने ऐसा ‘अंडरप्ले’ किया कि वो सुर्ख़ियों से ग़ायब हो गया। प्रधानमंत्री ने कहा कि “आर्थिक स्थिति की चिन्ता करने की ज़रूरत नहीं है। हमारी अर्थव्यवस्था अच्छी है।” कोरोना की आफ़त के बीच प्रधानमंत्री ने इतनी बड़ी बात कही है। लेकिन इसे तव्वज़ो नहीं मिली। शायद, ऐसी वजहों से ही प्रधानमंत्री को भारतीय पत्रकारिता नापसन्द है।

अरे! भले ही अपूर्व संकट की मौजूदा घड़ी में प्रधानमंत्री की मंशा देश को ढाँढस बँधवाने की ही रही हो, लेकिन इतने बड़े, गहरे और दूरगामी बयान को नज़रअंदाज़ करके गोदी मीडिया ने माननीय प्रधानमंत्री को उनके नारे “दो गज़ दूरी, है ज़रूरी” तक सीमित कर दिया।

ये मोदी जी के प्रति घोर अन्याय है। निन्दनीय है। गोदी मीडिया को ये हक़ किसने दिया कि वो मोदी जी को उस डोनॉल्ड ट्रम्प जैसा मसख़रा समझे जो ‘मज़ाक’ भी इतना मूर्खतापूर्ण करते हैं कि सारी दुनिया उन पर हँसती नहीं बल्कि उनकी बुद्धि पर तरस खाती है। ज्ञात हो कि ट्रम्प ने सेनेटाइज़र पीने और फेफड़ों में इंजेक्शन लगाकर कोरोना को ख़त्म करने का मशविरा दिया था। बहरहाल, लौटते हैं मोदी जी की ओर।

देश का हर अर्थशास्त्री, रिज़र्व बैंक, उद्योग जगत सभी लॉकडाउन की वजह से अर्थव्यवस्था को लेकर बेहद चिन्तित हैं। चिन्तित लोगों की इस जमात में विपक्षी नेता और टुकड़े-टुकड़े गैंग वाले बुद्धिजीवी शामिल नहीं हैं। क्योंकि इनका तो मोदी जी के चमत्कारों में कभी यक़ीन रहा ही नहीं। लेकिन गोदी मीडिया ने भी इतनी बड़ी ‘ख़बर’ को नहीं समझा, इसे लेकर आश्चर्य है!

सचमुच, ब्रॉन्डिंग के शहंशाह मोदी जी के लिए इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण और कुछ नहीं हो सकता! मुमकिन है गोदी मीडिया से अनजाने में ऐसा ग़ुनाह इसलिए हो गया हो कि उसे प्रधानमंत्री कार्यालय से अर्थव्यवस्था वाली बात को उछालने की हिदायत नहीं मिली हो। वैसे भी गोदी मीडिया को हिन्दू-मुस्लिम के सिवाय और कुछ दिखता भी तो नहीं। जो आँखें कभी ऐसे घोटाले भी देख लेती थीं, जो अदालतों में साबित नहीं हो सकें, जो आँखें नोटबन्दी और जीएसटी का गुणगान किये नहीं थकती थीं, जिन्होंने सीएए और एनआरसी की शान में आकाश-पाताल एक कर दिया था, उन्हीं आँखों को अब कोरोना की टेस्टिंग किट के आयात में छिपा गोल-माल नहीं दिखता है। जैसे इसे राफ़ेल घोटाला भी नहीं दिखा, वैसे ही अब प्रवासी कामगारों की भुखमरी और दिहाड़ी मज़दूरों की बेरोज़गारी भी नहीं दिख रही। 

कहना मुश्किल है कि गोदी मीडिया रतौंधी से पीड़ित है या मोतियाबिन्द से। वर्ना, ऐसे वक़्त में जब नवजात ‘पीएम केयर फंड’ को छोड़कर अर्थव्यवस्था का हरेक क्षेत्र या तो कराह रहा है या फिर अन्तिम साँसें गिन रहा है, तब प्रधानमंत्री के इस बयान की अहमियत कितनी बड़ी है कि ‘अर्थव्यवस्था की चिन्ता करने की ज़रूरत नहीं है, वो ठीक है।’ अरे! ये ब्रेक्रिंग नहीं, बल्कि Earth Shaking ख़बर है! इस बयान के बाद तो भारत ही नहीं बल्कि दुनिया भर में बसे हुए भारतवंशियों को अपने-अपने घरों में रहते हुए ताली-थाली वादन करके, शंखनाद करके और दीये जलाकर जश्न मनाना चाहिए।

दरअसल, हमें मानकर चलना चाहिए कि प्रधानमंत्री ने जनता को खुश करने के लिए रिज़र्व बैंक से सरप्लस फंड को हासिल करने की सीमा को 75,000 करोड़ रुपये से बढ़वाकर 2 लाख करोड़ रुपये करवा दिया है, बार-बार बैंकों के रेपो-रेट कम किये जा रहे हैं, जीडीपी के शून्य तक गिरने की बातें हो रही हैं, ग़रीबों की संख्या में 10 करोड़ लोगों के इज़ाफ़े की बातें भी हुई हैं, बेरोज़गारों की तादाद में भी 10 करोड़ की वृद्धि का अनुमान लगाया गया है, सरकारी कर्मचारियों की तनख़्वाह में भी डेढ़ साल तक कटौती लागू हो गयी है, पेंशनरों से भी कहा गया है कि उन्हें डेढ़ साल तक तो कष्ट बर्दाश्त करना ही होगा, संगठित क्षेत्र तबाह है, असंगठित क्षेत्र बर्बाद है, जिन किसानों की आमदनी ‘दोगुनी’ हो चुकी थी उन्हें अब अपनी उपज का आधा दाम भी मिलना मुहाल है, कल-कारखानें, ऑफ़िस-रेस्टोरेंट बन्द हैं, मॉल-बाज़ार बन्द हैं, कुटीर उद्योग ख़त्म हैं, रेल-विमान, ट्रक-बस सब बन्द हैं, फिर भी यदि मोदीजी कह रहे हैं कि अर्थव्यवस्था ठीक है, तो ठीक ही होगी!

वर्ना, कौन नहीं जानता कि उन्हें अपने दोस्त ट्रम्प की तरह न तो मज़ाक करना पसन्द है और ना ही बेवकूफ़ी भरी बातें करना। वो तो जैसे इंसान को कपड़ों से पहचानने की क़ाबलियत रखते हैं, वैसे ही अर्थव्यवस्था की नब्ज़ पकड़ना भी जानते हैं। मज़े की बात तो ये भी है कि मोदीजी के इस अनुपम रहस्य का पता दुनिया को कोरोना की दस्तक देने से पहले भारत में छायी मन्दी के वक़्त भी नहीं चला। शुक्र है कि अब पर्दा उठ गया। भेद खुल गया।

किसकी हिम्मत है जो प्रधानमंत्री से पूछ भी ले कि अरे हुज़ूर, माई-बाप, बड़ी मेहरबानी होगी, यदि आप ज़रा ये समझा दें कि अर्थव्यवस्था कैसे ठीक है, क्या-क्या ठीक है, कितना-कितना ठीक है? नहीं तो बस, इतना ही बता दीजिए कि जो कुछ लेस-मात्र भी ठीक नहीं है, वो कब तक ठीक हो जाएगा, कैसे ठीक होगा? टुकड़े-टुकड़े गैंग का भी आपके मार्गदर्शन से उद्धार हो जाएगा, देश द्रोहियों का कौतूहल भी शान्त हो सकेगा। साफ़ है कि यदि प्रधानमंत्री ये कह रहे हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था के लिए चिन्ता करने की ज़रूरत नहीं है, तो फिर अर्थव्यवस्था, रोज़ी-रोटी और घर-गृहस्थी के बारे में वो कुछ नहीं जानते। इन विषयों में वो अज्ञानी हैं। 

प्रधानमंत्री ये भी नहीं जानते कि लोगों को चिन्ता कब होती है, क्यों होती है और उसका निराकरण कैसे हो सकता है! उन्हें कौन बताये कि मामला सिर्फ़ देह से दो गज़ की दूरी का ही नहीं है, बल्कि भोजन की थाली से पेट की दूरी का सवाल इससे भी बड़ा है। सबसे बड़ा है। कोरोना का मुक़ाबला करने के लिए भी तो पेट को रोटी पहले चाहिए। रोटी के लिए पैसा चाहिए। पैसे के लिए धन्धा-रोज़गार चाहिए। धन्धा-रोज़गार है, तभी अर्थव्यवस्था ठीक है। वर्ना, सब कूड़ा है। सफ़ाचट है।

(मुकेश कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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