प्रभाष जोशी ने कहा था- आने वाले कई वर्ष प्रतिक्रियावादी छद्म और संकीर्ण हिंदुत्व के साल होंगे

आधुनिक हिंदी पत्रकारिता को नई दिशा, भाषा और तेवर प्रदान करने वाले चर्चित पत्रकार, सामाजिक-राजनीतिक चिंतक प्रभाष जोशी की आज 5 नवंबर को पुण्यतिथि है। प्रभाष जोशी का शुमार उन संपादकों में होता है, जिन्होंने हिंदी के पत्रकारों को सत्ता के गलियारों में विशिष्टता प्रदान की। उनकी पूछ-परख बढ़वाई। जोशी का लेखन सामाजिक सरोकारों से ओत-पोत लेखन था। ‘जनसत्ता’ के साप्ताहिक स्तंभ ‘कागद कारे’ में समाजी, सियासी मुद्दों पर लिखी हुईं उनकी टिप्पणियां हर एक का ध्यान अपनी ओर खींचती थीं। बेबाकी और निर्भीकता प्रभाष जोशी की कलम की खास पहचान थी। उनके कलम के ताप से कोई नहीं बच पाता था। वे जो कुछ सोचते, पहले उसे तर्क की कसौटी पर कसते, फिर उसे कागज के पन्नों पर उंडेल देते। प्रभाष जोशी के तरकश से जो भी तीर निकलता वह हमेशा सही निशाने पर लगता। उनके खाते में देश के लिए किए गए ऐसे कई काम हैं, जो उनकी लेखनी से मुमकिन हुए।

साल 1972 में समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण के साथ चंबल के डाकुओं के आत्मसमर्पण से लेकर, सूचना के अधिकार और रोजगार गारंटी आंदोलनों में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। प्रेस की स्वतंत्रता को बरकरार रखने के लिए लगातार कोशिशें कीं। आपातकाल का भयावह दौर रहा हो या भ्रष्टाचार, आतंकवाद या फिर सांप्रदायिकता प्रभाष जोशी की कलम देश की सभी ज्वलंत समस्याओं पर समान तौर से आग उगलती थीं। आठवें दशक में पंजाब से उठे आतंकवाद और नंवे दशक से फैली सांप्रदायिक लहर के खिलाफ तो उन्होंने बाकायदा मोर्चा खोलकर लड़ाई की। फिरकापरस्त ताकतों से वे अपनी जिंदगी के आखिर वक्त तक लोहा लेते रहे। अपने तीखे और तार्किक लेखन की वजह से प्रभाष जोशी हमेशा चरमपंथियों और कट्टरपंथियों के निशाने पर रहे। बावजूद इसके उन्होंने सच का दामन नहीं छोड़ा।

गांधीवादी और सर्वोदयी मूल्यों में प्रभाष जोशी का गहरा यकीन था। ये जीवन मूल्य उनके व्यक्तित्व में भी साफ झलकते थे। 15 जुलाई, 1937 को मध्य प्रदेश में सीहोर ज़िले के आष्ठा गांव में जन्में प्रभाष जोशी की हिंदी पत्रकारिता में शुरुआत साल 1960 में उस दौर के चर्चित समाचार पत्र ‘नई दुनिया’ से हुई। ‘नई दुनिया’ में कुछ साल काम करने के बाद वे नई दिल्ली आ गए। दिल्ली में उन्होंने यशस्वी संपादक भवानी प्रसाद मिश्र के संपादन में निकलने वाले ‘सर्वोदय जगत’ में कुछ समय काम किया। साल 1975 में प्रभाष जोशी ‘इंडियन एक्सप्रेस’ से जुड़े और यहीं से उनकी एक अलग पहचान बनी।

लोहियावादी रामनाथ गोयनका के ‘इंडियन एक्सप्रेस’ से वे एक बार जुड़े, तो हमेशा के लिए उसी के हो गए। साल 1975 में उन्होंने ‘एक्सप्रेस समूह’ के हिंदी साप्ताहिक ‘प्रजानीति’ का संपादन किया। आपातकाल में साप्ताहिक के बंद होने के बाद इसी समूह की पत्रिका ‘आसपास’ उन्होंने निकाली। बाद में वे ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के अहमदाबाद, चंडीगढ़ और दिल्ली में स्थानीय संपादक रहे। साल 1983 में ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने उन्हें अपने हिंदी अखबार ‘जनसत्ता’ की बागडोर सौंपी। साल 1983 के बाद का इतिहास ‘जनसत्ता’ और प्रभाष जोशी की कामयाबी का मिला-जुला इतिहास रहा। एक दौर ऐसा भी आया, जब ‘जनसत्ता’ और प्रभाष जोशी एक दूसरे के पर्याय हो गए। पूरे अखबार पर उनकी छवि साफ नजर आती थी।

उन्होंने अपने संपादन में पत्रकारों को वह छूट दी, जो आज विरले मीडिया संस्थानों में दिखलाई देती है। अपने पत्रकारों से प्रभाष जोशी का साफ कहना था कि ‘जो भी लिखो सच लिखो।’ नए पत्रकारों को समझाते हुए वे हमेशा कहते थे, ‘‘जो लिखते हो, उससे प्रभावित होने के बजाय समाचारों में निष्पक्ष और तटस्थ बने रहो।’’ जाहिर है उनके संपादन में ‘जनसत्ता’ ने कामयाबी के कई नए सोपान तय किए। ‘जनसत्ता’ जब अपनी लोकप्रियता के चरम पर था और इसका सर्कुलेशन ढाई लाख से भी ऊपर पहुंच गया, तब प्रभाष जोशी इकलौते ऐसे संपादक रहे, जिन्होंने बाकायदा एलान कर अपने पाठकों से यह कहा कि पाठक अब इसे मिल-बांट कर पढ़ें, अब हमारे पास इससे ज्यादा प्रिंट ऑर्डर बढ़ाने की मशीनी सामर्थ्य नहीं है।

बहरहाल, प्रभाष जोशी साल 1995 तक ‘जनसत्ता’ के संपादक रहे। संपादन से अवकाश लेने के बाद भी वे अखबार से संपादकीय सलाहकार के तौर पर जुड़े रहे। साल 1992 में ‘जनसत्ता’ में शुरू हुआ साप्ताहिक स्तंभ ‘कागद कारे’, प्रभाष जोशी का लोकप्रिय स्तंभ था, जिसे लोग बड़े चाव से पढ़ते थे। इस कॉलम का उनके विरोधी भी हफ्ते भर बेसब्री से इंतजार करते थे। उस दौर में ‘कागद कारे’ की क्या अहमियत थी?, गर इसे जानना-समझना है, तो वरिष्ठ आलोचक नामवर सिंह की इस टिप्पणी पर गौर कीजिए, जो उन्होंने इसकी तारीफ में लिखी थी, ‘‘कागद कारे, एक तरह से आज का महाभारत है और इसके लेखक प्रभाष जी आधुनिक व्यास। व्यास जी की तरह प्रभाष जी ने यह दावा तो नहीं किया कि ‘यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत्क्वचित्’ अर्थात् जो कुछ यहां है, वह दूसरी जगह भी है, और जो यहां नहीं है, वह कहीं नहीं है। फिर भी समग्रता ‘कागद कारे’ में कथित युगांत का प्रतिबिंब पर्याप्त समावेशी है।’’

‘जनसत्ता’ के अलावा प्रभाष जोशी का लेखन दीगर पत्र-पत्रिकाओं में भी चलता रहता था। वे जिस मौजू पर लिखते, वह दस्तावेज हो जाता। मुहावरों, कहावतों और मालवी बोली से लबरेज उनकी भाषा चुटीलापन लिए होती थी। उनके शब्द आर-पार भेद देते। प्रभाष जोशी के पैने विचार और भाषा उनकी ताकत थी। प्रभाष जोशी उन संपादकों में से एक थे, जिन्होंने संपादन के साथ-साथ हर विषय पर जमकर लिखा। पत्रकारिता के अलावा सामयिक प्रसंगों पर उनकी कई किताबें हैं। प्रभाष जोशी की जो भी किताबें प्रकाशित हुई हैं, वे किताबें, अखबारों में समय-समय पर लिखे हुए, उनके लेखों का संकलन है। मसलन ‘मसि कागद’, ‘हिंदू होने का धर्म’, ‘चंबल की बंदूकें’, ‘गांधी के चरणों में’ और ‘खेल सिर्फ खेल नहीं’। इन किताबों में ‘हिंदू होने का धर्म’ उनकी चर्चित किताब है। इस किताब में निर्भीकता से उन्होंने अपने समय की सांप्रदायिक राजनीति की जम कर बखिया उधेड़ी है। गांधी और उनके विचारों की हत्या करने वाली विचारधारा से प्रभाष जोशी की लंबी मुठभेड़ रही।

जब भी देश में फिरकापरस्त ताकतें सिर उठातीं, उनकी कलम खुद-ब-खुद मचलने लगती। अपनी कलम से वे उन पर ऐसे प्रहार करते कि वे तिलमिलाकर रह जाते। साल 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद प्रभाष जोशी ने अपने ऐसे ही एक लेख में लिखा था, ‘‘किसी भाजपा नेता ने कहा कि यह साल छद्म धर्मनिरपेक्षता और असली पंथ निरपेक्षता के संघर्ष का साल होगा, लेकिन अगर आप छह दिसंबर के सारे अर्थ समझ लें, तो अगला साल ही नहीं आने वाले कई साल प्रतिक्रियावादी छद्म और संकीर्ण हिंदुत्व और धर्म के संघर्ष के साल होंगे।’’ प्रभाष जोशी की यह बात आज कितनी सच साबित हो रही है। उनका जो डर और चिंताएं थी, वे आज और भी ज्यादा बढ़ गई हैं। बल्कि यह खतरा, खतरनाक मुहाने तक पहुंच गया है।

अपनी जिंदगी के आखिरी वक्त तक प्रभाष जोशी ने सक्रियता से काम किया। उम्र बढ़ने के साथ-साथ उनकी लेखकीय ऊर्जा भी बढ़ती गई। इसमें कहीं कोई कमी नहीं आई। वे प्रभाष जोशी ही थे, जिन्होंने आम चुनाव के दौरान अखबारों के चुनाव पैकेज के खिलाफ मुखरता से आवाज उठाई। अपने ही व्यवसाय और सहकर्मियों के ऊपर अंगुली उठाना, उनका साहसिक कदम था। शुरुआत में उनके इस कदम पर दबे स्वर में बात हुई, लेकिन बाद में उनके साथ और भी लोग जुड़ते चले गए। फिर तो देखते-देखते मीडिया सस्थानों के इस चुनाव पैकेज के खिलाफ देश में एक मुहिम छिड़ गई। जिसके अगुआ निश्चित तौर पर प्रभाष जोशी ही थे।

पचास साल के लंबे पत्रकारिता करियर में प्रभाष जोशी पर कुछ दाग भी लगे। मसलन राजस्थान में ‘रूप कंवर सती कांड’ पर ‘जनसत्ता’ में उनके स्टैंड को लेकर, देश भर में उनकी तीखी आलोचना हुई। प्रगतिशील और जनवादी समाज ने इस बात के लिए अखबार का बहिष्कार तक किया, जो सही भी था। बावजूद इसके, सिर्फ एक इस वजह से हिंदी पत्रकारिता में उनका योगदान कम नहीं हो जाता। अपने समय में प्रभाष जोशी ने पत्रकारिता के अंदर, अपनी कलम से जो क्रांतिकारी बदलाव किए, वे आज एक मिसाल हैं। 

पत्रकारिता के अलावा प्रभाष जोशी को संगीत और क्रिकेट से जुनून की हद तक लगाव था। जब वे क्रिकेट पर लिखते, तो पढ़कर ये एहसास ही नहीं होता था कि ये वही प्रभाष जोशी हैं, जो राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर गंभीरता से लिखते हैं। 5 नवंबर, 2009 को प्रभाष जोशी ने इस दुनिया से अपनी आखिरी विदाई ली। प्रभाष जोशी, पत्रकारिता के शिखर पुरुष माखनलाल चतुर्वेदी, गणेश शंकर विद्यार्थी, राहुल बारपुते और राजेंद्र माथुर परंपरा के आखिरी संपादक थे। उनके लिए पत्रकारिता एक सामाजिक सरोकार थी। पत्रकारिता, प्रभाष जोशी के लिए एक जरिया थी, समाज को बदलने का। आज जब पत्रकारिता में आहिस्ता-आहिस्ता ‘संपादक’ नाम की संस्था खत्म हो रही है, छपे हुए अल्फाजों की विश्वसनीयता लगातार सवालों के घेरे में हो, तब ऐसे निराशाजनक माहौल में प्रभाष जोशी की याद आना लाजमी है। पत्रकारिता और देश को बचाने के लिए आज कितने पत्रकार हैं, जो प्रभाष जोशी की तर्ज पर कर रहे हैं कागद कारे?

(मध्य प्रदेश निवासी लेखक-पत्रकार जाहिद खान, ‘आजाद हिंदुस्तान में मुसलमान’ और ‘तरक्कीपसंद तहरीक के हमसफर’ समेत पांच किताबों के लेखक हैं।)

This post was last modified on November 5, 2020 4:35 pm

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