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पीएस कृष्णन: सामाजिक न्याय के प्रखर योध्दा

‘दबे-कुचले वर्गों के प्रति भेदभाव के खिलाफ, अंतर-जातीय विवाहों की कड़ी वकालत, संस्कृत के अपने ज्ञान का उपयोग धर्म सत्ता के खिलाफ करते हैं, ग्रामीण अधिकारियों के बजाय ग्रामीणों के शब्दों पर भरोसा करते हैं।’एक आईएएस अधिकारी के रूप में कैरियर के शुरुआती दिनों में ही पीएस कृष्णन पर गोपनीय रिपोर्ट में लिखा गया यह अंश पूर्व प्रशासनिक अधिकारी, संविधान के पुरोधा और वंचित वर्गों के प्रबल पैरोकार और मार्गदर्शक दिवंगत पीएस कृष्णन के पूरे जीवन का मूल सार बना रहा।

मंडल आयोग के सदस्य से लेकर समाज कल्याण मंत्रालय के सचिव के रूप में मंडल आयोग के पिछड़े वर्गों को 27% आरक्षण देने के निर्णय को लागू करने में उनके महत्वपूर्ण योगदान को सामाजिक न्याय के प्रति उनकी निष्ठा को चिन्हित करने के लिए काफी है।

डॉ. अंबेडकर को अपना आदर्श मानने वाले पीएस कृष्णन ने समता, समानता और बंधुत्व के मूल को आत्मसात करते हुए अपने प्रशासनिक सेवा के दौर में भी इन मूल्यों को पूरी तरह से अपने  व्यहवारिक जीवन में अपनाया था।

पीएस कृष्णन के प्रयासों का ही नतीजा था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने दलितों और आदिवासियों के साथ हो रहे अत्याचार, उत्पीड़न और भेदभाव को रोकने के लिए अनुसूचित जाति/जनजाति (पीओए) एक्ट 1989 को संसद में भारी विरोध के बावजूद पास कराया। एससी/एसटी एक्ट कानून को अमली जामा देने वाले ड्राफ्ट को तैयार करने में कृष्णन ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। यह कानून दलित–आदिवासी के साथ होने वाले अत्याचारों उत्पीड़न को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

केरल के तिरुअनंतपुरम जिले के एक उच्च कुलीन परिवार में जन्मे पीएस कृष्णन का दस नवम्बर 2019 को दिल्ली अपोलो अस्पताल में 86 वर्ष की आयु में निधन हो गया। कृष्णन साहब के निधन के साथ ही दबे-कुचले वर्गों विशेष रूप से दलित, आदिवासी, पिछड़े  और अल्पसंख्यक वर्गों  ने अपना अमूल्य पैरोकार और स्तंभ खो दिया, जिसकी पूर्ति अपूर्णीय है l

1956 बैच के प्रशासनिक अधिकार के रूप में आंध्र प्रदेश से अपने करियर की शुरुआत करने वाले पीएस कृष्णन ने शुरू से ही सरकार को दबे-कुचले वर्गों विशेष रूप से दलित, आदिवासी, पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्गों के सामाजिक, आर्थिक विकास पर जोर डालने पर विवश कर दिया था।

केरल के जाति विरोधी आंदोलन के प्रवर्तक अय्यनकली और  श्रीनारायण गुरु से प्रभावित पीएस कृष्णन अपनी युवा अवस्था में अकसर अपने पिता से जाति मुक्त समाज को लेकर बात किया करते थे। पिता-पुत्र के बीच में जातिमुक्त समाज की अवधारणा एक समान थी। आगे चलकर 1940 में जब वह विश्वविद्यालय पहुंचे तो प्रगतिशील तबकों के बीच रहकर जाति मुक्ति और सामाजिक न्याय की अवधारणा को मजबूती मिली।

डॉ. अंबेडकर के विचारों के प्रबल समर्थक और सामाजिक समानता के पैरोकार कृष्णन वंचित वर्गों को आरक्षण दिए जाने के प्रबल समर्थक ही नहीं थे, बल्कि उसके दायरे को व्यापक करने के हिमायती रहे। वह हमेशा वंचित वर्गों को आर्थिक रूप से सक्षम बनाने के लिए विशेष प्रयासों के लिए निरंतर प्रयासरत रहे। देश के संसाधनों विशेष रूप से प्राकृतिक संसाधन जल, जंगल और ज़मीन में दलित-आदिवासियों के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए वह संविधान के भीतर से व्यवस्था बनाने की कोशिश ने उन्हें दलित आदिवासी वर्गों के एक मुखर प्रवक्ता और मार्गदर्शक के रूप में पूरे देश में स्थापित कर दिया था।

1979 में पिछड़े वर्गों को आरक्षण दिए जाने के मुद्दे पर बने बीपी मंडल आयोग के सदस्य के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले पीएस कृष्णन ने 1990 में वीपी सिंह सरकार द्वारा पिछड़े वर्गों को 27% आरक्षण दिए जाने के समय पीएस कृष्णन ने केंद्र सरकार के समाज कल्याण मंत्रालय के सचिव के रूप में भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई l वह पहले राष्ट्रिय पिछड़ा वर्ग आयोग के सदस्य भी रहे। समाज कल्याण मंत्रालय में सचिव के रूप में उनका सबसे बड़ा योगदान राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग और राष्ट्रीय अनुसूचित जाति-जन जाति आयोग को संवैधानिक दर्ज़ा दिए जाने के लिए हमेशा याद रखा जाएगा।

प्रशासनिक अधिकारी की भूमिका के बाद भी कृष्णन रुके नहीं बल्कि सेवा निवृत्ति के बाद भी निरंतर गतिशील रहे और वंचित वर्गों के मुद्दों की मुखर पैरवी विभिन्न स्तरों पर करते रहे। दलित, आदिवासी, पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्गों के हितों के लिए अपने जीवन के अंतिम समय तक काम करते रहे।

पिछले लगभग ढाई दशकों से भी ज्यादा समय से पीएस कृष्णन सामाजिक आंदोलनों, अभियानों और पैरवीकार संगठनों के बीच में एक प्रखर रणनीतिकार के रूप में अनेक भूमिकाएं निभाते रहे।

वंचित वर्गों के भूमि अधिकार, निजी क्षेत्र में आरक्षण, उच्च शिक्षा में आरक्षण और विशेष प्रावधान जैसे महवपूर्ण आंदोलनों को पैनापन देने में पीएस कृष्णन हमेशा महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे। दलित आदिवासी वर्गों के आर्थिक विकास के लिए शेड्यूल्ड कास्ट सब प्लान और ट्राइबल सब प्लान ( पहले दोनों के लिए स्पेशल कॉम्पोनेन्ट प्लान) को ज़मीनी धरातल में लाने में भी पीएस कृष्णन ने एक रणनीतिकार और मार्गदर्शक के रूप में लगातार योगदान किया था।

पीएस कृष्णन की सबसे बड़ी खूबी यह भी थी कि वंचित वर्गों विशेष रूप से दलित आदिवासियों के विभिन्न आंदोलनों, अभियानों और एडवोकेसी समूहों को सामूहिक हस्तक्षेप के लिए सामूहिक नेतृत्व देने के लिए तैयार कर लेते थे। वह सभी के बीच सर्वमान्य स्वीकार्य मार्गदर्शक थे।

ज़मीनी कार्यकर्ताओं और आन्दोलनों को भी पीएस कृष्णन बहुत सहज रूप से उपलब्ध रहते थे। उनका विश्वास था कि ज़मीनी कार्यकर्ता और आंदोलन उनके सूत्र और स्रोत हैं, जो उन्हें वास्तविकताओं से परचित कराते हैं।

पीएस कृष्णन दलित आदिवासी वर्गों से सक्षम समूहों के लिए एक शानदार  उदाहरण भी थे कि किस तरह अपने समाजों के अपनी सीमाओं में रहते हुए सकारात्मक योगदान किया जा सकता है।

मुख्यधारा के समाजों के लिए भी पीएस कृष्णन एक अनुकरणीय व्यक्तित्व थे, जो उच्च जाति से संबंधित होने के बावजूद समता, समानता और बंधुत्व के मूल्यों के साथ हाशिए के समाज के साथ कंधे से कन्धा मिला कर जीवन पर्यन्त सामाजिक न्याय के पक्ष में खड़े रहे।

पीएस कृष्णन पर नितिराजन द्वारा लिखी पुस्तक A Crusade for Social Justice (सामाजिक न्याय का योद्धा) में  उनकी स्मृतियों को सहेजते हुए उन्हें अंबेडकर-2 घोषित करते हुए सामाजिक न्याय के प्रति उनकी निष्ठा और प्रतिबद्धता को रेखांकित किया है।

हार्दिक नमन कृष्णन साहब!

(अरुण खोटे, पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं और आजकल लखनऊ में रहते हैं।)

This post was last modified on November 12, 2019 5:20 pm

Janchowk

Janchowk Official Journalists in Delhi

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