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उद्योग जगत और सरकार के बीच टूट चुका है विश्वास का रिश्ता

आज के टेलिग्राफ़ में उद्योगपतियों की मनोदशा के बारे में सुर्ख़ी की खबर है । “Why business is talking ‘wine’, not Dhanda”। (क्यों उद्योगपति ‘शराब’ की बात करते हैं, धंधे की नहीं) पूरी रिपोर्ट उद्योगपतियों की आपसी बातचीत और उनके बयानों के बारे में है जिसमें घुमा-घुमा कर एक ही बात कही गई है कि उद्योग और सरकार के बीच विश्वास का रिश्ता टूट चुका है। कोई भी अपने व्यापार के भविष्य के बारे में निश्चिंत नहीं है । इसीलिये आपस में मिलने पर पहले जहां नये प्रकल्प के बारे में चर्चा होती थी, वहीं अभी नई शराब की चर्चा हुआ करती है। अर्थात् अभी उद्योग जगत के लोग उपभोग की चर्चा से अपनी-अपनी पहचान बना रहे हैं, न कि उत्पादन के उपक्रमों से ।

दुनिया की बेहतरीन से बेहतरीन चीजों का उपभोग ही जैसे इनकी ज़िंदगी का ध्येय बनता जा रहा है, अपनी रचनात्मक मौलिकता का इनमें कोई मोह नहीं बचा है । बहरहाल, इस रिपोर्ट का कुछ ज़ोर इस बात पर भी है कि वर्तमान सरकार ने ईडी, आईटी की तरह की एजेंसियों के चुनिंदा प्रयोग से डर का वातावरण तैयार करके समग्र रूप से उद्यमशीलता को कमजोर किया है । उद्योगपतियों का यही वह तबका है जो कभी राजनीति में मोदी के उत्थान पर अश्लील ढंग से उत्साही नज़र आता था । उन्हें भरोसा था कि मोदी व्यापार के माहौल को उनके लिये अनुकूल बनायेगा । उनके इस भरोसे का एक प्रमुख कारण यह था कि उन्हें आरएसएस पर भरोसा था और वे इस बात को अच्छी तरह से जानते थे कि मोदी आरएसएस का एक सच्चा प्रतिनिधि है ।

भारत में आरएसएस के इतिहास पर यदि कोई गहराई से नज़र डाले तो पता चलेगा कि किस प्रकार उसके कार्यकर्ताओं का प्रमुख हिस्सा उन छोटे दुकानदारों और व्यापारियों से आता था जो एक अर्थ में विफल व्यापारी हुआ करते हैं क्योंकि उनके पास औद्योगिक साम्राज्य बनाने की तरह की व्यापक दृष्टि ही नहीं होती थी। उनकी मामूली शिक्षा जीविका के लिये उन्हें छोटे-मोटे धंधों से बांधे रखती थी । और, अपनी इसी कमजोर स्थिति के कारण वे अक्सर किसी न किसी बड़े व्यापारी घराने के साये में ही पला करते थे। यही वजह रही कि आरएसएस के कार्यकर्ताओं को पालने वाले औद्योगिक घराने उन्हें सहज ही अपना दास मानते रहे हैं । अक्षय मुकुल की पुस्तक ‘Gita Press and the making of Hindu India’ में पूरे विस्तार के साथ संघी मानसिकता के सामाजिक कार्यकर्ताओं के प्रति कोलकाता के मारवाड़ियों की उदारता का पूरा इतिहास दर्ज है । मुकुल ने इसे बिल्कुल सही मारवाड़ियों की अपनी पहचान के संकट से जोड़ कर विवेचित किया है।

उनके शब्दों में, “उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी के प्रारंभ में भारतीय पूंजीवाद में मारवाड़ियों के उदय के साथ दो महत्वपूर्ण, लेकिन परस्पर-विरोधी चीजें घटित हुईं । पहली तो यह कि यह समुदाय ईर्ष्या और तिरस्कार का पात्र बन गया, उनको यूरोप के यहूदियों की तरह घनघोर स्वार्थी बता कर मज़ाक़ उड़ाया जाने लगा। दूसरा मारवाड़ियों में खुद में एक विचित्र सा पहचान का संकट पैदा होने लगा । वह आर्थिक रूप में एक ऐसा शक्तिशाली समुदाय था जिसका कोई सामाजिक मान नहीं था। उनकी सादगी भी उनको मान नहीं दिला पाई थी । …धार्मिक और सामाजिक कामों में उनकी उदारता से उन्हें मान तो मिला लेकिन उसके अपने तनाव भी थे । धार्मिक और सामाजिक कामों के लिये उदारता से दान के आधार पर निर्मित सादा जीवन जीने वाला सार्वजनिक व्यक्तित्व ।” मुकुल ने बिल्कुल सही पकड़ा है कि मारवाड़ियों की पहचान का संकट ही उन्हें आधुनिक बनाने के बजाय हिंदू धार्मिक क्रियाकलापों से जोड़ता चला गया । उनके बीच से ही गीताप्रेस गोरखपुर के स्थापनाकर्ता हनुमान प्रसाद पोद्दार सरीखे लोगों ने कोलकाता के मारवाड़ी परिवारों के चंदे पर ही हिंदू धर्म और सांप्रदायिकता के प्रचार-प्रसार का ताना-बाना तैयार किया था ।

कहने का तात्पर्य यही है कि औद्योगिक घराने अनेक ऐतिहासिक सामाजिक कारणों से ही अपने को आरएसएस और हिंदुत्व की विचारधारा के संगठनों का सरपरस्त मानते रहे हैं और इसी वजह से उनका इनकी स्वामिभक्ति पर काफी भरोसा भी रहा है । लेकिन समझने की बात यह है कि इस प्रकार की किसी की भी सरपरस्ती तभी तक कोई मायने रखती है जब तक जिसे पाला जा रहा है, उसके लिये उसकी ज़रूरत बनी रहती है । जब पलने वाले खुद शासक के आसन पर पहुंच जाते हैं, और अपने ‘सरपरस्तों’ के ही मालिक बन जाते हैं, तो दोनों के बीच पुराना रिश्ता नहीं रह सकता है, बल्कि एक नये तनाव से भरा भिन्न रिश्ता बन जाता है । यह नये मालिक की अपने पुराने मालिक के प्रति ईर्ष्या और नफ़रत पर आधारित रिश्ता होता है ।

जर्मनी में हिटलर के उदय और पूरे शासन का इतिहास भी इसका गवाह है कि हिटलर को आगे बढ़ाने में वहां के जिन तमाम उद्योगपतियों ने भरपूर मदद की थी, हिटलर ने सत्ता पर अपना पूर्ण अधिकार क़ायम कर लेने के बाद उन सबको चुन-चुन कर या तो यातना शिविरों में पहुंचाया या युद्ध के दौरान ही देश छोड़ कर भाग जाने के लिये मजबूर किया । उद्योग की आज़ादी का कोई मूल्य नहीं रह गया था । इसी लेखक की किताब ‘आरएसएस और उसकी विचारधारा’ में एक पूरा अध्याय ‘आरएसएस और व्यवसायी वर्ग’ पर है जिसमें थोड़े विस्तार के साथ हिटलर और जर्मनी के उद्योगपतियों के संबंधों का इतिहास दिया गया है । प्रेम और ईर्ष्या का यह आरएसएस और व्यवसायी समुदाय के बीच का रिश्ता परस्पर की सामाजिक स्थिति और शक्ति में परिवर्तन के स्वरूप के साथ बनता-बिगड़ता रहता है ।

संघ के लोग व्यवसायी घरानों के निकट रहे हैं और स्वाभाविक रूप से उनकी अच्छी-बुरी करतूतों के बारे में उनकी अपनी ख़ास धारणाएं भी रहती होंगी । लेकिन, निकटस्थ व्यक्ति ही किसी भी सत्य के प्रति सबसे अधिक विभ्रांतियों से भरा हुआ पाया जाता है । बहुत निकटता से सत्य को उसकी समग्रता में देखा नहीं जा सकता है । कहना न होगा, यही वजह है कि आरएसएस के प्रतिनिधि मोदी जी और उनके निकट के लोगों में उद्योगपतियों के बारे में भारी भ्रांतियां भरी हुई हैं। वे न उन पर भरोसा कर पाते हैं और न पूरी तरह से अविश्वास ही । इसी वजह से ये पूरे व्यवसाय जगत के बारे में ही हमेशा दुविधाग्रस्त रहते हैं । विडंबना यह है कि भारत की अर्थ-व्यवस्था का बहुलांश निजी पूंजी की गतिविधियों पर ही निर्भर करता है ।

सरकार की किसी भी भ्रांति की वजह से उस क्षेत्र में यदि कोई गतिरोध पैदा होता है, तो यह तय है कि यह पूरी अर्थ-व्यवस्था के चक्के को जाम कर देने के लिये काफ़ी होगा । आज भारत के व्यवसाय जगत के बारे में मोदी जी की निजी भ्रांतियों की क़ीमत भारत की अर्थ-व्यवस्था को चुकानी पड़ रही है । रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन जब आज के आर्थिक संकट के लिये मोदी को निजी तौर पर ज़िम्मेदार बता रहे हैं, तो वह अकारण नहीं हैं । हिटलर का रास्ता औद्योगिक विकास का सही रास्ता कभी नहीं हो सकता है।

(अरुण माहेश्वरी वरिष्ठ लेखक और स्तंभकार हैं आप आजकल कोलकाता में रहते हैं।)

This post was last modified on December 9, 2019 3:18 pm

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