दास्तान बिहार के भागलपुर की एक बेटी की

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एक मां अपने संतान को 09 माह तक गर्भ में पालने के बाद जन्म देती है। पिता उसे लाड-प्यार देता है क्योंकि उसकी रगों में उसका खून बहता है। यह एक अटूट बंधन है जो ताउम्र बना रहता है। पर गरीबी एक अभिशाप है जिसके कारण यह बंधन कभी-कभी टूट जाता है, जब कोई उसके संतान को बेहतर जीवन देने का भरोसा दिला कर अपने साथ ले जाता है। और जब यह भरोसा टूट जाता है तो कलेजा फट जाता है, पर गरीबी की जकड़न के कारण आंसू बहाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं रह जाता है।

यह दास्तान भागलपुर जिला, गांव लक्ष्मण टोला गोविंदपुर, पोस्ट ऑफिस मोहनपुर और थाना पीर पैथी की एक बेटी की है। चंद्रिका साव नामक एक व्यक्ति ने इस बेटी के पिता से कोलकाता के संजय पांडे का परिचय कराया था।  गांव में इनका रसूख भी काफी है और खुशहाल व्यक्ति के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने पिता से कहा कि अपनी बेटी को मेरे साथ भेज दो हम उसे पढ़ा लिखा कर एक खुशहाल जीवन देंगे। पिता को लगा कि चलो तीन बेटी और तीन बेटों में से एक को तो खुशहाल जीवन मिलेगा। उस वक्त लड़की की उम्र 10 साल के करीब थी। अब मां-बाप को क्या पता था कि लड़की को खुशहाल जीवन नहीं नरक की यातना भोगनी पड़ेगी।

लड़की कोलकाता आ गई। यहां आने के कुछ दिनों बाद से ही जुल्मों सितम का सिलसिला शुरू हो गया। करीब 12 साल की उम्र में संजय पांडे ने उसका ब्याह अपने मंदबुद्धि बेटे से करा दिया। फिलहाल लड़की की उम्र 22 साल के करीब हो गई है और इन 12 वर्षों तक उसे बाहरी दुनिया के किसी से भी मिलने नहीं दिया गया। उसे अक्सर कमरे में बंद रखा जाता था। कहती है कि उसने भी एक अच्छे जीवन का सपना देखा था पर यह शहर उसे इतना गम देगा यह कभी सोचा भी नहीं था। ब्याह रचाने के बाद कुछ दिनों तक उसके बालिग होने का इंतजार करते रहे।

अब उन्हें एक औलाद की ख्वाहिश सताने लगी। कहती है कि बाहरी दुनिया को दिखाना था कि उसका बेटा मंदबुद्धि नहीं बल्कि एक संतान का पिता है। पर बेटा तो पिता बनने के काबिल नहीं था। लिहाजा संजय पांडे इसके लिए उनके साथ सहवास करने के लिए उस पर दबाव बनाने लगे। सिर्फ संजय पांडे ही नहीं चचिया ससुर मनीष पांडे, विवेक पांडे और उज्जवल पांडे  भी उस पर सहवास के लिए दबाव बनाने लगे। सास और ननद भी उनका समर्थन करती थी क्योंकि उन्हें का औलाद चाहिए था।

क्या गजब है कि जिसे बहू बनाया था उसे बच्चा जनने की एक मशीन में बदलने पर आमादा हो गए थे। इसी दौरान खुशहाल बेटी को देखने की आस लिए उसकी मां गुजर गई। संजय पांडे का कोलकाता के अम्हरस्ट स्ट्रीट में अपना मकान है। कभी-कभी उसे केस्टोपुर भी ले जाते थे, वहां भी उनका एक मकान है। उसके पर तो कतर दिए गए थे, पर इस नरक से भागने की तमन्ना तो दिल में थी ही। लिहाजा केस्टोपुर से उसे भागने का मौका मिल गया। बाहर आ गई, अनजान सड़क, अनजान लोग , ना कोई ठौर और ना कोई ठिकाना।

अब यह महज एक इत्तफाक था कि उसकी मुलाकात एक सज्जन व्यक्ति से हो गई और उन्होंने उसकी मुलाकात हाई-कोर्ट की एडवोकेट स्वाति सिंह से करा दी। एडवोकेट स्वाति सिंह उसका सहारा बन गई। वे लड़की के साथ अम्हरस्ट स्ट्रीट थाने में संजय पांडे और उनके कुनबे के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने गई। अब एक रसूखदार आदमी के खिलाफ एफआईआर भला कैसे दर्ज हो सकती है। पुलिस ने एफआईआर दर्ज करने से इंकार कर दिया। इसके बाद एडवोकेट स्वाति सिंह सिटी कोर्ट के एसीएमएम के समक्ष एक याचिका दायर कर दी और एसीएमएम के आदेश के बाद एफआईआर दर्ज हो पाई। अब मामले की जांच हो रही है। लड़की कहती है कि उसके गुजरे हुए 12 सालों को अब कोई वापस नहीं लौटा पाएगा, लेकिन उसे न्याय मिलना चाहिए। उसे गांव का घर द्वार आगन सब याद आता है, पिता और भाई बहनों से मिलने की इच्छा भी है, पर पिता की गरीबी का एहसास भी है। इस कहानी को खास से आम बनाने का बस इतना ही मकसद है कि फिर किसी गरीब मां बाप को अपनी बेटी किसी और को सौंपने के लिए मजबूर नहीं होना पड़े। इसके साथ ही एक संदेश देना भी है की गरीबी में ही अपनी बेटी के साथ गुजर बसर कर ले और किसी पर भरोसा करके सपनों की दुनिया में अपनी बेटी को उसके साथ नहीं भेजें।

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