प्रफुल्ल कोलख्यान

आलोचना की स्वतंत्रता का अवसर क्या जीवन में अवसरवाद का राज-द्वार खोल देता है?

जैसे-जैसे 2024 का आम चुनाव नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे भारत के राजनीतिक दलों की गतिविधियों में… Read More

यह भावुकता की फांस से बाहर निकलकर बुद्धिमत्तापूर्ण ढंग से सोचने और विवेक को आजमाने का क्षण है‎

भारत में जनवरी महान गणतंत्र, महात्मा गांधी और नेताजी सुभाषचंद्र बोस का महीना है। भारत में ही… Read More

विचारधारा और भावधारा के संगम की साझी जमीन पर होता है चुनाव का संघर्ष

नीतीश कुमार अब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में शामिल हो चुके हैं। उनके लिए वे सारे खतरे… Read More

पांच किलो की मोटरी तले जन, भारी गठरी के तले नायक: कैसे बचेगा लोकतंत्र!

अयोध्या के राम मंदिर में भगवान राम की प्राण-प्रतिष्ठा का कार्यक्रम हो चुका है। आयोजन की भव्यता… Read More

भावुक सांद्रता नहीं निष्कंप बुद्धिमत्ता ही कठिन समय में काम आती है

मनुष्य के जीवन में विभिन्न त्यौहारों, उत्सवों, दिवसों को मनाये जाने का बहुत महत्व है। साधारणतः लोग… Read More

राजनीतिक दुविधा-सुविधा की खींच-तान में ताना-बाना को उलझावों से बचाने की चिंता

हम भारी उथल-पुथल के दौर से गुजर रहे हैं। इस दौर में आंख-कान को खुला रखने की… Read More

त्रेता का राम राज नहीं, कलियुग का संविधान राज सुनिश्चित हो

छोटे-मोटे विवादों, रुष्टताओं के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अयोध्या के राम मंदिर में भगवान… Read More