प्रफुल्ल कोलख्यान

‘बड़ों के वर्चस्व’ का इनकार और ‘छोटों के सर्वस्व’ के स्वीकार का मार्मिक और न्याय ‎‎संगत आश्वासन है लोकतंत्र ‎

‎मतदान के लिए मन बनाते समय आम नागरिकों को किसानी अर्थव्यवस्था से जुड़ी ‎समस्याओं, सुरसा के मुंह… Read More

लोकतंत्र में ‘व्यावहारिक अड़चनों’ ‎को दूर करने का उपाय है चुनाव

सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी दान (Electoral Bonds) के संदर्भ में एक बहुत संवेदनशील निर्णय सुनाया था। न… Read More

आदर्श का औपचारिक बनकर रह जाना भावात्मक और बौद्धिक दुर्गति की कथा लिखता है

केंद्रीय चुनाव आयोग ने प्रेस वार्ता में राजनीतिक दलों एवं प्रचारकों से अनुरोध और अपील किया है… Read More

एक टांग पर खड़ा बनारस शहर नहीं, समास है: केदारनाथ सिंह की कविता बनारस

कविता में सामान्य मनुष्य, स्थान का उल्लेख तो होता ही रहता है। किसी विशिष्ट या खास व्यक्ति… Read More

मुद्दा क्या है ! ‘घनचक्करों’ और ‘धनचक्रों’ का तिकड़म ताल: मुद्दा है लोकतंत्र अब हो बहाल!

गिने-चुने दिन रह गये हैं। आम चुनाव 2024 सामने है। विभिन्न राजनीतिक दल और गठबंधन अपने-अपने चुनावी… Read More

किसानों के लिए ‘निधि सम्मान’ से अधिक जरूरी है ‘विधि सम्मान’ की व्यवस्था

सपनों का समय आ गया है। एक दौर से निकलकर दूसरे दौर में पहुंच रहे हैं। सपना… Read More