प्रफुल्ल कोलख्यान

एक टांग पर खड़ा बनारस शहर नहीं, समास है: केदारनाथ सिंह की कविता बनारस

कविता में सामान्य मनुष्य, स्थान का उल्लेख तो होता ही रहता है। किसी विशिष्ट या खास व्यक्ति… Read More

मुद्दा क्या है ! ‘घनचक्करों’ और ‘धनचक्रों’ का तिकड़म ताल: मुद्दा है लोकतंत्र अब हो बहाल!

गिने-चुने दिन रह गये हैं। आम चुनाव 2024 सामने है। विभिन्न राजनीतिक दल और गठबंधन अपने-अपने चुनावी… Read More

किसानों के लिए ‘निधि सम्मान’ से अधिक जरूरी है ‘विधि सम्मान’ की व्यवस्था

सपनों का समय आ गया है। एक दौर से निकलकर दूसरे दौर में पहुंच रहे हैं। सपना… Read More

टरकाव और टकराव की राजनीति के बीच कांग्रेस और राहुल गांधी की राजनीति का मर्म

राहुल गांधी भारत जोड़ो न्याय यात्रा पर हैं। लोग जुट रहे हैं। पत्रकार चिंता में हैं। देश… Read More

लोकतंत्र के चित्त में चौसर की बिसात बिछ गई है! हम एक असंभव दौर से गुजर रहे हैं!

पूरे देश में अभाव और अकाल का कोलाहल है। आंदोलन है। हाहाकार है। मोटरी-गठरी संभालते हुए, जनता… Read More

सामाजिक अन्याय और आर्थिक अन्याय के द्वंद्व विकार और सामाजिक लोकतंत्र की व्यथा कथा

अभी-अभी अयोध्या के भव्य और दिव्य मंदिर में रामलला की प्रण-प्रतिष्ठा का आयोजन शांतिपूर्वक संपन्न हुआ है।… Read More

गिरोही चरित, छल-छलावा-छर्रा का खन-खन और छम-छम के माहौल में लोकतंत्र बेदम

अभी-अभी देश में इतने धूमधाम से धीर, उदात्त ललितचरित के आदर्श- मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान की प्राण-प्रतिष्ठा हुई… Read More