Monday, April 15, 2024

प्रताप भानु मेहता

प्रताप भानु मेहता का लेख: विपक्ष के पास BJP से मुकाबले के लिए सटीक भाषा और विचार क्यों नहीं है?

विपक्ष अभी भी एक असरदार आलोचना के लिए सटीक भाषा और अवसर की तलाश में जूझ रहा है। फिलहाल तो यह उन्हीं लोगों से संवाद बना पा रहा है जो पहले से ही उससे सहमत हैं। हाल के विधानसभा...

प्रताप भानु मेहता का लेख: दिल्ली अध्यादेश संघीय लोकतंत्र के लिए अशुभ और निर्लज्जता की पराकाष्ठा

दिल्ली में प्रशासनिक सेवाओं पर नियंत्रण करने के लिए लाया गया भारत सरकार का अध्यादेश हद दर्जे की बेशर्मी भरा क़दम है। यह लोकतंत्र के भविष्य के लिए घातक है। थोड़ी देर के लिए आप अपनी पक्षपातपूर्ण निष्ठा से...

दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के साथ ही खुल गया है यूएपीए का ब्लैक बॉक्स

आसिफ तन्हा, देवांगना कलीता और नताशा नरवाल की जमानत के जस्टिस सिद्धार्थ मृदुल और जस्टिस जे भंभानी के पारित आदेश ने यूएपीए न्यायशास्त्र के पूरे ब्लैक बॉक्स को खोल दिया है। यूएपीए भारतीय न्यायशास्त्र का कई कारणों से ब्लैक...

यूपी शासन मॉडल को चुनौती देना भारतीय लोकतंत्र के लिए जरूरी

उत्तर प्रदेश की जनसंख्या ब्राजील के बराबर है और यहां लोकसभा की 80 सीटें हैं। लेकिन भारतीय राजनीति में इसके जबर्दस्त प्रभुत्व का कारण केवल आकार और जनसांख्यिकी का मामला नहीं है। उत्तर प्रदेश की राजनीति का राष्ट्रीय प्रभाव...

न्यायिक बर्बरता के दौर में पहुंच गया है सुप्रीम कोर्ट!

राजनीति शास्त्र की भाषा में एक बात कही जाती है- लोकतांत्रिक बर्बरता। लोकतांत्रिक बर्बरता अमूमन न्यायिक बर्बरता से पलती है। 'बर्बरता' शब्द के कई अवयव हैं। पहला है न्यायपालिका से जुड़े निर्णयों में मनमानी का बहुत अधिक देखा जाना।...

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तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद जनविवेक से स्थिति में बदलाव होगा

भारत में लोकतंत्र के भविष्य को लेकर कुछ गहरी आशंकाएं उभर रही हैं। इतिहास की गहरी घाटियों से कुछ...