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अकबर से पहले इलाहाबाद में नगर का नहीं मिलता कोई निशान!

बोधिसत्व

इलाहाबाद के संदर्भ में यह मेरा पांचवां लेख है। बात नेहरू जी से शुरू करता हूं। इलाहाबाद पर लिखते हुए नेहरू जी ने कहा है कि “किसी भी नगर का इतिहास उस नगर की इमारतों से नहीं बल्कि उस नगर के निवासियों से बनता है।” अब अगर हम नेहरू जी की बात को इलाहाबाद के ऊपर लागू करके देखें तो हमें वर्तमान इलाहाबाद क्षेत्र से कोई भी ऐतिहासिक व्यक्ति अकबर के पूर्व का, इस शहर से नहीं मिलता।

क्या प्रयाग उर्फ इलाहाबाद की सांस्कृतिक परम्परा प्राचीन या मध्ययुग में थी ही नहीं? क्या प्रयाग में युगप्रवर्तक सांस्कृतिक व्यक्तियों का अकाल था?

या अकबर ने नाम बदलने के साथ ही रात की रात में पूरी सांस्कृतिक परम्परा साहित्य को मिटा दिया। जैसे सरस्वती नदी नहीं मिलती वैसे ही प्रयाग की सांस्कृतिक धारा भी लुप्त हो गई।

कोई तानाशाह या शासक नगर उजाड़ सकता है लेकिन साहित्य की और संस्कृति की धारा नहीं मिटा सकता। ऐसा कोई एक प्रमाण संसार में नहीं मिलता जिसमें नगरों का ध्वंस हुआ हो तो साथ में उसके साहित्य और सांस्कृतिक सूत्र भी ध्वस्त कर दिये गए हों।

मेरा प्रश्न है कि जब काशी में संत कबीर थे तब उनका समकालीन या आगे पीछे का संत कवि प्रयाग में कौन था। भक्ति आंदोलन इलाहाबाद में शून्य रहा हो ऐसा तो नहीं। क्योंकि कबीर के गुरु रामानंद का भी जन्म प्रयाग में हुआ है। लेकिन प्रयाग में कहां पैदा हुए रामानंद, इसका कोई सही उत्तर नहीं मिलता। प्रयाग के किस मोहल्ले, किस ग्राम, किस क्षेत्र में उन महान रामानंद का कुल-घर था। इसका कोई उत्तर नहीं मिलता।

मैं आपसे कहता हूं कि प्रयाग के किसी प्राचीनतम कवि का नाम लें। कालिदास का कोई समकालीन संस्कृत कवि प्रयाग का क्यों नहीं मिलता। क्योंकि तब प्रयाग नगर न था। तब प्रतिष्ठानपुरी यानी आज की झूंसी था आवासीय नगर। वही इलावास था । मनु पुत्री इला का नगर या पुरुरवा ऐल की माँ का इला का आवास। कालिदास भी तो अपने विक्रम उर्वशी को प्रयाग नहीं प्रतिष्ठान यानी आज की झूँसी में अवस्थित बताते हैं। वह इंद्र को पराजित करने वाला महान पुरुरवा प्रतिष्ठान का सम्राट है। प्रयाग का नहीं। क्या कालिदास “प्रयाग-द्रोही” थे और “बादशाह अकबर” से मिल गए थे।

हर नगर और जनपद की एक सांस्कृतिक परम्परा होती है। खोजने पर उस परम्परा के सूत्र मिलते हैं। उसकी पूरी धारा मिलती है। मैं प्रयाग नगर की सांस्कृतिक धारा की परम्परा पर प्रश्न कर रहा हूं। मुझे वर्तमान इलाहाबाद शहर के पूर्व में प्रयाग होने की दुहाई देने वाले बताएं कि क्या है प्रयाग नगर की सांस्कृतिक परम्परा। कौन हैं उसके सांस्कृतिक नेता। क्या है अकबर पूर्व उसकी साहित्यिक राजनौतिक विरासत। प्रयाग तीर्थ की धारा मिलती है। लेकिन नगर की सांस्कृतिक धारा नहीं मिलती। ऐसा क्यों है।

ऐसा इसलिए है क्योंकि प्रयाग मात्र तीर्थ था। तीर्थ जो पार उतारे। भवसागर या भूभाग कहीं भी दूसरी दिशा में जाने का मार्ग दे। प्रयाग से ही पार होकर आगे जा सकते थे राम। मैं रामायण से प्रयाग के वन होने की बात अपने पिछले एक प्रलेख में कर चुका हूं। रामायण स्वयं प्रयाग को “प्रयाग-वन” कहता है। भरत के अतिथि सत्कार के प्रश्न पर भरत भारद्वाज मुनि से कहते हैं कि “वन में जो कुछ उपलब्ध हो सकता है उसके अनुसार आपने आतिथ्य सत्कार किया है”। यानी प्रयाग वन ही था नगर नहीं। देखें वाल्मीकि रामायण का अयोध्या कांड अध्याय नब्बे। पहला–तीसरा श्लोक।

रामायण के बाद महाभारत से प्रयाग की सांस्कृतिक ऐतिहासिक परम्परा के सूत्र खोजते हैं। जब पाण्डव वनवास के लिए निकले थे तो वे अरैल आए थे। महाभारत में अरैल का नाम अलर्कपुर है। वह अरैल भी आज के नगर वाले भाग से अलग गंगापार है। लाक्षागृह और वार्णावत आज भी हैं। जो कि लच्छागीर और बरौत के नाम से स्थानीय रूप से जाने जाते हैं। हंडिया तब हिडिम्बवन था। आज का अरैल किसी प्राचीन सम्राट अलर्क द्वारा स्थापित अलर्कपुर था कभी।

हमइलाहाबादयानीप्रयागकीसांस्कृतिकपरम्पराकेसंवाहकव्यक्तियोंकीबातकररहेथे।अमरकोषनामकमहानशब्दकोषकेरचनाकारअमरसिंहप्रयागकेमूलनिवासीहैं।लेकिनवेनैनीकेहैं।यानीजमुनापारवालेक्षेत्रके।आजवालेप्रयागकेनहीं।अगलाऐतिहासिकसंदर्भलेतेहैं।कुमारिलभट्टसेशंकराचार्यकीमुलाकातप्रयागमेंहोतीहै।बड़ाहीत्रासदसमयथा।

कुमारिल का आधा शरीर तुषानल यानी भूसे की आग में जल चुका था। शंकर उनको पराजित करने के उद्देश्य से प्रयाग आए थे। लेकिन प्रयाग में कहाँ हुई उन दोनों ऐतिहासिक महापुरुषों की भेट। कहाँ का उत्तर मिलता है जमुनापार नैनी में। यानी प्रयाग जो कि आज का इलाहाबाद का बदला हुआ नाम बताया जा रहा है। वह भूभाग किसी के मिलन, समागम संग्राम या वाद विवाद का स्थल वह हिस्सा क्यों नहीं मिलता जहाँ आज शहर बसा है। ऐसा इसलिए है कि क्योंकि अकबर पूर्व यहाँ नगर की सम्भावना कल्पित ही नहीं थी। लगभग सारा भूभाग जलमग्न था।

जब कबीर बनारस में सक्रिय थे तो उनके नजदीक का कोई कवि तो प्रयाग में मिलता नहीं। हाँ 1574 ईसवी के आसपास संत कवि बाबा मलूकदास कड़ा मानिकपुर में मिलते हैं। सन 1574 में उनका जन्म माना जाता है। अकबर द्वारा इलाहाबाद की नींव डालने के आसपास उनका जन्म हुआ । मलूक उसी कड़ा मानिकपुर के हैं जो तब के प्रयागक्षेत्र का शासकीय केन्द्र था। जहाँ अलाउद्दीन खिलजी ने अपने चाचा जलालुद्दीन खिलजी का अंत किया। वही मलूकदास जिनका एक दोहा आज भी आलसी जीवों का जीवन सूत्र है-

अजगर करै न चाकरी पंछी करे न काम

दास मलूका कह गए सबके दाता राम।।

मुनि भारद्वाज के बाद प्रयाग का कोई संस्कृत कवि या विद्वान जिनका नाम मिलता है वे हैं अमरकोष वाले अमर सिंह। वे भी नैनी के हैं। भारद्वाज और अमर सिंह के बीच में या बाद में फिर क्रम आता है कुमारिल भट्ट का। अमर सिंह 624 ईसवी के आपपास प्रयाग के नैनी में थे। उस प्रयाग में नहीं जो कि आज का इलाहाबाद है। कुमारिल भट्ट का काल अनुमान से 650 ईसवी माना जाता है। कुमारिल भी नैनी क्षेत्र में अपना अंत किया। उन्होंने मोक्ष पाने के लिए भी प्रयाग वाले अक्षयवट की शरण न ली।

कुमारिल के बाद अगले संस्कृत विद्वान का नाम आता है भानुदत्त मिश्र का। भानुदत्त के आश्रयदाता थे अरैल कड़ा के शासक वीरभानु। तो भानुदत्त मिश्र भी अरैल-कड़ा में आश्रय पाते थे। आधुनिक प्रयाग में नहीं। भानुदत्त के बाद प्रयाग के संस्कृत विद्वानों के क्रम में नाम आता है कबीर, सेन, धन्ना, नाभादास आदि के गुरु रामानंद का। लेकिन ऐसी मान्यता है कि ये कौशाम्बी के किसी कान्यकुब्ज कुल में उत्पन्न हुए थे। और इनका भी उस प्रयाग के भूभाग से कोई सीधा संबंध नहीं निकलता जिसके लिए कहा जा रहा कि अकबर ने प्रयाग से इलाहाबाद कर दिया।

क्योंकि प्रयाग वन था और अकबर के द्वारा बांध बनाए जाने के पहले वहाँ नगरीय आबादी की संभावना नहीं थी। आस्था को न इतिहास का आधार चाहिये न तर्क का। वह तो मनोगत होती है। इसीलिए प्रयाग की कोई नगरीय परम्परा नहीं मिलने पर भी लोग प्रयाग को प्राचीन नगर माने पड़े हैं। क्या प्रयाग का कोई कुल या खानदान या घराना मिलता है?

प्रयाग की पाण्डित्य और संगीत परम्परा में कोई भी कवि लेखक कलाकार विद्वान उस भूभाग में उपस्थित या जन्म लेता सृजन करता और मरता भी नहीं दिखता जो आज इलाहाबाद के रूप में उपस्थित है।

मलूकदास के बाद दो कवियों का नाम मध्यकाल की कविता में प्रयाग के कवियों में उल्लेख मिलता है। वे हैं जंगनामा के कवि श्रीधर और दूसरे तोषकवि। तोषकवि सिंगरौर या श्रृंगवेरपुर के थे। और जंगनामा वाले श्रीधर भी प्रयाग नगर के निवासी न थे।

आगे जिस सबसे प्राचीन कवि के प्रयाग का होने का प्रमाण मिलता है वे हैं सदासुखलाल जिन्होंने भाषा में सुखसागर का सृजन किया। सुखसागर श्रीमद्भागवत् का पुनर्सृजन था। सदासुखलाल जी इलाहाबाद में 1811 में मिर्जापुर से रिटायर होकर आए और 1824 में इनका देहांत हो गया। आगे लाला सीताराम भूप और श्रीधरपाठक से आधुनिक प्रयाग के साहित्य की परम्परा मिलने लगती है।

अबएकऔरबातऔरतर्ककेलिएपेशकीजासकतीहैकिप्रयागकीकोईअपनीसांस्कृतिकपरम्पराहीनरहीहो।नगरमेंकेवलव्यवसायीरहतेहोंसिपाहीरहतेहोंऔरसंतजनअपनेअखाड़ेचलातेरहेहों।

बस दिन रात भजन होता रहा हो और प्रभु स्मरण में सब के सब दिन बिताते रहते हों। भला ऐसा कोई मुर्दों का टीला हमारा प्रयाग कभी रहा होगा। अगर वो रहा होगा। यह बात कुछ हजम न हुई। भला किसी शहर का कोई सांस्कृतिक इतिहास उसकी स्थापना के पहले संभव है। इसीलिए इलाहाबाद या प्रयाग की कोई सांस्कृतिक धारा अकबर के पहले संभव नहीं दिखती। क्या कवियों लेखकों ने सोच समझ कर नगर प्रयाग में जन्म ही न लिया हो। उन्होंने तय किया हो कि जब तक अकबर बांध न बना दे। जब तक किला न बन जाए हम इलाहाबाद में जन्म ही न लेंगें!

इलाहाबाद के भूगोल पर एक दो बातें आज फिर रख देना चाहता हूँ। इलाहाबाद का ऐतिहासिक अध्ययन प्रो. जी.आर. शर्मा जी ने अपने ग्रंथ इलाहाबाद थ्रू दि एजेज में किया है। उनकी किताब का संदर्भ मुझे प्रयाग की पाण्डित्य परम्परा नामक किताब में मिला। जिसकी लेखिका हैं डॉ. उर्मिला श्रीवास्तव जी। यह किताब तथ्यपूर्ण है और पठनीय भी है। प्रो. जी.आर. शर्मा इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के एक प्रकांड पंडित थे और उनकी इतिहास दृष्टि प्रांजल थी। अपनी किताब में वे बताते हैं कि “गंगा तट पर बक्शी बांध के पूर्व गंगा की एक धारा फाफामऊ से होकर आज के चांदपुर सलोरी डहररिया, बघाड़ा, चर्चलेन, कमलानेहरू अस्पताल, आनंद भवन, भारद्वाज आश्रम होते हुए लाउदर रोड से वर्तमान मिंटो पार्क के निकट यमुना में विलीन होती थी। गंगा नदी की दूसरी धारा का प्रवाह फाफामऊ से झूँसी की ओर था।”

प्रोफेसर जी.आर. शर्मा कोई साधारण इतिहासकार न थे। उनकी किताब का हवाला आज भी देखा जा सकता है। प्रो. शर्मा के अनुसार “आज के अल्लापुर, टैगोरटाउन, अलोपीबाग, तुलारामबाग, जार्जटाउन, बैरहना आदि जलमग्न यानी डूब के क्षेत्र थे। दारागंज और किले का क्षेत्र एक द्वीप की तरह तब भी रहे होंगे।

यानी कुल मिलाकर आज का जो इलाहाबाद या इलाहाबास या इलावास है वह अकबर के पहले किसी भी स्थिति में संभव नहीं है। कोई इसका नाम बदले या इसको धरातल से रसातल में भेज दे। इलाहाबाद का संस्थापक तो अल् फतह जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर वल्द नासिरुद्दीन मुहम्मद हुमायूँ ही था है और माना जाता रहेगा। आप वर्तमान को तोड़ सकते हैं। लेकिन अतीत और भविष्य दोनों का निर्माण आपके हाथों में आना असंभव है।

(बोधिसत्व प्रतिष्ठित कवि और लेखक हैं। इलाहाबाद का नाम बदले जाने पर उनके द्वारा लिखे गए लेखों की श्रृंखला में ये नया लेख है। आप आजकल मुंबई में रहते हैं। ये लेख उनके फेसबुक से साभार लिया गया है।)

This post was last modified on December 3, 2018 6:41 am

Janchowk

Janchowk Official Journalists in Delhi

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