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Categories: बीच बहस

लाल किले के प्राचीर से अधूरे सच, सफेद झूठ और आत्म प्रशंसा से भरा भाषण

अधूरा सच, सफेद झूठ, परनिंदा, नए-नए शिगूफे, धार्मिक और सांप्रदायिक प्रतीकों का इस्तेमाल और आत्म प्रशंसा! यही पांच प्रमुख तत्व होते हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण में। मौका चाहे देश में हो या विदेश में, संसद में हो या किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर, चुनावी रैली हो या कोई और अवसर- हर जगह उनके भाषण में यही पंचतत्व हावी रहते हैं। आजादी की 74वीं वर्षगांठ के मौके पर लाल किले से दिया गया उनका भाषण भी इसका अपवाद नहीं रहा।

देश इस समय कोरोना महामारी की दिनोंदिन बढ़ती चुनौती के साथ ही, अर्थव्यवस्था की बदहाली, बेरोजगारी की अभूतपूर्व स्थिति और सीमा पर चीन समेत अन्य पड़ोसी देशों से तनाव का सामना कर रहा है। प्रधानमंत्री से उम्मीद थी कि वे चुनौतियों के मद्देनजर देश के आम आदमी को भय और निराशा के माहौल से बाहर निकालने के लिए कोई ठोस बात करेंगे।

बेशक प्रधानमंत्री मोदी ने इन सभी मसलों पर बात की। उन्होंने बताया भी कि उनकी सरकार इन चुनौतियों से निपटने के लिए क्या करने जा रही है, लेकिन यह सब बताने में उन्होंने हमेशा की तरह गलत और आधे-अधूरे तथ्यों का सहारा लिया और यह जताने की कोशिश की कि हालात पूरी तरह सरकार के नियंत्रण में हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने 86 मिनट के भाषण में मौजूदा चुनौतियों के मद्देनजर देश को आत्मनिर्भर बनाने पर ही जोर दिया और लोकल से वोकल की बात की। इसी सिलसिले में उन्होंने ‘मेक इन इंडिया’ की अपनी पुरानी योजना की तर्ज पर ‘मेक फॉर वर्ल्ड’ की बात भी कही, ठीक उसी तरह जैसे 2015 में लाल किले से उन्होंने ‘स्टार्टअप इंडिया’ और ‘स्टैंडअप इंडिया’ का एलान किया था। इन दोनों योजनाओं का आज कोई नाम भी नहीं लेता है।

बहरहाल आत्मनिर्भर भारत अभियान की बात करते हुए ही प्रधानमंत्री ने इस बात के लिए अपनी पीठ भी थपथपाई कि देश में पहले से ज्यादा विदेशी निवेश आ रहा है। यही सवाल उठता है कि आत्मनिर्भरता और विदेशी निवेश की चाह, ये दोनों बातें एक साथ कैसे चल सकती हैं?

प्रधानमंत्री ने कोरोना महामारी का जिक्र करते हुए कहा कि यह विपत्ति बड़ी जरूर है, लेकिन इतनी भी बड़ी नहीं कि हमारे आत्मनिर्भर भारत की विजय यात्रा को रोक पाए। बात सुनने में बहुत अच्छी लगती है, लेकिन सवाल यही है कि इस विजय यात्रा का रोडमैप क्या होगा? इस सवाल का जवाब न तो मोदी के भाषण में मिला और न ही उनकी सरकार के कामकाज की दशा और दिशा में दिखता है।

कोरोना महामारी की चुनौती का मुकाबला करने में भारत का प्रदर्शन दुनिया के दूसरे देशों के मुकाबले कैसा रहा, इस बारे में प्रधानमंत्री ने कुछ नहीं कहा। भारत में पांच महीने पहले लॉकडाउन का एलान करते वक्त प्रधानमंत्री ने 21 दिन में इस चुनौती पर काबू पा लेने की बात कही थी, लेकिन करीब दो महीने के देशव्यापी कंपलीट लॉकडाउन के बावजूद कोरोना संक्रमण के मामले भारत में जिस तेजी से बढ़ रहे हैं, उससे भारत जल्द ही दुनिया का सबसे अव्वल देश बन जाएगा। ऐसे में प्रधानमंत्री ज्यादा कुछ न बोलना ही शायद उचित समझा होगा।

अलबत्ता प्रधानमंत्री ने देशवासियों को आश्वस्त किया कि हमारे देश में कोरोना की एक नहीं, तीन-तीन वैक्सीन बनाने पर काम हो रहा है। उन्होंने नेशनल डिजिटल हेल्थ मिशन शुरू होने का एलान भी किया, जो शायद आरोग्य सेतु का ही एक्सटेंशन है। चूंकि आरोग्य सेतु की नाकामी जगजाहिर हो चुकी है, लिहाजा कहा नहीं जा सकता कि डिजिटल हेल्थ मिशन किस हद तक सफल होगा।

प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत योजना का जिक्र करने से भी बचे, तो इसकी वजह यही रही कि इस योजना का जितना प्रचार प्रसार हुआ था, उतना फायदा लोगों को नहीं मिला है।

कोरोना महामारी का मुकाबला करने के मामले में अपनी सरकार की पीठ थपथपाने के मकसद से प्रधानमंत्री गलत बयानी करने से बाज नहीं आए। उन्होंने कहा कि कोरोना काल से पहले देश में पीपीई किट नहीं बनते थे, लेकिन जैसे ही महामारी की चुनौती हमारे सामने आई, देश भर में बड़े पैमाने पर पीपीई किट्स का उत्पादन होने लगा, जबकि हकीकत यह है कि मार्च के महीने तक पीपीई किट्स भारत से निर्यात किए जा रहे थे, जिस पर बहुत बवाल मचा था कि देश में डॉक्टर्स को पीपीई किट्स मुहैया नहीं हो रहे हैं और सरकार इनके निर्यात मे लगी हुई है।

प्रधानमंत्री के भाषण में सबसे ज्यादा निराशाजनक मुद्दा सीमा पर पड़ोसी देशों से मिल रही तनावभरी चुनौती का है। लद्दाख में चीनी सेना की घुसपैठ को लेकर प्रधानमंत्री मोदी ने करीब दो महीने पहले सर्वदलीय बैठक में कहा था कि हमारी सीमा में न तो कोई घुसा था और न हीं वहां कोई घुसा हुआ है, लेकिन लाल किले से अपने भाषण में उन्होंने कहा कि एलओसी से लेकर एलएसी तक देश की संप्रभुता पर जिस किसी ने आंख उठाई है, हमारे देश की सेना ने उसका उसी भाषा में जवाब दिया है। उन्होंने कहा कि हमारे जवान क्या कर सकते हैं, यह दुनिया ने लद्दाख में देख लिया है।

सवाल है कि जब लद्दाख में हमारी सीमा में कोई घुसा ही नहीं था तो फिर प्रधानमंत्री किसको उसी की भाषा में जवाब देने की बात कर रहे हैं? दरअसल प्रधानमंत्री मोदी ने लद्दाख में मामले में लाल किले से सरासर गलत बयानी कर देश को गुमराह करने की कोशिश की है, क्योंकि लद्दाख में चीनी घुसपैठ और भारतीय जमीन पर अतिक्रमण करने की बात खुद रक्षा मंत्री ने स्वीकार की है और रक्षा मंत्रालय की वेबसाइट पर इस आशय के दस्तावेज भी डाले गए थे जो बाद में हटा लिए गए।

उधर चीन अभी भी लगातार लद्दाख की पैंगांग झील और गलवान घाटी पर अपने कब्जे का दावा कर रहा है। यही वजह है कि जब प्रघानमंत्री ने लाल किले के अपने भाषण में कहा कि लद्दाख में हमारे सैनिकों ने जो किया है, वह सबको पता है, तो वहां मौजूद चीन के राजदूत ने व्यंग्यपूर्ण मुस्कान के साथ गर्दन हिलाते हुए एक तरह से प्रधानमंत्री के इस कथन का मजाक बनाया।

पड़ोसी देशों से सीमा पर तनाव की चर्चा के सिलसिले में ही प्रधानमंत्री ने कहा कि सिर्फ सीमा से सटे देश ही पड़ोसी नहीं होते, बल्कि जिनके दिल हमसे मिलते हैं, वे भी हमारे पड़ोसी होते हैं। मुहावरेदार भाषा में प्रधानमंत्री का यह कथन एक तरह से इस बात की स्वीकारोक्ति है कि भारत के अपने किसी भी पड़ोसी देश के साथ रिश्ते सामान्य नहीं हैं।

नरेंद्र मोदी ने 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद अमेरिका, चीन, जापान आदि देशों की यात्रा करने के बाद दावा किया था कि भारत जल्द ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बन जाएगा। उनके दावे के मुताबिक भारत स्थायी सदस्य तो नहीं बन सका मगर पिछले दिनों भारत दो वर्ष के लिए सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य अवश्य चुन लिया गया है।

मोदी ने लाल किले से अपने भाषण में इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की एक बड़ी उपलब्धि बताया और इसे इस तरह पेश किया मानों भारत पहली बार सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य बना हो। हकीकत यह है कि भारत इससे पहले भी 1950 से लेकर 2012 के दौरान सात मर्तबा सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य चुना जा चुका है।

घरेलू मोर्चे पर उन्होंने अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण शुरू होने को भी अपनी सरकार की उपलब्धि के तौर पर पर पेश किया, जबकि सब जानते हैं कि अयोध्या विवाद का निपटारा सुप्रीम कोर्ट के फैसले से हुआ है, जिसे लगभग पूरे देश ने स्वीकार किया है, लेकिन श्रेय लेने की होड़ में प्रधानमंत्री इसे अपनी उपलब्धि बता रहे हैं। सवाल है कि क्या प्रधानमंत्री ऐसा करते हुए परोक्ष रूप से यह नहीं रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी उनकी सरकार के प्रयासों से ही आया है। अगर ऐसा है तो क्या यह इस बात का संकेत नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट सरकार के दबाव में काम कर रहा है।

सवाल यह भी है कि देश के प्रधान न्यायाधीश की किसी गैरन्यायिक गतिविधि पर की गई टिप्पणी को अदालत की अवमानना मानने वाला सुप्रीम कोर्ट क्या प्रधानमंत्री की इस टिप्पणी का भी अदालत की अवमानना के तौर पर संज्ञान लेने की हिम्मत दिखाएगा?

कुल मिलाकर अर्थव्यवस्था, अंतरराष्ट्रीय राजनीति और कोरोना महामारी के मोर्चे पर बेहद निराशाजनक प्रदर्शन के बावजूद प्रधानमंत्री ने अपने भाषण के जरिए देश की उम्मीदें जगाने का प्रयास किया है। वे अपने इस प्रयास में कहां तक सफल रहे, यह आने वाले दिनों में पता चलेगा।

(अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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This post was last modified on August 17, 2020 9:20 am

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