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अमर सिंह: मुलायम सिंह के संकट मोचक, जो उनके सबसे बड़े संकट भी थे

इस वक्त मुझे साल-महीना नहीं याद आ रहा है पर वो समाजवादी पार्टी की बुलंदी के दिन थे और पार्टी से भी ज्यादा अमर सिंह की बुलंदी के दिन थे। उन दिनों मैं हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप के हिंदी अखबार ‘हिन्दुस्तान’ में काम करता था। राष्ट्रीय राजनीतिक मामलों को ‘कवर’ करता था। एक शाम अचानक अमर सिंह के यहां से फोन आया-‘साहब आपसे बात करेंगे।’ थोड़ी ही देर में अमर सिंह की आवाजः ‘उर्मिलेश जी, आपको अमुक दिन लखनऊ चलना है। इस बार ना-नुकुर नहीं चलेगी। कहिये तो शोभना जी से बोल दूं।’ जरूरत न हो तो भी ‘नेम ड्रापिंग’ उनकी आदत में शुमार था। मैंने पूछा-‘क्या है उस दिन लखनऊ में? उन्होंने बतायाः ‘बहुत बड़ी रैली है! मुलायम सिंह जी की ऐसी सभा आपने देखी नहीं होगी। इस रैली में क्षत्रियों की संख्या सबसे ज्यादा होगी।’ मैंने उनसे पूछाः ‘अमर सिंह जी आपकी रैली का मुद्दा क्या है?’

उन्होंने फरमायाः ‘सब वहीं पता चलेगा। बस आपको चलना है। दिल्ली से कई और बड़े पत्रकार चल रहे हैं।’ उन्होंने कइयों के नाम भी बता दिये। मैंने कहा, ‘थोड़ी देर में मैं बताता हूं।’ मैंने सोचा, पहले संपादक से बात करूंगा, फिर इन्हें हां या ना में कोई जवाब दूंगा। एक तो लखनऊ में हमारे अखबार का अपना प्रांतीय संस्करण था, दूसरे मुलायम-अमर के किसी रैली-नुमा कार्यक्रम में जाने का मतलब था-पूरा दिन बेकार जाना। सिवाय भाषण बाजी के वहां रिपोर्ट करने को क्या था! संपादक के चैम्बर में जाने से पहले मैं एक अधूरा लिखा विश्लेषणात्मक आलेख पूरा करने लगा। इसी बीच संपादक का फोन आ गया-‘उर्मिलेश जी जरा आइये न।’ मैंने कहा, ‘जी, बस आता ही हूं दस मिनट में।’

काम निपटाकर पहुंचा वहां तो उन्होंने बताया ‘अमुक दिन आपको लखनऊ जाना है। समाजवादी पार्टी का कोई बड़ा जलसा है।’ मैंने कहा-‘लेकिन वहां अपना संस्करण है, काहे को मुझे भेजेंगे! वहां के रिपोर्टर को भी खराब लगेगा कि बताइये लखनऊ में एक रैली कवर करने दिल्ली से उर्मिलेश चले आ रहे हैं!’ संपादक ने कहाः ‘नहीं, नहीं, घूम आइये लखनऊ।’—तो ये अमर सिंह की स्टाइल थी! उनको मालूम था कि उर्मिलेश से कहेंगे तो ना-नुकुर करेगा। इसलिए ‘ऊपर’ से कहवा दिया! बहरहाल, एसाइनमेंट तय हो गया तो जाना ही था। इस बहाने लखनऊ के मित्रों से मुलाकात भी हो रही थी।

पर हमें क्या मालूम था कि जिस एसाइनमेंट को मैं रूटीन किस्म की उबाऊ खबर वाला समझ रहा हूं, वह कितना दिलचस्प और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव को समझने में मेरे लिये इतना मददगार होगा! रैली से पहले कुछ देर के लिए मुलायम सिंह जी हम कुछ पत्रकारों से भी मिले। हमने पूछाः ‘तो ये पार्टी का शो है या अमर सिंह जी का?’ उन्होंने कहा-‘पार्टी और अमर सिंह क्या अलग-अलग हैं! अमर सिंह पार्टी के बड़े नेता हैं। उन्होंने पार्टी को मजबूत बनाने में दिन-रात एक कर रखा है।’ कुछ और पत्रकारों ने भी कुछ सवाल दागे। इसी गपशप के दरम्यान मुलायम सिंह के मुंह से निकलाः ‘अमर सिंह जैसे दो-तीन अमर सिंह हमारी पार्टी में और हो जाएं तो मुझे प्रधानमंत्री बनने से कोई रोक नहीं सकता!’ मुलायम सिंह के दायें हल्की धूप में खड़े अमर सिंह का चेहरा और दमक उठा।

मजे की बात है कि मुलायम सिंह यादव ने उस रैली में भी अमर सिंह के बारे में यह बात सार्वजनिक मंच से कह दी। मुझे नहीं मालूम उस दिन भाई मोहन सिंह, आजम खां, जनेश्वर मिश्र, रामगोपाल यादव या पार्टी के अन्य प्रमुख नेताओं पर क्या गुजरी होगी? पर वे करते भी क्या, पार्टी तो मुलायम सिंह की थी, वे जिसे चाहे जो बनायें! सिर्फ सपा या मुलायम सिंह का ही नहीं, व्यक्ति या परिवार केंद्रित लगभग हर पार्टी का यह सबसे बड़ा संकट है। पर अमर सिंह की शख्सियत को भी तवज्जो देना होगा। उन्होंने अपनी खास ‘क्षमताओं और विशेषताओं’ के बल पर मुलायम सिंह यादव की सपा में सन् 1996 से 2010 के बीच नंबर-2 की हैसियत बनाई।

पर वक्त और सियासत के उतार-चढ़ाव में वही अमर सिंह समाजवादी पार्टी में अलग-थलग होते रहे और एक दिन पार्टी से बाहर होना पड़ा। शनिवार को सिंगापुर में लंबी बीमारी के बाद उनका असमय निधन हो गया। बीच में उन्होंने एक नयी पार्टी भी बनाई थी। इतने संसाधन और नेटवर्किंग की क्षमता के बावजूद उनकी ‘सियासी दुकान’ नहीं चली। फिर वह भाजपा की तरफ झुके। भाजपा में राजनाथ सिंह सहित कई नेताओं से उनके बहुत निकट के रिश्ते भी थे। पर सपा से निराश अमर सिंह को भाजपा में ठौर नहीं मिला। तब तक भाजपा में नरेंद्र मोदी और अमित शाह का दौर शुरू हो चुका था। इस जोड़ी को ‘किसी अमर सिंह’ की जरूरत ही नहीं थी।

फिर अमर सिंह कहां जाते? अखिलेश यादव और राम गोपाल यादव से खराब रिश्तों के बावजूद समाजवादी पार्टी ने सन् 2016 में उन्हें राज्य सभा की एक सीट देकर उपकृत किया। बताया जाता है कि मुलायम सिंह यादव के निर्देश पर ऐसा ही हुआ। लेकिन 2017 में अखिलेश ने उन्हें फिर पार्टी से बाहर का रास्ता भी दिखाया। इसके बाद जो अमर सिंह भाजपा और ‘हिन्दुत्वा’ के ध्वजवाहक-संघ को भारतीय राजनीति की सबसे नकारात्मक शक्ति कहा करते थे, जमकर उसे कोसते थे, उसी कट्टर हिन्दुत्वा संगठन को उन्होंने अपनी पैतृक सम्पत्ति दान करने की घोषणा की। पता नहीं घोषणा के आगे क्या हुआ?

अमर सिंह की कॉरपोरेट, बॉलीवुड और सियासत के अंतःपुर में गजब की घुसपैठ थी। अपनी तिकड़मी चालों और राजनीति-नौकरशाही में रिश्तों के बल पर वह कई बड़े उद्योगपतियों और फिल्मी सितारों के व्यापारिक-आर्थिक हितों के संरक्षण के लिए हर कुछ करते थे। उद्योगपतियों और अमीरों की तरह-तरह की ‘मुश्किलों’ को निपटाने में उन्हें महारथ हासिल था। इसके अलावा सस्ते किस्म की और कई बार तो बहुत घटिया स्तर की शेरो-शायरी और जुमलेबाजी से वह बॉलीवुड की कई नामचीन हस्तियों और सियासत के अनेक सूरमाओं को मस्त कर देते थे। इसमें कोई दो राय नहीं कि कोलकाता छोड़कर दिल्ली और मुंबई के अंतःपुर मे दाखिल होने के बाद उन्होंने बेशुमार दौलत और दोस्तियां बनाईं।

इनका उन्होंने फालतू संचय नहीं किया, जमकर इनका इस्तेमाल भी किया। वह कई लोगों के बहुत करीबी रहे। राजनीति में एक समय वह वीर बहादुर सिंह और फिर माधव राव सिंधिया के भी करीबी हुए। इसके बाद वह मुलायम सिंह यादव के नजदीक आये तो उनके ‘नंबर-2’ बन गये। सपा मुखिया को नजदीक से जानने वाले बताते हैं कि अमर सिंह की सलाह और इच्छा के बगैर सिर्फ सपा ही नहीं, मुलायम सिंह के घर में भी कोई बड़ा फैसला नहीं होता था।

सच पूछिये तो मुलायम सिंह यादव और उनकी समाजवादी पार्टी को यूपी के पिछड़ों, अल्पसंख्यकों और किसानों की दुनिया से छीनकर देश के कुछ बड़े कारपोरेट घरानों, नामचीन धनाढ्य फिल्मी हस्तियों और दिल्ली-मुंबई स्थित तरह-तरह के धंधेबाजों के नजदीक लाने में अमर सिंह ने सबसे अहम् भूमिका निभाई। आठवें-नवें दशक में किसानों-पिछड़ों-अल्पसंख्यकों से घिरे रहने वाले मुलायम सिंह यादव की जुझारू राजनीति को 1996-97 के बाद बहुत तेजी से अमर, अमिताभ, सुब्रत राय सहारा और अनिल अंबानी जैसे अरबपतियों की तरफ सरकती गई। कई साल पहले की बात है, एक दिन समाजवादी पार्टी के दफ्तर में आयोजित प्रेस कांफ्रेंस के बाद मैं संसद के सेंट्रल हाल पहुंचा।

वहां समाजवादी पार्टी के तत्कालीन प्रखर सांसद और इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हमारे सीनियर भाई मोहन सिंह मिल गये। उन्होंने मुस्कराते हुए पूछाः कहां से आ रहे हैं? मैंने बताया ‘आपकी पार्टी की प्रेस कांफ्रेंस थी। क्या आपको यह बात मालूम नहीं थी? आप भी तो शायद महासचिव या कोई बड़े पदाधिकारी हैं।’ उन्होंने अपना दर्द ‘शेयर’ करते हुए कहाः ‘उर्मिलेश जी, पार्टी में क्या हो रहा है, यह हम जैसे लोगों को सबेरे अखबार पढ़कर पता चलता है!’

माना जाता है कि अमर सिंह ने बहुत कुशलता से सपा और उसके नेता की राजनीति का कायांतरण ही नहीं, हृदयांतरण भी कर दिया। पर मैं समझता हूं, इसके लिए सिर्फ अमर सिंह को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं। उनसे ज्यादा स्वयं मुलायम सिंह जिम्मेदार हैं, जिन्होंने अपनी पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं, पिछड़ों-अल्पसंख्यकों-किसानों के ठेठ प्रतिनिधियों और लोहिया-नरेंद्र देव को जानने-समझने वाले कुछ बड़े नेताओं को दरकिनार कर अचानक अमर सिंह को पार्टी में इतना महत्वपूर्ण और शक्तिमान बना दिया। वह अमर सिंह के ‘एहसानों’ से हमेशा दबा महसूस करते रहे। सन् 2016 में पार्टी की एक हंगामी सभा में जहां पहली बार उनके परिवार की आंतरिक कलह सार्वजनिक हुई, उन्होंने सबके सामने कहा, ‘अमर सिंह ने उन्हें सीबीआई से बचाया।’

और भी कुछ मौकों पर उन्होंने कहा कि अमर सिंह ने उन्हें जेल जाने से बचाया! जाहिर है, मुलायम सिंह ने उस ‘एहसान’ के लिए अपनी राजनीति और अपने सामाजिक आधार की परवाह नहीं की और इस तरह अपने राजनीतिक पतन का रास्ता तैयार किया। मुलायम सिंह पर अमर सिंह का एक और एहसान था, जो नेताजी ने कभी सार्वजनिक मंच से नहीं बताया। आखिरी बार जब मुलायम सिंह यूपी के मुख्यमंत्री बने तो उसका सारा प्रकल्प अमर सिंह ने तैयार किया था। भाजपा के साथ अमर ने ही सारी बातें तय कराई थीं। मुझे यह बात किसी और ने नहीं, स्वयं अमर सिंह ने बताई थी। 

उनके पुत्र और सपा के मौजूदा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अपने अब तक के राजनीतिक जीवन में जो चंद अच्छे कदम उठाये होंगे, पार्टी को अमर सिंह की छाया से मुक्त कराना, उन तमाम कदमों में सबसे उल्लेखनीय माना जायेगा। पता नहीं, मुलायम सिंह जी अखिलेश के इस कदम को पार्टी के लिए उपलब्धि मानते हैं या घाटा! यह तो सिर्फ सैफई वाले ही जानते होंगे। बहरहाल, भारतीय राजनीति खासकर यूपी और दिल्ली की राजनीति में अमर सिंह अपने ढंग की अनोखी शख्सियत थे। उन्हें तिकड़म आता था, पीआर आता था, सही को गलत और गलत को सही करना आता था। आर्थिक सुधारों के दौर के बाद की भारतीय राजनीति में विचार और मूल्यों का जो तेजी से ह्रास हुआ, एक ‘राजनीतिक’ के तौर पर वह उस प्रक्रिया की पैदाइश और पैमाने, दोनों थे।

मैं यह दावा नहीं कर सकता कि निजी तौर पर अमर सिंह को मैं बहुत नजदीक से जानता था। एक पत्रकार के रूप में मैंने ‘राजनीतिक’ अमर सिंह को लंबे समय तक देखा, अनेक बार बातें कीं, राज्यसभा में उन्हें बोलते या किसी बहस में हस्तक्षेप करते देखा, कई मौकों पर उनके आमंत्रण पर पंच सितारा आयोजनों में भी गया, उनके जीवनकाल में भी उनकी कई बार आलोचना की और इसके लिए कुछेक बार उनकी नाराजगी और शिकायतें भी सुनीं। पर वह जब भी मिलते, उनके चेहरे पर मेरे लिए असम्मान या कटुता नहीं होती थी। यह उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी बात थी। अंतिम मुलाकात पिछले साल किसी टीवी स्टूडियो में हुई थी। अब वह नहीं हैं। उन्हें आदरांजलि और उनके परिवार को हमारी शोक-संवेदना।    

(उर्मिलेश वरिष्ठ पत्रकार हैं। और आप राज्य सभा टीवी के संस्थापक कार्यकारी संपादक रहे हैं।)

This post was last modified on August 2, 2020 10:01 pm

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