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Categories: बीच बहस

एनपीआर पर अमित शाह पहले सच थे या आज?

राज्य सभा में गृहमंत्री अमित शाह ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी के नाम के सामने डी यानि डाउटफुल नहीं लगेगा मतलब एनपीआर के आधार पर किसी को डाउटफुल सिटीजन नहीं बनाया जाएगा और ना ही सीएए के माध्यम से किसी की नागरिकता ली जाएगी।लेकिन इसके बावजूद संशय का माहौल बना हुआ है क्योंकि गृहमंत्री अमित शाह ने ही दहाड़ लगाई थी कि पूरे देश में एनआरसी लागू की जाएगी। अब अमित शाह पहले सही कह रहे थे या अब सही कह रहे हैं यह रहस्य के घेरे में है।

इसी बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक याचिका पर नोटिस जारी किया है जिसमें याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि उन्हें उस प्रोफार्मा की प्रति उपलब्ध करने के निर्देश संबंधित अधिकारियों को दिए जाएं जिसमें नागरिकों के सभी व्यक्तिगत डेटा को राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) के अपडेशन के उद्देश्य से अधिकारियों द्वारा एकत्रित किया जाएगा। यह प्रोफार्मा सामने आने पर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो जाएगी।

चीफ जस्टिस गोविंद माथुर और जस्टिस चंद्र धारी सिंह की पीठ एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें यह चिंता जताई गई थी कि एनपीआर के अपडेशन के लिए एकत्र किए गए नागरिकों के डेटा का इस्तेमाल नेशनल रजिस्टर ऑफ इंडियन सिटीजन (एनआरसी) की नींव बनाने के लिए किया जाएगा।

याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि सभी नागरिकों के लिए यह आवश्यक होगा कि वे एनआरसी से बाहर किए जाने की स्थिति में प्रोफार्मा की एक प्रति रखें। याचिकाकर्ता ने कहा कि एकत्र किए गए डेटा को भारतीय नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर के लिए आधार बनाया जाएगा और इसलिए यह आवश्यक होगा कि प्रोफार्मा की प्रतिलिपि पास हो, जिसमें सभी व्यक्तिगत डेटा जो नागरिक द्वारा प्रदान किए गए हों।याचिकाकर्ता ने यह भी दावा किया कि सरकार द्वारा संबंधित निवासियों को सुनवाई का अवसर प्रदान किए बिना कोई प्रतिकूल निर्णय नहीं लिया जा सकता। उन्होंने कहा, एक उद्देश्यपूर्ण और निष्पक्ष सुनवाई के लिए आवश्यक है कि सभी सामग्रियों की आपूर्ति की जाए, जिस पर उत्तरदाता भारतीय नागरिक के राष्ट्रीय रजिस्टर में जानकारी दर्ज करने से संबंधित कोई भी निर्णय लेते समय भरोसा कर सकें।

उल्लेखनीय है कि सरकार ने हाल ही में स्पष्ट किया था कि फिलहाल उसकी देशव्यापी एनआरसी लागू करने की कोई योजना नहीं है,  हालांकि 1 अप्रैल 2020 से 30 सितंबर 2020 के बीच राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) को अपडेट किया जाएगा, साथ ही असम को छोड़कर पूरे देश में हाउस लिस्टिंग और हाउसिंग सेंसस की जाएगी। इसके अलावा, एनपीआर के लिए एकत्र किए गए डेटा का उपयोग विभिन्न सरकारी योजनाओं और सब्सिडी के लाभार्थियों की पहचान करने के लिए किया जाएगा।

2010 में बनाया गया, एनपीआर एक डेटाबेस है जिसमें भारत के ‘सामान्य निवासियों’ की जनसांख्यिकीय जानकारी है, जिसमें भारतीय और विदेशी नागरिक भी शामिल हैं। नागरिकता के नियम 3 (नागरिकों का पंजीकरण और राष्ट्रीय पहचान पत्र जारी करना) नियम, 2003 के तहत NPR को बनाए रखने के लिए सरकार को अधिकार दिया गया है। इस उद्देश्य के लिए, यह निम्नलिखित डेटा एकत्र किया जा सकता है: (i) (नाम; (ii) पिता का नाम; (iii) माता का नाम; (iv) सेक्स; (v) जन्म तिथि; (vi) जन्म का स्थान; (vii) आवासीय पता (वर्तमान और स्थायी); (viii) वैवाहिक स्थिति- यदि विवाहित हों, पति या पत्नी का नाम; (ix) दृश्यमान पहचान चिह्न; (x) नागरिक पंजीकरण की तिथि; (xi) पंजीकरण की क्रमिक संख्या; और (xii) राष्ट्रीय पहचान संख्या।

इस बीच राज्य सभा में गृहमंत्री अमित शाह ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी के नाम के सामने डी यानि डाउटफुल नहीं लगेगा मतलब एनपीआर के आधार पर किसी को डाउटफुल सिटीजन नहीं बनाया जाएगा और ना ही सीएए के माध्यम से किसी की नागरिकता ली जाएगी।सरकार दावा करती रही है कि ये तीनों आपस में जुड़े नहीं रहे हैं, लेकिन सच्चाई है कि ये आपस में जुड़े रहे हैं।

गृहमंत्री के शब्दों में ही समझें तो वह पहले ही कह चुके हैं कि आप क्रोनोलॉजी समझिए, पहले नागरिकता क़ानून आएगा, फिर एनआरसी आएगी। उनके इस बयान का साफ़ मतलब था कि एनआरसी और नागरिकता क़ानून जुड़े हुए हैं। यह इससे भी साफ़ है कि जब एनआरसी से लोग बाहर निकाले जाएंगे तो नागरिकता क़ानून के माध्यम से पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश के हिंदू, सिख, पारसी, जैन, बौद्ध और ईसाई धर्म के लोगों को भारत की नागरिकता दी जाएगी।

जब नागरिकता क़ानून (सीएए) पास हो गया तो इस पर ज़बरदस्त विरोध हुआ। दो दर्जन से ज़्यादा लोगों की जानें चली गईं। पूरे देश भर में प्रदर्शन हुए। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी दबाव बना। भाजपा  के सहयोगी दलों ने ही आपत्ति दर्ज करानी शुरू कर दी। सरकार ने एनआरसी से साफ़-साफ़ किनारा कर लिया और कह दिया कि एनआरसी लाने की चर्चा तक नहीं हुई है। हालाँकि विरोध-प्रदर्शन तब भी नहीं रुका। इसी विरोध के बीच जब पहली बार एनपीआर को अपडेट करने के लिए 3941 करोड़ रुपये के बजट की ख़बर आई तब इस पर नये सिरे से विवाद खड़ा हो गया। कहा जाने लगा कि सरकार एनआरसी को पीछे के दरवाजे से लागू कराना चाहती है।

इसके बाद सूत्रों के हवाले से ख़बर आई कि एनपीआर के लिए सभी लोगों से 21 प्वाइंट में जानकारियाँ माँगी गईं। इससे पहले 2010 में सिर्फ़ 15 प्वाइंट में सूचनाएँ माँगी गई थीं और उस समय कोई बाध्यता नहीं थी। इस बार छह और प्वाइंट जोड़े गए। इसमें आवेदन करने वाले का नाम, पिता का नाम, माता का नाम जैसी जानकारियाँ शामिल थीं। इस बार पिछली बार के तीन प्वाइंट- माँ का नाम, पिता का नाम और पति-पत्नी का नाम को एक प्वाइंट बना दिया गया।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल इलाहाबाद में रहते हैं।)

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This post was last modified on March 18, 2020 2:29 pm

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