Friday, March 1, 2024

एंटी-इमीग्रेशन प्रोटेस्ट: यूरोप इस्लाम को निशाने पर रख क्या अपनी बर्बादी की पटकथा लिख रहा है?

बृहस्पतिवार, 23 नवंबर के दिन डबलिन में दोपहर को एक 50 से अधिक उम्र के व्यक्ति द्वारा स्कूली बच्चों पर चाक़ू से हमले की खबर ने आयरलैण्ड को हिंसा और आगजनी की चपेट में ले लिया। शुक्रवार के दिन शहर में धुर-दक्षिणपंथी समूह के हुड़दंगियों ने बड़े पैमाने पर लूटपाट, आगजनी और मारपीट की घटनाओं को अंजाम दिया। ऐसा कहा जा रहा है कि चाकू मारने वाला व्यक्ति अल्जीरियाई मूल का है, और उसके इस्लाम धर्म की पहचान ने तत्काल एंटी-इमीग्रेशन प्रोटेस्ट की भावना को हिंसक बना दिया।

कल की घटना में लगभग 500 लोगों की भीड़ ने दुकानों में लूटपाट की, वाहनों को आग के हवाले किया और भीड़ को नियंत्रण में रखने के लिए आये सुरक्षाकर्मियों पर जमकर पत्थरबाजी की। इनमें से 34 लोगों को हिरासत में लिया जा चुका है, और साथ ही अल्जीरियाई हमलावर से पुलिस तहकीकात कर रही है। लेकिन प्रशासन का कहना है कि स्कूली बच्चों पर हमले की वजह के पीछे कोई सुनियोजित साजिश नजर नहीं आती है, लेकिन देश में एंटी-मुस्लिम सेंटीमेंट्स अन्य यूरोपीय देशों की तरह तेजी से जड़ जमा रही है।

यूरोप में वेलफेयर स्टेट की अवधारणा एक छलावा थी  

औद्योगिक क्रांति के अग्रदूत के रूप में यूरोप को पूंजीवादी लोकतंत्र का सबसे पुराना अनुभव है। ब्रिटेन, फ़्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड, पुर्तगाल सहित बेल्जियम जैसे देशों ने 18वीं शताब्दी से लेकर द्वितीय विश्व युद्ध तक लगभग समूचे विश्व को अपने औपनिवेशिक लूट का जरिया बना रखा था। लेकिन 1917 की रुसी क्रांति और संयुक्त राज्य अमेरिका के आर्थिक महाशक्ति के रूप में उदय के बाद प्रथम विश्व युद्ध के बाद से ही एक-एक कर तीसरी दुनिया के देशों को औपनिवेशिक दासता की बेड़ियों से मुक्त होने का अवसर मिलने लगा था।

लेकिन इन देशों में अधिकांश की अर्थव्यस्था और शासन प्रणाली इस हद तक मजबूत नहीं थी कि वे आजादी पाने के फौरन बाद ही पूर्ण रूप से एक संप्रभु राष्ट्र के तौर पर खुद को स्थापित कर सकें। उल्टा, इन देशों के लिए अब यूरोपीय देश ही नहीं अमेरिका और सोवियत रूस के बीच की भूराजनैतिक प्रतिद्वंदिता एवं नव-औपनिवेशिक लूट से खुद को कैसे बचाए रखा जाये, एक बड़ी चुनौती बन गई थी। जिन देशों में उनके राष्ट्रीय नायक व्यापक भूमि सुधार के साथ-साथ समाजोन्मुख नीतियों को लागू कर पाने में विफल रहे, उन देशों के शासक वर्गों में जमींदारों और पूंजीपतियों की यूरोपीय एवं अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ सांठ-गांठ ने आज भी इन देशों को लूट का चारागाह बना रखा है। 

लेकिन यूरोपीय देशों में थैचर युग की शुरुआत से पहले कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के कारण व्यापक जनमानस और मजदूर वर्ग ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बेहद खुशहाल जीवन जिया। लिबरल मूल्यों और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति अपने अबाध विश्वास को व्यक्त करने के पीछे यूरोप और अमेरिका के लिए 1930 से 80 के दशक तक सोवियत रूस की समाजवादी सरकार का भूत काफी हद तक जिम्मेदार कहा जा सकता है। 1917 में रुसी क्रांति के बाद सोवियत रूस ने एक ऐसे समाज का निर्माण चंद वर्षों में कर डाला था, जिसमें बेरोजगारी, भुखमरी और अशिक्षा का नामोनिशान नहीं रह गया था।

1929 की वैश्विक आर्थिक महामंदी और प्रथम विश्व युद्ध में हार के कारण जर्मनी के उपर अपमानजनक शर्तें लाद दी गई थीं, जिसमें जर्मन आबादी के लिए जीना दिन-प्रतिदिन दूभर हो रहा था। वैश्विक आर्थिक मंदी में जर्मनी और इटली में फासीवाद के उदय में जर्मन पूंजीपति ही नहीं अमेरिकी कॉर्पोरेट की भूमिका आज दुनिया के सामने उद्घाटित हो चुकी है। लेकिन सोवियत रूस के जन्म के 28 वर्षों के भीतर उसके वैश्विक महाशक्ति बन जाने से बुरी तरफ आशंकित शासक वर्गों के लिए अपने-अपने देशों में वर्किंग क्लास के लिए स्थायी रोजगार, पेंशन, बुनियादी स्वास्थ्य और शिक्षा पर खर्च कर उनके दिलों में पूंजीवादी लोकतंत्र के प्रति भ्रम को बनाये रखना था, और दूसरी तरफ सोवियत रूस को कैसे जल्द से जल्द बर्बाद किया जाये, को अंजाम देना शामिल था।

यह मौका खुद सोवियत रूस की कम्युनिस्ट सरकार ने बनाया, क्योंकि उनके यहां उत्पादक शक्तियों के विकास पर ध्यान हटाकर 50 के दशक से ही परमाणु हथियारों की होड़, अन्तरिक्ष अनुसंधान सहित हर कदम पर अमेरिका से दुनिया में होड़ का सिलसिला शुरू हो चुका था। 90 के दशक में सोवियत रूस के पतन के बाद से ही अमेरिकी एवं ब्रिटेन की ओर से एक-एक कर कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया, और इसके साथ ही एक बार फिर से बड़ी पूंजी के लिए जमकर मुनाफा और लूट को अंजाम देने के लिए पूरी दुनिया में नव-उदारवादी अर्थनीति को विश्व बैंक और आइएमएफ के जरिये लागू कराया जाने लगा। इसलिए हाल के वर्षों तक चंद स्कैनडिनेवियन देशों को छोड़ दें तो यूरोप की फिजा लगातार बदलती गई है। कम्प्यूटर क्रांति के बाद से अमेररिका की तरह यूरोप में भी उद्योग-धंधों के बजाय सर्विस सेक्टर और फाइनेंस कैपिटल की भूमिका बढ़ती गई है। 

अपने उपनिवेशों के साथ इन यूरोपीय देशों का संबंध पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ था। जैसे भारत में आजादी मिलने के बाद भी कई ब्रिटिश कंपनियों, विशेषकर चाय बागानों की मिल्कियत बची हुई थी, और भारतीय अभिजात्य वर्ग के लिए लंदन में स्वागत के द्वार खुले हुए थे, ने नव-औपनिवेशिक लूट का रास्ता बना रखा था। इन देशों के प्रतिभावान और शिक्षित लोगों के लिए अप्रवासी बनने या नागरिकता ग्रहण करने की छूट मिली हुई थी। यही कारण है कि ब्रिटेन में जहाँ भारतीय उपमहाद्वीप सहित दक्षिण अफ्रीकन की बहुतायत है, उसी प्रकार फ़्रांस के अफ्रीका में उपनिवेश होने के कारण वहां पर बहुतायत अप्रवासी अफ्रीकी मूल के मिलेंगे। 

लेकिन हाल के वर्षों में देखने को मिल रहा है कि यूरोप एक बार फिर से राष्ट्रवाद और विशेषकर एंटी-मुस्लिम भावनाओं की जद में आ चुका है। ऐसा क्यों हो रहा है? दुनिया के सबसे शिक्षित, सभ्य कहे जाने वाले देशों में पिछड़ी और प्रतिक्रियावादी सोच की वजह क्या है? सोवियत संघ के विघटन के बाद तो यूरोपीय संघ के झंडे तले एक हो चुके देश अब एक-एक छिटक रहे हैं।

ब्रेक्सिट के साथ पहले ही यूरोपीय संघ से ब्रिटेन ने किनारा कर लिया था, लेकिन नीदरलैंड में हुए हालिया चुनावों में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरने वाले ग्रीट वैल्दर्स की पार्टी पार्टी फॉर फ्रीडम की भी छवि एंटी-ईयू की है, और कहा जा सकता है कि हंगरी, पोलैंड, इटली की तरह नीदरलैंड भी एंटी-इमीग्रेशन, एंटी-मुस्लिम, एंटी-ईयू और डच राष्ट्रवाद के खुमार को हवा दे रहा है। जर्मनी, इंग्लैंड और फ़्रांस में भी धुर-दक्षिणपंथी जमात को बढ़ता समर्थन बताता है कि दुनिया एक बार फिर से पीछे की ओर देख रही है।     

चीन के नई औद्योगिक शक्ति के तौर पर उठ खड़े होने से यूरोप की मुश्किलें बढ़ीं    

लेकिन इतिहास के पहिये को पीछे मोड़ने की चाह रखने वालों के पीछे जाने वाले देशों को कभी आगे जाते नहीं देखा गया है। अमेरिकी पूर्व रोनाल्ड रीगन और ब्रिटेन की पीएम मारग्रेट थैचर ने 80 के दशक में जब नव-उदारवादी नीति की पेशकश दुनिया के सामने रखी थी, तो उन्हें लगता था कि वे इतिहास के अंत की पटकथा लिख रहे हैं। दुनिया अब एकध्रुवीय ही रहने वाली है और अमेरिका का सूरज कभी नहीं डूबेगा।

लेकिन जिस प्रकार ग्रेट ब्रिटेन आज ग्रेट होने के आसपास भी नहीं है, उसी प्रकार अमेरिका के लिए भी पूरी दुनिया का चौधरी बनने के दिन बस हाथों में गिने जा सकते हैं। इसके पीछे उनके द्वारा बड़ी पूंजी और मिलिटरी-इंडस्ट्रियल-कॉम्प्लेक्स के हाथों अमेरिकी संसाधनों और जनता को पूर्ण समर्पण में छिपा है। इन विकसित पश्चिमी देशों की अर्थव्यस्था अब पूरी तरह से वित्तीय पूंजी में तब्दील हो चुकी है, और इनका एकमात्र लक्ष्य कम से कम मेहनत कर दुनिया में अपना एकाधिकार स्थापित कर भारी मुनाफा कमाना रह गया है। 

ऐसा कहा जा सकता है कि सोवियत रूस को मात देने के लिए जिस प्रकार अमेरिका सहित यूरोपीय देशों ने छद्म कल्याणकारी राज्य की नीतियों पर चंद दशकों तक काम किया और अपने पूंजीपति वर्ग को कम मुनाफे पर कुछ समय तक बर्दाश्त करने की हिदायत दी थी, कुछ उसी प्रकार 70 के दशक के अंत में चीन ने भी डेंग जिआओ पिंग के नेतृत्व में पूंजीवादी समाजवाद का नारा देकर चीन में विदेशी पूंजी निवेश को दावत देकर पश्चिमी साम्राज्यवादी देशों के लिए पूंजीवाद की पूर्ण जीत की उम्मीद जगा दी। उन्हें उम्मीद थी कि सोवियत रूस की तुलना में चीन में समाजवाद का महल बिना कुछ किये अपनेआप ही भरभराकर टूट जाने वाला है, क्योंकि पूंजीवादी मूल्य और मध्य वर्ग बड़ी से बड़ी सत्ता की चूलें हिलाने के लिए पर्याप्त हैं।

लेकिन चीन ने विदेशी पूंजी के साथ-साथ तकनीक हस्तांतरण और देशी पूंजीपति वर्ग को भी खड़ा किया, लेकिन महत्वपूर्ण केंद्रीय बैंकों सहित नीतिगत मामलों पर कम्युनिस्ट पार्टी की पकड़ को पहले की तुलना में भी मजबूत कर दिया था। आज दुनिया के 4 सबसे बड़े बैंक चीन के हैं, और 2010 के बाद से ही यूरोप और 2018 के बाद से अमेरिका के लिए चीनी प्रभुत्व उनके अस्तित्व के लिए चुनौती बन चुका है। 

यूरोप में एकमात्र देश जर्मनी था, जिसे रिसर्च एवं आधुनिकतम तकनीक के मामले में अमेरिका और चीन के समकक्ष कहा जा सकता है। इसका फायदा उसे यूरोपीय संघ में भी मिला, लेकिन नाटो के तहत अमेरिकी छत्रछाया में पलने वाले देश के तौर पर उसे अंततः रूस-यूक्रेन युद्ध में यूक्रेन के पक्ष में खड़ा होने के लिए बाध्य कर दिया गया, और इसी के साथ यूरोप का अंतिम स्तंभ भी गिराकर आज अमेरिका ने समूचे यूरोप को अपने पीछे खड़े रहने के लिए मजबूर ही नहीं किया, बल्कि उनकी उर्जा जरूरतों का फायदा उठाकर अमेरिकी कंपनियां भारी मुनाफा लूट रही हैं।

नोर्ड-2 स्ट्रीम परियाजना से रूस-जर्मनी के बीच की दूरी खत्म हो जाने वाली थी, और जर्मनी के रूस और चीन के साथ रिश्ते बेहद प्रगाढ़ हो रहे थे। यही हाल फ़्रांस सहित अन्य देशों के लिए भी था, जो बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के साथ जुड़कर अमेरिकी भूराजनैतिक जरूरतों के लिए बने नाटो, जी-7 से लगातार दूर जा रहे थे।  

अमेरिकी कॉर्पोरेट की वितीय धोखाधड़ी की सजा यूरोप भुगत रहा है 

इससे पहले 2008-09 की आर्थिक मंदी ने यूरोप के कई देशों की आर्थिक स्थिति बिगाड़ दी थी। इसके बाद से ही यूरोप के कुछ देशों में अप्रवासी भीड़ के प्रति संदेह बढ़ने लगा था, लेकिन कोविड-19 महामारी के बाद मंदी और यूक्रेन-रूस संघर्ष की आग में लगभग पूरा यूरोप ही आज इसकी चपेट में आ चुका है। आज मुक्त-व्यापार की बात करने वाले यूरोप और अमेरिका के द्वारा decoupling की बात की जा रही है, और अपने-अपने देशों की अर्थव्यस्था को चीन सहित एशिया पूर्व से आने वाले अपेक्षाकृत सस्ते दामों से अधिकाधिक बचाने के लिए जूझना पड़ रहा है।

चीन में विशाल मध्य-वर्ग के लिए यूरोपीय निर्माताओं ने पलक-पांवड़े बिछा रखे हैं, और कोविड-19 महामारी के बाद जब चीन ने आवाजाही की छूट दी थी, तो यूरोप में ख़ुशी की लहर थी कि उनके माल के खरीदार बड़ी संख्या में चीन से आ रहे हैं। लेकिन आज जर्मनी जैसे संपन्न और विकसित देश के लिए चीनी इलेक्ट्रिक कार सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है, केमिकल्स के क्षेत्र की दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी ने जर्मनी के अपने आधार को छोड़ विशाल बाजार को लक्ष्य करते हुए चीन को अपना बेस बना लिया है, जबकि बाकी के उद्योग धंधे अमेरिका में शिफ्ट हो रहे हैं। 

ऐसी परिस्थितयों में जब सरकारें वेलफेयर स्टेट की अपनी घोषित नीतियों से पहले ही पीछे हट रही हों, और दूसरी तरफ औद्योगिक ढांचे के स्थान पर सर्विस सेक्टर, फाइनेंश कैपिटल, डायमंड ट्रेडिंग (बेल्जियम) के बाद अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और गूगल, फेसबुक जैसे सोशल मीडिया और अमेज़न सहित वाल मार्ट जैसे अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा यूरोप को सिर्फ उपभाक्ता बनकार रख छोड़ा हो, तो ऐसे में यूरोप के लिए तेजी से आर्थिक रूप से यह कमजोर होने वाला क्षण ही कहा जा सकता है। 

इन बातों पर आज खुलकर चर्चा की जा रही है कि क्या यूरोप अब गरीब होता जा रहा है। चीनी मीडिया सीजीटीएन ने हाल ही में चर्चा के लिए यही विषय रखा, जिसमें लैंकेस्टर विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के वरिष्ठ व्याख्याता रेनॉड फौकार्ट, सेंटर फॉर इकोनॉमिक्स एंड बिजनेस रिसर्च में पूर्वानुमान एवं वैचारिक नेतृत्व के प्रमुख के न्यूफेल्ड, और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर इयान बेग ने खुलकर यूरोप की बदलती स्थितियों के विभिन्न पहलुओं पर आपनी बातचीत रखी। 

यूरोप को विश्व में आधुनिक सभ्यता का पितामह कहा जाता है, लेकिन हम भूल जाते हैं कि दुनिया में दो-दो विश्वयुद्ध भी यूरोप की वजह से ही दुनिया ने झेले हैं। दुनिया में आज हम जिस संयुक्त राज्य अमेरिका को अपनी साम्राज्यवादी प्रभुत्व के लिए कभी इराक तो कभी ईरान, लीबिया, कोरिया, वियतनाम, अफगानिस्तान, सीरिया, क्यूबा, वेनेजुएला, यूक्रेन और हाल ही में फिलिस्तीन के गाजापट्टी में इजराइल के पीछे मजबूती से खड़ा देख रहे हैं, वह भी असल में संयुक्त यूरोपीय गोरे लोगों की एक औपनिवेशिक पहल से ही निर्मित हुआ था, जिसे मूल अमेरिकी देशजों के खून से इतना मजबूत किया गया। आज यूरोप की बर्बादी में उसके द्वारा अमेरिकी आर्थिक नीतियों के पिछलग्गू बनने के साथ-साथ वही नस्लीय भावना भी काम कर रही है, जो उसे संयुक्त राष्ट्र, सुरक्षा परिषद और नाटो, आइएमएफ या यूरोपीय संघ की संसद में भी संप्रभु राष्ट्र और संयुक्त यूरोप के तौर पर खड़ा होने से रोकती रहती है।

यूरोप को अगले 25 वर्षों में कम से कम 5 करोड़ नए अप्रवासी चाहिए 

आज यूरोप के अधिकांश देश अपनी श्रमशक्ति में बूढों की बढ़ती फ़ौज से परेशान हैं। कई विशेषज्ञों सहित पश्चिमी थिंक टैंक फारेन पालिसी मैगजीन में हावर्ड डब्ल्यू फ्रेंच यूरोपीय देशों को सुझाव देते हैं कि उनके लिए अफ्रीका और एशिया से रोजगार की खोज में आने वाले अप्रवासियों का खुले हाथों से स्वागत करना चाहिए, क्योंकि आज यूरोप में यदि 7 बच्चे जन्म ले रहे हैं तो बदले में 10 लोगों की मौत हो रही है। एंटी-इमीग्रेशन पालिसी पर चलकर यूरोप अपनी ही कब्र खोदने जा रहा है। इस बात को आम यूरोपीय नहीं समझता, क्योंकि सामाजिक कल्याणकारी योजनाओं में कटौती जारी है, सार्वजनिक क्षेत्रों का निजीकरण लगभग किया जा चुका है, और वेतन में बेहद मामूली वृद्धि की तुलना में मुद्रास्फीति में भयानक वृद्धि ने यूरोप में गरीबों की संख्या में रिकॉर्ड इजाफा कर दिया है। 

2008 से यूरोप इसका समाधान नहीं खोज पाया है, जबकि अब तो दुनिया में काले धन के लिए स्वर्ग माने जाने वाले स्विस बैंक भी दिवालिया हो रहे हैं। यूरोप के शासक वर्ग के लिए अपने डूबते सूरज की असली वजह बताने की जगह लोगों की निराशा, गुस्से को एक बार फिर इस्लाम और उनके मतावलंबियों पर फोड़ने के साथ एक बार फिर से उसी फासिस्ट विचारधारा को हवा देना है, जिसमें समूचा यूरोप खुद को लगभग स्वाहा कर चुका था।

अफ्रीका और एशिया से पलायन कर इटली और ग्रीस के तटों पर शरण लेने वाले मुस्लिम इमिग्रेंट भी नहीं जानते कि उनके देशों में इन्हीं यूरोपीय पूंजीपतियों और उनके देशों के दलाल पूंजी के गठजोड़ के कारण तानाशाहों की सरकारों को स्थापित और गिराया जाता है, और कई बार तो दुनिया में कहीं स्थायी शांति न हो जाये, और यदि ऐसा हुआ तो अमेरिकी मिलिट्री इंडस्ट्रियल कॉम्प्लेक्स और उसके भाड़े के हत्यारों की सेना का क्या होगा, के मुनाफे को सुनिश्चित करने के लिए ही दुनिया में हर समय कहीं न कहीं जंग छिड़ी रहती है।    

फारेन पालिसी पत्रिका के अनुसार प्रवासन नीतियों की जिम्मेदारी संभाल रहे स्पेन के मंत्री के द्वारा पिछले वर्ष अंतर्राष्ट्रीय प्रवासन प्रवृत्तियों पर आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन की एक नई रिपोर्ट की लांचिंग पर बोलते हुए कहा कि यूरोप को अपनी आबादी को मौजूदा स्तर पर बनाये रखने के लिए अगले 25 वर्षों में करीब करोड़ नए प्रवासियों की आवश्यकता होगी।

लेकिन यूरोप में तो उल्टी दिशा में हवा बह रही है, जो उसके लिए बर्बादी का सबब बनने जा रही है। उसे सही सलाह कनाडा से मिल सकती है, जिसने अपने देश को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए बड़ी संख्या में दुनियाभर से कुशल श्रमिकों और इंजीनियर को आकर्षित करने के लिए राज्यों को टारगेट तक दे रखा है, और इसके लिए उन्हें इंसेंटिव तक दिया जाता है।

यूरोप के लिए अप्रवासन वरदान की तरह आज भी काम कर रहा है, इस बात को आज ब्रेक्जिट से अलग हुए देश ब्रिटेन से समझा जा सकता है, जिसे पूर्वी यूरोप से ईयू के भीतर ब्रिटेन में बढ़ते प्रवासियों ने परेशान कर रखा था। आज उसी ब्रिटेन में गरीबी तेजी से बढ़ रही है, लेकिन काम करने के लिए सस्ती श्रमशक्ति ही उपलब्ध नहीं है। लेकिन यूरोप को एक बार फिर से अपनी बर्बादी के लिए नया बहाना चाहिए, इसलिए इस बार उसके स्याह इतिहास से उसकी फासिस्ट प्रवृतियां यहूदियों की जगह इस्लाम को निशाने पर लिए हुए हैं।  

(रविंद्र पटवाल जनचौक की संपादकीय टीम के सदस्य हैं।)

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