तमाम सरकारी योजनाओं के बाद भी देश में कम नहीं हो रही है कुपोषित बच्चों की संख्या

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प्रतीकात्मक फोटो।

देश में आज भी कुपोषण से पांच साल से कम आयु के 68.2 फीसद बच्चों की मौत हो जाती है। ये देश के लिए बड़ी समस्या बनी हुई है। समेकित बाल विकास योजना के तहत आंगनवाड़ी मुख्य रुप से मां और बच्चे की देखभाल के लिए चलाई गई सरकारी योजना है जो उन्हें कुपोषण से मुक्त करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर चलाई जा रही है। इसी तरह मिड-डे मील भारत सरकार की एक ऐसी योजना है, जिसके तहत सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे छोटी आयु के बच्चों को भोजन मुहैया करवाया जाता है।

इसका मुख्य उद्देश्य बच्चों को उचित पोषण युक्त भोजन उपलब्ध करवाना है ताकि पोषण की कमी की वजह से कोई भी बच्चा कुपोषण जैसी गंभीर बीमारियों का शिकार नहीं हो सके। लेकिन कुपोषण के आंकड़े जस के तस हैं। क्योंकि  आंगनवाड़ी और मिड-डे मील योजना पूरी तरह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गयी है और प्रतिवर्ष पूरे देश में आंगनवाड़ी और मिड-डे मील योजना के तहत करोड़ों, अरबों का घोटाला ऊपर से लेकर नीचे तक  रहा है।

देश में पोषण की कमी की वजह से हर साल काफी तादाद में बच्चों की मौत होती है। इसलिए सरकार ने बच्चों को उचित पोषण देने के मकसद से मिड-डे मील योजना की शुरुआत की थी। इंडियन कॉउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च (आईएमआरसी) की रिपोर्ट में 2017 तक मौजूद डेटा के हवाले से बताया गया है कि पांच साल तक के बच्चों में मौत की एक बहुत बड़ी वजह कुपोषण है। सबसे अचरज की बात यह है कि इस मामले में कोई राज्य या केंद्र शासित प्रदेश अपवाद नहीं है। डिजे़बिलिटी एडजस्टेड लाइफ ईयर्स (डीएएलवाईएस) में कुपोषण के शिकार कई राज्यों में तो सात गुना तक अधिक है। इसमें सबसे अधिक राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार और असम के साथ मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, नागालैंड और त्रिपुरा के बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। यही नहीं कुपोषण से देश में होने वाले रोगों का भार बढ़ रहा है।

शासन के निर्देश पर मध्यान्ह भोजन प्राधिकरण ने सभी डीएम और बीएसए को मिड डे मील से जुड़े मामले की जांच के निर्देश दिए हैं।  शासन की तरफ से प्रदेश के सभी जिलों में मिड डे मील के खातों और उसके वितरण की जांच के निर्देश दिए गए हैं। ये सारी कार्रवाई बाराबंकी में मिड डे मील बांटने के नाम पर किए गए करीब सवा चार करोड़ के घोटाले की पोल खुलने के बाद शुरू हुई है। बाराबंकी मामले में विभाग की शुरुआती जांच में यह सामने आया है कि घोटाला करने वालों ने फर्जी स्कूलों के नाम से आईडी बनाकर खाते खुलवाए और ट्रेजरी से बजट ट्रांसफर कराया। यह खेल 2013 से चल रहा था। लंबे समय से मध्यान्ह भोजन प्राधिकरण की जानकारी में भी आ रहा था कि प्रदेश के कई स्कूलों में या तो मिड डे मील बांटा नहीं जा रहा है या जानकारी नहीं दी जा रही है।

यूपी के मिर्जापुर में सरकारी स्कूलों में मिड डे मील के नाम पर आने वाले पैसे को हजम कर सरकारी स्कूल में मिड डे मील की जगह बच्चों को खाने में नमक और रोटी परोसा जा रहा है। मामले का वीडियो वायरल हुआ तो सरकार के इशारे पर खुलासा करने वाले पत्रकार पर ही अधिकारीयों ने एफआईआर करा दिया लेकिन घोटाला छिपना सम्भव नहीं था क्योंकि यह प्रदेश ही नहीं राष्ट्रीय स्तर पर भी चल रहा है। नया मामला रायबरेली, कन्नौज और प्रतापगढ़ जिलों का  है।

उत्तर प्रदेश के रायबरेली, कन्नौज और प्रतापगढ़ जिलों में हुए एक बड़े मिड डे मील घोटाले के मामले में करीब 29 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। आरोपियों पर मिड डे मील के लिए आवंटित अनाज को बाजार में बेचने का आरोप है। रायबरेली में एक निजी व्यापारी के गोदाम में इस योजना के लिए भारी मात्रा में आए खाद्यान्न की बरामदगी के लिए छापेमारी के बाद प्रतापगढ़ के चार पर्यवेक्षकों और 17 आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को निलंबित कर दिया गया।

रायबरेली के सलोन ब्लॉक के गोदाम में लगभग 155 बैग (करीब 9,300 किलोग्राम) अनाज मिला, जिसे पड़ोस के प्रतापगढ़ से लाया गया था। विभागीय जांच के बाद यह खुलासा हुआ कि मिड डे मील के लिए आया यह अनाज प्रतापगढ़ के रामपुर-संग्रामगढ़ और रामपुर खास ब्लॉकों के लिए था, जिसे गैर-कानूनी ढंग से रायबरेली के व्यापारियों को बेच दिया गया।कन्नौज में डीएम की टीम को मिड डे मील के लिए आवंटित अनाज बड़ी मात्रा में एक ऑटो रिक्शा में मिले थे जिसे कहीं ले जाया जा रहा था। जिलाधिकारी कार्यालय द्वारा रिपोर्ट सौंपने के बाद यह कार्रवाई की गई।

इसी तरह नवंबर में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने  दावा किया था कि यूपी में 1.88 लाख आंगनवाड़ियों में 14 लाख से ज्यादा ‘‘फर्जी बच्चे’’ दर्ज पाए गए । राष्ट्रीय पोषण परिषद की एक बैठक में मंत्रालय को बताया गया कि प्रदेश में चल रही 1.88 लाख आंगनवाड़ियों में करीब 14.57 लाख फर्जी लाभार्थी दर्ज थे। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक उत्तर प्रदेश में आंगनवाड़ी में कुल 1.08 करोड़ बच्चे पंजीकृत हैं और इस वित्त वर्ष में इन केंद्रों के लिये फरवरी 2018 तक कुल 2,126 करोड़ रुपये जारी किये गए। फर्जी बच्चों की पहचान के साथ ही यह पाया गया कि उत्तर प्रदेश में प्रति महीने 25 करोड़ रुपये बचाए जा सकते हैं।

कुपोषण पर रिपोर्ट के अनुसार वर्ष वर्ष 2017 तक भारत में जन्म के समय कम वजन का प्रतिशत 21.4फीसद रहा, जबकि कुपोषण की वजह से बच्चों में विकास की दर 39.3 फीसद रही है।  इस दौरान 15.7फीसदबच्चे भारी कुपोषण का शिकार हुए.चूंकि प्रजनन के दौरान महिलाओं में पौष्टिक भोजन का आभाव होता है जिसकी वजह से बच्चों में इसका सीधा प्रभाव पड़ता है। शोध में यह भी कहा गया कि 32.7 फीसद बच्चे कम वजन से पीड़ित थे,जबकि 59.7 फीसद आयरन की कमी से पीड़ित पाए गए। वहीं महिलाओं में खून की कमी भी बड़ी समस्या बनी हुई है। 15 साल की लड़कियों से लेकर 49 साल महिलाओं के बीच एनीमिया से पीड़ित फीसद महिलाएं थीं।

(लेखक जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल इलाहाबाद में रहते हैं।)

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