मेरे लिए लिखना बंद करने से बेहतर जेल जाना होगा: अरुंधति

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विश्व-प्रसिद्ध भारतीय लेखिका अरुंधति राय ने ऑडियो बुक्स स्ट्रीमिंग सेवा ‘स्टोरीटेल’ से बातचीत करते हुए कहा कि उनके लिए लिखना बंद करने से बेहतर जेल जाना होगा।

‘स्टोरीटेल’ ने बुधवार तीसरे पहर अरुंधति राय के अंग्रेजी उपन्यास `The Ministry of Utmost Happiness` के कवि मंगलेश डबराल द्वार किया गया हिन्दी अनुवाद `अपार ख़ुशी का घराना` की ऑडियो बुक का लोकार्पण किया। इस मौके पर `स्टोरीटेल` के संचालक और हिन्दी कवि गिरिराज किराडू ने फेसबुक लाइव के ज़रिये अरुंधति से बातचीत की। किराडू ने दुनिया भर में एक ख़ास तरह के दक्षिणपंथी उभार और हाल ही में बहुत सारे बुद्धिजीवियों की गिरफ्तारी का हवाला देते हुए पूछा कि क्या ऐसे में पॉलिटिकल राइटर होना और मुश्किल होता जा रहा है। किराडू ने जानना चाहा कि वे रोज-ब-रोज के लिहाज से इसे कैसे लेती हैं? 

अरुंधति रॉय ने इस सवाल के जवाब में कहा, “देखिए, मेरे लिए तो रोजाना के लिहाज से…। जैसे अभी प्रशांत भूषण के साथ हो रहा है, मेरे साथ सेम यही 20 साल पहले हुआ था। कन्टेम्पट ऑफ कोर्ट में। तभी मैंने इसके बारे में सोचा कि अगर मैं एक लेखिका हूँ और अगर जो मेरे मन में है, वह नहीं लिख सकती हूँ तो फिर छोड़ दो। मतलब, कुछ और करो। यह (मन का न लिखना) मुझे यह कहने की तरह है कि सांस मत लो। लेकिन बहुत सारी जगहों पर जैसे सोविएत यूनियन में लॉ (बने थे) या कितनी सारी जगहों पर स्टेट बहुत रिप्रेसिव बने थे और लेखकों ने लिखना जारी रखा था।

लिखने के रास्ते तलाश करना जारी रखा था। हमारे लिए यह बहुत ज़रूरी है कि लिखो, लिखते जाओ, जो आप चाहते हो। तरीक़े ढूँढो लेकिन लिखते जाओ। अगर आप मुझे मेरे विचारों या मेरे लेखन के लिए जेल में रखना चाहते हैं तो मैं जेल जाना पसंद करूंगी। यानी, लिखना बंद करने से बेहतर (मेरे लिए) जेल जाना होगा। (If you are going to put me in jail for something that I believe in, that I have written, then I am willing  to go to jail. Better for me to  go to jail than stop writing.) 

इससे पहले एक सवाल में किराडू ने पूछा कि दुनिया में जिस तरह का बदलाव आ रहा है, क्या उस में राइटर के या उसके लेखन के पॉलिटिकल होने से दिक्कत होती है। अरुंधति ने कहा कि दिक्कत भी होती है और नहीं भी होती है। जब पॉलिटिकल एक बहुत ही `सिम्पल टाइप ऑफ प्रीची पॉलिटिक्स` होती है, जैसे काफी सारे पुराने लेखकों में है, तब तो कोई दिक्कत नहीं होती। जब पॉलिटिक्स थोड़ी कॉम्पलेक्स होती है और थोड़ा अनसेटलिंग होती है तब मुझे लगता है, ऐसा होता है। जब आप बड़ा सिम्पल सा प्रीच कर रहे हैं कि गरीब बच्चे हैं, औरत को दबाया जाता है, ये  होता है, वो होता है तो आप जानते हैं, सब ठीक है। लेकिन, हर चीज़ पॉलिटिकल है। ऐसा नहीं है कि कोई चीज़ पॉलिटिकल नहीं है लेकिन एक कृत्रिम दीवार बना रखी है कि क्या स्वीकार्य है, क्या नहीं।

अरुंधति से पूछा गया कि उन्होंने भारत में साहित्य अकादमी पुरस्कार लेने से मना कर दिया था लेकिन बुकर प्राइज़ ले लिया था। क्या उन्हें इसमें कोई विरोधाभास लगता है? अरुंधति ने कहा, “नहीं। क्योंकि मुझे साहित्य एकेडमी अवॉर्ड `द अलजेबरा ऑफ इनफिनीट जस्टिस` के लिए दे रहे थे। मेरे पॉलिटिकल एसेज़ को। उसी चीज़ के लिए मुझे जेल में भी डालें तो दोनों तरफ़ से एक दबाव है। या तो कॉ-ऑप्ट करने का, या तो जेल में डालने का। तो मुझे इसमें कोई कॉन्ट्रडिक्शन नहीं लगा।“

`बुकर` की हिस्ट्री से जुड़े सवालों पर अरुंधति ने कहा, “हाँ, बहुत सारे सवाल हैं तो बुकर पुरस्कार का पैसा मैंने `नर्मदा बचाओ आंदोलन` को दे दिया था। पूरा का पूरा। हाँ, ऐसी कोई कम्पलीटली प्योर पज़ीशन नहीं है। बहुत से कॉन्ट्रडिक्शन हैं, हमारी ज़िंदगी में, हमारे निजी फ़ैसलों में। मैं कोई `मिनिस्ट्री ऑफ कॉन्सटेंसी` तो नहीं हूँ। मैं डिसाइड करती हूँ कि अच्छा ये ले लो, इससे हमारी पोज़ीशन या जो हम कहना चाहते हैं, उसके लिए फ़ायदा होगा;  इसको रिजेक्ट करो, उसमें हमारी पोज़ीशन को फ़ायदा होगा। इसमें कुछ पवित्र और वंडरफुल या ग्रेट या कंसिस्टेंट होने जैसी बात नहीं है। उस समय मुझे यही करना ठीक लगा।

कॉरपोरेट मैग्जीन में ही लिखने के सवाल पर अरुंधति ने हँसते हुए कहा कि आपने पूछा ही नहीं। उन्होंने कहा, “मेरा ऐसा है कि जैसे ही मेरा एस्से आउटलुक में छपता था, उसी पल इतनी सारी भाषाओं में ट्रांसलेट होता था, इंटरनेट में होता था। मैंने इससे कोई पैसा नहीं बनाया। यह कैसे होता था कि मुझे याद है कि जिस दिन आउटलुक में वॉकिंग विद द कॉमरेड्स छपा, उस के दो दिन बाद मैं अमेरिका में थी सेन फ्रांसिस्को में मैं लेक्चर दे रही थी। लेक्चर के बाद कोई आ कर मुझे `वॉकिंग विद द कॉमरेड्स` किताब दिखा रहा था।

उन्होंने किताब बना दी। लिखकर, `विद द परमिशन ऑफ द राइटर`। अरुंधति ने हँसते हुए कहा कि यह महत्वपूर्ण है कि हम में से कोई है जिसे मेनस्ट्रीम में जगह मिलती है, वह जगह लेनी चाहिए। अपने आप को कभी मार्जिनलाइज्ड नहीं करना चाहिए। अपनी राजनीतिक और साहित्यिक निबंधों की नयी किताब `AZADI: Freedom. Fascism. Fiction` दिखाते हुए अरुंधति ने बताया कि इसका हिन्दी अनुवाद राजकमल प्रकाशन से आएगा। 

(जनचौक ब्यूरो की रिपोर्ट।)

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