Thursday, October 21, 2021

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विचार की स्वतंत्रता के बगैर आप कुछ भी कैसे व्यक्त कर सकते हैं: हाईकोर्ट ने नए आईटी नियमों पर केंद्र से पूछा

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नए आईटी नियमों पर मोदी सरकार देश के उच्च न्यायालयों में घिरती नजर आ रही है। इसके बचाव में केंद्र सरकार की दलीलें न्यायालयों को संतुष्ट नहीं कर पा रही हैं। एक ओर जहाँ बाम्बे हाईकोर्ट ने शुक्रवार को केंद्र सरकार से पूछा कि 2009 में लागू हुए मौजूदा आईटी नियमों को हटाये बिना हाल में अधिसूचित सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) नियम, 2021 को पेश करने की क्या आवश्यकता थी वहीं दूसरी ओर मद्रास हाईकोर्ट ने आईटी नियम 2021 को चुनौती देने वाली याचिकाओं के जवाब में देरी के लिए केंद्र को फटकार लगाई और केंद्र से पूछा कि आदेश के बावजूद केंद्र की ओर से जवाबी हलफनामा क्यों नहीं दाखिल किया गया?’  

बाम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि जब तक आपको विचार करने की स्वतंत्रता नहीं है, आप खुद को कैसे व्यक्त कर सकते हैं? आप विचार की स्वतंत्रता को सीमित कर रहे हैं। लेकिन आपके नियमों के अनुसार, ऐसा लगता है कि एक मामूली उल्लंघन व्यक्ति को कार्रवाई के लिए उत्तरदायी बनाता है।

चीफ जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस जीएस कुलकर्णी की खंडपीठ ने नए आईटी नियमों के कार्यान्वयन पर अंतरिम रोक लगाने के अनुरोध वाली दो याचिकाओं पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया। समाचार वेबसाइट ‘लीफलेट’ और पत्रकार निखिल वागले की ओर से यह याचिकाएं दायर की गई हैं। याचिकाओं में नये नियमों के कई प्रावधानों पर आपत्तियां जताई गई हैं।

खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि वह याचिकाकर्ताओं, नियम 9 के संचालन के लिए इच्छुक है, जो आईटी नियम 2021 द्वारा निर्धारित आचार संहिता का पालन करना अनिवार्य है। पीठ ने कहा कि हम इस हद तक सीमित राहत देने के इच्छुक हैं कि आचार संहिता के किसी भी कथित उल्लंघन के लिए, अदालत की अनुमति प्राप्त किए बिना अकेले आपके (पत्रक) या श्री वागले के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए क्योंकि वह भी एक पत्रकार हैं। पीठ शनिवार को शाम साढ़े पांच बजे आदेश सुनाएगी।

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि सामग्री के नियमन और उत्तरदायित्व की मांग करना ऐसे मापदंडों पर आधारित है जो अस्पष्ट हैं और वर्तमान आईटी नियमों के प्रावधानों तथा संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के परे हैं। उन्होंने कहा कि ये नियम संविधान के अनुच्छेद 19 (2) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रावधानों से भी परे जाते हैं।

इससे पहले सुनवाई के दौरान, केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अनिल सिंह ने कहा कि यहां तक कि प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (पीसीआई) ने भी पत्रकारों द्वारा पालन की जाने वाली आचार संहिता निर्धारित की है।

इसपर खंड पीठ ने कहा कि पीसीआई दिशानिर्देश व्यवहार के संबंध में परामर्श मानदंड है और उनके उल्लंघन के लिए कोई कठोर सजा नहीं है। खंडपीठ ने कहा कि आप पीसीआई दिशानिर्देशों पर इतना ऊंचा दर्जा कैसे रख सकते हैं कि उन दिशानिर्देशों का पालन नहीं करने पर जुर्माना लगेगा? जब तक आपके पास विचार की स्वतंत्रता नहीं है, आप कुछ भी कैसे व्यक्त कर सकते हैं? आप किसी की विचार की स्वतंत्रता को कैसे प्रतिबंधित कर सकते हैं?यह देखा गया कि आक्षेपित नियमों के तहत एक आचार संहिता निर्धारित करके, सरकार प्रत्यायोजित कानून के माध्यम से एक वास्तविक कानून में कुछ ला रही है।

चीफ जस्टिस दत्ता ने पूछा कि प्रेस काउंसिल आचार संहिता सिर्फ दिशानिर्देश हैं, आप इसे इतने ऊंचे दर्जे पर कैसे रख सकते हैं कि वे कार्रवाई के लिए उत्तरदायी होंगे? उन्होंने कहा कि क्या प्रेस काउंसिल एक्ट और केबल टीवी एक्ट के तहत पहले से नियंत्रित किसी चीज को इन नियमों के दायरे में लाया जा सकता है? यही वह सवाल है जिसका जवाब देना होगा। पीठ ने पीसीआई के दिशा-निर्देशों को पढ़ा और कहा कि इसमें यह नहीं कहा गया है कि नियमों में, किसी भी उल्लंघन पर कार्रवाई की जाएगी। वे कुछ मात्रा में विवेक की अनुमति देते हैं। विवेक पर कुछ तत्व बाकी है।

अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सिंह ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को नए नियमों के उल्लंघन पर प्रतिकूल कार्रवाई की आशंका समय से पहले थी। लीफलेट  के लिए पेश हुए एडवोकेट खंबाटा और वागले की ओर से पेश वकील अभय नेवागी ने दलील दी कि केंद्र सरकार जो नए नियम लाई थी वे वास्तव में एक वास्तविक कानून की तरह कार्य करेंगे।उच्च न्यायालय ने कहा कि वह शनिवार को याचिकाओं के माध्यम से मांगी गई अंतरिम राहत पर अपना आदेश सुनाएगा।

इस बीच मद्रास हाईकोर्ट ने बुधवार को सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 (आईटी नियम, 2021) की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अपना जवाब दाखिल करने के लिए भारत सरकार के वकील द्वारा और समय देने का अनुरोध करने पर गंभीर आपत्ति जताई। चीफ जस्टिस  संजीब बनर्जी और जस्टिस पीडी ऑडिकेसवालु की खंडपीठ ने कहा कि अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल को यह बताना चाहिए कि पिछले निर्देशों के बावजूद केंद्र की ओर से जवाबी हलफनामा दाखिल नहीं करने के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ उचित कार्रवाई क्यों नहीं की जानी चाहिए।

हाईकोर्ट वर्तमान में आईटी नियम, 2021 की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली दो रिट याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था। मद्रास हाईकोर्ट ने पिछले महीने प्रशंसित कर्नाटक गायक और रेमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता टीएम कृष्णा द्वारा दायर याचिका पर नोटिस जारी किया था, जिन्होंने इस नियम को चुनौती देते हुए दावा किया था कि यह नियम डिजिटल समाचार मीडिया और सोशल मीडिया इंटरमीडियर पर मनमाना, अस्पष्ट, अनुपातहीन और अनुचित प्रतिबंध लगाता है।

डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन के साथ-साथ पत्रकार मुकुंद पद्मनाभन द्वारा दायर याचिका पर भी नोटिस जारी किया गया था, जिसमें आईटी की संवैधानिकता को चुनौती दी गई थी और इसे शून्य और भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) और 19(1)(जी), अनुच्छेद 14 के उल्लंघन के रूप में घोषित करने की मांग की गई थी।

मद्रास हाईकोर्ट ने 23 जून को दोनों मामलों को एक साथ टैग किया और याचिकाकर्ताओं को 2021 आईटी नियमों के नियम 12, 14 और 16 के तहत उनके खिलाफ कोई भी दंडात्मक कार्रवाई किए जाने की स्थिति में उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने की स्वतंत्रता दी थी। हाईकोर्ट ने 14 जुलाई को सुनवाई को तीन हफ्ते के लिए स्थगित करने से पहले केंद्र सरकार को जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए दो हफ्ते का समय दिया था।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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