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Categories: बीच बहस

पीएम मोदी का वादा पूरा हुआ, युवकों को मिला इंसानों की हत्या का रोजगार

नई दिल्ली। दिल्ली नरसंहार मामले में कुछ चीजें जो छूट गयी थीं उन पर बात किए गए बगैर कहानी पूरी नहीं होगी। आम तौर पर अभी तक प्रायोजित दंगों में देखा गया है कि संघ और बीजेपी दलितों का इस्तेमाल करती रही हैं। और चूंकि ज्यादातर दंगे शहरों में होते रहे हैं लिहाजा यहां का वाल्मीकि समुदाय उनका हथियार बनता रहा है। यहां बताना जरूरी है कि वाल्मीकि समुदाय को बीजेपी के आधार के तौर पर देखा जाता रहा है। 2002 के गुजरात दंगों में यह तस्वीर और ज्यादा उभर कर सामने आयी थी। जब विश्व हिंदू परिषद ने नरसंहार के लिए दलितों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया था।

अशोक मोची तो दंगों का चेहरा ही बन गया था। लेकिन इस बीच दलितों में आयी जागरूरकता का असर रहा या फिर संघ और बीजेपी के दलित विरोधी चेहरे के पर्दाफाश होने का नतीजा। बता पाना मुश्किल है। लेकिन दिल्ली के इस दंगे में दलितों की वह भूमिका नहीं रही। बल्कि भीम आर्मी द्वारा बुलाए गए भारत बंद के दिन यह तबका एक तरह से सीएए विरोधी मुस्लिम प्रदर्शनकारियों के साथ ही खड़ा था। हालांकि अभी इसको लेकर कोई अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। लेकिन हिंसाग्रस्त क्षेत्रों के दौरे में कहीं इसकी कोई निशानी देखने को नहीं मिली। गूर्जरों के सिलसिले में यह आम बात दिखी। जिसमें बाहर से आए लोगों को स्थानीय लोगों द्वारा मदद पहुंचायी गयी।

और एक दूसरी अहम बात जो फासिस्ट ताकतों के मंसूबों पर पानी फेर देता है। वह यह कि बड़े स्तर पर लोग एक दूसरे के साथ खड़े हुए हैं। वह हिंदू हो या कि मुस्लिम। अपने पड़ोसियों और कई जगहों पर पूरे मोहल्ले की साझा एकता बनाकर लोगों ने इस काम को किया है। कई स्थानों पर उन्होंने मिलकर न केवल दंगाइयों का मुकाबला किया बल्कि जरूरत पड़ने पर अपनी जान भी दे दी।

एक हिंदू युवक ने तो अद्भुत मिसाल पेश की। उसने आग लगने पर अपने पड़ोसी मुस्लिम परिवार को जलते घर से निकाला। और बाद में जब उसे पता चला कि परिवार की बूढ़ी महिला अंदर ही छूट गयी है तो अपनी जान की परवाह किए बगैर वह फिर से जलते घर में कूद पड़ा। उसने बूढ़ी दादी को तो बचा लिया लेकिन खुद शहीद हो गया। इस तरह की एक नहीं हजार घटनाएं देखने और सुनने को मिल रही हैं। सुनील कुमार ने किस तरह से एक पूरे मुस्लिम परिवार को अपने घर में रखकर उन्हें दंगाइयों की नजरों से दूर रखा। यह कहानी अब हर किसी की जुबान पर है। बाद में कुछ लोगों द्वारा देशद्रोही कहे जाने पर वह कुछ दुखी भी थे। लेकिन निराश नहीं। क्योंकि उन्हें इस बात का एहसास था कि उन्होंने सही काम किया है। सुनील ने बताया कि उनकी बच्ची को इसी मुस्लिम परिवार ने पाला था। ऐसे संकट के समय उसका साथ ने दने पर शायद ही उनका जमीर उनको कभी माफ कर पाता।

घोंडा के एक मोहल्ले की एक गली में हिंदू-मुस्लिम 40 साल से एक साथ रह रहे थे। इस दौरान जब दंगाइयों ने हमला बोला तो दोनों ने मिलकर उनका मुकाबला किया। हालांकि इस कड़ी में चार लोगों को गोली लगी जिसमें 32 साल के एक फारूक की मौत हो गयी और उसके दो मासूम बच्चे अनाथ हो गए। इसी तरह से खजूरी खास के एक गांव गढ़ी मेंडू में दंगाई 40 मुस्लिम परिवारों के घर जला दिए। लेकिन उसी में एक मोहम्मद इलियास के साथ उनके पड़ोसी भीम भाई खड़े हो गए। उन्हें परिवार समेत न केवल अपने घर में रखा बल्कि हर तरह से उनकी और उनके घर की सुरक्षा की। नतीजतन भागने के लिए मजबूर दूसरे मुस्लिम परिवारों में वह अकेले हैं जो अभी भी पूरे सम्मान के साथ अपने मकान में रह रहे हैं।

दंगाइयों के बड़े हिस्से के बाहर से आने की पुष्टि दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग की एक रिपोर्ट से भी होती है। जिसमें बताया गया है कि तकरीबन 2000 लोगों को बाहर से ढो कर लाया गया था। इन सभी को लाकर 24 घंटे के लिए आस-पास के स्कूलों में ठहराया गया था। ऐसा दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष जफरुल इस्लाम का कहना है। इसी तरह की एक रिपोर्ट पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक गांव से आयी है। जिसमें बताया गया था कि तकरीबन 45 युवकों को 30-30 हजार रूपये देकर लाया गया था। जिनमें से तीन का शव गांव लौटा। लेकिन 12 युवक अभी भी लापता हैं। इस दंगे में युवकों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया है। ढेर सारी ऐसी तस्वीरें आयी हैं जिनमें बगैर रेख-दाढ़ी वाले युवक हाथों में लाठियां, तलवार और दूसरे हथियार लिए सड़कों पर मार्च करते देखे जा सकते हैं।

12 से 16 साल के इन नाबालिग युवकों की अभी कोई सोच भी नहीं बन पायी है लेकिन उन्हें दंगों में चारे के बतौर झोंक दिया गया। एक पोर्टल की एक रिपोर्ट का हवाला देना यहां गैरमुनासिब नहीं होगा जिसमें बताया गया है कि स्वदेशी का नारा देने वाले बीजेपी के 15 कैबिनेट मंत्रियों के बेटे-बेटियां विदेशी विश्वविद्यालयों से डिग्रियां ले चुके हैं या अभी भी वहां शिक्षा हासिल कर रहे हैं। मौजूदा समय की यह बेहद विडंबनापूर्ण तस्वीर है।एक तरफ दंगों के प्रायोजक अपने बच्चों को विदेश में शिक्षा दिलवाकर उनका कैरियर बनवा रहे हैं जबकि दूसरी तरफ आम लोगों के बेटों को तमंचा पकड़ाकर दंगाई कारोबार में झोंक दिया गया है। बहरहाल देश में मोदी ने जिन दो करोड़ लोगों को सालाना रोजगार देने की बात कही थी शायद यह वही कार्यक्रम था जिसके तहत युवकों को इंसानों की हत्या का रोजगार दे दिया गया है।

इसके अलावा इस दौरान दिल्ली में सत्तारूढ़ दल आम आदमी पार्टी और उसके मुखिया अरविंद केजरीवाल की भूमिका की समीक्षा किए बगैर यह लेख पूरा नहीं होगा। जब संघ और बीजेपी अपने ‘कारोबार’ में लगे थे। तब सवाल उठता है कि उस समय मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल क्या कर रहे थे। इसका जवाब यह है कि केजरीवाल वह लंगूर बन गए थे जिसे शेर की जगह जंगल का राजा बना दिया गया था। और इस डाल से उस डाल कूद-फांद कर रहे थे। कभी उन्होंने गृहमंत्री के साथ बैठक की तो कभी राजघाट पर सिर नवाया। लेकिन एक बार फिर दंगाग्रस्त क्षेत्र में जाने की जहमत नहीं उठायी। लोगों का कहना है कि अगर मुख्यमंत्री खुद दंगाग्रस्त क्षेत्र में पहुंच जाते तो हालात तत्काल काबू में आ जाते।

चुनाव से पहले तो था ही जीतने के बाद भी जिस तरह से केजरीवाल ने अल्पसंख्यकों से किनारा किया वह बात किसी से छुपी नहीं है। न उन्होंने एक बार शाहीन बाग का दौरा करना उचित समझा और न ही उस पर कोई बयान दिया। और इस तरह से उनकी पूरी भूमिका संघ की बी टीम की रही। यह राजधानी के अल्पसंख्यकों और सेकुलर हिस्सों का वोट लेकर उनके सीने में छूरा घोंपने सरीखा था। राजनीतिक तौर पर पूरी दिल्ली एक तरह से दंगाइयों के पक्ष में चली गयी।

अगर देंखे तो बीजेपी के अलावा चुनाव में आप को ही मत मिला था। रही बात कांग्रेस की तो वह हासिये पर फेंक दी गयी थी। इस तरह से राजनीतिक जमात का बहुसंख्य हिस्सा दंगाइयों का समर्थन किया या फिर वह चुप हो गया। जो एक तरह से दंगाइयों के साथ ही जाने का संदेश था। इस तरह से पूरा अल्पसंख्यक समाज राजनीतिक रुप से अनाथ हो गया। उसकी अपनी कोई राजनीतिक आवाज ही नहीं बची। जिसका पूरा फायदा संघ और बीजेपी ने उठाया।

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संपादक हैं।)

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This post was last modified on March 5, 2020 3:44 pm

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